कुम्बले का कोच इंटरव्यू लाइव: "गुड आफ्टरनून, फोक्स!"
अनिल कुम्बले को टीम इंडिया का कोच बनाया गया है. कैसे मिले होंगे वो उन तीन लोगों से जिनके साथ वो कभी क्रिकेट खेला करते थे.
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फोटो - thelallantop
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हिंदुस्तान में, और सिर्फ हिंदुस्तान ही नहीं, पूरे क्रिकेट की दुनिया में एक बड़ी ही अजीबोगरीब समस्या रही है. बैट्समैन को बॉलर के ऊपर ही आंका गया है. कभी कभी सुनने को मिल जाता है कि सचिन की वजह से द्रविड़ को उनका हक़ नहीं मिल सका. इस बात में कितनी सच्चाई है इसपर बाकायदे बहस की जा सकती है. लेकिन इतना तो तय है कि बल्लेबाजों की वजह से बॉलर्स को वो सम्मान नहीं मिल सका जिसके वो हमेशा से हक़दार थे.
अनिल कुम्बले. एक नाम जिसे उतनी लाइमलाइट कभी मिल ही न सकी जितनी मिलनी चाहिए थी. कुछ इंडियन क्रिकेट के पॉपुलर कल्चर की मेहरबानी रही और कुछ कुम्बले की खुद जश्न न मना पाने की मजबूरी. मुझे नहीं लगता कि कभी भी विकेट लेने के बाद उन्होंने जश्न मनाने में अपना 100% दिया. हमेशा एक अदृश्य ताकत उन्हें जकड़े रहती थी. बावजूद इसके, गेम में 100% से कम का तो सवाल ही नहीं उठता. वो चाहे पाकिस्तान के खिलाफ़ फ़िरोज़शाह कोटला में 10 विकेट लेना वाला किस्सा हो या फिर टूटे जबड़े पर पट्टी बांध गेंद फेंकते हुए उनकी वो अमर तस्वीर हो. कुम्बले ने हमेशा खुद को टीम के लिए न्योछावर किया. एक दिन, तारीख 2 नवम्बर 2008, गुनगुनी दोपहर में मैच के पांचवे दिन उन्होंने रिटायरमेंट का ऐलान कर दिया.
7 साल, 6 महीने, 19 दिन बाद कोलकाता में क्रिकेट एडवाइज़री कमेटी के सामने उन्हें पेश होना पड़ा. कमेटी के मेम्बर कौन? वो लोग जिनके साथ कुंबले ड्रेसिंग रूम में मैच की प्लानिंग करते थे. सचिन, गांगुली और लक्ष्मण. उनके सामने इन्हें अपनी प्रेजेंटेशन देनी थी. किसलिए? टीम इंडिया का कोच बनने के लिए. 45 साल के अनिल कुम्बले बिना किसी टेस्ट टीम को कोच करने के एक्सपीरियंस के टीम इंडिया का कोच बनना चाह रहे थे.
खैर, मीटिंग में एडवाइज़री कमेटी भी वही सोच रही थी जो कुम्बले सोच रहे थे. मीटिंग की शुरुआत होगी कैसे? उनके साथ जो अभी तक टीम-मेट्स थे. और कुम्बले ने मीटिंग रूम में घुसते ही कहा - "गुड आफ्टरनून, फोक्स!" बस! ये थी कुम्बले की स्ट्रेटेजी. पहली ही गेंद टप्पे पर. पिच जांच-परख के काम करने की आदत रिटायरमेंट के साढ़े सात साल भी गयी नहीं थी.
कुम्बले ने पूरी मीटिंग में वो सब कुछ कहा जिसकी एडवाइज़री कमेटी को चाहत थी. उन्होंने बजाय अपनी क्वालिटी गिनाने के, मसलों पर बात की. उन मसलों पर जिनकी वजह से इंडियन टेस्ट टीम विदेशी ज़मीन पर पीछे रह जाती है. स्पिनर होने के नाते उन्हें टीम के स्पिनर्स से कुछ रंज थे. उनके हिसाब से स्पिनर्स को टेस्ट मैच में 20 विकेट गिराने के टार्गेट पर काम करना चाहिए. एडवाइज़री कमेटी को तो बस ये ही लग रहा था कि कुम्बले अपना होमवर्क पूरी तरह से कर के आये हैं.
