बॉब डिलन ने लिखा, गाया और 'युद्ध के विचार' को अपने शब्दों से ध्वस्त करदिया. उनके गीत 'ब्लोइंग इन द विंड' की शुरुआती लाइनें पूरी दुनिया में युद्धविरोधीअभियान का एंथम बनीं. लेकिन उन्हें नोबेल पुरस्कार देने पर बहुतों की भौंहें चढ़ीहुई हैं. विरोध और आश्चर्य के स्वर यहां वहां से उठ रहे हैं. एक गायक और गीतकार को'साहित्य' का नोबेल! लाहौल विला कुव्वत! ये हैरत, इसलिए क्योंकि वह गाते थे? याइसलिए कि उनका लिखा मौखिक तौर पर ज्यादा चला? क्या गायकी आपके साहित्य को देखे जानेके परसेप्शन के आड़े आती है? क्या बॉब डिलन मुकम्मल साहित्यकार हैं?लेकिन उससे बड़ा सवाल: क्या बॉब डिलन के बहाने हमारे पॉपुलर गीतकारों के लिए 'साहित्यिक स्वीकृति' की कोईखिड़की खुली है? हमने इस पर चार बॉलीवुड गीतकारों से बात की. मोटा-मोटी वे लोगप्रसन्न हैं. कुछ स्वीकृति खोजने को ही गैरजरूरी मानते हैं और कुछ मौजूदा साहित्यिकमठाधीशी से इतने नाराज़ हैं कि इस खबर को उत्साह से नहीं देखते. जो लोग लिखने केसाथ गाते भी हैं, उनमें से कितनों को हमने गंभीर मंचों पर सम्मान दिया है? कितनोंको गवैया कहकर खारिज कर दिया है? क्या भारत में हमने 'साहित्यिक कलाकार' जैसी कोईजगह बनाई-बचाई है? बॉब डिलन सामाजिक समझदारी वाले 'साहित्यिक कलाकारों' की संभवत:आखिरी खेप में थे. उन्होंने अपना श्रेष्ठ उस दौर में दिया जब विचार महत्वपूर्ण थेऔर कला लक्ष्यविहीन नहीं थी. उसका इंडस्ट्री और मनोरंजन से इतर भी कुछ मतलब था.वहां शासकों से अपीलें थीं, जनता के दहले हुए दिलों के बयान थे. पाब्लो नेरुदा नेये काम कविताओं में किया तो हमने गर्व किया. बॉब यही चीजें गा गए तो सवाल उठते हैं.https://www.youtube.com/watch?v=vWwgrjjIMXA क्या गीतों से दुनिया को बेहतर बनानेकी कोशिशें बॉब डिलन के पक्ष में गई? और क्या इस आधार पर हम उन्हें बाकी पॉपुलरगीतकारों से अलग कर सकते हैं? इन सब सवालों को लेकर हमने बात की पीयूष मिश्रा,इरशाद कामिल, राजशेखर और पुनीत शर्मा से. आगे उनकी बात, उन्हीं की जुबान में:1. पीयूष मिश्रा: पर साहित्यिक कहलाने की लालसा क्यों है?'पॉपुलर लिरिसिस्ट को अवॉर्ड मिला. इससे ये समझना चाहिए कि कुछ बातें सहज तरीके सेकही जा सकती हैं, उनके लिए भारी शब्द कहने की जरूरत नहीं है.' जहां तक आलोचकों कीमुहर का सवाल है, मुझे तो बाकायदा एक्सेप्ट किया जाता है. आपने नामवर सिंह का नामलिया. वे मुझे एक्सेप्ट करते हैं. लेकिन साहित्यिक कहलाने की लालसा ही क्यों होनीचाहिए. अपना मौज-मस्ती में लिखना चाहिए. अपनी मरज़ी से. जिसे कैफी आज़मी की क़द्रकरनी है, वो उनकी करेगा. जिसे आपकी करनी है, वो आपकी करेगा. आपकी भी तो इस समाज मेंएक स्थिति है, उस पर भरोसा करके लिखते रहिए. मुझे तो याद नहीं आता कौन आलोचक हैस्याला. पसंद करे तो ठीक है. वरना क्या परवाह करना. लेकिन एक बात है, थोड़ा दमलगानी पड़ेगा. आप कैफी आजमी की बात करें तो बहुत दम लगाकर लिखते थे. तो फिल्म वालोंको भी उनके समकक्ष खड़ा होना पड़ेगा. दुर्भाग्य से पहले के मुकाबले वैसे लिरिसिस्टहैं नहीं. ये एमटीवी ने जुबान बदल दी ना यार. हमें उर्दू और हिंदी की तरफ लौटने कीजरूरत है. और लिखने वाले का तजुर्बा बहुत अहमियत रखता है. मतलब मैंने तो वैसे हीलिखा है. बिना परवाह के. ये सोच कि ठीक है यार, अपना एक स्टाइल है. हम तुम्हारी तरहनहीं लिख सकते. पर हम जिस तरह से लिखते हैं, वैसे कोई नहीं लिख सकता.2. इरशाद कामिल: स्वयंभू कमांडर ही इस पर बात करेंगेसाहित्य और फिल्मी