अनुष्का शर्मा के चमकदार सफेद मोजे का राज़ क्या है?
अर्जुन कपूर ने कपड़ों की धुलाई के जिस तरीके की बात की, वो भी जान लीजिए.
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बाएं से दाएं: ड्राई क्लीनिंग के बाद कपड़ों को सुखाने की प्रोसेस. अनुष्का शर्मा की वो तस्वीर, जहां से ड्राई क्लिनिंग की बात शुरू हुई.
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बॉलीवुड एक्ट्रेस अनुष्का शर्मा. ट्विटर और इंस्टाग्राम पर काफी एक्टिव रहती हैं. अक्सर तस्वीरें डालती रहती हैं. 16 जनवरी के दिन भी उन्होंने कॉफी पीते हुए दो तस्वीरें पोस्ट कीं. उन तस्वीरों में वो बालकनी में बैठे दिख रही थीं. कैप्शन दिया,
यहां पर अर्जुन ने 'ड्राई क्लीनिंग' शब्द का इस्तेमाल किया है. ये कपड़ों की धुलाई का तरीका है, लेकिन आम धुलाई से थोड़ा अलग है. अब बात निकली है, तो इसे पूरा करना भी जरूरी है. कपड़ों की धुलाई तीन तरीकों से होती है-
पहला 'दे पटक-पटककर'. इसमें पानी और डिटर्जेंट का इस्तेमाल करके कपड़ों को रगड़-रगड़कर धोया जाता है. हमारे यहां ये कपड़े धोने का सबसे पुराना और शायद सबसे फेमस तरीका है.
दूसरे तरीके में होता है वॉशिंग मशीन का इस्तेमाल. कुछ नहीं करना होता इसमें. कपड़े मशीन में डाल दो, पानी पाइप से कनेक्ट रहता है. डिटर्जेंट डाल दो. बटन चालू कर दो. घुर्र्ररर से मशीन चलती है. कपड़ों की धुलाई हो जाती है.
तीसरा तरीका है ड्राई क्लीनिंग. इसे आमतौर पर घरों में इस्तेमाल नहीं करते. घरों-मोहल्लों के आस-पास ड्राई क्लीनिंग की दुकानें अक्सर होती ही हैं. ज्यादातर लोग अपने महंगे और सबसे सुंदर कपड़ों की ड्राई क्लीनिंग कराते हैं. या फिर ऐसे कपड़ों की जिनके लिए उन्हें डर होता है कि आम धुलाई से कहीं उस कपड़े का रंग न उतर जाए, या फिर उसमें किसी दूसरे कपड़े का रंग न लग जाए. या फिर कुछ कपड़े ऐसे होते हैं, जिन्हें पानी से नहीं धोया जाता, जैसे सिल्क, ऊनी कपड़े या फिर लैदर के कपड़े. इन्हें ड्राई क्लीन किया जाता है.
क्या होती है ड्राई क्लीनिंग?
शब्द है ड्राई. यानी सूखा. यानी आपको लगता होगा कि गर्म हवा का इस्तेमाल करके कपड़ों पर से धूल-मिट्टी और मैल निकाला जाता होगा. लेकिन ऐसा कुछ नहीं होता. ये धुलाई सूखी नहीं होती. बस होता ये है कि ड्राई क्लीनिंग में पानी का नहीं, बल्कि लिक्विड सॉल्वेंट का इस्तेमाल होता है. आसान भाषा में कैमिकल को यूज़ किया जाता है. कपड़ों को पानी से नहीं, बल्कि कैमिकल से धोया जाता है.
मशीन में होती ड्राई क्लीनिंग. ये मशीन पूरी तरह वॉशिंग मशीन की तरह ही दिखती है. फोटो- वीडियो स्क्रीनशॉट.
पहले कैरोसिन, गैसोलीन का इस्तेमाल होता था, लेकिन ये काफी खतरनाक था, क्योंकि ये पदार्थ बहुत जव्लनशीन होते हैं. अब हाइड्रोकार्बन सॉल्वेंट का इस्तेमाल होता है. सामान्य तौर पर परक्लोरोथिलीन (perchloroethylene) नाम के कैमिकल का, जिसे PERC (पर्क) भी कहते हैं, इसका इस्तेमाल सबसे ज्यादा होता है. कहीं-कहीं पर कैमिकल के साथ पेट्रोल और डिटर्जेंट का इस्तेमाल भी होता है.
कैसे होती है ड्राई क्लीनिंग?
