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खुफिया एजेंसी ISI के कुख्यात कारनामे, जिन्होंने पाकिस्तान को बना दिया आतंकी देश

1948 में बना था ये संगठन.

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ऋषभ
21 नवंबर 2016 (अपडेटेड: 21 नवंबर 2016, 01:24 PM IST)
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ISI वो नाम है जो हिंदुस्तान में पाकिस्तान की आइडेंडिटी है. हमेशा यही लगता है कि पाकिस्तानी सरकार की अपनी जुबान नहीं है. वो उसी की जुबानी बोलती है. पर क्या है ISI? इसमें तो मात्र 2000-3000 लोग ही काम करते हैं. तो ये लोग कैसे पूरे देश की लोकतांत्रिक सरकार को बंधक बना लेते हैं. जो चाहते हैं करवा लेते हैं. ये चाहते हैं तो सरकार बोलती है. ये चाहते हैं तो सरकार कुछ और बोल देती है. यही वो संस्था है जिस पर पाकिस्तान के पहले तानाशाह अयूब खान को रत्ती भर भी भरोसा नहीं था. इससे अलग उन्होंने अपनी एक सीक्रेट संस्था बनाई. इसके टॉप अफसरों ने सत्तर के दशक में सीक्रेट प्लान बनाया था. सिर्फ 3-4 लोगों को पता था. ये अलग बात है कि जब ये लोग ऑफिस पहुंचे तो सारे लोग मुस्कुरा रहे थे. क्योंकि सबको पता था ये टॉप सीक्रेट. पर यही वो ऑर्गनाइजेशन है जिसपे अमेरिका की खुफिया एजेंसी CIA भरोसा करती है. पैसे देती है. 1980 के बाद से दोनों मौसेरे भाईयों की तरह व्यवहार करते हैं. जानकारों का कहना है कि 1980 से पहले इंडिया की RAW और CIA में यही संबंध था. दोनों मिल के बहुत कुछ जानकारी जुटाते थे. अफगानिस्तान में रूस के आने के बाद अमेरिका के लिये पाकिस्तान जरूरी हो गया. और रिश्ते बदल गये. पाकिस्तान में ही अपनी इज्जत के लिये तरसते ISI को आइडेंडिटी मिल गई. और वो पाकिस्तान का दूसरा नाम हो गया. क्योंकि उसी वक्त इन लोगों ने कश्मीर में आतंकवाद की शुरूआत कर दी. और इकॉनमी के लिये तरसते देश के राष्ट्रवाद के लिये ये एक नया मुद्दा मिल गया. बस यहीं से गाड़ी चल पड़ी. गाड़ी में पेट्रोल डाला 1988 में प्रेसिडेंट जिया-उल-हक की मौत ने. उनके साथ पाकिस्तानी मिलिट्री के टॉप अफसर भी मारे गये थे. एक साथ पूरा ऊपरी तबका साफ हो गया था. फिर पाकिस्तान की अंदरूनी राजनीति में बवाल मच गया. पॉवर हासिल करने के लिये सब जोर-आजमाइश करने लगे. और इसके लिये जरूरत पड़ी ISI की. ये लोग भी कम चालाक नहीं थे. एक नई पार्टी को बैक करने लगे. ये पार्टी बहुत ज्यादा सफल तो नहीं हुई. पर इसने एक नया नेता जरूर दे दिया पाकिस्तान को नवाज शरीफ. और अब लोग पूछते हैं कि ISI की फंडिंग कौन करता है, क्योंकि नवाज शरीफ प्रधानमंत्री हैं. तो जवाब है कि नवाज पहले भी प्रधानमंत्री रह चुके हैं. अगर ISI के एक चीफ हमीद गुल का कहा सुनें तो प्रधानमंत्री तो हम लोग बनाते-बिगाड़ते रहते हैं. तो सच ये है कि इनको फंडिंग के लिये पाकिस्तान सरकार की जरूरत नहीं पड़ती. अफगानिस्तान से लड़ाई के नाम पर बहुत पैसा इकट्ठा किया है अमेरिका से. इसके अलावा अफगानिस्तान के गांजा-अफीम व्यापार को यही लोग चलाते हैं. फिर और भी तरीके हैं पैसा उगाही के, पर सबका मयार वही है. ये है कि खुले दिल के लोग हैं. आतंकवादियों का खर्चा उठाने का जिम्मा लिया है इन्होंने. इंग्लैंड में इनकी पसंद का बैंक भी हुआ करता था. BCCI. इसको मुसलमान ही चलाते थे. ये बैंक भी इन्हीं की यारी-दोस्ती में काम करता था. इंग्लैंड ने इसको बाद में बंद करवा दिया. इन लोगों ने अपना जुगाड़ कहीं और सेट कर लिया पर पूरी दुनिया में मुसलमानों का ना खराब कर गये.
ISI के फाउंडिंग फादर थे वॉल्टर जोसेफ कॉथार्न. भारत के आजाद होने के बाद कॉथार्न ने पाकिस्तान के साथ रहना चुना था. क्योंकि अयूब खान के करीबी थे. ऐसा माना जाता है कि इस्लामिक देशों में अपनी पकड़ बनाये रखने के लिये पाकिस्तान ने तुरंत ही इसकी अनुमति दे दी थी. साथ ही विदेशों से फाइनेंस हुआ क्योंकि रूस से निबटना था सबको. पाकिस्तान की लोकेशन इतनी जरूरी हो गई कि ISI को बनाना ही पड़ा. पाकिस्तान के अंदर इंटेलिजेंस के लिये इंटेलिजेंस ब्यूरो थी. बाहर से निपटने के लिये ISI. जब हिंदुस्तान में RAW बना तब दोनों में कंपटीशन हो गया. एकदम क्रिकेट मैच वाला. ISI वाले एक चीज से संतोष करते हैं. कहते हैं कि रॉ में प्रमोशन और पोस्ट के लिये खूब ड्रामा होता है. हमारे यहां नहीं होता.
ISI के कुछ जरूरी किस्से:

