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ट्रंप के आने के बाद कभी भी फट सकता है अमेरिका में ये बम

आधी से ज्यादा जनता भय में है.

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ऋषभ
10 नवंबर 2016 (Updated: 10 नवंबर 2016, 09:48 AM IST)
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रेसिज्म. मतलब कोई इंसान खुद को बाकी लोगों से श्रेष्ठ मानता है. क्योंकि उसकी नजर में उसका रंग, धर्म, नेशनलिटी, ग्रुप बाकी लोगों से बहुत ऊपर है. इंसानियत के नजरिए से ये मानसिक बीमारी है. पर एक रेसिस्ट इंसान को ये चीज कभी समझ नहीं आती है. उसके लिये ये उतना ही सही है जितना कि कहना कि सूरज पूरब में उगता है. रेसिज्म का कोई साइंटिफिक प्रूफ नहीं है. रेसिज्म का एक नया नाम भी है. इस्लामोफोबिया.
डोनाल्ड ट्रंप अब अमेरिका के प्रेसिडेंट बन गये हैं. सारे प्रेडिक्शन्स को धता बताकर. राजनीति में एकदम बाहरी. बिजनेसमैन जो कानूनों का दुरुपयोग कर आगे बढ़ा था. ट्रंप ने अपना चुनाव प्रचार एक ऐसी चीज से शुरू किया था जो अमेरिका में मौजूद थी. एक वायरस की तरह. बस पनपने की जगह नहीं मिल रही थी. ट्रंप ने उसके लिए जगह बनाई. ये चीज थी नफरत. दूसरे लोगों की रेस के लिए नफरत. ये दूसरे लोग नेटिव अमेरिकन, इंडियन, जापानी, चीनी या अरब कोई भी हो सकता है. मैक्सिको या अफ्रीका के लोग भी हो सकते हैं. अमेरिका में ये चीज 17वीं शताब्दी से ही मौजूद है. जब यूरोपियन लोगों ने वहां जाकर नेटिव लोगों से सब कुछ हड़पना शुरू कर दिया था. नेटिव लोगों को गुलाम बनाया जाने लगा. नेटिव कल्चर ही खत्म कर दिया गया. ना आगे बढ़ने दिया गया, ना उनको अपने तरीके से जीने दिया गया. बाद में अब्राहम लिंकन ने जान की कीमत पर गुलामी-प्रथा खत्म की. पर लोगों के मन में नेटिव लोगों के लिए नफरत बनी रही. बस उस पर मॉडर्निटी धूल जमती गई. पर वो नफरत आज भी है. अमेरिका की हवाओं में. वहां पर पुलिस नेटिव को पकड़ती नहीं है, मार देती है. सबसे ज्यादा सुसाइड भी नेटिव लोगों में ही होता है. नौकरियों के मामले में भी ये लोग बहुत पीछे हैं. racism1
धीरे-धीरे रेसिज्म ने अपना रूप बदल लिया. नई-नई चीजें, नये-नये तरीके आने लगे. हाल के सालों में रेसिज्म ने एक नया नाम लिया. इस्लामोफोबिया. इस्लाम और मुसलमानों से डर. 9/11 अटैक के बाद इस चीज को दुनिया की स्वीकृति मिल गई. इस चीज को रेसिज्म नहीं माना जाता है. इसे लोग दुनिया के हक में मानने लगे हैं.
तो अमेरिकी चुनाव में जो हुआ वो नॉर्मल नहीं है. वैसे देश में जहां अफ्रीकन-अमेरिकन बराक ओबामा जो टर्म प्रेसिडेंट रहे, वहां चुनाव प्रचार की शुरूआत इससे हुई कि बाहर से आने वाले लोग रेपिस्ट और ड्रगिस्ट हैं. ट्रंप ने ऐलान किया कि प्रेसिडेंट बनते ही वो मुस्लिमों को बैन कर देंगे अमेरिका में. नाजियों और रेस वादी लोगों के ट्वीट रिट्वीट करते थे. कहा कि मैक्सिको के बॉर्डर पर दीवार बनायेंगे जिसका पैसा मैक्सिको से ही लेंगे. और फिर ट्रंप जीत गये. कहा जा रहा है कि एक क्लास उभरा है अमेरिका में. व्हाइट वर्किंग क्लास. जो काम कर