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डियर पीवी, 21 साल की उमर में तुम हज़ारों की आइडल बन चुकी हो

पीवी सिंधू के नाम खुला ख़त.

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19 अगस्त 2016 (अपडेटेड: 19 अगस्त 2016, 07:01 PM IST)
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डियर पीवी सिंधू, आज से महीने भर पहले मैं तुम्हारा नाम भी नहीं जानता था. हां इतना मालूम था कि ओलम्पिक आने वाला है. और आज मैं तुम्हें ख़त लिख रहा हूं. आज जब तुम पोडियम पर चढ़कर हाथ में सिल्वर मेडल पकड़े हुए मुस्कुरा रही थीं, तुम्हारे बगल में खड़ी थी वो स्पैनिश लड़की जिसने तुम्हें हराया था.

तुम्हारी हार के बावजूद कल के अखबार तुम्हारी तस्वीरों और बातों से भरे होंगे. असल में इसे ही जीत कहते हैं.


तुम आज हारी नहीं जीती हो. तुमने सिल्वर मेडल ही नहीं जीता बल्कि दर्ज करा लिया है इतिहास में अपना नाम. जब मैं 21 साल का था तो जानता भी नहीं था कि मुझे करना क्या है. ये किसी को भी मत बताना लेकिन मुझे आज भी नहीं मालूम कि मुझे करना क्या है. जब मैं 21 का था तो फ़िल्में देखता था. लोगों के सामने बोलने से डरता था. जो अब भी जारी है. और तुम 21 साल की उम्र में दुनिया की सबसे तेज़-तर्रार बैडमिन्टन खेलने वाली लड़की की आंखों में झांक कर उसे चुनौती दे रही थीं. उसे डर था हार का. और हमें यकीन था तुम्हारी जीत का. तुम जीती हो. तुम उसी वक़्त जीत गयी थीं जब तुमने ओलम्पिक खेलने के लिए फ्लाइट में अपनी सीट बेल्ट बांधी थी. वो क्या है कि यहां 'खेलोगे कूदोगे तो बनोगे खराब' वाली रस्म अब भी चलती है. पोडियम पर जब तुम्हें मेडल पहनाया गया, तुमने उसे हाथ में लिया, देर तक मुस्कुराईं और फिर एक लम्बी सांस छोड़ी. ऐसे जैसे कि कोई ठाना काम हो जो आखिरकार पूरा हो गया हो. मुझे मालूम है तुम्हारी उस सांस में 21 सालों की मेहनत के साथ सुकून घुला हुआ था. कल सुबह जब सभी ऑफिस में मिलेंगे तो तुम्हारे बारे में ही बात करेंगे. तुम्हारे स्मैशेज़ के बारे में. तुम्हारे अटैक के बारे में. कैसे तुमने पहला गेम कम-बैक कर जीता था. कैसे तुमने तीसरे गेम में भी एक वक़्त पर बराबरी पर स्कोर ला खड़ा कर दिया था. वो बात करेंगे कि कैसे उन्होंने अपने घरवालों के साथ मैच देखा. कैसे तुम्हारे मैच के दौरान सारा काम ठप्प रहा और सभी ने डिनर मैच खतम होने का बाद ही किया. दरअसल यहां जब तक घर के सभी लोग इकठ्ठा नहीं हो जाते, खाना नहीं खाते हैं. तुम खेल रही थीं तो हम कैसे खाते?

मुझे नहीं याद कि 2011 क्रिकेट वर्ल्ड कप फाइनल के बाद कब परिवारों ने साथ बैठकर इस कदर टीवी पे कोई मैच देखा था. और बैडमिंटन तो कतई नहीं. और तुम्हें लगता है कि तुम हार गईं? कतई नहीं.


21 साल की उमर में तुम हज़ारों की आइडल बन चुकी हो. वो लोग जो तुमसे उमर में बड़े हैं, तुम जैसा बन जाना चाहते हैं. वो भी चाहते हैं कि उनके नाम की मिसालें दी जायें. तुम्हारी तो दी जाने लगी हैं. शर्मा जी के लड़के की जगह पीवी सिंधू का नाम आने वाला है. और तुम्हें लगता है तुम हार गईं? कतई नहीं. मरीना ने आखिरी पॉइंट के बाद अपना रैकेट ज़मीन पर पटक दिया और कोर्ट पर लेट गईं. लेटीं तुम भी थीं लेकिन उठा खड़ी हुईं, मरीना के पास जा उसका रैकेट उठाया और सलीके से उसे कोर्ट के बाहर रख दिया. फिर रोती हुई मरीना के गले लिपट गईं. वाह! मेरा ऑफिस से जल्दी भागकर घर आना उस पल ने सफ़ल बना दिया था. उस पल मैंने देखा कि कैसे अपने जीवन का सबसे बड़ा मैच हाथ से निकल जाने के बाद भी कोई खेल के लिए अपने दिल में बसी इज्ज़त को उसी तरह से बनाये रखता है. मैं हर दिन कुछ नया सीखना चाहता हूं. तुम्हारा ये गेम देख मेरा महीने भर का कोटा पूरा हो गया है. मैं एक बार तुमसे मिलना चाहता हूं. मिलकर बताना चाहता हूं कि कितना मुश्किल होता है टीवी देखते हुए आंसुओं को रोक पाना. वो भी तब जब आप अपने दोस्त के घर बैठे टीवी देख रहे हों और साथ ही उसके घरवाले भी हों. और हां, गोपी सर को मेरा सलाम कहना. तुम्हारे हौसले और कूद के मारे गए स्मैश का मुरीद बुकरैत

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