1. 1965 की लड़ाई

उस वक्त पाकिस्तान के तानाशाह थे अयूब खान. उनका पूरा मानना था कि 1962 की लड़ाई में चीन से हारा भारत कभी भी पाकिस्तान का मुकाबला नहीं कर सकता. उन्होंने ISI के डिप्टी चीफ ब्रिगेडियर जान को कहा कि एक्शन की तैयारी करो. पर चीफ रियाज ने इसका विरोध किया. अयूब के आगे किसी की चलती नहीं थी. इस काम को नाम दिया गया ऑपरेशन जिब्राल्टर. इसके साथ ही ऑपरेशन ग्रैंड स्लैम भी होना था. जिसमें भारत-कश्मीर के बीच की लाइनें तोड़ देनी थीं. और कब्जा कर लेना था. पर जैसा कि इतिहास गवाह है, पाकिस्तान बुरी तरह हारा. सबसे मजेदार बात थी कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी को भारत के सैनिकों के बारे में पता ही नहीं चल पाता था. जबकि भारत में तो रॉ अभी बना भी नहीं था. बना 1968 में. भारत तब तक मिलिट्री इंटेलिजेंस के भरोसे काम चला रहा था.

2. 1971 की लड़ाई

इस साल ISI ने बांग्लादेश में अपने हत्यारों को भेजा वहां के इंटेलेक्चुअल क्लास को मारने के लिये. क्योंकि वो लोग लगातार पाकिस्तान को तोड़ने की बात कर रहे थे. पर पाकिस्तान को अंदाजा नहीं था कि भारत भी वहां काम कर रहा है. पहले तो भारत इस बात को नहीं मानता था. पर अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल इस बात को याद दिलाने से नहीं चूकते. पाकिस्तान के मुताबिक RAW ने बांग्लादेश के लड़ाकों को जबर्दस्त ट्रेनिंग दी. ये कोशिश बहुत दिन से की जा रही थी. पाकिस्तानी अफसर ये भी कहते हैं कि यही वजह है कि कश्मीर को भारत से तोड़ने के लिये पूरी कोशिश की जाती है. ISI का मजाक भी बनता है कि रॉ ने तो पाकिस्तान को तोड़ दिया. आप ने क्या किया.

