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मैं अब बोरिंग बॉलिंग करूंगा : अश्विन

इंडियन टीम चेंजओवर से गुज़री है. कोच ही नहीं, अब सब कुछ बदल रहा है. खेल भी, तरीका भी.

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14 जुलाई 2016 (अपडेटेड: 14 जुलाई 2016, 07:56 AM IST)
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आर आश्विन. इंडिया के स्पिन बॉलर. वेस्ट इंडीज़ के साथ चार टेस्ट मैचों की सीरीज़ शुरू होने से ठीक पहले क्रिकइन्फो से बात कर रहे थे. उन्होंने कहा कि वो लाइन और लेंथ पर पूरी तरह से फ़ोकस करते हुए बॉलिंग करेंगे. वो खुद को जितना हो सकेगा बोरिंग बना देंगे. वेस्ट इंडीज़ के स्लो विकेट पर उन्हें पूरे पेशेंस और दिमाग के साथ बॉलिंग करनी होगी. उन्हें टी-20 के मोड से बाहर आना होगा. टीम इंडिया एक बड़े चेंज से अभी-अभी गुज़री है. ये ऐसा चेंज है जो टीमों की काया पलट देता है. टीम इंडिया के सारथी अब अनिल कुंबले बन चुके हैं. अनिल का आना कई मायनों में सोने पे सुहागा साबित हो सकता है. कुंबले बहुत ही टेक्निकल और चीज़ों की एनेलिसिस करके अपने काम को आगे बढ़ाने वाले लोगों में से हैं. उनकी ये आदत तबसे रही है जब वो इंडियन क्रिकेट में एक प्लेयर भर थे. हालांकि वो भी कोई मामूली बात नहीं है लेकिन आज उनके कन्धों पर भार ज़्यादा है. जिम्मेदारियां बढ़ चली हैं. अब उन्हें सिर्फ कुछ विकेट ही नहीं गिराने हैं बल्कि पूरे देश के क्रिकेट को एक दिशा देनी है. अगले एक साल, टीम इंडिया की पतवार कुम्बले के हाथ में रहेगी. अनिल कुम्बले खुद वॉर्न की तरह गेंदों को एक ध्रुव से दूसरी ओर मोड़ने में यकीन नहीं रखते थे. उनके बारे में मज़ाक में कहा जाता था कि सौरव गांगुली दौड़कर भी इससे धीमी गेंदें फेंकता है. उन्होंने लाइन-लेंथ के सहारे ताउम्र गेंदें फेंकी. जिनकी गेंदें टप्पा खा के बैट्समैन के बल्ले का किनारा चूम सीधे स्लिप में खड़े राहुल द्रविड़ के हाथों में जा चिपकती थीं. कुम्बले ऐसे बॉलर थे जिनके पास वेरिएशन के नाम पर एक गुगली थी. उनका असली वेरिएशन लेंथ और स्पीड में आता था. वो क्वालिटी जो सालों बाद डेनिएल विटोरी की बॉलिंग में देखने को मिली. कुम्बले की दो अंगुलियों के सहारे फेंकी गयी फ्लिपर के बारे में तो क्या ही कहा जाए. सबा करीम का क्रिकेट करियर उनकी फ्लिपर ने ही खतम कर दिया. ज़ाहिर है कोच बन जाने से उनके एक्सपीरियंस का फ़ायदा टीम इंडिया को मिलेगा. कुम्बले का सूत्र है कि टीम के कोच के हाथ भी खिलाडियों जितने मैले होने चाहिए. वो मानते हैं कि कोच को भी प्लेयर्स के साथ नेट्स में बॉलिंग, बैटिंग करनी चाहिये. यहां तक कि जिम में वर्कआउट और दौड़-भाग भी. कुम्बले ने आते ही शुरुआत की एक बॉन्डिंग सेशन से. साल भर एक दूसरे के साथ समय बिताने के लिए ये ज़रूरी है कि लोगों के बीच एक अच्छी फीलिंग हो. और उसके लिए ऐसे सेशन्स ज़रूरी हैं. कुम्बले ने एक ज़िम्मेदार डॉक्टर की तरह सीधे नब्ज़ पकड़ी है. और अब वो अपना नुस्खा बताकर उसकी ख़ुराक निश्चित कर रहे हैं. ये एक अच्छा संकेत है. इसे काफी पहले ही हो जाना चाहिए था. लेकिन ठीक है. देर अये, दुरुस्त आये. Anil Kumble आश्विन बताते हैं कि कुम्बले ने आते ही नेट्स में बॉलिंग करनी शुरू कर दी है. जहां से उन्हें सबसे ज़्यादा सीखने को मिलता है. कुम्बले ने आश्विन पर काई जिम्मेदारियां और ढेर सारा आत्मविश्वास दिया है. आश्विन ने बताया की उनकी कुम्बले के साथ एक बेहद ओपन चैट हुई जहां उन्होंने ये साफ़ किया की आश्विन की ताकतें क्या-क्या हैं और वो आश्विन से मैच में क्या चाहते हैं. कुम्बले के आने से टीम का वो सेक्शन जिसे सबसे ज़्यादा प्यार और देख-रेख मिलेगी, वो है स्पिन डिपार्टमेंट. एक बेहतरीन टेस्ट प्लेयर होने के नाते कुंबले की सलाह टीम के स्पिनर्स के काफी काम आने वाली है. चौखट पर खड़ी वेस्ट इंडीज़ टेस्ट सीरीज़ के बाद अगले पूरे एक साल इंडिया देसी पिचों पर ही टेस्ट मैच खेलेगी. टेस्ट सीरीज़ें भी प्रचुर मात्रा में हैं. लिहाज़ा स्पिन अटैक इन-फ़ोकस रहेगा. टेस्ट खेलने को तैयार स्पिनर्स आज टी-20 के मोड में चल रहे हैं. ओवर की हर तीसरी गेंद दूसरा या क्विकर वन होने लगी है.

