नीले रंग के मकानों वाला मोहल्ला
पति पत्नी और वो कैमरा की दसवीं किस्त आयी है. इस बार वहां पहुंचे हैं राजस्थान के उस मोहल्ले में जिसके सारे घर नीले हैं.
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फोटो - thelallantop
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हमने जोधपुर के नीले घरों वाले मोहल्लों में फ़ेमस फ़ोटोग्राफ़र स्टीव मैक्करी(Steve Mccurry's)का काम देखा था. और जोधपुर के लिए एक्साइटमेंट की वजह भी यही थी. वो नीला रंग हमारे कैमरे में भी क़ैद हो. सुबह 6 बजे होटल से निकलते ही सिटी बस मिल गई. हमें ठीक-ठीक जगह का नाम तो नहीं पता था. इसलिए हमने नीले घरों वाले मोहल्लों तक पहुंचाने को कहा. कंडक्टर ने बताया चांदपोल उतर जाओ. चांदपोल पहुंच दायीं तरफ़ चलने पर कुछ नीले घर दिखे. पर वैसा नहीं लग रहा था जैसा फोटुओं में दिखता था. असल में जो देखना था. माने गलियों में भटकने जैसी कोई फीलिंग नहीं आ रही थी.
फिर वहां एक आदमी से पूछा कि क्या नीले घरों वाला मोहल्ला यही है तो उसने बताया -"अब तो फ़ैशन में सभी रंगनें लगे हैं पर पहले जोधपुर के शाही परिवार के पुरोहित और ब्राह्मण ही अपने घरों को नीले रंग में रंगवाते थे." हमें थोड़ी निराशा हुई. लेकिन फिर उसी ने बताया "आप उलटा चले आए हैं, चांदपोल से बायीं तरफ़ जाइए वहां पर वक़ील साहब के घर से बगल वाली गली में चले जाइयेगा. वहां पर आपको खूब नीले घर दिखाई पड़ेंगे."
हम अपनी बनारसी बेफ़िक्र चाल से गली में बस घुसे ही थे कि आशीष के पैर में एक कुत्ते ने काट लिया. अब कुत्ते के काट लेने के दर्द से ज्यादा जो इतने सारे फ़्रेम्स आंखों में बन चुके थे उनके कैमरे में न उतर पाने का मलाल हो रहा था. आशीष के घावों को धुलने के लिए एक आदमी से पानी मांगा तो वो साबुन भी लेकर आए. घाव धुलने के बाद आशीष ने मदद करने वाले की फ़ोटो खींचकर इन गलियों को कैमरे में समेटने की शुरूआत की.
ये गलियां बनारस की गलियों से ज्यादा अलग नहीं है पर माहौल बिल्कुल अलग है. बनारसी मस्ती, अक्खड़पन और
भौकाल की जगह यहां शान्ति, सादगी और भोलापन मिला. लोग बहुत हेल्पिंग थे. एक तो हमें अपने घर की चौथी मंज़िल पर ले गए और बोले - "यहाँ से खींचों. पूरा मोहल्ला दिखता है. खूब बढ़िया आयेंगी तस्वीरें."
जितने लोगों से बातें की उन्होनें बिना पूछे ही ये ज़रूर बताया कि "नीले घर शाही परिवार के पुरोहितों और ब्राह्मणों के हुआ करते थे. समय के साथ सब रंगवाने लगे. इन घरों को सूरज की किरणें अपने उजास से भर देती हैं. घर ठंडे रहें इसलिए नीले रंग से रंगवाने की शुरूआत हुई."
इन शब्दों में अपने विशेष अतीत के जुड़ाव के साथ बदलते वर्तमान को सहज स्वीकार न कर पाने की टीस थी.
फिर तभी हमें एक नीली आंखों वाली एक महिला नज़र आयीं. तस्वीरें लेने की इजाज़त मांगी तो सब्ज़ी काटते हुए शर्माकर बोलीं "मेरी फ़ोटो खींचकर क्या करना? मैंने तो अच्छे कपड़े भी नहीं पहने"
हम जिसकी भी तस्वीर लेते वो थोड़ा शर्माता फिर जब हम उन्हें उनकी तस्वीर दिखाते और वो चेहरा खिल उठता. हम यहां मोहल्लों की नीली ख़ूबसूरती क़ैद करने आए थे. पर जैसे-जैसे लोगों से मिलते गए तो हमारा सब्जेक्ट ही बदल गया. हम नीले घरों वालों के चेहरे में उलझ कर रह गए. आखिर उलझते भी कैसे नहीं?