विदेशों में और बड़े-बड़े लाउंड्री हाउस में मशीनों के जरिए ये काम होता है. एक बड़ी सी मशीन होती है. जो आम वॉशिंग मशीन की तरह ही दिखती है. इसमें कपड़े को सॉल्वेंट के साथ डाला जाता है. फिर वॉशिंग मशीन की तरह ही ये मशीन भी कपड़े को धोती है. कई बार डिटर्जेंट का भी इस्तेमाल होता है. मशीन के अंदर ही सॉल्वेंट को कपड़ों से बाहर भी कर दिया जाता है. कपड़े सूखकर भी बाहर निकलते हैं. उसके बाद उन्हें प्रेस करके हैंगर में टांग दिया जाता है. कपड़े एकदम चकाचक नए दिखने लगते हैं.
ये तो बात हुई मशीन वाली ड्राई क्लीनिंग की. अब बात करते हैं उन लाउंड्री हाउस की जो आपके और हमारे घरों के आस-पास होते हैं. वहां क्या होता है, ये जानने के लिए हमने कल्याणपुरी की एक लाउंड्री के मालिक से बात की. उन्होंने हमें बताया कि ज्यादातर छोटे लाउंड्री हाउस में मशीनों का इस्तेमाल नहीं होता है. हाथ से ही काम होता है.
इस तस्वीर में हाथ से ड्राई क्लीनिंग की जा रही है.
आगे बताया कि कपड़े की क्वालिटी और रंग के हिसाब से कैमिकल को सेलेक्ट किया जाता है. कितनी मात्रा में लेना है, कौन सा लेना है, ये देखा जाता है. उस कैमिकल को बड़े से टब में डाला जाता है. उसके बाद कपड़े को उसमें फुलाया जाता है. अगर कपड़े में कोई गहरा दाग होता है, तो उसे छुड़ाने के लिए कई बार पेट्रोल का इस्तेमाल किया जाता है. कपड़े को धोने के बाद हाइड्रो मशीन में डालकर उसके अंदर का कैमिकल निकाला जाता है. पेट्रोल की महक निकालने के लिए कपड़े को धूप में सुखाया जाता है. फिर उसे स्टीम किया जाता है. फिर पैकिंग कर दी जाती है. कपड़ा एकदम नया दिखने लगता है.
ये होती है ड्राई क्लीनिंग की प्रोसेस, जिसमें कुछ भी सूखा नहीं होता है.
वीडियो देखें:
'और बस इसी तरह अपने घर की बालकनी में सूरज की रोशनी में बैठकर कॉफी पीना एक याद बन गई.'
तस्वीरें लेने का क्रेडिट अनुष्का ने विराट कोहली को दिया. अब इस पोस्ट में कई लोगों के रिएक्शन्स आए, लेकिन उन सबमें से अर्जुन कपूर का रिएक्शन सबसे अलग रहा. उनकी नज़र पड़ी अनुष्का के मोजे पर, जो एकदम सफेद और साफ दिख रहे थे. अर्जुन ने लिखा,'मोजे की ड्राई क्लीनिंग माशा अल्लाह टॉप नॉच है'
अब ये कमेंट इतना ज्यादा वायरल हुआ, कि इसे अब तक 5432 लाइक्स मिल गए और 251 लोगों ने कमेंट भी कर दिया.
यहां पर अर्जुन ने 'ड्राई क्लीनिंग' शब्द का इस्तेमाल किया है. ये कपड़ों की धुलाई का तरीका है, लेकिन आम धुलाई से थोड़ा अलग है. अब बात निकली है, तो इसे पूरा करना भी जरूरी है. कपड़ों की धुलाई तीन तरीकों से होती है-
पहला 'दे पटक-पटककर'. इसमें पानी और डिटर्जेंट का इस्तेमाल करके कपड़ों को रगड़-रगड़कर धोया जाता है. हमारे यहां ये कपड़े धोने का सबसे पुराना और शायद सबसे फेमस तरीका है.
दूसरे तरीके में होता है वॉशिंग मशीन का इस्तेमाल. कुछ नहीं करना होता इसमें. कपड़े मशीन में डाल दो, पानी पाइप से कनेक्ट रहता है. डिटर्जेंट डाल दो. बटन चालू कर दो. घुर्र्ररर से मशीन चलती है. कपड़ों की धुलाई हो जाती है.
