जिस आर्टिकल 19 की सुप्रीम कोर्ट ने मोदी सरकार को याद दिलाई , वो क्या है?
इंटरनेट कैसे बन गया मौलिक अधिकार?
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सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर में लगी हुई पाबंदियों पर सुनवाई की. इसमें आर्टिकल 19 का हवाला देते हुए इंटरनेट को मौलिक अधिकार बताया. धारा 144 के दुरूपयोग पर भी सवाल उठाए. (तस्वीर: बायीं ओर लोकसभा के शीत सत्र में बैठे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह: Mail Today/ दायीं ओर सांकेतिक तस्वीर: Getty Images)
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पांच अगस्त, 2019 से कश्मीर में इंटरनेट सेवा बंद है. इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई. जस्टिस एनवी रमन्ना, जस्टिस आर सुभाष रेड्डी और जस्टिस बीआर गवई ने इस पर फैसला सुरक्षित रखा था. ये बात है 27 नवंबर 2019 की. अब 10 जनवरी, शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने इस जनहित याचिका पर फैसला सुनाया है.
बेंच के सदस्य वही थे. इस पूरे मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा,
ये आर्टिकल 'फ्रीडम ऑफ स्पीच' यानी अभिव्यक्ति की आजादी से जुड़ा हुआ है. इस आर्टिकल के पहले क्लॉज में लिखा है कि सभी नागरिकों को ये अधिकार प्राप्त हैं:
इसी का हवाला देकर सुप्रीम कोर्ट ने ये कहा कि राज्य सरकार को इंटरनेट पर पाबंदी, धारा 144, यात्रा पर रोक से जुड़े सभी आदेशों को पब्लिश करना होगा. कोर्ट ने एक कमेटी बनाई है, जो राज्य सरकार के फैसलों का रिव्यू करेगी और सात दिन के बाद कोर्ट को रिपोर्ट करेगी.
ये भी पढ़ें: बवाल होने पर पुलिस क्या करके इंटरनेट बंद करवा देती है?
इंटरनेट क्या एक बेसिक ह्यूमन राइट (जरूरी मानवाधिकार) है?
यूनाइटेड नेशंस (संयुक्त राष्ट्र) ने 2016 में ही इंटरनेट को 'मानवाधिकार' घोषित कर दिया था. एक नॉन-बाइंडिंग प्रस्ताव पास किया गया, जिसमें किसी भी तरह से इंटरनेट पर रोकथाम को गलत बताया गया है. 70 देशों इसके पक्ष में रहे. 17 देशों ने विरोध किया. उन 17 देशों में भारत शामिल है. यही नहीं, भारत के साथ बांग्लादेश, दक्षिण अफ्रीका, चीन, सऊदी अरब, क्यूबा, और वियतनाम जैसे देश भी इसके खिलाफ रहे.
साल भर में, जुलाई 2015 से जून 2016 तक, इंटरनेट शटडाउन की वजह से पूरी दुनिया में ढाई बिलियन डॉलर का नुकसान हुआ. (सांकेतिक तस्वीर)
भारत सरकार ने पिछले पांच साल में डिजिटल इंडिया पर जोर दिया है. इसके लिए ऑनलाइन ट्रांजेक्शन, नए पोर्टल इत्यादि सामने आए हैं. जैसे भीम-पे, फोन-पे. बिजली का बिल भरने से लेकर यूनिवर्सिटी का फॉर्म भरने तक- सब कुछ ऑनलाइन करने पर जोर है. और बिना इंटरनेट के आप ऑनलाइन नहीं हो सकते. यानी इंटरनेट एक लक्जरी नहीं है. बेसिक जरूरत की तरह है.
भारत में केरल पहला ऐसा राज्य है, जिसने इंटरनेट को बेसिक ह्यूमन राइट घोषित किया है. 2017 में इस घोषणा के बाद 1000 करोड़ की लागत से प्रोजेक्ट शुरू किया गया, जिससे तकरीबन 20 लाख गरीब परिवारों को मुफ्त में इंटरनेट सुविधा मिलने की बात कही गई, और बाकियों को सब्सिडी के साथ.
इंटरनेट इसलिए भी जरूरी बनता जा रहा है, क्योंकि कई सरकारी पेमेंट भी ऑनलाइन हो गई हैं. कई एक्जाम ऑनलाइन हो गए हैं. कई एडमिशन प्रक्रियाएं ऑनलाइन हो गई हैं. यही नहीं, पढ़ाई-लिखाई से जुड़े कई दूसरे काम ऑनलाइन होने लगे हैं. नौकरियां ऑनलाइन हो गई हैं. बिना इंटरनेट के लोग अपना काम नहीं कर पा रहे हैं.
ऐसे में अगर एक जगह के लोगों को इंटरनेट की सुविधा मिल रही हो और दूसरी जगह के लोगों को नहीं, तो ये उनके साथ भेदभाव और उनके अधिकारों का हनन ही कहा जाएगा. सुप्रीम कोर्ट ने अपने स्टेटमेंट में भी कहा है कि इंटरनेट बैन करना बेहद कड़ा कदम है.
