अंध-भक्ति Vs. अंध-विरोध में फंसी आम जनता को देख रही हैं अनुराधा बेनीवाल
जनता गलतियां माफ़ कर सकती है, धोखा नहीं.
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फोटो - thelallantop
अनुराधा बेनीवाल हरियाणा की हैं. 15 की उम्र में शतरंज की नेशनल चैंपियनशिप जीत चुकी थीं. 16 में वर्ल्ड चैंपियनशिप में देश के लिए खेल रहीं थीं. अनुराधा ने जब शतरंज खेलना छोड़ा तब उनकी वर्ल्ड रैंकिंग थी 38. एक दिन रोहतक से डीयू आ पहुंचीं. मिरांडा हाउस कॉलेज. इनने अपनी बचत के पैसों से देश घूमा. विदेश में बड़े-बड़ों को शतरंज की चालें सिखाईं. 'आजादी मेरा ब्रांड' नाम की किताब लिखी. 500 और 1000 के नोट बंद होने पर वो क्या सोचती हैं, खुद पढ़ लीजिए:
ना मैं कोई अर्थशास्त्री हूं, ना कोई नेता. मेरी समझ सिर्फ एक जागरूक नागरिक की है, जो पॉलिटिक्स, समाज, सिस्टम समझना चाहती है. वो समझ कभी कोई न्यूज़ पढ़ के बनती है, तो कभी कोई किताब, कभी किसी की समझदार बात सुनने से बनती है, तो कभी किसी की बकवास. असल बात तो जाने मुझ तक पहुंचती है कि नहीं, लेकिन मैं मानना चाहूंगी कि दुनिया इतनी भी ख़राब नहीं है कि हर चीज़ को शक की निगाह से देखा जाए. मैं पहले स्वागत करती हूं और फिर जरूरत पड़ने पर शक. उसके उलट पहले शक और फिर स्वागत नहीं. मैंने जब पहली बार नोटबंदी की घोषणा सुनी तो रूबल के घर स्कूल के बाद चाय पीने आई थी. सब भारतीय न्यूज़ चैनल्स प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पांच सौ और हज़ार के नोटों के इनवैलिड हो जाने की घोषणा को रिपीट कर-करके चला रहे थे. मैंने रूबल से पूछा कि क्या मामला है, क्या हो रहा है? स्कूल के बाद न्यूज़ समझने की ताकत कम ही बची थी. रूबल ने मामले की जानकारी दी और जैसे-जैसे मैंने स्पीच सुनी, मेरे रोंगटे खड़े होते गए. मेरे अचरज और उल्लास का ठिकाना नहीं था. मतलब जो तहखानों में नोटों की गड्डियां रखते हैं, वो सब तो गए. उनका तो बैंड बज जाएगा. उनके पास तो ना कोई समय है, ना कोई चारा. मज़ा आ गया. इसका मतलब नकली नोट भी सब ख़त्म एकदम से. टेररिज़म को जो काले धन और फेक करेंसी से फंड किया जाता है, उसकी भी लग गई. मेरा मन तालियां पीटने को किया. ज्यादातर जब भारत में कोई बड़ी खबर होती है, तो मां-पापा के साथ-साथ सब घरवालों मौसी, बुआ, काकी, मामी, भाई को फ़ोन करके खबर लेती हूं. हाल-चाल जानती हूं. लेकिन इस बार तो कुछ खबर लेने जैसा ना था. सच में पहली बार ऑनेस्ट टैक्स पेयर परिवार में होने का सुख महसूस कर रही थी. टोटे में जब आधी जिंदगी बिताई हो तो इस घोषणा का मज़ा कैसे ना लेती. अगले दिन पापा को फ़ोन किया, तो पापा को भी उतना ही खुश पाया. 