कुम्बले के सामने जो दो मेन सवाल रखे गए वो थे - उन्हें कोच क्यूं चुना जाये और इंडियन टीम के विदेशी पिचों पर ख़राब परफॉरमेंस को कैसे सुधारेंगे. कुम्बले की ये मीटिंग कुल डेढ़ घंटे चली. इस दौरान कुम्बले ने अपने सभी अरमान टेबल पर रख दिए. सारी प्लानिंग और स्ट्रेटेजी कमेटी के सामने रखी. कुम्बले का यूं बात करना, उनका अपने प्लान पर बात करना काफी ज़रूरी भी था. वो इसलिए क्यूंकि टीम इंडिया अगले पूरे साल खेलती रहेगी. साथ ही वेस्ट इंडीज़ के दौरे को छोड़कर बाकी के सभी टेस्ट मैच इंडियन पिच पर ही खेले जाने हैं. इसके बारे में उन्होंने कहा कि होम पिच पर जीतना ज़रूरी तो है ही लेकिन टीम के टैलेंट की धार को तेज़ करना ही होगा. जिस तरह से पिछले मैचों में होम पिचेज़ को टर्नर तैयार कर स्पिनर्स फैंटम बन जाते हैं और विदेश में तेज़ पिचेज़ पर कुछ खास नहीं कर पाते हैं, उसे बदलना होगा.
कुंबले से जब इंडिया टुडे ने पूछा कि कोच की रेस में अचानक उनका नाम कैसे आया तो उन्होंने कहा कि वो अपने परिवार के साथ छुट्टियां मन रहे थे जब अचानक उन्हें ये ख्याल आया. उन्होंने अपनी पत्नी से की हुई बातचीत के बारे में बताया "हम इस बात पर बात कर रहे थे कि मैं भविष्य में क्या करना चाहता हूं. बात घूम-फिरकर कोच के पद पर आ टिकी, क्यूंकि मुझे पता था कि भारतीय टीम किसी कोच की तलाश में है." पत्नी चेतना से उन्होंने इस बारे में भी बात कि एक बार कोच बन जाने के बाद उन्हें घर से महीनों बाहर रहना पड़ेगा तो उनकी पत्नी के जवाब के बारे में उन्होंने बताया "उसने कहा कि उसका समर्थन बना रहेगा, जैसा कि वास हमेशा करती रही है और बच्चों की उम्र भी ऐसी हो गयी है कि कोई समस्या नहीं होगी. बस यही सोचकर मैंने अपना आवेदन भेज दिया."
कुम्बले से जब उनके प्लान्स और स्ट्रेटेजी के बारे में पूछा गया तो उन्होंने सबसे पहले कहा कि टीम में पूरा भार कप्तान पर डाल दिया जाता है और कोच किनारे बैठकर बस इंस्ट्रक्शन देता रहता है. जबकि कोच को भी अपने हाथ गंदे करने चाहिए. उसे भी ट्रेनिंग में हिस्सा लेना चाहिए. उसे प्लेयर्स के साथ दौड़ना चाहिए, बॉल फेंकनी चाहिए, हो सके तो बैटिंग भी करे.
कुम्बले जब खुद कप्तान थे तो इंडियन टीम में दो अलग अलग कप्तानों की रस्म शुरू हुई थी. उन्हीं के वक़्त धोनी वन-डे में कप्तानी करते थे जबकि वो खुद टेस्ट टीम के कैप्टन थे. अब उनके सामने धोनी और कोहली के बीच बंटवारे को मैनेज करने का सवाल खड़ा है. हालांकि कुछ लोग कोहली को तीनों फॉरमैट में कैप्टन बनाने के पक्ष में रहे हैं. पिछले कोच रवि शास्त्री तो खुल्लम खुल्ला इस बात को कह चुके थे. लेकिन कुम्बले ने खुद इस बात पर कुछ भी साफ़ नहीं कहा. उन्होंने थोड़ा पॉलिटिकली करेक्ट होकर टीम में नए प्रॉस्पेक्टस को लेकर पैदा होने वाली उम्मीदों के बारे में बात की. उन्हें लगता है कि कम उम्र के खिलाड़ी टीम में नया उत्साह भर देंगे.
खैर, मीटिंग में एडवाइज़री कमेटी भी वही सोच रही थी जो कुम्बले सोच रहे थे. मीटिंग की शुरुआत होगी कैसे? उनके साथ जो अभी तक टीम-मेट्स थे. और कुम्बले ने मीटिंग रूम में घुसते ही कहा - "गुड आफ्टरनून, फोक्स!" बस! ये थी कुम्बले की स्ट्रेटेजी. पहली ही गेंद टप्पे पर. पिच जांच-परख के काम करने की आदत रिटायरमेंट के साढ़े सात साल भी गयी नहीं थी.
