कैसे लगी है ऑस्ट्रेलिया की भयानक आग, जिसमें करीब पचास करोड़ जानवर जलकर मर गए
जितना पाकिस्तान का क्षेत्रफल है, उससे ज़्यादा बड़ी जगह पर ये आग लगी हुई है.
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बायीं तरफ जो तस्वीर है. इन चिंगारियों के उड़ने को एम्बर अटैक कहा जाता है. (तस्वीर साभार: Twitter)
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ऑस्ट्रेलिया. भारत के दक्षिणी छोर से निकलें, और दक्षिण पश्चिम की तरफ बढ़ते चलें. तो तकरीबन 7,134 किलोमीटर आगे बढ़ने पर ये देश आता है. द लैंड डाउन अंडर. इस वक़्त ये देश धधक रहा है. क्यों? क्योंकि सितंबर से यहां के जंगलों में आग लगी हुई है.
इन्हें ऑस्ट्रेलियन बुशफायर कहा जा रहा है. 6 जनवरी को तापमान कई जगहों पर 44 से 49 डिग्री तक रहा. जोकि बेहद तीखी गर्मियों के दौरान होता है. दिसंबर की सर्दियों के दौरान नहीं.
कैसे लगी ये आग?
हर साल गर्मी के दिनों में जंगलों में आग लगती ही है. 6 सितंबर को सबसे पहले न्यू साउथ वेल्स के पास आग भड़की. यहां से शुरू हुई ये तबाही अभी तक चले जा रही है. हर साल गर्मियों के दौरान जंगलों में आग लगती है. हमारे देश में भी. इसे दावानल कहते हैं. गर्मियों के दौरान जंगलों में सूखे पेड़ों की मात्रा बढ़ जाती है. बिजली गिरने या आपस में सूखी लकड़ी घिसने से आग लग जाती है. जो फैलती जाती है. आम तौर पर बारिश होने या जंगल के किसी गीले हिस्से तक पहुंचने पर आग शांत हो जाती है. लेकिन ऑस्ट्रेलिया के मामले में ऐसा नहीं हुआ.
इस मैप में देख सकते हैं कि ऑस्ट्रेलिया में लगी आग कितनी भयानक है. दक्षिण की ओर न्यूजीलैंड भी दिखाई दे रहा जहाँ तक इस आग का धुआं पहुंच गया. (तस्वीर साभार:myfirewatch.landgate.wa.gov.au)
पिछले कई सालों से ऑस्ट्रेलिया में सूखे की स्थिति बन रही है. 2019 ऑस्ट्रेलिया के पिछले दशक का सबसे सूखा साल भी था. इसकी वजह से सूखी हवा आग को फैलाने में मददगार साबित हुई. इसके अलावा नवंबर में ऑस्ट्रेलियाई अधिकारियों ने एक 19 साल के लड़के को भी गिरफ्तार किया. उस पर आरोप लगे कि उसने अलग-अलग जगहों पर जाकर आग लगाई. इससे आग और ज्यादा भड़क गई.
मौसम विज्ञान समझने वाले लोग ये भी बता रहे हैं कि ऑस्ट्रेलिया के पास जो भारतीय महासागर है, उसका तापमान भी बढ़ा है. पूर्व की तरफ उसका तापमान कम है, इसलिए बारिश करने वाली हवाएं उस तरफ बह रही हैं. ऑस्ट्रेलिया की तरफ नहीं आ रहीं.
क्या असर पड़ा है इस आग का?
ये आग अभी तक आठ लाख चालीस हजार स्क्वायर किलोमीटर के क्षेत्र में फैली हुई है. ये एरिया इतना बड़ा है कि इसमें पूरा पाकिस्तान फिट हो जाएगा. फिर भी जगह बच जाएगी. तकरीबन डेढ़ हज़ार घर बर्बाद हो चुके हैं इस आग से. सितंबर से लेकर अब तक 26 लोगों के इसमें मारे जाने की खबर है. तकरीबन 50 करोड़ जानवरों के मरने की रिपोर्ट्स भी आ रही हैं. ऑस्ट्रेलिया के ही एक मंत्री ने तो इस आग की तुलना एटॉमिक बम तक से कर दी. लोग इस आग से बचने के लिए समंदर किनारे जाकर बैठ गए या फिर नावों में चले गए. इन सभी को बचाव दल भेज कर बचाया गया.
कोआला भालू, जो ऑस्ट्रेलिया के मशहूर जंतु हैं, उनके ऊपर भी बहुत असर पड़ा है. न्यू साउथ वेल्स के तीस फीसद कोआला इस आग में मारे गए, और कंगारू आइलैंड के 50 फीसद कोआला मारे गए हैं. 3500 से ज्यादा लोग इस आग से निबटने के लिए लगाए गए हैं. लेकिन उनका कोई असर नहीं हो पा रहा है.
ये आग इतने बढ़े क्षेत्र में फैली है कि इसकी वजह से बड़े बड़े बादल बन रहे हैं, जिनसे बिजली भी कड़क रही है. ये पूरे मौसम को बदल देने वाली घटनाएं हैं. आम तौर पर ज्वालामुखी फटने या एटमी धमाके के धुएं से ऐसा होता है.