रहा है. पैसा कमा रहा है. पर फ्रस्ट्रेटेड है. क्योंकि तुरंत अरबपति नहीं हो पा रहा. अफ्रीकन-अमेरिकन ओबामा ने अमेरिका के गरीब लोगों के लिए हेल्थ इंश्योरेंस की व्यवस्था की तो ये क्लास नाराज था. क्योंकि उनको लग रहा था कि उनके पैसे से बेकार के लोगों को हेल्थ इंश्योरेंस दिया जा रहा है. तो ट्रंप ने वादा किया कि आते ही सबसे पहले इस इंश्योरेंस को खत्म कर दूंगा. ये कुछ लोगों के लिए दिल जीतने वाली बात थी. डिसीजन मेकिंग पॉवर. इच्छाशक्ति. 2008 के बाद अमेरिकी इकॉनमी उस रफ्तार से नहीं बढ़ रही है. लोगों का जीवन ठीक चल रहा है. पर वो चीज नहीं हो पा रही कि नोट जला के आग ताप रहे हैं. ट्रंप ने लोगों को ये अहसास कराया कि ये इसलिए हो रहा है क्योंकि अमेरिका में बाहर के लोग बहुत ज्यादा हैं. सारा पैसा यही लोग ले रहे हैं. बाहर में वो लोग भी आते हैं जो अमेरिका के मूल निवासी हैं. यूरोप से गये लोगों का ही तो अमेरिका है अब. ट्रंप ने कहा कि मैं संविधान में संशोधन कर के इन लोगों को सिखा दूंगा. trump racism 1
नेशनलिज्म एक बार फिर से दुनिया में छा चुका है. क्योंकि गर्मजोशी पैदा करने के लिए नई चीज नहीं मिल रही थी. अभी हर देश में लोग अपने देश को लेकर पागल हो रहे हैं. क्योंकि फ्रस्ट्रेटेड जिंदगी में खुश रहने के लिए एक मौका मिल रहा है. चाहे वो किसी की कीमत पर ही क्यों ना हो.अमेरिका में 70 प्रतिशत वोटर व्हाइट थे. ज्यादातर ने ट्रंप को ही वोट किया. नेटिव लोगों में से अधिकतम ने हिलेरी को वोट किया.
ट्रंप के लिए रेसिज्म कोई जुमला नहीं था सिर्फ चुनाव के लिए. आज पचास साल से ट्रंप रेसिज्म फैला रहे हैं. 70-80 के दशक में ही ट्रंप अपने ऑफिस में नेटिव लोगों को फ्लोर छोड़ देने का आदेश देते थे. 80-90 के दशक में ट्रंप ने बाकायदा लोगों को फंड भी किया था नफरत फैलाने के लिए. ट्रंप उस विचारधारा के हैं जो ये मानते हैं कि अमेरिका बहुत श्रेष्ठ देश है और बाहरी लोगों के चलते गर्त में जा रहा है. पिछले 30-40 साल से ट्रंप ने इसी विश्वास को मन में पाला है. यही चीज ट्रंप की रैलियों में भी सामने आई. वक्त के गुजरने के साथ लोगों के मन की तहों में चला गया था रेसिज्म. लोग खुल के बोल नहीं पाते थे. पर जब प्रेसिडेंशियल कैंडिडेट ने खुल के बोलना शुरू किया तो उन लोगों को अपने मन की बात सामने नजर आ गई. और अब अमेरिका के दर्जनों शहरों में हजारों लोग ट्रंप के खिलाफ उतर आये हैं. न्यूयॉर्क, वाशिंगटन, ऑस्टिन, बॉस्टन, लॉस एंजल्स हर शहर में लोग गुस्से में आ गये हैं. व्हाइट हाउस के सामने प्रोटेस्ट हो रहा है. और आज उन पर एक जगह फायरिंग हो गई. 5 लोग मर भी गये. पुलिस ने नहीं किया. जनता में से ही किसी ने किया. और यही चीज सबसे खतरनाक है. लोग खुद को अपनी रेस का रखवाला समझने लगेंगे. दूसरी रेस के लोगों पर उनकी नफरत एकदम से सामने आ जाएगी. बहुत सारे लोग नेट पर सर्च करना शुरू कर दिये हैं कि प्रेसिडेंट कैसे हटाया जाता है. पर अभी तो कोई फायदा नहीं. अब तो जो है, उसी से डील करना पड़ेगा.

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