The Lallantop
Advertisement
  • Home
  • Lallankhas
  • Aradhna singh writes about her experience of finding and engaging with Muslims on the ghats of Ganga in Benaras

पति पत्नी और वो कैमरा - कहानी बनारस की ज़रीना भाभी की

आराधना और आशीष पहुंचे बनारस के गंगा घाट पर. कर रहे हैं बयान कि बनारस के मुसलमान आखिर वहां पहुंच कर करते क्या हैं

Advertisement
Img The Lallantop
फोटो - thelallantop
pic
केतन बुकरैत
7 मार्च 2016 (अपडेटेड: 12 जुलाई 2016, 08:13 PM IST)
font-size
Small
Medium
Large
font-size
Small
Medium
Large
whatsapp share
पति पत्नी और वो कैमरा की चौथी किस्त आ गयी है. ये कहानी है स्टीरियोटाइप कर दी गयी 'पावन' गंगा के बारे में. एक नदी जो किसी ज़मीन के टुकड़े के लिए लाइफलाइन कही जाती है, किसी एक ग्रुप के लोगों के लिए रिज़र्व मान ली जाती है. और लोग इस भ्रान्ति के साथ ही जी रहे हैं कि यही सच है.
ashish and aradhana singh
इस सच को झूठा बतलाने के लिए  आराधना और आशीष ने हमें ये टुकड़ा भेजा है. नैरेटर- आराधना सिंह. फोटो- आशीष सिंह    
एक शाम ज़रीन भाभी ने बनारस, गंगा और घाटों से जुड़ा अनुभव साझा किया. उन्होंने बताया कि निक़ाह के बाद सैय्यद भाई सबसे पहले गंगा आरती दिखाने लाए थे. और उसके बाद ज़रीन भाभी अपने मायके की लखनऊ की शाम-ए-अवध भूल सुबह-ए-बनारस के प्यार में पड़ गईं. उन्होंने किस्सा सुनाया, तो हमने ये शेर पढ़ा. जिसे सुन वह भावुक हो गईं.
Embed
BENARAS PEOPLE SITTING ON GHAT
फिर अगली बार मैं और आशीष जब घाटों पर गए, तो यही सब बातें दिमाग में थीं. टहलते हुए सोशल मीडिया और टीवी पर चल रही बहसें याद आ रही थीं.
Embed
BENARAS GHAT MUSLIM
ख़ैर घाट पर आज हम मुसलमान खोज रहे थे. जहां दिख रहे थे, वहां उन्हें निहार रहे थे. सीढ़ियों, चबूतरों पर पैर लटकाए मछलियों को आटे की गोलियाँ खिलाते, गप्पें लड़ाते मुसलमान. हमारी तरह गंगा से अपना सुख-दुख बतियाते मियां-बीवी. और वो रहा एक छोटा सा बच्चा जो गंगा को नापने की तैयारी में है.
BENARAS MNG KID
एक साहब मछलियों को दाना देते दिखे. मैं उनके बगल में बैठ गई. पूछा, आप मछलियों को आटे की गोलियां क्यूं खिलाते हैं?" वो कहते हैं
Embed
मैंने उनसे आटे की थोड़ी सी लोई मांग ली. अब मैं भी गोलियां बनाकर उनके साथ मछलियों को खिलाने लगती हूं. ये शायद जादू ही है कि 'फ़िश फ़ूड' 'सोल फ़ूड' में तब्दील होता हुआ महसूस होने लगता है. मछलियों की भूख का तो पता नहीं पर मैं ज़रूर तृप्त हो रही हूं. तभी आशीष अपनी ताजा क्लिक्स दिखाने लगते हैं. मैं उनसे पूछती हूं
Embed
आशीष अफ़सोस करते हुए बोलते हैं "अगली बार ज़रूर."
BENARAS HINDU MUSLIM UNITY
  मैं 'आम़ीन' बोल अमृता प्रीतम की एक कविता दोहराने लगती हूं.
Embed
BENARAS GHAT BOAT PRIEST
  और अमृता की ही एक और कविता, ऐश ट्रे का ये टुकड़ा
Embed
 

Advertisement

Advertisement

()