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रोहिंग्या मुसलमानों की बदहाली का असल जिम्मेदार कोई और है!

रोहिंग्या मुसलमानों की समस्या की जड़ में जाने के लिए इसे पढ़ना जरूरी है.

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13 सितंबर 2017 (अपडेटेड: 13 सितंबर 2017, 02:36 PM IST)
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म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों के हजारों घर जला दिए गए और वो अपना सब कुछ छोड़ने को मजबूर हो गए. Image: Reuters
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ये आर्टिकल ताबिश सिद्दीकी ने दी लल्लनटॉप के लिए लिखा है.




रोहिंग्या मुसलमानों के साथ जो हो रहा है वो अमानवीय, क्रूर और भर्त्सना योग्य है. शायद ही कोई ऐसा हो जिसका इस नरसंहार के प्रति दिल न पसीजे. सारी दुनिया इस मसले को लेकर परेशान है मगर इस समस्या का जो मूल है उसके बारे में शायद ही कोई चर्चा करने को तैयार हो. अभी बर्मा (म्यांमार) में जो है वो आज से नहीं बल्कि दशकों से चल रहा है. ये सारा झगड़ा एंटी-इंडियन मूवमेंट के नाम पर शुरू हुआ और आज इसने एंटी इस्लाम का रूप ले लिया है. इस्लाम के विरोध में ये इसलिए अधिक उभरा क्यूंकि इस्लामिक शिक्षा और बौद्ध धर्म की शिक्षाओं में बड़ा विरोधाभास है.
बेघर रोहिंग्या मुसलमान. Image: Reuters
बेघर रोहिंग्या मुसलमान. Image: Reuters

बर्मा में सोलहवीं शताब्दी से ये विरोधाभास बौद्धों और मुसलमानों के बीच झगड़े का मुख्य कारण बना हुआ है. उदाहरण के लिए, सोलहवीं शताब्दी में बर्मा के राजा ने बकरीद पर होने वाली कुर्बानी को अमानवीय बताते हुए इस पर पूरी तरह से पाबंदी लगा दी थी. आगे आने वाले राजाओं ने भी इस 'निषेध' को जारी रखा. अट्ठारवीं शताब्दी के राजा 'अलौंगपाया' ने तो इस्लामिक तरीके से जानवर को हलाल करने को भी निषेध क़रार दिया था. क्यूंकि उनके हिसाब से ये जानवर को मारने का सबसे अमानवीय तरीका था.
राजा अलौंगपाया की मूर्ति, Image: Pinterest
राजा अलौंगपाया की मूर्ति, Image: Pinterest

म्यांमार में इस्लाम और बौद्ध धर्म की शिक्षा के बीच ये खींच तान आज की नहीं है. और अब यही खींचतान लगभग दुनिया के हर धर्मों और इस्लाम के बीच देखने को मिल रही है. इसकी बहुत गूढ़ वजह है जिस पर बात करना इस समय में बहुत ही ज़रूरी है.
म्यांमार में बौद्ध बहुसंख्यक थे और हैं. वो नहीं चाहते थे कि इस्लाम की कुछ परम्पराएं उनके यहां बर्मा में निभाई जाएं. क़ुर्बानी जिसमें से एक थी. वजहें और भी बहुत सारी थीं और हैं मगर व्यापक रूप से ये ही एक 'दिखने' वाला कृत्य था जिस पर वो अपना रोष दिखा सकते थे. इसलिए उन्होंने कुर्बानी पर पहले रोक लगायी. इसको लेकर विवाद हुआ. और अट्ठारवीं शताब्दी के बाद मुसलमानों द्वारा ये फिर से किया जाने लगा क्यूंकि तब तक मुसलमानों की संख्या वहां अधिक हो चुकी थी. अभी भी म्यांमार की कुल जनसंख्या का साढ़े चार प्रतिशत मुसलमान हैं.
बकरीद की कुर्बानी को लेकर अभी भी वहां बहुत तनाव हो जाता है. जिस जगह मुसलमान क़ुर्बानी करते हैं उसके बाहर भारी पुलिस बल तैनात होता है. मुसलमानों को ये निर्देश दिए जाते हैं कि स्लॉटर हाउस (कसाई घर) से निकलने से पहले अपने कपड़ों पर लगे खून को साफ़ कर लें. ताकि बाहर दूसरे धर्म के लोगों को ये खून न दिखे. कुर्बानी के दौरान ऐसा तनाव अन्य देशों में भी देखने को मिलता है. मगर मुसलमान उस से तब तक मुंह फेरे रहेंगे जब तक स्थिति बिगड़ न जाए.
Image: Help Hand for Relief and Development
Image: Help Hand for Relief and Development

