जब डॉक्टर आपकी मां बनने की उम्मीद को दो हफ्ते और लटका देती है...
चौथी क़िस्त : एक प्रेग्नेंट लड़की की डायरी. मां बनने के लिए किन हालातों से गुज़रती है.
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फोटो - thelallantop
अंकिता जैन. जशपुर छतीसगढ़ की रहने वाली हैं. पढ़ाई की इंजीनियरिंग की. विप्रो इंफोटेक में छह महीने काम किया. सीडैक, पुणे में बतौर रिसर्च एसोसिएट एक साल रहीं. साल 2012 में भोपाल के एक इंजीनियरिंग इंस्टिट्यूट में असिस्टेंट प्रोफेसर रहीं. मगर दिलचस्पी रही क्रिएटिव राइटिंग में. जबर लिखती हैं. इंजीनियरिंग वाली नौकरी छोड़ी. 2015 में एक नॉवेल लिखा. ‘द लास्ट कर्मा.’ रेडियो, एफएम के लिए भी लिखती हैं. शादी हुई और अब वो प्रेग्नेंट हैं. ‘द लल्लनटॉप’ के साथ वो शेयर कर रही हैं प्रेग्नेंसी का दौर. वो बता रही हैं, क्या होता है जब एक लड़की मां बनती है. पढ़िए चौथी क़िस्त.
बचपन से ही मुझे और मेरी बहिन को मां के पेट पर हाथ रखकर सोने की आदत है. अगर हाथ ना रखें तो सुबह तक लगता है कि नींद पूरी ही नहीं हुई, छोटे में मैं और मेरी छोटी बहिन मां का पेट आपस में बांट लेते थे, उनकी साड़ी में से जितना पेट झांकता था उसका ऊपर वाला हिस्सा मेरा और नीचे वाला बहिन का. बड़े हुए तो पेट के साथ-साथ उस पर खाना पकाते समय तेल या घी के छींटों से आए छोटे-छोटे जलने के निशान भी दिखने लगे, और उनके मायने भी समझ आने लगे. मां क्या होती है, कैसे एक औरत मां बन जाती है, और अपने बच्चों के लिए सारी ज़िन्दगी वो कितनी ही छोटी-छोटी तकलीफों को यूं ही चलता-फिरता कर देती है, ये बड़े होते-होते समझ आया... और सही मायनों में एक प्रेग्नेंसी खोकर. अब समझ आने लगा है कि मेडिकली अपने हाड़-मांस-खून से बने एक टुकड़े के लिए एक औरत मां कैसे बन जाती है. वो 17 दिन शांति से काटना उतना आसान भी नहीं था, क्योंकि अर्ली प्रेगनेंसी साइन दिखने लगे थे, सुबह उठने में चक्कर आना, माथा भारी होना, सीने में होने वाले बदलाव, ब्लड प्रेशर लो हो जाना, इन सबने बिना किसी टेस्ट के मन में उम्मीद जगा तो दी थी, लेकिन फिर भी मन कड़ा करके हम आने वाले हर कढ़वे घूंट के लिए तैयार थे. उन दिनों मेरी सास घर में नहीं थी, और ससुर जिन्हें मेरी हालत नासाज़ सी दिखने लगी तो उन्होंने मुझे अपनी तबीयत और ब्लड प्रेशर वाच करने के लिए एक चार्ट बना कर दिया, जिसमें मुझे रोज़ अपनी बदलती हालत को लिखना था, ब्लड प्रेशर आदि का चार्ट बनाना था. ससुर और बहु के बीच एक मौन और शालीन अंडरस्टैंडिंग बनाते हुए पापा (ससुर) ने मां (सास) के घर वापस आने तक हर कदम पर मेरा पूरा साथ दिया, जिसके लिए उन्हें अपने खाने-पीने के रूटीन या अपनी व्यवस्थित दिनचर्या में भले ही थोड़ा फेर-बदल करना पड़ा हो, लेकिन उनके इस साथ ने मेरे मन में उनके लिए सम्मान और स्नेह का रिश्ता और मजबूत कर दिया, ससुराल में भी मुझे पिता मिल गए थे, और बचपन से मन में बनी ससुर की, पित्रसत्तात्मक छवि अब पूरी तरह बदल चुकी थी. पीरियड मिस होने के तकरीबन 24 दिन बाद हम पहली बार डॉक्टर के पास रांची पहुंचे. मेरे साथ यह भी एक समस्या थी कि जशपुर में कोई बहुत अच्छी गायनेकोलॉजिस्ट नहीं थी, जिसके लिए या तो हमें कुनकुरी या रांची जाना था, छतीसगढ़ सरकार की मेहरबानी से जशपुर से कुनकुरी तक का रास्ता इतना शानदार था कि किसी गर्भवती महिला को वहां तक ले जाना खतरे से खाली नहीं था, इसलिए हमने रांची चुना, और एक मेडिकल मोबाइल एप की मदद से रांची की एक नामी, एक्सपीरियंसड और