अरुण तिवारीअरुण तिवारी, पर्यावरण संबंधी कार्यों से जुड़े हुए हैं. उन्होंने राष्ट्रीय जलबिरादरी एवं गंगा जल बिरादरी में लंबे समय तक संयोजन के उत्तरदायित्व को निभाया था.उन्होंने जल साक्षरता, जल नीति, जल निजीकरण, नदी जोड़, नदी नीति, मतदाता जागरुकता,पंचपरमेश्वर जागृति तथा गंगा-यमुना-गोमती-हिंडन-मंदाकिनी व सई नदी संबंधी कईमहत्वपूर्ण अभियानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. ‘गंगा प्रहरी सम्मान’ (1996),‘गंगा सम्मान’ (2009) एवं ‘तरुण भारत पर्यावरण रक्षण सम्मान’ (2013) आदि सेपुरुस्कृत हो चुके अरुण वर्तमान में ‘इंडिया वाटर पोर्टल (हिंदी)’ में सलाहकार और‘पानी पोस्ट’ नामक वेब पत्रिका के संपादक हैं. पर्यावरण सरोकारों को लेकर ‘प्रकृतिके समय लेख’ उनकी शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक है. आज राष्ट्रीय मतदान दिवस के अवसर परप्रस्तुत है उनका लेख - मतदान के आगे भी है दायित्व.--------------------------------------------------------------------------------मतदान के आगे भी है दायित्वएक वोट ने फ्रांस में लोकतांत्रिक सरकार का रास्ता प्रशस्त किया, एक वोट के कारण हीजर्मनी नाजी हिटलर के हवाले हो गया. यह एक वोट ही था, जिसने 13 दिन में ही अटलसरकार को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया था. एक वोट ने ही कभी अमेरिका कीराजभाषा तय की दी थी. यदि एक वोट सरकार बदल सकती है, तो हमारी तकदीर क्यों नहीं?स्पष्ट है कि हमारे एक-एक वोट की कीमत है. अतः हम अपने मत का दान करते वक्त संजीदाहों. हम सोचें कि पांच साल में कोई आकर चुपके से हमारा मत चुरा ले जाता है, कभीजाति-धर्म-वर्ण-वर्ग, तो कभी किसी लोभ, भय या बेईमानी की खिड़की खोलकर और हम जान भीनहीं पाते. यह अक्सर होता है. इन खिड़कियों को कब और कैसे सीलबंद करेंगे हम मतदाता?इस राष्ट्रीय मतदाता दिवस पर मतदाता से जवाब मांगता, प्रथम प्रश्न यही है.Greetings to everyone on #NationalVotersDay. Congratulations to the Election Commission of India, which was founded on thisday.— Narendra Modi (@narendramodi) January 25, 2018यह सच है कि बीते एक दशक में चुनाव को कम खर्चीला बनाने में निर्वाचन आयोग नेनिश्चित ही शानदार भूमिका निभाई है, किंतु लोभमुक्त, भयमुक्त और धोखामुक्त मतदानकराने के लिए अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है. अतः निर्वाचन आयोग के चुनावआयुक्तों को चाहिए कि वे सेवानिवृति के पश्चात् अपने लिए किसी पार्टी के जरिए पदसुनिश्चित करने की बजाय, निष्पक्ष मतदान सुनिश्चित कराने के लिए संकल्पित हों.सूचना के अधिकार का सम्मान कर उम्मीदवार व मतदान से जुड़ी ज्यादा से ज्यादा सूचनाओंमें शुचिता लाए. वोटिंग मशीन को लेकर तमाम आशंकाओं को निर्मूल साबित करें. मैंसमझता हूं कि कम से कम जीते हुए उम्मीदवारों के शपथ-पत्रों को जांचकर सत्यापित करनेका कदम उठाकर निर्वाचन आयोग, शुचिता की दिशा में एक नई शुरुआत कर सकता है. जानकारीगलत अथवा आधी-अधूरी पाई जाने पर पद गंवाने तथा दंड के प्रावधानों को और सख्त करनेसे यह शुचिता सुनिश्चित करने में और मदद मिलेगी.मतदाता मित्रों, शुचिता सुनिश्चित करने की इस बहस में क्या हमें खुद अपने आप से यहप्रश्न पूछना माकूल नहीं होगा कि यदि भारतीय राजनीति गंदी है, तो इसके दोषी क्यासिर्फ राजनेता हैं? क्या इन्हे चुनने वाले हम मतदाताओं का कोई दोष नहीं? क्या हमारीमतदाता जागरुकता का सारा मतलब, एक वोट डालने तक ही सीमित है? उसके आगे पांच साल कुछनहीं?