वाह रे केजरीवाल, मोदी बोलें तो भाषा, आप बोलें तो गुस्सा
कोई पाकिस्तान का एजेंट नहीं है. सब ISI के एजेंट हैं. कहने को अनेक हैं. किंतु आचरण के स्तर पर सब एक हैं.
पंजाब में चुनावी कैंपेन के दौरान केजरीवाल.
कुलदीप
5 अप्रैल 2016 (अपडेटेड: 5 अप्रैल 2016, 02:53 PM IST)
पठानकोट हमले की जांच के लिए पाकिस्तान से एक टीम भारत आई है, आप जानते ही हैं. इसमें पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI के भी अफसर भी शामिल हैं. लेकिन इसमें भी पॉलिटिक्स हो रही है. रोटियां सेंकने का मुहावरा पुराना हो गया है, पर यहां भी नत्थी है.
आम आदमी पार्टी को शुरू से यह प्रॉब्लम है कि पाकिस्तान की टीम यहां जांच करने कैसे आ गई. मतलब उन्हें यहां आने की इजाजत देकर सरकार झुक गई है. यहां तक तो ठीक था, लेकिन बुधवार को अरविंद केजरीवाल के एक उत्साही मंत्री थोड़ा आगे बढ़ गए. कपिल मिश्रा ने ट्वीट कर डाला कि क्या हमारे प्रधानमंत्री पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI के एजेंट हैं?
उन्होंने लिखा कि प्रधानमंत्री भारत विरोधी ताकतों के आगे समर्पण कर रहे हैं. आईएसआई की रिपोर्ट पर भाजपा चुप क्यों है? हमें यह बताया जाए कि नवाज और मोदी के बीच किस तरह का समझौता है.
अरविंद केजरीवाल ने भी इस मुद्दे पर ट्वीट किए और बुधवार दोपहर प्रेस कॉन्फ्रेंस में यही आरोप दोहराए. लेकिन जब उनसे कपिल मिश्रा के अजीब बयान पर पूछा गया तो कहने लगे कि, 'पूरे देश का खून खौल रहा है, जो लोगों के भावनाओं के रूप में बाहर आ रही हैं. यहां देश बिक रहा है और आप भाषा की बात कर रहे हैं.'
लल्लन कहिस
लेकिन बात करेंगे सर. भाषा की भी और गुजरे हुए जमाने की भी. लोकसभा चुनाव से पहले का एक सीन है, जिसे चुनावोन्मुखी होने के बाद आप भूल गए हैं. मार्च 2014 में नरेंद्र मोदी ने भी ऐसी ही बात कही थी. उन्होंने आपको 'एके-49' कहा था, (क्योंकि आप 49 दिनों की सरकार के मुख्यमंत्री थे), और लगे हाथ 'पाकिस्तान का एजेंट' कह डाला था. याद ही होगा? तब आपने कैसे इसे भुनाया था, याद ही होगा.
नरेंद्र मोदी तब प्रधानमंत्री नहीं थे. उनका पूरा बयान इस तरह था. यूट्यूब पर भी सुना जा सकता है.
https://www.youtube.com/watch?v=kP1z8tf4MhU
अरविंद सर, आपने इस बयान को चुनावी मुद्दा बना लिया था. आप जनता के बीच यही संदेश लेकर गए कि यह कैसी लोकतांत्रिक स्पर्धा है जिसमें प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार एक पूर्व मुख्यमंत्री को सीधे-सीधे 'पाकिस्तान का एजेंट' कह रहा है. कितना निराधार, गैर-जिम्मेदाराना बयान है. विधानसभा चुनाव से पहले भी आपने यही कहा. देखिए वे हमें नक्सली कह रहे हैं, इस स्तर पर उतर आए हैं कि 'जंगल जाने के योग्य' बता रहे हैं. यह सियासत की एक चतुर चाल थी. कुछ तटस्थ विश्लेषक भी इसके मुरीद हो गए. इसी से सबक लेकर नीतीश कुमार ने बिहार में DNA वाले बयान को भी 'बैकफायर' करवा दिया.