3. ISI के अपने देश के कांड

देश की सबसे बड़ी खुफिया एजेंसी होने के बावजूद इन लोगों ने बहुत सारे कांडों की इन्वेस्टीगेशन को उससे बड़ा कांड बना दिया. पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री लियाकत अली खान की हत्या, जिया-उल-हक की प्लेन हादसे में मौत, बेनजीर भुट्टो की हत्या किसी में भी कोई सुराग नहीं मिला. या नहीं लाया गया. इसके अलाव जो घटना इन लोगों पर सबसे बड़े सवाल खड़ी करती है, वो है 2011 में एबोटाबाद में अमेरिकी सैनिकों का लादेन को मारना. क्योंकि इसी इलाके में ISI के अफसर भी रहते थे. और अगर उनको लादेन के रहने के बारे में नहीं पता था तो लानत ही है. अगर पता था और फिर भी वहीं रह रहे थे तब तो और लानत है. क्योंकि उसको पकड़ने के लिये अमेरिका से पैसे ले रहे थे ये लोग.

4. 26/11 की घटना, नॉर्थ-ईस्ट और पंजाब

ISI ने शुरू से प्लान बनाया कि भारत को कई जगह से काटा जाये कि खून बहता जाये और भारत अपने पैरों पर खड़ा ना हो पाये. क्योंकि आमने-सामने की लड़ाई में पाकिस्तान कभी भारत से जीत नहीं पाया है. तो नॉर्थ-ईस्ट में जितने उग्रवादी ग्रुप थे, उनको ISI ने पैसा और हथियार देना शुरू किया. तब तक देते रहे जब तक कि भारत ने एकदम टाइट नहीं कर दिया. भारत ने इस मामले पर बिल्कुल ही सख्ती बरती है. चाहे कितने भी लोग मारे जायें भारत नरम नहीं पड़ता. किसी को मुआफी नहीं दी जाती. बात करने की कोशिश भी कम की जाती है. कश्मीर में भी यही पॉलिसी अपनाई गई. पर भारत के सैनिक इस तरह के ऑपरेशन के लिये तैयार नहीं थे. क्योंकि इसकी प्रैक्टिस नहीं थी. तो बदले में कई गलतियां भी हो गईं सैनिकों से. इसका नतीजा भारत ने भुगता है प्रतिरोध के रूप में. अस्सी-नब्बे के दशकों में जब पंजाब में आतंकवाद चरम पर था तब ISI ने ही भिंडरावाले को हथियार उपलब्ध कराये थे. ये लोग सिख उग्रवादियों को आत्मघाती हमला करने के लिये भी उकसाते थे. प्लेन हाईजैक करने और ब्लास्ट करने के लिये भी तैयार किया जा रहा था. पर उग्रवादियों के मुताबिक उनका धर्म इस बात की गवाही नहीं देता था. बाद में अमेरिका ने भी पेच कसा कि ये सब बंद करो, तब जा के बंद हुआ. 2008 में मुंबई हमले में तो ISI रंगे हाथ पकड़ा गया. क्योंकि अजमल कसाब और डेविड हैडली ने इन लोगों का नाम लिया था. पर बेशर्मी है. कहते हैं कि भारत भी तो करवाता है बलूचिस्तान में. अजित डोभाल ने कह दिया था कि एक और 26/11 हुआ तो आप बलूचिस्तान खो देंगे. इसी बात को पकड़ के फेंटते रहते हैं.

5. भारत पर आरोप

2015 में ISI ने भारत के बारे में कहा कि भारत न्यूक्लियर हथियार को लेकर झूठ बोलता है. पूरी दुनिया में फैला रखा है कि हम लोग कभी भी किसी पर पहले एटम बम नहीं गिरायेंगे. ये कहकर बहुत इज्जत कमाते हैं कि मोरल देश है. पर उसी के नीचे ये भी लिखा हुआ है कि अगर कोई हम पर केमिकल या बॉयलॉजिकल हमला करता है तो हम एटम बम गिरा देंगे. तो ये लोग हमला करने के लिये ये भी कह सकते हैं कि पाकिस्तान ने हम पर केमिकल हमला किया है.