इतने तनाव के बाद भी मुसलमान क़ुर्बानी ज़रूर करते हैं. सन 2012 में पहली बार इस तनाव को देखते हुए कुर्बानी नहीं की गयी थी. बौद्ध भिक्षुओं का कहना था कि उन्हें इस से बहुत परेशानी होती है. कि उनके यहां इतनी बड़ी तादात में 'गायें' एक दिन में मुसलमान एक दिन में कुर्बान कर देते हैं. उन्हें गाय नहीं बल्कि बकरी करनी चाहिए. मगर ये विवाद सुलझा नहीं. दरअसल बौद्ध साधुवों को क़ुर्बानी के इस कृत्य से ही पूरी तरह नफ़रत थी और है मगर इस बात पर मुसलमान कभी झुके नहीं. इतने दिनों से चले आ रहे इतने छोटे मोटे विवाद और धार्मिक कट्टरता ने अब ये जन धारणा वहां आम कर दी है कि मुसलमान उनकी किसी भी भावना का कभी भी सम्मान नहीं करेंगे.
अफगानिस्तान का बामियान प्रांत. लगभग दूसरी शताब्दी से बौद्ध लोगों द्वारा तब तक तीर्थ स्थान के रूप में प्रयोग किया जा रहा था, जब तक कि सातवीं शताब्दी के बीच में 'इस्लामिक' आक्रमणकारियों द्वारा इस पर पूरी तरह से कब्ज़ा नहीं कर लिया गया. इस्लाम के आते ही बौद्ध लोगों को वहां से मजबूर होकर भागना पड़ा. बुद्ध की विशाल प्रतिमाएं, जो कि मुहम्मद साहब के पैदा होने के समय से भी पहले बामियान में बनाई गयी थीं, कई बार इस्लामिक आक्रमणकारियों ने ध्वस्त करने की कोशिश की. ये बुद्ध की सबसे विशाल प्रतिमाएं थीं जिन्हें आक्रमणकारी पूरा नहीं तोड़ पाते थे तो हल्का नुकसान पहुंचा देते थे.
बामियान तीर्थ, Image: Khan Academy
बामियान तीर्थ, Image: Khan Academy

बादशाह औरंगज़ेब ने भी बहुत भारी भरकम तोपों से इसे उड़ाने की भी कोशिश की थी. औरंगज़ेब के बाद पर्शियन राजा नादिर अफ्शार ने भी उन प्रतिमाओं को तोपों से उड़ाने की कोशिश की थी. ये सारे इस्लामिक शासक समय समय पर उन प्रतिमाओं को नष्ट करने की कोशिश करते रहे. अंत में सन 2001 में तालिबानी कमांडर मुल्ला उमर की टीम ने उन प्रतिमाओं को पूरी तरह से नष्ट कर दिया. ये बौद्धों का तीर्थ था और ये उनके ईष्ट की प्रतिमा थी. तालिबान को तो हम आतंकवादी कह कर पल्ला झाड़ सकते हैं मगर औरंगज़ेब और अन्य इस्लामिक हुक्मरानों द्वारा इन प्रतिमाओं पर हमला यही दर्शाता है ये 'इस्लामिक' दर्शन मूल था जिसे बाद में तालिबान ने पूरा कर दिया.
बामियान बुद्ध, नष्ट होने के बाद. Image: AP
बामियान बुद्ध, नष्ट होने के बाद. Image: AP

इस बात से बौद्ध भली भांति अवगत हो चुके थे और वो जानते थे कि इस्लाम के मानने वालों में उनके धर्म को लेकर कोई भी करुणा नहीं थी. जब बामियान की प्रतिमाएं तोड़ी गईं तब भी म्यांमार के मुसलमानों ने कोई ख़ास विरोध नहीं किया और न ही अपनी कोई संवेदना दिखाई. ये सब यहां इसलिए लिखना ज़रूरी है क्यूंकि जब तक इस समस्या का मूल नहीं समझा जाएगा तब तक इसको हल नहीं किया जा सकता है. बौद्ध ही नहीं बल्कि लगभग हर धर्म इस समय इस्लाम की शिक्षा और उसके क्रियाकलापों को लेकर शंकित हैं. हम बहुसंख्यक म्यांमार बौद्धों पर दबाव बना कर कभी भी उनको इस बात के लिए राज़ी नहीं कर सकते हैं कि आप अपने यहां उनके साथ ये व्यवहार न करें. बल्कि हम मिलकर इस तरह के दर्शन और सोच पर, जो दूसरे धर्मों और लोगों की भावनाओं की क़द्र न करे, पाबन्दी लगा सकते हैं. क्यूंकि जब तक ये सोच ख़त्म नहीं होगी ये सब सुधरेगा नहीं बल्कि और बिगड़ता जाएगा.
बकरीद पर नमाज पढ़कर दुवा करते रोहिंग्या मुस्लिम, Image: Reuters
बकरीद पर नमाज पढ़कर दुवा करते रोहिंग्या मुस्लिम, Image: Reuters

