भगवान शिव की पत्नी सती अपने पिता दक्ष के यज्ञ की आग में जलकर जान दे चुकी थीं.महर्षि नारद ने यह खबर शिव को दी तो वह गुस्से से लाल हो गए. होंठ चबाते हुएउन्होंने अपनी एक जटा उखाड़ ली जो रस्सी की तरह जल रही थी. उसे उन्होंने ज़मीन पर पटकदिया. उससे एक भारी भरकम भूत पैदा हुआ. आसमान को छूता शरीर, काला रंग, एक हजारहाथ-पैर. नाम था वीरभद्र. उस भयानक आदमी ने शिव जी से पुछा, भगवान आप बताइए अब मैंक्या करूं? भगवान ने कहा, बेटा तुम मेरे हिस्से हो और तुम ही तुरुप के इक्के हो.जाकर दक्ष के यज्ञ को तहस-नहस कर दो. अब चली भयानक पिच्चर. अंधेरा छा गया और धूलउड़ने लगी. शिव के चेले-चपाटी हंगामा मचाने लगे. उनमें कोई बौना, कोई लाल, कोई पीलेरंग का था और कोई तो मगरमच्छ की तरह दिखता था. इतने भयानक प्राणियों को देखकर हीदक्ष और उनके दोस्तों की हवा टाइट हो गयी. शिव के चेलों ने सब तोड़-ताड़ कर बराबर करदिया. भृगु जी ने जिन मूछों को ऐंठकर शंकर जी पर ताने कसे थे, वीरभद्र ने उन्हेंनोच लिया. किसी को जमीन पर पटका, किसी की आंखें निकाल लीं और दक्ष का तो सिर ही धड़से अलग कर यज्ञ की आग में झोंक दिया. दक्ष और उनके साथियों का दिमाग अब ठिकाने लगचुका था. वे चुपचाप भगवान ब्रह्मा के पास गए और उनकी हेल्प से शंकर जी को मनाया.शंकर भगवान ने कहा कि ये तो ट्रेलर था. अगर असली रूप दिखा दूं तो कोई भी यज्ञ करनेलायक नहीं बचोगे. फिर शंकर भगवान ने दक्ष को बकरे का सिर लगा दिया और बाकी देवताओंको भी दुरुस्त कर दिया. दक्ष फिर कायदे में हो गए और चुप्पेचाप अपना यज्ञ पूराकिया. (श्रीमद्भागवत महापुराण)