कुम्बले ने पूरी मीटिंग में वो सब कुछ कहा जिसकी एडवाइज़री कमेटी को चाहत थी. उन्होंने बजाय अपनी क्वालिटी गिनाने के, मसलों पर बात की. उन मसलों पर जिनकी वजह से इंडियन टेस्ट टीम विदेशी ज़मीन पर पीछे रह जाती है. स्पिनर होने के नाते उन्हें टीम के स्पिनर्स से कुछ रंज थे. उनके हिसाब से स्पिनर्स को टेस्ट मैच में 20 विकेट गिराने के टार्गेट पर काम करना चाहिए. एडवाइज़री कमेटी को तो बस ये ही लग रहा था कि कुम्बले अपना होमवर्क पूरी तरह से कर के आये हैं.
कुम्बले के सामने जो दो मेन सवाल रखे गए वो थे - उन्हें कोच क्यूं चुना जाये और इंडियन टीम के विदेशी पिचों पर ख़राब परफॉरमेंस को कैसे सुधारेंगे. कुम्बले की ये मीटिंग कुल डेढ़ घंटे चली. इस दौरान कुम्बले ने अपने सभी अरमान टेबल पर रख दिए. सारी प्लानिंग और स्ट्रेटेजी कमेटी के सामने रखी. कुम्बले का यूं बात करना, उनका अपने प्लान पर बात करना काफी ज़रूरी भी था. वो इसलिए क्यूंकि टीम इंडिया अगले पूरे साल खेलती रहेगी. साथ ही वेस्ट इंडीज़ के दौरे को छोड़कर बाकी के सभी टेस्ट मैच इंडियन पिच पर ही खेले जाने हैं. इसके बारे में उन्होंने कहा कि होम पिच पर जीतना ज़रूरी तो है ही लेकिन टीम के टैलेंट की धार को तेज़ करना ही होगा. जिस तरह से पिछले मैचों में होम पिचेज़ को टर्नर तैयार कर स्पिनर्स फैंटम बन जाते हैं और विदेश में तेज़ पिचेज़ पर कुछ खास नहीं कर पाते हैं, उसे बदलना होगा.
कुंबले से जब इंडिया टुडे ने पूछा कि कोच की रेस में अचानक उनका नाम कैसे आया तो उन्होंने कहा कि वो अपने परिवार के साथ छुट्टियां मन रहे थे जब अचानक उन्हें ये ख्याल आया. उन्होंने अपनी पत्नी से की हुई बातचीत के बारे में बताया "हम इस बात पर बात कर रहे थे कि मैं भविष्य में क्या करना चाहता हूं. बात घूम-फिरकर कोच के पद पर आ टिकी, क्यूंकि मुझे पता था कि भारतीय टीम किसी कोच की तलाश में है." पत्नी चेतना से उन्होंने इस बारे में भी बात कि एक बार कोच बन जाने के बाद उन्हें घर से महीनों बाहर रहना पड़ेगा तो उनकी पत्नी के जवाब के बारे में उन्होंने बताया "उसने कहा कि उसका समर्थन बना रहेगा, जैसा कि वास हमेशा करती रही है और बच्चों की उम्र भी ऐसी हो गयी है कि कोई समस्या नहीं होगी. बस यही सोचकर मैंने अपना आवेदन भेज दिया."
कुम्बले से जब उनके प्लान्स और स्ट्रेटेजी के बारे में पूछा गया तो उन्होंने सबसे पहले कहा कि टीम में पूरा भार कप्तान पर डाल दिया जाता है और कोच किनारे बैठकर बस इंस्ट्रक्शन देता रहता है. जबकि कोच को भी अपने हाथ गंदे करने चाहिए. उसे भी ट्रेनिंग में हिस्सा लेना चाहिए. उसे प्लेयर्स के साथ दौड़ना चाहिए, बॉल फेंकनी चाहिए, हो सके तो बैटिंग भी करे.
कुम्बले जब खुद कप्तान थे तो इंडियन टीम में दो अलग अलग कप्तानों की रस्म शुरू हुई थी. उन्हीं के वक़्त धोनी वन-डे में कप्तानी करते थे जबकि वो खुद टेस्ट टीम के कैप्टन थे. अब उनके सामने धोनी और कोहली के बीच बंटवारे को मैनेज करने का सवाल खड़ा है. हालांकि कुछ लोग कोहली को तीनों फॉरमैट में कैप्टन बनाने के पक्ष में रहे हैं. पिछले कोच रवि शास्त्री तो खुल्लम खुल्ला इस बात को कह चुके थे. लेकिन कुम्बले ने खुद इस बात पर कुछ भी साफ़ नहीं कहा. उन्होंने थोड़ा पॉलिटिकली करेक्ट होकर टीम में नए प्रॉस्पेक्टस को लेकर पैदा होने वाली उम्मीदों के बारे में बात की. उन्हें लगता है कि कम उम्र के खिलाड़ी टीम में नया उत्साह भर देंगे.