साहित्य अलग नहीं है, दोनों का मकसद मनोरंजन ही रहा है, लेकिन हमआदत से मजबूर हैं इसलिए उन्हें खांचों में बांट दिया है. कहानियां और कविताएं जबशुरु हुई थीं तो उनका मकसद भी मनोरंजन ही था ना. उन्हें कविताओं के जरिये उन्हेंकौन से राजनीतिक मसले सुलझाने थे. बॉब डिलन को नोबेल मिला है. पर मुझे लगता नहीं किइससे हिंदुस्तान के पॉपुलर साहित्यकारों को बहुत फायदा होगा. मैं आपको एक किस्साबतलाता हूं. मैं अपनी किताब 'समकालीन कविता: समय और समाज' का विमोचन करने दिल्लीआया तो एक नामी गिरामी साहित्यकार को बुलाया. उन्होंने उस प्रोग्राम में कहा कि अबफिल्मी वाले भी साहित्य की बात करने लगे हैं. दिमागी तौर पर उन लोगों ने खुद कोस्वयंभू कमांडर जैसा मान लिया है. फंक्शन के बाद मुझे अफसोस भी हुआ कि बिना किसीफंक्शन के किताब ले आता तो अच्छी बात होती. इस पर वही लोग विमर्श करेंगे जिन्होंनेस्यूडोइज़म पाल लिया है. जहां तक रास्ते खुलने की बात है तो मुझे लगता है कि बॉबडिलन का नोबेल 50 परसेंट ही गीतकार का है. 50 प्रतिशत गायक का है. इससे वे गीतकारखुश हो सकते हैं जो अपने गाने गाते भी हैं. जैसे पीयूष भाई. पर हमारे यहां इस तरहके इंडीपेंडेंट म्यूजिक का बहुत बड़ा कल्चर नहीं है. गीत-संगीत को फिल्मों के साथही जोड़ा जाता है. स्वतंत्र धारा आई भी तो उस तरह का मेयार नहीं ले पाई. बॉब डिलनने एक किस्म का माहौल बनाया था अमेरिका में. बहुत सारे गाने इस तरह के हैं,'ब्लोइंग इन द विंड' और 'द टाइम्स दे आर अ-चेंजिंग', वो अपने वक्त की नब्ज पर हाथरखे हैं. पर हमारे यहां पता ही नहीं चलता कि ऐसे गाने कब आए और कब चले गए. हमलिजलिजे किस्म के रोमांटिक गाने रिसीव करना ही पसंद करते हैं. ठीक है, मेरा 'साडाहक' गाना पॉपुलर हुआ. लेकिन 'मदारी' के लिए लिखा 'दमा दम' और 'सारे जहां से अच्छाहिंदोस्ता कहां है' जैसे गाने आए-गए हो जाते हैं. हम याद रखते हैं उसी तरह केलिजलिजे गाने. कंटेपरेरी लिसनर्स के तौर पर हमारा स्टैंडर्ड भी अच्छा नहीं है. येहमारे सुनने की चॉइस पर भी सवालिया निशान है. ये सवाल न होता तो हमारे यहां जरूरक्वालिटी म्यूजिक ही पॉपुलर होता.--------------------------------------------------------------------------------3. राज शेखर: उनकी तो इंक खत्म हो जाती है हमारी तारीफ के नाम परमुझे बहुत देर से खबर मिली. लगा कि बॉब डिलन को मिला है तो शांति का नोबेल होगा.बाद में पता चला कि लिट्रेचर के लिए मिला है. कॉलेज के दिनों में उनके तमाम गाने हमलोग अनुवाद कर करके गाते थे, 'कितने लाशों के अंबार लगे. हवाओं में यारों जवाबमिलेगा.' मेरा कहना है कि उनकी पहुंच है, वे ज्यादा लोगों को प्रभावित कर सकते हैं.सिर्फ रीच के आधार पर फैसले न लिए जाएं, लेकिन उसे इग्नोर भी न किया जाए. ये लोगतब्दीलियां ला सकते हैं. लेकिन जो लोग मुहर लगाते हैं, हमारी तारीफ की बात आने परउनके पेन की इंक खत्म हो जाती है. काशीनाथ सिंह जी दिल्ली में मिले थे. उन्होंनेहमसे कहा कि आप खुलेआम बोलिए. आपको साहित्य में अपना स्पेस क्लेम करना पड़ेगा. आपकीरीच बहुत ज्यादा है. आप इसे छोड़िए मत. क्लेम करिए. ऐसा नहीं है कि सीधे हम लोगोंसे कोई बुरी बात कही जा रही हो. लेकिन जब सीरियस बहस की बात होती है तो वे लोगथोड़ा दूर से ही नमस्ते करते हैं. उनका अप्रोच 'ये तो बच्चे हैं' वाला रहता है.जैसे कहते हों, 'अच्छा आप राजनीति पर भी बात करेंगे'. बात नोबेल प्राइज की नहीं है.कई ऐसे लोगों को मिल चुका है, जिस पर आपत्ति जताई जा सकती है. बात इस बहस की है.