तो क्या जंगलों में आग लगना हमेशा बुरा होता है?
नहीं. कुछ हद तक इसका लगना ज़रूरी होता है क्योंकि इस आग से ज़मीन की मिट्टी बेहतर होती है. जले हुए पेड़ों से ज़रूरी मिनरल मिट्टी में जाते हैं. सड़ रहे पौधे और घासफूस भी इससे साफ़ हो जाते हैं. बहुत घने जंगलों में जब आग लगती है तो ऊपर के घने हिस्से साफ़ कर देती है. इससे धूप उन हिस्सों में पहुंच पाती है जहां बाकी समय पेड़ उसे ब्लॉक कर देते हैं. बूढ़े सूखे पेड़ जब जल कर ठूंठ हो जाते हैं तो उनमें जंगली जानवर घर बना लेते हैं. यही नहीं, आग कई बीमारी फैलाने वाले कीड़े मकोड़ों को भी साफ़ कर देती है. इससे जवान, मजबूत पेड़ जो आग से बच जाते हैं वो बेहतर बढ़ते हैं. नए पौधों को भी सुरक्षा मिलती है.
इस आग को काबू में करने के लिए प्लेन से आग बुझाने वाले केमिकल और डिवाइस भी गिराए जा रहे हैं. लेकिन उनसे कोई ख़ास फायदा नहीं हो पाया है. इस तस्वीर में एक ऐसा ही प्लेन उड़ता हुआ दिख रहा है. (तस्वीर: रायटर्स)
दिक्कत तब होती है जब आग कंट्रोल से बाहर हो जाए. जब इसे शांत करने वाला मौसम ही न हो. जब आग ऐसी फैले कि सूखे पेड़ों के साथ हरे-भरे पेड़ों को भी जलाकर राख कर दे. जानवरों के छुपने के लिए जगह न छोड़े. जो इस वक़्त ऑस्ट्रेलिया में हो रहा है. आसमान धधकती आग से नारंगी हो रखा है. 1200 मील दूर बसे न्यूजीलैंड के आसमान तक इसका रंग फ़ैल गया है. पिछले साल ही एमेज़ोन के वर्षावनों में लगी आग हफ़्तों तक जलती रही थी. वैज्ञानिक बार बार इस बात पर जोर दे रहे हैं कि क्लाइमेट चेंज की वजह से इस तरह की घटनाएं हो रही हैं. ग्लेशियर, जो अधिकतर नदियों के स्रोत हैं, तेजी से पिघल रहे हैं. लेकिन कोई बड़ा कदम किसी देश ने उठाया हो, जिससे फर्क पड़ा हो, ये कहना मुश्किल है.
वीडियो: JNU हिंसा पर सावधान इंडिया वाले सुशांत सिंह की बात नकाबपोशों की बत्ती गुल कर देगी
इन्हें ऑस्ट्रेलियन बुशफायर कहा जा रहा है. 6 जनवरी को तापमान कई जगहों पर 44 से 49 डिग्री तक रहा. जोकि बेहद तीखी गर्मियों के दौरान होता है. दिसंबर की सर्दियों के दौरान नहीं.
कैसे लगी ये आग?
हर साल गर्मी के दिनों में जंगलों में आग लगती ही है. 6 सितंबर को सबसे पहले न्यू साउथ वेल्स के पास आग भड़की. यहां से शुरू हुई ये तबाही अभी तक चले जा रही है. हर साल गर्मियों के दौरान जंगलों में आग लगती है. हमारे देश में भी. इसे दावानल कहते हैं. गर्मियों के दौरान जंगलों में सूखे पेड़ों की मात्रा बढ़ जाती है. बिजली गिरने या आपस में सूखी लकड़ी घिसने से आग लग जाती है. जो फैलती जाती है. आम तौर पर बारिश होने या जंगल के किसी गीले हिस्से तक पहुंचने पर आग शांत हो जाती है. लेकिन ऑस्ट्रेलिया के मामले में ऐसा नहीं हुआ.
इस मैप में देख सकते हैं कि ऑस्ट्रेलिया में लगी आग कितनी भयानक है. दक्षिण की ओर न्यूजीलैंड भी दिखाई दे रहा जहाँ तक इस आग का धुआं पहुंच गया. (तस्वीर साभार:myfirewatch.landgate.wa.gov.au)पिछले कई सालों से ऑस्ट्रेलिया में सूखे की स्थिति बन रही है. 2019 ऑस्ट्रेलिया के पिछले दशक का सबसे सूखा साल भी था. इसकी वजह से सूखी हवा आग को फैलाने में मददगार साबित हुई. इसके अलावा नवंबर में ऑस्ट्रेलियाई अधिकारियों ने एक 19 साल के लड़के को भी गिरफ्तार किया. उस पर आरोप लगे कि उसने अलग-अलग जगहों पर जाकर आग लगाई. इससे आग और ज्यादा भड़क गई.
