फागुन आया होली आई चला लट्ठ बरसाने में
पति पत्नी और वो कैमरा वाली जोड़ी ने इस बार बरसाने की लट्ठमार होली की तस्वीरें और किस्से भेजे हैं.
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फोटो - thelallantop
हमारी सीरीज पति पत्नी और वो कैमरा देखते, पढ़ते हो न. वो पति पत्नी हैं आराधना और आशीष. बनारस में रहते हैं. अपने दो बच्चों, एक बुलेट और एक कैमरे के साथ. आशीष डॉक्टर हैं. और आराधना राइटर. दोनों दोस्त भी हैं. इसलिए खूब मटरगश्ती करते हैं. खुली सड़कों, तंग गलियों, घाटों और नदी की धारों पर. फोटो खींच उनकी कहानी लिख भेजते हैं हमें. हम आप तक पहुंचा देते हैं.
अब होली आ गई है. भंग, रंग और हुड़दंग के साथ. टीवी सीरियल्स और फिल्मों से लेकर पूरे इंडिया में धमाचौकड़ी होती है होली में. नॉर्थ इंडिया तो हफ्तों खरच डालता है इसी धुप्पल में. लेकिन साहब बरसाने की होली की बात न करना. उस एंजायमेंट में सारी दुनिया छूट जाती है. अब देखो. आपको बात करने से मना कर रहे हैं लेकिन हम जरूर करेंगे. काहे कि हमारे पास आराधना और आशीष की बातें हैं. आशीष की खींची फोटोज हैं. आराधना की बतकही है. तो देखो बरसाने की होली.
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भारत में होली की शुरुआत बरसाने से होती है और यहां यह होली नहीं लीला है,राधा और कृष्ण के बीच होने वाली 'रंग-लीला'. यहां हर पुरुष कृष्ण(कान्हा) है और हर स्त्री राधा (लाडली जी). बरसाना और नंदगांव के बीच लगभग आठ किलोमीटर की दूरी है. नंदगांव के लोग बरसाने के 'पीली पोखरी' पर आकर कृष्ण और उनके सखाओं का रूप धारण कर लेते हैं माने कि पारंपरिक वेष-भूषा और साज़ो सामान के साथ तैयार हो जाते हैं.
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और फिर इस उद्देश्य के साथ गलियों में घुसते हैं कि पहला गुलाल 'राधा रानी के मन्दिर' में जाकर राधा रानी को डालेंगे. 'गलियों में घुसते ही बरसाने के पुरूष,स्त्रियां ,बच्चे तक सब के सब छतों से गुलाल और रंग भरी बाल्टियों से उनका स्वागत करते हैं.
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और राधा मन्दिर की सीढ़ियां चढ़ते हुए उन पर हेलीकाप्टर से फूलों की बारिश भी की जाती है. नंदगांव के लोग भागते हुए सबसे पहले 'राधा रानी के मन्दिर' में राधा रानी से रंग खेलते हैं और फिर कृष्ण का प्रतिरूप यह ग्रुप जिसे बरसाने वाले 'समाज' कहते हैं, मंदिर में बैठकर भजन-कीर्तन में जुट जाता है और बीच-बीच में मंदिर के पुरोहित से लेकर छोटे बच्चे तक सब उनके ऊपर गुलाल फेंकते रहते हैं.
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मन भर भजन-कीर्तन के बाद ये 'समाज' अपना ढाल संभालता है, इस चमड़े से बने ढाल की भी बड़ी कहानियां हैं. अलग-अलग परिवारों में अपनी तरह की ढाल इस्तेमाल करने की प्रथा है, ये ढाल ऑर्डर देकर ख़ूब शौक़ से तैयार किये जाते हैं क्योंकि ये ढाल इस समय उनके रुतबे और पर्सनालिटी की पहचान हैं.
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ढाल लेकर 'समाज' बाहर जब 'रंगीली गली'में उतरता है तो वहां की औरतें लाल,गुलाबी,नारंगी लंहगों में ख़ूब सज-धज कर ,लम्बे-लम्बे घूंघट में लाठियां लेकर उनका बेसब्री से इंतज़ार कर रही होती हैं.
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और पहले होती है दोनों के बीच हंसी-ठिठोली.
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"ओ मुन्ना खा-पीकर तो आया है ना" "ओ भाभी तेरी लाठी तो बड़ी पतली लाग रही,मेरा कुछ ना बिगाड़ पाएगी "बदले में "तू मैदान में आ तो फिर कहियो,आज तू गया रे मुन्ने'.इन सबके बाद शुरू होती है 'लट्ठमार होली'.
"ले ,बड़ी बोली निकल रही थी,अब खा लाठी"
"ओ सुन ! तेरी लाठी मेरा कुछ ना बिगाड़ पाएगी"

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