बॉब डिलन के जरिये कम से कम बात तो शुरू होगी.--------------------------------------------------------------------------------4. पुनीत शर्मा: इससे कुछ नहीं बदलेगामुझे लगता है कि इससे इतना कुछ सिनैरियो बदलेगा नहीं. बॉब डिलन को नोबेल मिलने परभी सवाल खड़े किए जा रहे हैं. बहुत अच्छा है. उन्होंने बड़ा काम किया है. लेकिनक्या और कोई विकल्प नहीं था आपके पास ? इसमें दो बातें हैं. वे लोग जिन्हें कभी फेमनहीं मिलता, जो बिना पैसे के लिखते रहते हैं, कई बार बड़ी ऑडियंस भी नहीं मिलती.ऐसे अवॉर्ड्स एक ज़रिया हैं उन्हें बड़े लेवल पर पहुंचाने के. मतलब मुझे ही कई बड़ेकवियों के बारे में तब पता चला, जब उन्हें नोबेल पुरस्कार मिला. तब मैंने उनकीकविताएं पढ़ीं और कहा कि वाह यार क्या पोएट है. तो मैं ये कह रहा हूं कि जो पॉपुलरहै वो तो लोगों तक पहुंच ही रहा है. जो काबिल हैं और इंडस्ट्री से न होने की वजह सेनहीं पहुंचे तो अवॉर्ड्स उनके लिए सुरक्षित रख भी दिए जाएं तो क्या दिक्कत है. ऐसानहीं है कि हमें साहित्य के लोगों राय की परवाह नहीं होती. अगर हमारे लिखे कोमुख्यधारा साहित्य के लोग सराहें तो अच्छा तो लगता है. ये वैसा ही है कि टी-20प्लेयर की कोई टेस्ट प्लेयर तारीफ करे. वे ज्यादा तपे हुए लोग हैं लेकिन दोनों मारेहुए हैं. हम लोग भी साहित्य को अपनी भाषा में लाने की कोशिश कर रहे हैं,लेकिनपरिस्थितियां मुश्किल है. प्रोड्यूसर और एक्टर की भाषा में बात कहनी होती है. हाँलेकिन भेदभाव तो होता ही है. हमारा मेनस्ट्रीम से होना पहले से साहित्य वालों केज़ेहन में बैठा हुआ है. मैं गीतों के बजाय कविताएं लिख रहा होता तो शायद ज़्यादासीरियसली लिया जाता. मैं फिल्मों से इतर भी गीत लिखता हूँ लेकिन यहां गीत लिखने कामतलब फिल्मी गीत लिखना है. ख़ासकर हिंदुस्तान में फिल्मी गीतों का बड़ा हिस्सा ऐसाहै, जिसे आप साहित्य से नहीं जोड़ सकते. सेवंटीज तक तो मुख्यधारा साहित्य के लोग हीफिल्मी गीत लिख रहे थे. साहिर, शैलेन्द्र, मजरूह, शकील. सब बड़े बड़े लोग थे. तबगीतकार भी साहित्यकार था. लेकिन हमें मानना होगा कि तब से क्वालिटी गिरी है. अभीइज्जत नहीं है उतनी. सिर्फ फैन फॉलोइंग है. ऐसा नहीं है कि लोग पसंद नहीं करते. कलको वरुण ग्रोवर को साहित्य अकादमी मिल जाए तो हो सकता है उधर से कोई कहे कि हमनेसारी जिंदगी साहित्य की सेवा की और अवॉर्ड ये ले गया. मैं दोनों की भावनाएं समझताहूं. और स्वीकृति तो देखिए, सबको चाहिए. अपने लिए तो सभी लिखते हैं. लेकिन जबपब्लिक में जाते हैं तो स्वीकृति ही खोजते हैं. उदय प्रकाश मेरे गीत पर कुछ कहें तोलगता है कि यार ऐसा आदमी कह रहा है, जिसे समझ है. ये तो सच्चाई है. वैसे बॉब डिलनको नोबेल मिलने का अपने यहां फर्क नहीं पड़ने वाला. भूल जाएंगे लोग. बड़ी आसानी सेभूल जाएंगे. कोई सबूत या रेफरेंस के तौर पर इसे पेश करने नहीं वाला. ऐसा नहीं है किसम्मान बढ़ जाएगा. एकाध हफ्ते चर्चा जरूर रहेगी. खासकर जो फ़िल्म की मुख्यधारा केलोग हैं उन्हें इससे फर्क नहीं पड़ता. वो उसके मायने और डायनमिक्स पर ऐसे सोचनेनहीं बैठे हैं.--------------------------------------------------------------------------------भारत में मेनस्ट्रीम साहित्यिक लोगों का रुख इस पर क्या होगा, इसे कवि-लेख उदयप्रकाश की इस टीप से समझिए:--------------------------------------------------------------------------------ये भी पढ़िए: नोबेल लाए डिलन, पर मोक्ष चाहे उनका मन