तीसरा तरीका है ड्राई क्लीनिंग. इसे आमतौर पर घरों में इस्तेमाल नहीं करते. घरों-मोहल्लों के आस-पास ड्राई क्लीनिंग की दुकानें अक्सर होती ही हैं. ज्यादातर लोग अपने महंगे और सबसे सुंदर कपड़ों की ड्राई क्लीनिंग कराते हैं. या फिर ऐसे कपड़ों की जिनके लिए उन्हें डर होता है कि आम धुलाई से कहीं उस कपड़े का रंग न उतर जाए, या फिर उसमें किसी दूसरे कपड़े का रंग न लग जाए. या फिर कुछ कपड़े ऐसे होते हैं, जिन्हें पानी से नहीं धोया जाता, जैसे सिल्क, ऊनी कपड़े या फिर लैदर के कपड़े. इन्हें ड्राई क्लीन किया जाता है.
क्या होती है ड्राई क्लीनिंग?
शब्द है ड्राई. यानी सूखा. यानी आपको लगता होगा कि गर्म हवा का इस्तेमाल करके कपड़ों पर से धूल-मिट्टी और मैल निकाला जाता होगा. लेकिन ऐसा कुछ नहीं होता. ये धुलाई सूखी नहीं होती. बस होता ये है कि ड्राई क्लीनिंग में पानी का नहीं, बल्कि लिक्विड सॉल्वेंट का इस्तेमाल होता है. आसान भाषा में कैमिकल को यूज़ किया जाता है. कपड़ों को पानी से नहीं, बल्कि कैमिकल से धोया जाता है.
मशीन में होती ड्राई क्लीनिंग. ये मशीन पूरी तरह वॉशिंग मशीन की तरह ही दिखती है. फोटो- वीडियो स्क्रीनशॉट.पहले कैरोसिन, गैसोलीन का इस्तेमाल होता था, लेकिन ये काफी खतरनाक था, क्योंकि ये पदार्थ बहुत जव्लनशीन होते हैं. अब हाइड्रोकार्बन सॉल्वेंट का इस्तेमाल होता है. सामान्य तौर पर परक्लोरोथिलीन (perchloroethylene) नाम के कैमिकल का, जिसे PERC (पर्क) भी कहते हैं, इसका इस्तेमाल सबसे ज्यादा होता है. कहीं-कहीं पर कैमिकल के साथ पेट्रोल और डिटर्जेंट का इस्तेमाल भी होता है.
कैसे होती है ड्राई क्लीनिंग?
विदेशों में और बड़े-बड़े लाउंड्री हाउस में मशीनों के जरिए ये काम होता है. एक बड़ी सी मशीन होती है. जो आम वॉशिंग मशीन की तरह ही दिखती है. इसमें कपड़े को सॉल्वेंट के साथ डाला जाता है. फिर वॉशिंग मशीन की तरह ही ये मशीन भी कपड़े को धोती है. कई बार डिटर्जेंट का भी इस्तेमाल होता है. मशीन के अंदर ही सॉल्वेंट को कपड़ों से बाहर भी कर दिया जाता है. कपड़े सूखकर भी बाहर निकलते हैं. उसके बाद उन्हें प्रेस करके हैंगर में टांग दिया जाता है. कपड़े एकदम चकाचक नए दिखने लगते हैं.
ये तो बात हुई मशीन वाली ड्राई क्लीनिंग की. अब बात करते हैं उन लाउंड्री हाउस की जो आपके और हमारे घरों के आस-पास होते हैं. वहां क्या होता है, ये जानने के लिए हमने कल्याणपुरी की एक लाउंड्री के मालिक से बात की. उन्होंने हमें बताया कि ज्यादातर छोटे लाउंड्री हाउस में मशीनों का इस्तेमाल नहीं होता है. हाथ से ही काम होता है.
इस तस्वीर में हाथ से ड्राई क्लीनिंग की जा रही है.आगे बताया कि कपड़े की क्वालिटी और रंग के हिसाब से कैमिकल को सेलेक्ट किया जाता है. कितनी मात्रा में लेना है, कौन सा लेना है, ये देखा जाता है. उस कैमिकल को बड़े से टब में डाला जाता है. उसके बाद कपड़े को उसमें फुलाया जाता है. अगर कपड़े में कोई गहरा दाग होता है, तो उसे छुड़ाने के लिए कई बार पेट्रोल का इस्तेमाल किया जाता है. कपड़े को धोने के बाद हाइड्रो मशीन में डालकर उसके अंदर का कैमिकल निकाला जाता है. पेट्रोल की महक निकालने के लिए कपड़े को धूप में सुखाया जाता है. फिर उसे स्टीम किया जाता है. फिर पैकिंग कर दी जाती है. कपड़ा एकदम नया दिखने लगता है.
ये होती है ड्राई क्लीनिंग की प्रोसेस, जिसमें कुछ भी सूखा नहीं होता है.
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