इंटरनेट से कई लोगों की रोजी-रोटी जुड़ी हुई है. ये सिर्फ इंटरटेनमेंट का माध्यम नहीं रह गया. कश्मीर के इस इंटरनेट शटडाउन की वजह से कई लोकल व्यापारी बहुत बड़ा नुकसान झेल रहे हैं. (सांकेतिक तस्वीर)
मानवाधिकार और मौलिक अधिकार में क्या अंतर है?
मौलिक अधिकार हर देश के हिसाब से अलग होते हैं. लेकिन मानवाधिकार पूरी दुनिया में स्वीकृत ऐसे अधिकार होते हैं, जिनसे किसी भी इंसान को अलग नहीं किया जा सकता. भारत का सुप्रीम कोर्ट इसे मौलिक अधिकार मानता है, संविधान के आर्टिकल 19 के तहत.
लेकिन ज़रूरी नहीं है कि हर देश इसे मौलिक अधिकार का दर्जा दे ही. ये अंतर है. लेकिन जहां सुप्रीम कोर्ट इसे मौलिक अधिकार कह रहा है, वहीं भारत पूरी दुनिया का ऐसा पहला लोकतंत्र बन गया है, जहां 158 दिनों तक इंटरनेट बंद किया गया.
Indiaspend नाम की वेबसाइट के अनुसार, 2011 से 2017 तक तकरीबन 16,000 घंटों तक इंटरनेट शटडाउन रहा भारत में. इसमें देश का तकरीबन 213.36 अरब रुपयों का नुकसान हुआ. कश्मीर इससे सबसे ज्यादा प्रभावित इलाका है.
वीडियो:डीयू में एबीवीपी के झंडे के साथ अक्षय कुमार की तस्वीर को ट्रोल करने वाले ये जान लें
बेंच के सदस्य वही थे. इस पूरे मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा,
धारा 144 का दुरुपयोग नहीं किया जा सकता है. धारा 144 को अनंतकाल तक के लिए नहीं लगा सकते हैं. इसे लागू करने के लिए जरूरी तर्क होना चाहिए. धारा 144 का इस्तेमाल विचारों को दबाने के लिए नहीं किया जा सकता है.ये भी पढ़ें: सुप्रीम कोर्ट ने कश्मीर मसले पर सरकार को जोर का झटका दिया
बेहद जरूरी हालात में ही इंटरनेट को बंद किया जा सकता है. इंटरनेट 'फ्रीडम ऑफ स्पीच' के तहत आता है. संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत इंटरनेट को मौलिक अधिकार (फंडामेंटल राइट) के रूप में इस्तेमाल करने का अधिकार देता है.
क्या है संविधान के आर्टिकल 19 में?Supreme Court while delivering verdict on petitions on situation in J&K after abrogation of Article 370: It is no doubt that freedom of speech is an essential tool in a democratic set up.Freedom of Internet access is a fundamental right under Article 19(1)(a) of free speech https://t.co/NcuCbeMxih
— ANI (@ANI) January 10, 2020
ये आर्टिकल 'फ्रीडम ऑफ स्पीच' यानी अभिव्यक्ति की आजादी से जुड़ा हुआ है. इस आर्टिकल के पहले क्लॉज में लिखा है कि सभी नागरिकों को ये अधिकार प्राप्त हैं:
# बोलने और अपने आप को अभिव्यक्त करने की आज़ादी
# शान्ति से बिना हथियारों के कहीं भी इकट्ठा होने की आज़ादी
# एसोसिएशन/संगठन/यूनियन बनाने की आज़ादी
# भारत की सीमा में कहीं भी बेरोक-टोक घूम सकने की आज़ादी
# भारत की सीमा में कहीं भी बस सकने की आज़ादी
# किसी भी प्रोफेशन को अपनाने या नौकरी/व्यापार करने की आज़ादी
आर्टिकल में आगे भी कुछ शर्तें हैं, इन सभी अधिकारों के लिए. इनमें यही बताया गया है कि इन अधिकारों का इस्तेमाल इस तरह नहीं किया जाना चाहिए कि ये किसी क़ानून का उल्लंघन करें. ये अधिकार इस तरह इस्तेमाल किए जाने चाहिए कि वे भारत की संप्रभुता और एकता को खतरा न पहुंचाएं. आम जनजीवन को अस्त-व्यस्त न करें. भारत की सुरक्षा के साथ समझौता न करें. जितने भी अधिकार हैं, उनके इस्तेमाल के लिए कुछ नियम तय किए गए हैं संविधान में. उदाहरण के तौर पर कहीं भी बस सकने की आज़ादी के अधिकार का इस्तेमाल इस तरह न हो कि किसी जनजाति के अधिकारों का हनन हो.इसी का हवाला देकर सुप्रीम कोर्ट ने ये कहा कि राज्य सरकार को इंटरनेट पर पाबंदी, धारा 144, यात्रा पर रोक से जुड़े सभी आदेशों को पब्लिश करना होगा. कोर्ट ने एक कमेटी बनाई है, जो राज्य सरकार के फैसलों का रिव्यू करेगी और सात दिन के बाद कोर्ट को रिपोर्ट करेगी.