'गजब कर दिया भई. गजब का फैसला है. बहुत सफाई हो जाएगी,' पापा ने कहा. बबली मौसी ने कहा, 'इस मोदी नै एक तो बढ़िया काम कर दिया, इब ताई तो बेरा ना के भीतर-हे-भीतर प्लानिंग करे था.' इतने बड़े देश में जो एक पूरे महाद्वीप जितनी जनसंख्या रखता है, उसे यूं बदलना या बदलने की कोशिश भी करना सराहनीय है. स्टेटस-को बनाये रखना आसान है, अब तक रहा ही है और रह जाने दो, कोई और बदलेगा. कुछ बदलने के लिए तो बहुत परेशानी उठानी पड़ती है. दो यूरोप के बराबर आबादी वाले हमारे देश में इस तरह के बदलाव लाने की सोच को एक बार तो सलाम ठोंकने का मन किया. तब तक हमें आने वाली परेशानियों का अंदाजा नहीं था. ठीक अधिकतर नेताओं और मीडिया की तरह, जो प्रधानमंत्री की घोषणा पर पहले तो सन्न हुए, कुछ गुदगुदा गए. फिर इस निर्णय की सराहना किए बिना रह नहीं पाए या रह गए कि समय दिया जाए कमियों को उभरने के लिए. इस 'इंस्टैंट कॉफ़ी रीएक्शन' को बदलना ही था. एक दिन बाद ही अख़बार, न्यूज़ चैनल्स, पार्टियां, नेता, लोग दो पालों में बंट गए. एक तरफ लोग इसे 'रैडिकल मूव ऑफ़ द सेंचुरी' कह रहे थे, तो दूसरी तरफ इसे 'स्कैम ऑफ़ द सेंचुरी' बताया जा रहा था. एक तरफ इससे अच्छा कुछ नहीं था, दूसरी तरफ इससे ख़राब कुछ नहीं था. दोनों तरफ के बीच कहीं मेरी समझ फंसी थी. शायद मैं नहीं समझ पा रही हूं, शायद और लोगों से बात करने की जरूरत है. लन्दन में पढ़ने के लिए रही फैमिली-फ्रेंड की बेटी ने बताया कि कैसे उसके कॉलेज में पढ़ रहे इंडियन स्टूडेंट्स एकदम से परेशान हो गए हैं. 'बहुत लॉस हो गया दीदी लोगों का.' वो बच्चे जो वीकेंड पे एक-दो लाख रुपए पार्टियों पर उड़ाते हुए नहीं झिझकते थे, आज परेशान हैं. मेरे मिडिल क्लास दिल की ख़ुशी का ठिकाना नहीं था. एक दूसरी फ्रेंड ने बताया कि कैसे उसके दोस्त ने अभी आठ करोड़ का घर बेचा था, (कुछ काला, कुछ सफ़ेद) उसके दुख और गालियों का कोई अंत नहीं था. हम अध्यापकों की बेटियां अदरक की चाय पे काले-धन वाले अमीरों के दुःख के किस्से सुड़कती रहीं. लेकिन धीरे-धीरे ख़ुशी थोड़ी परेशानी में बदलने लगी. मेरा परिवार पूरा देश नहीं है. पूरा देश मिडिल क्लास भी नहीं है. मजदूरों को मजदूरी ना मिलने की खबरें आने लगीं. सब्जी-फल बेचने वाले छोटे ट्रेडर्स की मुश्किलें सामने आने लगीं. लोगों के मरने तक की खबरें आईं. अब दिल खुश होने के साथ-साथ परेशान भी था. क्या है पूरी खबर? क्या है सही, क्या है गलत, जैसे सवालों ने घेरना शुरू किया. क्या यूं ख़ुशी मनाना गरीब/कमजोर के प्रति इंसेंसिटिव होना है? हमारे देश में गरीब रोज मरता है, आज तक मैंने उसके लिए क्या किया है? क्या फेसबुक पे सेंसिटिव होकर मैं अपनी रिस्पॉन्सिबिलिटी से पल्ला झाड़ सकती हूं? तो क्या उसकी मदद की जाए या एक सेंसिटिव सा स्टेटस अपडेट कर दिया जाए? एक कविता लिख दूं? या एटीएम के सामने मरे हुए गरीब की फोटो डाल के दो लाइनें लिख दूं? कैसे बताऊं कि हां, मैं भी सेंसिटिव हूं और अपने से कमजोर की चिंता करती हूं. जब से