मौसम विज्ञान समझने वाले लोग ये भी बता रहे हैं कि ऑस्ट्रेलिया के पास जो भारतीय महासागर है, उसका तापमान भी बढ़ा है. पूर्व की तरफ उसका तापमान कम है, इसलिए बारिश करने वाली हवाएं उस तरफ बह रही हैं. ऑस्ट्रेलिया की तरफ नहीं आ रहीं.
क्या असर पड़ा है इस आग का?
ये आग अभी तक आठ लाख चालीस हजार स्क्वायर किलोमीटर के क्षेत्र में फैली हुई है. ये एरिया इतना बड़ा है कि इसमें पूरा पाकिस्तान फिट हो जाएगा. फिर भी जगह बच जाएगी. तकरीबन डेढ़ हज़ार घर बर्बाद हो चुके हैं इस आग से. सितंबर से लेकर अब तक 26 लोगों के इसमें मारे जाने की खबर है. तकरीबन 50 करोड़ जानवरों के मरने की रिपोर्ट्स भी आ रही हैं. ऑस्ट्रेलिया के ही एक मंत्री ने तो इस आग की तुलना एटॉमिक बम तक से कर दी. लोग इस आग से बचने के लिए समंदर किनारे जाकर बैठ गए या फिर नावों में चले गए. इन सभी को बचाव दल भेज कर बचाया गया.
कोआला भालू, जो ऑस्ट्रेलिया के मशहूर जंतु हैं, उनके ऊपर भी बहुत असर पड़ा है. न्यू साउथ वेल्स के तीस फीसद कोआला इस आग में मारे गए, और कंगारू आइलैंड के 50 फीसद कोआला मारे गए हैं. 3500 से ज्यादा लोग इस आग से निबटने के लिए लगाए गए हैं. लेकिन उनका कोई असर नहीं हो पा रहा है.
ये आग इतने बढ़े क्षेत्र में फैली है कि इसकी वजह से बड़े बड़े बादल बन रहे हैं, जिनसे बिजली भी कड़क रही है. ये पूरे मौसम को बदल देने वाली घटनाएं हैं. आम तौर पर ज्वालामुखी फटने या एटमी धमाके के धुएं से ऐसा होता है.
Koalas are more at risk in the fires because they’re slow, making it even more difficult for them to escape the flames. They also eat eucalyptus, a tree whose leaves contain highly flammable oils. pic.twitter.com/QJVOSsg1q2
— Earth (@earth) January 5, 2020
तो क्या जंगलों में आग लगना हमेशा बुरा होता है?
नहीं. कुछ हद तक इसका लगना ज़रूरी होता है क्योंकि इस आग से ज़मीन की मिट्टी बेहतर होती है. जले हुए पेड़ों से ज़रूरी मिनरल मिट्टी में जाते हैं. सड़ रहे पौधे और घासफूस भी इससे साफ़ हो जाते हैं. बहुत घने जंगलों में जब आग लगती है तो ऊपर के घने हिस्से साफ़ कर देती है. इससे धूप उन हिस्सों में पहुंच पाती है जहां बाकी समय पेड़ उसे ब्लॉक कर देते हैं. बूढ़े सूखे पेड़ जब जल कर ठूंठ हो जाते हैं तो उनमें जंगली जानवर घर बना लेते हैं. यही नहीं, आग कई बीमारी फैलाने वाले कीड़े मकोड़ों को भी साफ़ कर देती है. इससे जवान, मजबूत पेड़ जो आग से बच जाते हैं वो बेहतर बढ़ते हैं. नए पौधों को भी सुरक्षा मिलती है.
इस आग को काबू में करने के लिए प्लेन से आग बुझाने वाले केमिकल और डिवाइस भी गिराए जा रहे हैं. लेकिन उनसे कोई ख़ास फायदा नहीं हो पाया है. इस तस्वीर में एक ऐसा ही प्लेन उड़ता हुआ दिख रहा है. (तस्वीर: रायटर्स)दिक्कत तब होती है जब आग कंट्रोल से बाहर हो जाए. जब इसे शांत करने वाला मौसम ही न हो. जब आग ऐसी फैले कि सूखे पेड़ों के साथ हरे-भरे पेड़ों को भी जलाकर राख कर दे. जानवरों के छुपने के लिए जगह न छोड़े. जो इस वक़्त ऑस्ट्रेलिया में हो रहा है. आसमान धधकती आग से नारंगी हो रखा है. 1200 मील दूर बसे न्यूजीलैंड के आसमान तक इसका रंग फ़ैल गया है. पिछले साल ही एमेज़ोन के वर्षावनों में लगी आग हफ़्तों तक जलती रही थी. वैज्ञानिक बार बार इस बात पर जोर दे रहे हैं कि क्लाइमेट चेंज की वजह से इस तरह की घटनाएं हो रही हैं. ग्लेशियर, जो अधिकतर नदियों के स्रोत हैं, तेजी से पिघल रहे हैं. लेकिन कोई बड़ा कदम किसी देश ने उठाया हो, जिससे फर्क पड़ा हो, ये कहना मुश्किल है.
वीडियो: JNU हिंसा पर सावधान इंडिया वाले सुशांत सिंह की बात नकाबपोशों की बत्ती गुल कर देगी