ये भी पढ़ें: बवाल होने पर पुलिस क्या करके इंटरनेट बंद करवा देती है?
इंटरनेट क्या एक बेसिक ह्यूमन राइट (जरूरी मानवाधिकार) है?
यूनाइटेड नेशंस (संयुक्त राष्ट्र) ने 2016 में ही इंटरनेट को 'मानवाधिकार' घोषित कर दिया था. एक नॉन-बाइंडिंग प्रस्ताव पास किया गया, जिसमें किसी भी तरह से इंटरनेट पर रोकथाम को गलत बताया गया है. 70 देशों इसके पक्ष में रहे. 17 देशों ने विरोध किया. उन 17 देशों में भारत शामिल है. यही नहीं, भारत के साथ बांग्लादेश, दक्षिण अफ्रीका, चीन, सऊदी अरब, क्यूबा, और वियतनाम जैसे देश भी इसके खिलाफ रहे.
साल भर में, जुलाई 2015 से जून 2016 तक, इंटरनेट शटडाउन की वजह से पूरी दुनिया में ढाई बिलियन डॉलर का नुकसान हुआ. (सांकेतिक तस्वीर)भारत सरकार ने पिछले पांच साल में डिजिटल इंडिया पर जोर दिया है. इसके लिए ऑनलाइन ट्रांजेक्शन, नए पोर्टल इत्यादि सामने आए हैं. जैसे भीम-पे, फोन-पे. बिजली का बिल भरने से लेकर यूनिवर्सिटी का फॉर्म भरने तक- सब कुछ ऑनलाइन करने पर जोर है. और बिना इंटरनेट के आप ऑनलाइन नहीं हो सकते. यानी इंटरनेट एक लक्जरी नहीं है. बेसिक जरूरत की तरह है.
भारत में केरल पहला ऐसा राज्य है, जिसने इंटरनेट को बेसिक ह्यूमन राइट घोषित किया है. 2017 में इस घोषणा के बाद 1000 करोड़ की लागत से प्रोजेक्ट शुरू किया गया, जिससे तकरीबन 20 लाख गरीब परिवारों को मुफ्त में इंटरनेट सुविधा मिलने की बात कही गई, और बाकियों को सब्सिडी के साथ.
इंटरनेट इसलिए भी जरूरी बनता जा रहा है, क्योंकि कई सरकारी पेमेंट भी ऑनलाइन हो गई हैं. कई एक्जाम ऑनलाइन हो गए हैं. कई एडमिशन प्रक्रियाएं ऑनलाइन हो गई हैं. यही नहीं, पढ़ाई-लिखाई से जुड़े कई दूसरे काम ऑनलाइन होने लगे हैं. नौकरियां ऑनलाइन हो गई हैं. बिना इंटरनेट के लोग अपना काम नहीं कर पा रहे हैं.
ऐसे में अगर एक जगह के लोगों को इंटरनेट की सुविधा मिल रही हो और दूसरी जगह के लोगों को नहीं, तो ये उनके साथ भेदभाव और उनके अधिकारों का हनन ही कहा जाएगा. सुप्रीम कोर्ट ने अपने स्टेटमेंट में भी कहा है कि इंटरनेट बैन करना बेहद कड़ा कदम है.
इंटरनेट से कई लोगों की रोजी-रोटी जुड़ी हुई है. ये सिर्फ इंटरटेनमेंट का माध्यम नहीं रह गया. कश्मीर के इस इंटरनेट शटडाउन की वजह से कई लोकल व्यापारी बहुत बड़ा नुकसान झेल रहे हैं. (सांकेतिक तस्वीर)मानवाधिकार और मौलिक अधिकार में क्या अंतर है?
मौलिक अधिकार हर देश के हिसाब से अलग होते हैं. लेकिन मानवाधिकार पूरी दुनिया में स्वीकृत ऐसे अधिकार होते हैं, जिनसे किसी भी इंसान को अलग नहीं किया जा सकता. भारत का सुप्रीम कोर्ट इसे मौलिक अधिकार मानता है, संविधान के आर्टिकल 19 के तहत.
लेकिन ज़रूरी नहीं है कि हर देश इसे मौलिक अधिकार का दर्जा दे ही. ये अंतर है. लेकिन जहां सुप्रीम कोर्ट इसे मौलिक अधिकार कह रहा है, वहीं भारत पूरी दुनिया का ऐसा पहला लोकतंत्र बन गया है, जहां 158 दिनों तक इंटरनेट बंद किया गया.
Indiaspend नाम की वेबसाइट के अनुसार, 2011 से 2017 तक तकरीबन 16,000 घंटों तक इंटरनेट शटडाउन रहा भारत में. इसमें देश का तकरीबन 213.36 अरब रुपयों का नुकसान हुआ. कश्मीर इससे सबसे ज्यादा प्रभावित इलाका है.
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