फेसबुक डीएक्टिवेट किया है, समाज के प्रति अपनी रिस्पॉन्सिबिलिटी नहीं निभा पा रही हूं. (पन इंटेंडेड) तो बहन जो आज-कल गोवा में काम कर रही है, उसे कहा कि जाकर अपने विदेशी दोस्तों की मदद करे. टाइम लगे तो किसी जरूरतमंद के लिए लाइन में खड़ी हो. जितना कम पैनिक हो और जितनी सही जानकारी, उतना हम इस सिचुएशन को अच्छे से संभाल पाएंगे. कुछ लोगों की आत्महत्या की खबर आई, तो लगा कि लोग जानकारी के अभाव में जान दे रहे हैं. बारह हज़ार ना बदलवा सकने पर एक आदमी ने फांसी लगाई. क्या उसे किसी ने नहीं बताया कि टैक्स सिर्फ उसी पूंजी पर लगेगा, जिसका सोर्स साफ़ नहीं है? ऑनेस्ट आदमी को डरने की जरूरत नहीं है. क्या ये सब सरकार को वॉलंटियर्स के जरिये समाज तक नहीं पहुंचाना चाहिये था? क्या मीडिया का इस जानकारी को बार-बार दिखाना फर्ज नहीं बनता? क्या हम गलतियां हाईलाइट करने के साथ-साथ उन्हें सुधारने की कोशिश ना करें? जो लंबी लाइनें विदड्रॉल से ज्यादा डिपॉजिट के लिए लगी हैं, उनको बताया जाए कि डिपॉजिट में तो अभी बहुत समय बाकी है. फ़िलहाल जिनको पैसे बदलवाने हैं या निकलवाने हैं, उनको प्रायॉरिटी दी जाए. और भी कितनी ही जानकारी दे के हम अपनी तरफ से कुछ ना कुछ मदद कर सकते हैं. शायद जानें भी बचा सकते हैं? क्या हम इस काम में हाथ बंटा के लोगों और देश की मदद कर सकते हैं? मैं कांस्पीरेसी थ्योरी में यकीन करने वालों में नहीं हूं. हो सकता है, लेकिन मैं चाहूंगी कि ये इस डिकेड का सबसे बड़ा स्कैम ना हो. विजय माल्या और ललित मोदी जैसे चोर-भगोड़े किसी पॉलिटिकल पार्टी के नहीं, हमारे सिस्टम के प्रोडक्ट हैं. इस सिस्टम को बदलें और बदल सकने में अपना सहयोग दें. इस सिस्टम को बदलने के लिए सवाल उठाते रहें, कोशिश करते रहें. पैनिक फ़ैलाने से बचें और अंध वाह-वाही से भी दूर रहें. अभी तो सरकार खुद ही अपनी स्कीम को समझ नहीं पाई है, रोज़ रूल बदल रहे हैं या फिर कह सकते हैं कि उन्हें भी आइडिया नहीं था कि इतनी बड़ी मूव के चैलेंजस क्या होंगे या क्या-क्या दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है. जनता गलतियां माफ़ कर सकती है, धोखा नहीं. मैं चाहूंगी कि मेरा देश तरक्की करे और फेक करेंसी और टेररिज़म जैसी महामारियों से बचा रहे. और वो धन जिसको सिर्फ चूहे खाते हैं, जो तहखानों में दबा रहता है, किसी के काम नहीं आता, वो बाहर निकले और गरीब के काम आए. सरकार की गलतियां हाईलाइट हों, लेकिन अगर कुछ अच्छा निर्णय हो, तो हम उसकी मदद करें. देश हमारा है, लोग हमारे हैं. उथल-पुथल में दिक्कतें नहीं होंगी, ये नामुमकिन है. परेशानियां सह लेंगे, रोज़ सहते हैं, लेकिन धोखा नहीं बख्शा जाएगा. आगे-आगे देखता है, होता है क्या.
अनुराधा बेनीवाल की किताब का एक अंश यहां क्लिक करके पढ़ें.
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