हम में से कितने मतदाता हैं, जो पांच साल के दौरान जाकर अपने चुने हुए जन-प्रतिनिधिसे उसे मिले बजट का हिसाब पूछते हैं? कितने हैं, जो सार्वजनिक हित के वादों को पूराकरने को लेकर जन-प्रतिनिधि को समय-समय पर टोकते हैं? सार्वजनिक हित के काम में उसेसहयेाग के लिए खुद आगे आते हैं? हम भूल जाते हैं कि जहां सवाल-पूछी होती है,जवाबदेही भी वहीं आती है. यह सवाल-पूछी की प्रक्रिया और तेज होनी चाहिए. इसलिए हमयह तो याद रखें कि मतदान हमारा अधिकार है, किंतु कर्तव्य को न भूल जायें. जाति,धर्म, वर्ग, पार्टी, लोभ अथवा व्यक्तिगत संबंधों की बजाय उम्मीदवार की नीयत,काबिलियत, चिंता, चिंतन, चरित्र तथा उसके द्वारा पेश पांच साल की कार्ययोजना केआधार पर मतदान करना हमारा कर्तव्य है.Rare newsreel footage "INDIA GOES TO THE POLLS", of 1945 Central AssemblyElections, from NFAI's collection to mark #NationalVotersDaytoday!@MIB_India@PIB_India@AkashvaniAIR@Ra_THORe@smritiirani@PMOIndiapic.twitter.com/wScx5yivRK— NFAI (@NFAIOfficial) January 25, 2018गणतंत्र दिवस से एक दिन पूर्व, 25 जनवरी की यह तारीख, प्रतिवर्ष हमें यह भी याददिलाने आती है कि सिर्फ मतदान कर देना मात्र ही लोकतंत्र के निर्माण में हमारीएकमेव भूमिका नहीं है. महज मतदान कर देने मात्र से हम अपने सपनों का भारत नहीं बनासकते. एक मतदाता के रूप में लोकतंत्र के निर्माण में सहभागिता के लिए जागने की अवधिसिर्फ वोट का एक दिन नहीं, पूरी पांच साल है - एक चुनाव से दूसरे चुनाव तक. जैसेचुनाव संपन्न होता है, मतदाता का असल काम शुरु हो जाता है. चुने गए उम्मीदवार कोलगातार संवाद के लिए जनमत के अनुरूप दायित्व-निर्वाह को विवश करना. राष्ट्र स्तर परनीतिगत निर्णयों के लिए सांसद को और हितकारी विधान निर्माण के लिए विधायक कोप्रेरित करना व शक्ति देना. एक निगम पार्षद को विवश करना कि वह इलाके का विकासनागरिकों की योजना व जरूरत के मुताबिक करे. ग्राम पंचायत के निर्णयों में ग्राम सभाका साझा सपना झलकना ही चाहिए. ये हम मतदाता ही हैं, जो कि उम्मीदवार को इस सच्चाईसे वाकिफ करा सकते हैं कि चुनाव न हार-जीत का मौका होता है और न ही यह कोई युद्धहै. चुनाव मौका होता है, पिछले पांच साल हमारे जन-प्रतिनिधि द्वारा किए गए कार्य वव्यवहार के आकलन का. चुनाव मौका होता है, अगले पांच साल के लिए अपने विकास व विधानकी दिशा तय करने का. यह तभी हो सकता है, जबकि मतदाता मतदान के बाद सो न जाये.हम बीते पांच साल में लोकप्रतिनिधि के कार्य का आकलन भी तभी कर सकते हैं, जब हमारेलिए बनी योजनाओं की हम खुद जानकारी रखें. उनमें लोकप्रतिनिधि, अधिकारी और खुद कीभूमिका को हम जाने. उनका सफल क्रियान्वयन सुनिश्चित करें और कराएं. उनकेउपयोग-दुरुपयोग व प्रभावों की खुद कड़ी निगरानी रखें. सरकारी योजनाओं के जरिए हमारेऊपर खर्च होने वाली हर पाई का हिसाब मांगे. लोक अंकेक्षण यानी पब्लिक ऑडिट करें.‘मनरेगा में काम क्या होगा? कहां होगा? यह जिम्मेदारी किसकी है? - ग्रामसभा की.’रेडियो-टीवी पर दिन में कई-कई बार एक विज्ञापन यही बात बार-बार याद दिलाता है;बावजूद इसके यदि ग्रामवासी हर निर्णय की चाबी ग्राम प्रधान को सौंपकर सो जाएं, तोवह हर पांच साल में एक गाड़ी बनायेगा ही. तेरी गठरी में लागा चोर, मुसाफिर जाग जरा!क्या करें? कैसे जागें?? वर्ष 2010 में भारतीय राष्ट्रीय मतदाता दिवस का विचार देनेवाले एक साधारण से मतदाता कैप्टन चांद का असल सपना संभवतः यही था.Your vote is the strength of our democracy!On the #NationalVotersDay, everyone, especially youngsters, must register as a voter and contribute inbuilding a #NewIndiaRegister here- https://t.co/aBN01Z0M3tpic.twitter.com/nT5fZcw1ga— Rajyavardhan Rathore (@Ra_THORe) January 25, 2018अच्छा है कि हमने जागना शुरु कर दिया है. थोड़ा और जागें. वोट से और आगे बढ़ें.