मोबाइल में नज़रें गड़ाए और सेल्फी लेते हुए चेहरों की शून्यता से अलग, खिड़कियों से झांकती आंखों का इंतज़ार. घरों के बरामदों में सुकून बुनते बुज़ुर्ग. बेफ़िक्र गप्पें लड़ाते लोगों के सादे चेहरों का सम्मोहन जो था.
आशीष से कहा "तुम्हारे पैरों का दर्द बढ़ जाएगा, अब वापस चलो. बाक़ी बनारस की गलियों में भटक लेना"
आशीष ने कहा "रूको! वहां ये नीले मोहल्ले नहीं हैं."
मैंने कहा
"हां सच! वहां ये चेहरे भी तो नहीं हैं."
आशीष ने अपनी इस यात्रा की एक ई-बुक भी तैयार की है. लिंक खोलें - https://issuu.com/ashishsinghphotography/docs/jodhpur-the_blues_of_life
हम अपनी बनारसी बेफ़िक्र चाल से गली में बस घुसे ही थे कि आशीष के पैर में एक कुत्ते ने काट लिया. अब कुत्ते के काट लेने के दर्द से ज्यादा जो इतने सारे फ़्रेम्स आंखों में बन चुके थे उनके कैमरे में न उतर पाने का मलाल हो रहा था. आशीष के घावों को धुलने के लिए एक आदमी से पानी मांगा तो वो साबुन भी लेकर आए. घाव धुलने के बाद आशीष ने मदद करने वाले की फ़ोटो खींचकर इन गलियों को कैमरे में समेटने की शुरूआत की.
ये गलियां बनारस की गलियों से ज्यादा अलग नहीं है पर माहौल बिल्कुल अलग है. बनारसी मस्ती, अक्खड़पन और
भौकाल की जगह यहां शान्ति, सादगी और भोलापन मिला. लोग बहुत हेल्पिंग थे. एक तो हमें अपने घर की चौथी मंज़िल पर ले गए और बोले - "यहाँ से खींचों. पूरा मोहल्ला दिखता है. खूब बढ़िया आयेंगी तस्वीरें."
जितने लोगों से बातें की उन्होनें बिना पूछे ही ये ज़रूर बताया कि "नीले घर शाही परिवार के पुरोहितों और ब्राह्मणों के हुआ करते थे. समय के साथ सब रंगवाने लगे. इन घरों को सूरज की किरणें अपने उजास से भर देती हैं. घर ठंडे रहें इसलिए नीले रंग से रंगवाने की शुरूआत हुई."
इन शब्दों में अपने विशेष अतीत के जुड़ाव के साथ बदलते वर्तमान को सहज स्वीकार न कर पाने की टीस थी.
फिर तभी हमें एक नीली आंखों वाली एक महिला नज़र आयीं. तस्वीरें लेने की इजाज़त मांगी तो सब्ज़ी काटते हुए शर्माकर बोलीं "मेरी फ़ोटो खींचकर क्या करना? मैंने तो अच्छे कपड़े भी नहीं पहने"
हम जिसकी भी तस्वीर लेते वो थोड़ा शर्माता फिर जब हम उन्हें उनकी तस्वीर दिखाते और वो चेहरा खिल उठता. हम यहां मोहल्लों की नीली ख़ूबसूरती क़ैद करने आए थे. पर जैसे-जैसे लोगों से मिलते गए तो हमारा सब्जेक्ट ही बदल गया. हम नीले घरों वालों के चेहरे में उलझ कर रह गए. आखिर उलझते भी कैसे नहीं?
मोबाइल में नज़रें गड़ाए और सेल्फी लेते हुए चेहरों की शून्यता से अलग, खिड़कियों से झांकती आंखों का इंतज़ार. घरों के बरामदों में सुकून बुनते बुज़ुर्ग. बेफ़िक्र गप्पें लड़ाते लोगों के सादे चेहरों का सम्मोहन जो था.
आशीष से कहा "तुम्हारे पैरों का दर्द बढ़ जाएगा, अब वापस चलो. बाक़ी बनारस की गलियों में भटक लेना"
आशीष ने कहा "रूको! वहां ये नीले मोहल्ले नहीं हैं."
मैंने कहा
"हां सच! वहां ये चेहरे भी तो नहीं हैं."
आशीष ने अपनी इस यात्रा की एक ई-बुक भी तैयार की है. लिंक खोलें - https://issuu.com/ashishsinghphotography/docs/jodhpur-the_blues_of_life