तो केजरीवाल सर, आपकी रणनीति तो बैकफायर करवा देने की होती थी. लेकिन हैरत है कि वही गलती अब आपके लाडले मंत्री कर रहे हैं और आप कहते हैं कि 'भाषा' से फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि देशवासियों का खून खौल रहा है. किसका खून खौल रहा है? हमें तो नहीं दिखता कि पाकिस्तान की जांच टीम के आने के खिलाफ कोई जनाक्रोश. आप जनाक्रोश बनाने की कोशिश क्यों कर रहे हैं? पठानकोट हमला देश की आंतरिक सुरक्षा से जुड़ा है और भारत-पाकिस्तान सहमति से डिप्लोमैटिक लेवल पर इसकी जांच की कोशिश कर रहे हैं. पाकिस्तान की टीम अपने यहां आई है. वो झूठी रिपोर्ट ही दें, लेकिन अपनी टीम भी तो पाकिस्तान जाएगी ही.
वैसे ये 'पाकिस्तान का एजेंट' होता कौन है? इसकी पहचान के लक्षण क्या हैं? क्या अब यूं होगा कि विरोधी विचार वाला पाकिस्तान का एजेंट हो जाएगा? या जैसा प्रधानमंत्री कहते हैं कि जिसकी पाकिस्तान में पूछ हो, अखबारों में नाम हो, जिसे पाकिस्तान की अवाम पसंद करे, वो पाकिस्तान का एजेंट होता है? विराट कोहली, सचिन तेंदुलकर और शाहरुख खान से लेकर तमाम इंडियन सितारों के पाकिस्तान में दीवाने हैं. फिर 'पाकिस्तान के एजेंट' की व्याख्या कैसे की जाए. पहला मतलब तो यही लगता है कि कोई व्यक्ति जो भारत में है और चोरी-छिपे पाकिस्तान के लिए काम करता है. अंतत: यह सामने वाले को 'देशद्रोही' ठहराना है. लेकिन देशद्रोह और देशभक्ति की राजनीति पर तो बीजेपी का कॉपीराइट था. आपने इसे कब से ग्रहण कर लिया, केजरीवाल सर?
हे जनता के CM. ये अतिवादी नेशनलिस्ट राजनीति में सेंध लगाने की इच्छा आपको कहीं नहीं ले जाएगी. अगर आप 'आम' की राजनीति करते हैं तो विचारों की शिकंजी मत बनाइए. और भाषा जरूर सुधारिए, उसका असर होता है. पत्रकार सुशांत झा ने फेसबुक पर लिखा है कि पाकिस्तानी इतने भी बेवकूफ नहीं होंगे कि एक 'साइकोपैथ' को अपना 'एजेंट' बना लें. है ना?
आपने जवान होते लड़कों को एक साथ होस्टल के बाथरूम में नहाते देखा है? नहीं ही देखा होगा. कुछ लड़के अपने नंगेपन को लेकर निर्लज्ज होते हैं. बिल्कुल निरपेक्ष भाव से वह कपड़े उतारकर नहाते हैं. कुछ चड्ढी पहनकर नहाते हैं, लेकिन फिर कहीं से गोविंदा का गाना बजने लगता है, तो बाल सुलभ शरारत में वह भी शरीर से इकलौता वस्त्र उतार फेंकते हैं. 'हमाम' का साबुन हम नहीं लगाते थे, पर मुहावरे से पहले यह किस्सा जान लिया था. मजा सबको आता है. नहाने का भी, सत्ता का भी.
कोई पाकिस्तान का एजेंट नहीं है. सब पाकिस्तान के एजेंट हैं. खालिस ISI मार्का बर्तन से. कहने को अनेक हैं. किंतु आचरण के स्तर पर सब एक हैं.