टेस्ट मैच में स्पिन अटैक के लगने का मतलब होता था एक जाल का बुना जाना. हम अपने टीवी सेट पर बैठे एक चक्रव्यूह रचे जाने का प्रॉसेस देख रहे होते थे.


आज वो टेक्नीक गायब सी दिखाई देती है. स्पिनर्स का एक ही जगह पर गेंदों को फेंकते रहना और बैट्समैन के गलती करने का इंतज़ार करना आज लुप्तप्राय हो चला है. उसकी जगह बैट्समैन खुद छोटी या तेज़ फेंकी गयी गेंदों की ताक में रहते हैं जिन्हें मिलने में उन्हें देर भी नहीं लगती. बॉलर्स जल्दी विकेट लेने की चाह में प्लानिंग नाम के शब्द से दूर होते जा रहे हैं. हालत ये है कि बॉलर फ़ील्ड के हिसाब से गेंद ही नहीं डालने को तैयार हैं. वो उस आर्ट को भूल चुके हैं. आज वो समय आ गया है जब विकेट के पीछे खड़ा कप्तान चिल्ला कर बॉलर को कहता है कि "इसको ये घूमेगा तो पुजारा को उसी के लिए रक्खा है. वो उधर ताली बजाने के लिए नहीं है." टीम इंडिया में आये स्पिनर्स को अगर हम देखें तो अनिल कुम्बले के जाने के बाद अमित मिश्रा एक मात्र ऐसे स्पिनर हैं जो पेशेंस को अपना हथियार बना कर चलते हैं. हरभजन सिंह का ग्राफ पिछले 5 सालों में गिरता ही गया है. अश्विन और जडेजा वेरिएशन के मारे रहे हैं. बाकी कोई भी स्पिनर अपनी जगह पक्की करने में नाकाम ही रहा है. धोनी के लिए मुसीबत में पड़ने पर अमित मिश्रा ही एकमात्र विकल्प बचते हैं. Amit Mishra वेस्ट इंडीज़ के टूर पर गयी टीम अभी अभी पहला वार्म-अप मैच खेल कर निपटी है. इसमें आश्विन को खेलने का मौका नहीं मिला. लेकिन अमित मिश्रा ने ज़रूर गेंदबाजी की. वहां साफ़ दिखा है कि पहले 15-16 ओवर बॉलिंग करने पर उन्हें एक भी विकेट नहीं मिला. लेकिन वो फिर भी वही बॉल फेंकते रहे. जिसका फ़ायदा उन्हें मिला. एक बार विकेट गिरने के बाद उन्हें लगातार विकेट मिलते चले गए. अपनी लय को खोये बगैर धीरज से गेंदबाजी करना ही एक अच्छे टेस्ट बॉलर की ज़रुरत और पहचान है. ये जितनी जल्दी हो सके, सभी बॉलर्स को समझ लेना चाहिए. वो जो अभी टेस्ट टीम में हैं. और वो भी जो आगे बीसीसीआई का बिल्ला लगी सफ़ेद टीशर्ट और नीली कैप सर पर पहनना चाहते हैं.

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