राजनेता चुनना बंद करें. लोकनेता चुनना शुरु करें. हम मतदाता खुद अपनीलोकसभा/विधानसभा/ग्रामसभा का घोषणापत्र बनाएं. सभी उम्मीदवार व पार्टियों को बुलाकरउनके समक्ष पेश करें. उनसे संकल्प लें और जीतकर आये जन-प्रतिनिधि को उसके संकल्प परखरे उतरने को न सिर्फ विवश करें, बल्कि सहयोग भी करें.लूट के रास्तों की बाड़बंदी तभी होगी, प्रत्येक नागरिक अपने कर्तव्य व अधिकार –दोनों का एक समान निर्वाह करें. वर्ना लगाई बाड़ खेत खाएगी ही. सिटीजन चार्टर सिर्फपढ़ें नहीं, उसकी पालना के लिए प्रशासन को विवश भी करें. यह तभी संभव है कि जब हममतदाता सकरात्मक, सजग, समझदार व संगठित हों. उत्तर प्रदेश के ज़िला सीतापुर का एकअभियान प्रमाण है कि देशव्यापी स्तर पर निष्पक्ष मतदाता परिषदों का गठन कर यह कियाजा सकता है. लोकतंत्र में राजतंत्र की मानसिकता को बाहर का रास्ता दिखाने का यहीतरीका है. लोक उम्मीदवारी का मार्ग भी इसी से प्रशस्त होगा. आइये, प्रशस्त करें.मेरा मानना है कि मतदाता जागरूकता का असल मतलब सिर्फ मतदान नहीं, बेहतर लोकतंत्र केनिर्माण में हर स्तर पर भागीदारी से है; व्यक्तिगत जिम्मेदारियों के निर्वाह सेलेकर पदगत व संस्थागत दायित्वों की पूर्ति तक. मेरे पढ़ने, लिखने, कुछ बनने, करने,अधिक से अधिक कमाने - किसी भी कार्य के पीछे का उद्देश्य यदि बेहतर राष्ट्र कानिर्माण करना हो, तो भी हमें स्वयं से यह प्रश्न बार-बार पूछना चाहिए कि अपने कार्यके ज़रिए क्या मैं बेहतर लोकतंत्र के निर्माण में सच्ची भागीदारी निभा रहा हूं? यदिनहीं, तो हमें अपने कार्य पर पुनर्विचार तथा सतत् सुधार करना चाहिए. किसी भीलोकतंत्र की मज़बूती की प्रक्रिया को सतत् सक्रिय रखने का यही तरीका है.We urge all eligible voters to register themselves to exercise their right tovote. #NationalVotersDaypic.twitter.com/3V2V2gp8x5— BJP (@BJP4India) January 25, 2018On the occasion of the #NationalVotersDay, we encourage each and every voter in the country to exercise their right tovote. It was first celebrated by the UPA Govt in 2011.pic.twitter.com/yBtNAkDMP2— Congress (@INCIndia) January 25, 2018हमें समझना चाहिए कि आज दुनिया का यदि कोई सबसे आसान काम है, तो वह है व्यवस्था औरसत्ता को गाली देना. दूसरों को भ्रष्टाचारी कहना, निश्चित ही सबसे आसान काम है औरखुद को सदाचारी बनाना, निश्चित ही सबसे कठिन काम. खुद को सदाचारी बनाने के लिए जिससंकल्प की जरूरत है, उसकी बात आने पर हम से ज्यादातर विकल्प तलाशते हैं. आज हम इतनेसुविधा-भोगी हो गए हैं कि अपनी सुविधा के लिए आज हम खुद शॅार्टकट रास्ते तलाशतेहैं. 'आउट ऑफ़ वे' हासिल करना हम रुतबे की बात मानते हैं. कहते हैं कि इतना तो चलताहै. जब तक यह चित्र नहीं बदलेगा, मतदाता जागरूकता आधी-अधूरी ही रहेगी. आइये, बतौरमतदाता आज हम सम्पूर्ण दायित्व पूर्ति के लिए संकल्पित हों.--------------------------------------------------------------------------------'एक कहानी रोज़' में कहानियां यहां पढ़ें:याद एक अमरबेल है!'तुम किसको दीप जलाकर पथ दिखलाना चाहती हो'उसकी आवाज गूंजती है, जैसे लोहे की सांकल बजती है, जैसे ईमान बजता है!'उसके चेहरे पर पालक की कोमलता, हरी मिर्चों की खुशबू पुती थी'क्या हुआ जब मुसलमानों ने बकरीद को दीवाली की तरह मनाने का फैसला किया?'यही तुम अंग्रेजी की एम.ए. हो?'एक कहानी रोज़: 'मुगलों ने सल्तनत बख्श दी'--------------------------------------------------------------------------------Video देखें: केदारनाथ सिंह की 'बनारस':