अच्छी डॉक्टर खोजकर हम उसके पास पहुंच गए. मन में डर बहुत था कि पता नहीं डॉक्टर क्या कहेगी, क्या मैंने सही से कंसीव किया होगा, क्या ये वाली प्रेग्नेंसी आगे चलेगी, या कोई अनहोनी खबर हमें मिलेगी... इन्हीं सब सवालों के साथ हम डॉक्टर के सामने बैठे थे. अपने पिछले मिस्केरिज और पूरी मेडिकल हिस्ट्री डॉक्टर को बताने के बाद हमें डॉक्टर के जवाब का इंतज़ार था. जो उसने हमारी पूरी रामकहानी सुनने के बाद एक लाइन में दिया, “बिना अल्ट्रासाउंड किये मैं कुछ नहीं कह सकती”. उसकी इन लाइन्स ने मेरी बंधी हिम्मत में कोई ख़ास इज़ाफा नहीं किया था, बस मेरी लार सी टपकती उम्मीद को अल्ट्रासाउंड वाली डॉक्टर की तरफ शिफ्ट कर दिया था. तकरीबन दो बोतल पानी और एक घंटे इंतज़ार करने के बाद मैं अपनी यूट्रस के अन्दर तांका-झांकी करने डॉक्टर के सामने लेटी थी. मन के दो कोने उम्मीद और नाउम्मीदी का पार्लियामेंट बनाए हुए थे, जहां कोई किसी की नहीं सुन रहा था. कुछ देर तक मेरे पेट पर मशीन का रोलर घुमाने के बाद भी जब डॉक्टर के चेहरे पर मुझे कुछ पढ़ने को नहीं मिला तो मेरी नाउम्मीदी मुझ पर हावी होने लगी, फिर डॉक्टर ने मुझसे पूछा, “लास्ट पीरियड्स कब हुए थे”. मैंने तारीख बताई तो बोली, “उस हिसाब से तो अब तक फेटल पोल बन जाना चाहिए था.” रिपोर्ट देखकर डॉक्टर ने बताया कि “मेरी right ovary में corpus luteal cyst भी देखने को मिला है. जो असामान्य तो नहीं है, लेकिन भविष्य में बच्चा बन्ने के बाद यदि ये अपने आप डिज़ोल्व नहीं हुआ तो खतरा बन सकता है. जिसे ऑपरेशन करके निकालना पड़ता है. लेकिन फिलहाल आप चिंता मत कीजिये, और बिना किसी उम्मीद के घर जाइए, अगर सब ठीक रहा तो दो हफ्ते बाद आपको अच्छी खबर मिलेगी, वरना अभी बहुत समय है आपके पास मां बनने के लिए.” डॉक्टर से मिली इस उम्मीद भरी नाउम्मीदी ने मुझे दो हफ़्तों के लिए फिर उसी स्थिति में ला खड़ा किया था, लेकिन इस बार मैंने सोच लिया था कि मैं अपने ऊपर किसी भी तरह का कोई नकारात्मक हउआ नहीं मंडराने दूंगी. मैं ख़ुश रहूंगी और जो भी स्थिति आएगी उसका सामना करूंगी. मैं यहां अपनी रिपोर्ट भी दिखा रही हूं, ताकि मेरे तरह के केस वाले लोगों को अपनी स्थिति जांचने में आसानी हो. डॉक्टर से मिली इतनी जानकारी मेरे लिए काफी नहीं थी, right ovary में corpus luteal cystके और फेटल पोल के बारे में अब मुझे हर वो जानकारी चाहिए थी जो इन्टरनेट पर या मेरे पास रखी प्रेग्नेंसी सम्बंधित किताबों में उपलब्ध है. मैं और मेरे पति हम दोनों ही इस जानकारी को चाटने में लग गए और बहुत कुछ पढ़ने के बाद एक उम्मीद भरा जो अंत हमें मिला वो ये था कि,“right ovary में corpus luteal cyst प्रेग्नेंसी में बहुत ही सामान्य बात है, और कई महिलाओं को यह पता भी नहीं चल पाता कि उनकी प्रेग्नेंसी के दौरान उन्हें यह हुआ था. ये वो जानकारी थी जिसने मुझे कुछ हद तक राहत दी थी. उम्मीद बाकी थी कि फेटल पोल बनने के बाद भी यदि यह cyst रहा तो भी कोई खतरे वाली बात नहीं होगी. लेकिन फेटल पोल यानि मेरा बच्चा बनना अभी बाकी था. बस अब मुझे डॉक्टर की दी हुई दवाइयों, कुछ हिदायतों और मन को शांत रखकर दो हफ़्तों तक इंतज़ार करना था कि ऊपर वाला मुझे इस बार मां बनने की नेमत से नवाज़ेगा या नहीं... अगली क़िस्त में बताउंगी कि आगे क्या हुआ... वैसे एक बात अब यथार्थ लगती है कि खुशियां यूं ही नहीं मिल जातीं दोस्त... मिलने से पहले सारे इम्तेहान ले डालती हैं.

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