भारत में भी अभी तक ज़िद में गाय काटी जाती रही हैं. बिना कुछ सोचे समझे इस जाहिलियत को मर्दानगी समझ के किया जाता रहा है. अब जब वो लोग सत्ता में आए जिनके लिए 'गाय' एक पवित्र जानवर था और है, उन्होंने कट्टरता के साथ इसका दमन शुरू कर दिया है. ये दमन की नौबत आखिर आई क्यूं? कभी इस पर गौर कीजिए. और इसे जिस दिन आप समझ जाएंगे उस दिन रोहिंग्या मुसलमानों के हालात को समझ जाएंगे. रोहिंग्या के गरीब मुसलमान बिलकुल निर्दोष हैं. मगर आस्था की जो लड़ाई सदियों से चली आ रही है उसको वो और दुनिया के अन्य मुसलमान अभी तक शायद समझने में नाकाम रहे हैं. उसके साथ साथ दुनिया के अन्य कोनों में भी कट्टर मुसलमान समय समय पर ऐसी हरकतें करते रहते हैं जिसका ख़ामियाज़ा रोहिंग्या मुसलमानों जैसे गरीब और निर्दोष लोगों को बिना वजह उठाना पड़ता है.
म्यांमार के गांवों में जलाए गए रोहिंग्या मुसलमानों के घर, Image: Reuters
म्यांमार के गांवों में जलाए गए रोहिंग्या मुसलमानों के घर, Image: Reuters

बुद्ध की प्रतिमा कहीं टूटे तो आप ख़ुशी न मनाइए. कहीं शिया मारे जाएं तो आप ख़ुशी न मनाइए. कहीं यहूदी मारे जाएं तो आप हाथ उठा उठा के अल्लाह का शुक्र न अदा कीजिए. कहीं दुनिया के अन्य कौम के लोग मारे जाएं तो आप उतना ही विलाप कीजिए जितना आप रोहिंग्या मुसलमानों के लिए कर रहे हैं. तभी लोग समझ पाएंगे कि आप के भीतर असल में दया है और ये रोना आपके 'मुस्लिम भाईचारे' का हिस्सा नहीं है.
औरंगज़ेब और तालिबान से लेकर बगदादी तक ने बहुत नुकसान कर दिया है. लोगों की आस्थाओं को बहुत नुकसान पहुंचाया है. ये काम तब हुआ है जब जहां मुस्लिम बहुसंख्यक थे. और यही 'मुसलमानों के बहुसंख्यक' होने का डर म्यांमार के लोगों के दिलों में बस गया है. यही डर दुनिया के हर देशों में बसता जा रहा है. सोचिये इसे. सोचना बहुत ज़रूरी है. अगर हम इसे सोच और समझ सकें और अपने जीवन में उतार सकें तो मुसलमानों के साथ रोहिंग्या मुसलमानों जैसी नौबत दुनिया के अन्य देशों में कभी नहीं आएगी.
रोहिंग्या का केस समझने के लिए वीडियो देखें:



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ताबिश एक मुखर विचारक हैं. अपनी लॉजिकल सोच की वजह से फेसबुक पर फेमस हैं. इसी वजह से आसपास के कट्टर धार्मिक विचारधारा वाले लोगों के निशाने पर रहते हैं. ताबिश का मानना है कि सबसे पहले खुद के घर से शुरुआत करनी चाहिए. इसीलिए अपने ही मज़हब की कुरीतियों पर खुलकर लिखते हैं. फेसबुक पर फॉलोअर्स और विरोधक समान मात्रा में हैं इनके. अक्सर दोनों तरफ के कट्टरपंथियों के निशाने पर रहते हैं.


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