6. ओझड़ी कैंप घटना

ओझड़ी कैंप पाकिस्तान से अफगानिस्तान के बीच की जगह थी. यहां पर हथियार रखे जाते थे. ट्रक से भरकर अफगानिस्तान में सप्लाई होती थी. साल 1988 के एक दिन यहां 200 ट्रक रखे हुए थे. हजारों रॉकेट और हथियार. जहां गनपाउडर रखा गया था वहीं आग लग गई. ये एक टेंपररी जगह थी, इसलिये सुरक्षा का कोई इंतजाम नहीं था. सब कुछ जल गया. बस ये था कि बारूद में आग नहीं लगी. ISI के टॉप ऑफिसर जावेद नासिर अल्लाह का नाम लेकर घुसे दूसरे दिन. जो बचा था, उसको बचाने. आग लगने के बाद वो पहले व्यक्ति थे घुसने वाले. बाद में नासिर ने अपनी जिंदगी अल्लाह को समर्पित कर दी. इस घटना के बाद ISI की बड़ी बेइज्जती हुई. वक्त लगा जनता की नजरों में खुद को ऊपर उठाने में. 1993 के मुंबई बम ब्लास्ट में हाथ आया इनका. ढाई-तीन सौ लोग मरे पर ISI को वो मिल गया जो ये लोग चाहते थे. नाम और पाकिस्तान की राजनीति में दखल.
इन सबके बीच कुछ घटनायें हुईं हैं जिनका ISI से कोई डायरेक्ट रिलेशन नहीं है. पर बिना इनके इंवाल्वमेंट के ये घटनायें हो भी नहीं सकतीं. भुट्टो परिवार के कई लोग मारे गये हैं पाकिस्तान में. जुल्फिकार अली भुट्टो को फांसी हुई. ISI ने कहा कि हमें कुछ नहीं मालूम. फिर भुट्टो के दो बेटों की हत्या हुई. बेनजीर भुट्टो की भी हत्या हो गई. पर इनको कुछ नहीं पता. इसी सिलसिले में एक अजीब वाकया भी पढ़ने को मिला है. बेनजीर का एक भाई था मुर्तजा भुट्टो. इसकी मौत 1996 में हुई थी. 'अज्ञात' बंदूकधारियों ने रोड पर छलनी कर दिया था. मुर्तजा विदेश में रहता था और अपने बाप की मौत का बदला लेने के लिये व्याकुल रहता था. एक ऑर्गनाइजेशन भी बनाया था. अल-जुल्फिकार. इसको ISI ने आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया था. करें भी क्यों ना, ऐसे संगठन बनाने का लाइसेंस तो सिर्फ इन्हीं के पास है. तो मुर्तजा के मरने के ठीक पहले का  एक वाकया है. मुर्तजा अपने गुंडों के साथ बेनजीर के पति आसिफ अली जरदारी से मिला. जरदारी की बड़ी खूबसूरत मूंछें थीं. किसी बात पर बहस हुई और मुर्तजा ने जरदारी को पीट दिया. यही नहीं, उनकी आधी मूंछें भी मूंड़ दिया. जरदारी रोते रहे. और बाद में अपनी अम्मी की कसम खा के बोले कि मुर्तजा जिंदा नहीं रहेगा. कुछ दिन बाद ही मुर्तजा मर गया. पर जरदारी के बारे में कुछ सबूत नहीं निकला है. कहने वाले तो बेनजीर की हत्या में भी जरदारी का हाथ ही मानते हैं. पर कुछ निकला नहीं है. ना ही जरदारी के खिलाफ, ना ही ISI के खिलाफ.
इस आर्टिकल की ज्यादातर जानकारी Hein G. Kiessling की लिखी किताब FAITH, UNITY, DISCIPLINE: THE ISI OF PAKISTAN से ली गई है. ये किताब आई है हार्पर कोलिंस पब्लिकेशन से. ISI के बारे में जानना है तो ये किताब पढ़ें. एकदम अपनेपन से बताई गई हैं सारी बातें. लेखक महोदय पाकिस्तान में बहुत दिन रहे हैं. बहुत जानकारी है उनको. एकदम फर्स्टहैंड.
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