रेसिज्म. मतलब कोई इंसान खुद को बाकी लोगों से श्रेष्ठ मानता है. क्योंकि उसकी नजरमें उसका रंग, धर्म, नेशनलिटी, ग्रुप बाकी लोगों से बहुत ऊपर है. इंसानियत के नजरिएसे ये मानसिक बीमारी है. पर एक रेसिस्ट इंसान को ये चीज कभी समझ नहीं आती है. उसकेलिये ये उतना ही सही है जितना कि कहना कि सूरज पूरब में उगता है. रेसिज्म का कोईसाइंटिफिक प्रूफ नहीं है. रेसिज्म का एक नया नाम भी है. इस्लामोफोबिया. डोनाल्डट्रंप अब अमेरिका के प्रेसिडेंट बन गये हैं. सारे प्रेडिक्शन्स को धता बताकर.राजनीति में एकदम बाहरी. बिजनेसमैन जो कानूनों का दुरुपयोग कर आगे बढ़ा था. ट्रंपने अपना चुनाव प्रचार एक ऐसी चीज से शुरू किया था जो अमेरिका में मौजूद थी. एकवायरस की तरह. बस पनपने की जगह नहीं मिल रही थी. ट्रंप ने उसके लिए जगह बनाई. येचीज थी नफरत. दूसरे लोगों की रेस के लिए नफरत. ये दूसरे लोग नेटिव अमेरिकन, इंडियन,जापानी, चीनी या अरब कोई भी हो सकता है. मैक्सिको या अफ्रीका के लोग भी हो सकतेहैं. अमेरिका में ये चीज 17वीं शताब्दी से ही मौजूद है. जब यूरोपियन लोगों ने वहांजाकर नेटिव लोगों से सब कुछ हड़पना शुरू कर दिया था. नेटिव लोगों को गुलाम बनायाजाने लगा. नेटिव कल्चर ही खत्म कर दिया गया. ना आगे बढ़ने दिया गया, ना उनको अपनेतरीके से जीने दिया गया. बाद में अब्राहम लिंकन ने जान की कीमत पर गुलामी-प्रथाखत्म की. पर लोगों के मन में नेटिव लोगों के लिए नफरत बनी रही. बस उस पर मॉडर्निटीधूल जमती गई. पर वो नफरत आज भी है. अमेरिका की हवाओं में. वहां पर पुलिस नेटिव कोपकड़ती नहीं है, मार देती है. सबसे ज्यादा सुसाइड भी नेटिव लोगों में ही होता है.नौकरियों के मामले में भी ये लोग बहुत पीछे हैं.--------------------------------------------------------------------------------धीरे-धीरे रेसिज्म ने अपना रूप बदल लिया. नई-नई चीजें, नये-नये तरीके आने लगे. हालके सालों में रेसिज्म ने एक नया नाम लिया. इस्लामोफोबिया. इस्लाम और मुसलमानों सेडर. 9/11 अटैक के बाद इस चीज को दुनिया की स्वीकृति मिल गई. इस चीज को रेसिज्म नहींमाना जाता है. इसे लोग दुनिया के हक में मानने लगे हैं.--------------------------------------------------------------------------------तो अमेरिकी चुनाव में जो हुआ वो नॉर्मल नहीं है. वैसे देश में जहां अफ्रीकन-अमेरिकनबराक ओबामा जो टर्म प्रेसिडेंट रहे, वहां चुनाव प्रचार की शुरूआत इससे हुई कि बाहरसे आने वाले लोग रेपिस्ट और ड्रगिस्ट हैं. ट्रंप ने ऐलान किया कि प्रेसिडेंट बनतेही वो मुस्लिमों को बैन कर देंगे अमेरिका में. नाजियों और रेस वादी लोगों के ट्वीटरिट्वीट करते थे. कहा कि मैक्सिको के बॉर्डर पर दीवार बनायेंगे जिसका पैसा मैक्सिकोसे ही लेंगे. और फिर ट्रंप जीत गये. कहा जा रहा है कि एक क्लास उभरा है अमेरिकामें. व्हाइट वर्किंग क्लास. जो काम कर रहा है. पैसा कमा रहा है. पर फ्रस्ट्रेटेडहै. क्योंकि तुरंत अरबपति नहीं हो पा रहा. अफ्रीकन-अमेरिकन ओबामा ने अमेरिका केगरीब लोगों के लिए हेल्थ इंश्योरेंस की व्यवस्था की तो ये क्लास नाराज था. क्योंकिउनको लग रहा था कि उनके पैसे से बेकार के लोगों को हेल्थ इंश्योरेंस दिया जा रहाहै. तो ट्रंप ने वादा किया कि आते ही सबसे पहले इस इंश्योरेंस को खत्म कर दूंगा. येकुछ लोगों के लिए दिल जीतने वाली बात थी. डिसीजन मेकिंग पॉवर. इच्छाशक्ति. 2008 केबाद अमेरिकी इकॉनमी उस रफ्तार से नहीं बढ़ रही है. लोगों का जीवन ठीक चल रहा है. परवो चीज नहीं हो पा रही कि नोट जला के आग ताप रहे हैं. ट्रंप ने लोगों को ये अहसासकराया कि ये इसलिए हो रहा है क्योंकि अमेरिका में बाहर के लोग बहुत ज्यादा हैं.सारा पैसा यही लोग ले रहे हैं. बाहर में वो लोग भी आते हैं जो अमेरिका के मूलनिवासी हैं. यूरोप से गये लोगों का ही तो अमेरिका है अब. ट्रंप ने कहा कि मैंसंविधान में संशोधन कर के इन लोगों को सिखा दूंगा.--------------------------------------------------------------------------------नेशनलिज्म एक बार फिर से दुनिया में छा चुका है. क्योंकि गर्मजोशी पैदा करने के लिएनई चीज नहीं मिल रही थी. अभी हर देश में लोग अपने देश को लेकर पागल हो रहे हैं.क्योंकि फ्रस्ट्रेटेड जिंदगी में खुश रहने के लिए एक मौका मिल रहा है. चाहे वो किसीकी कीमत पर ही क्यों ना हो. अमेरिका में 70 प्रतिशत वोटर व्हाइट थे. ज्यादातर नेट्रंप को ही वोट किया. नेटिव लोगों में से अधिकतम ने हिलेरी को वोट किया.--------------------------------------------------------------------------------ट्रंप के लिए रेसिज्म कोई जुमला नहीं था सिर्फ चुनाव के लिए. आज पचास साल से ट्रंपरेसिज्म फैला रहे हैं. 70-80 के दशक में ही ट्रंप अपने ऑफिस में नेटिव लोगों कोफ्लोर छोड़ देने का आदेश देते थे. 80-90 के दशक में ट्रंप ने बाकायदा लोगों को फंडभी किया था नफरत फैलाने के लिए. ट्रंप उस विचारधारा के हैं जो ये मानते हैं किअमेरिका बहुत श्रेष्ठ देश है और बाहरी लोगों के चलते गर्त में जा रहा है. पिछले30-40 साल से ट्रंप ने इसी विश्वास को मन में पाला है. यही चीज ट्रंप की रैलियोंमें भी सामने आई. वक्त के गुजरने के साथ लोगों के मन की तहों में चला गया थारेसिज्म. लोग खुल के बोल नहीं पाते थे. पर जब प्रेसिडेंशियल कैंडिडेट ने खुल केबोलना शुरू किया तो उन लोगों को अपने मन की बात सामने नजर आ गई. और अब अमेरिका केदर्जनों शहरों में हजारों लोग ट्रंप के खिलाफ उतर आये हैं. न्यूयॉर्क, वाशिंगटन,ऑस्टिन, बॉस्टन, लॉस एंजल्स हर शहर में लोग गुस्से में आ गये हैं. व्हाइट हाउस केसामने प्रोटेस्ट हो रहा है. और आज उन पर एक जगह फायरिंग हो गई. 5 लोग मर भी गये.पुलिस ने नहीं किया. जनता में से ही किसी ने किया. और यही चीज सबसे खतरनाक है. लोगखुद को अपनी रेस का रखवाला समझने लगेंगे. दूसरी रेस के लोगों पर उनकी नफरत एकदम सेसामने आ जाएगी. बहुत सारे लोग नेट पर सर्च करना शुरू कर दिये हैं कि प्रेसिडेंटकैसे हटाया जाता है. पर अभी तो कोई फायदा नहीं. अब तो जो है, उसी से डील करनापड़ेगा.