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इंसानों की इतनी बड़ी आदत, जो हमने अमेरिका को दी है!

हम सत्य के बाद बाद वाले युग में पहुंच चके हैं

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लल्लनटॉप
18 नवंबर 2016 (अपडेटेड: 18 नवंबर 2016, 10:37 AM IST)
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विवेक आसरी

यूरोप. दूर. ठंडा. पराया. अतीत को खुरचें तो हम पर कब्जा करने वाला. और पीछे लौटें तो हमें मसालों की कीमत चुका अमीर करने वाला. मगर सांस्कृतिक रूप से हमेशा दूर दूर रहा.

लेकिन ये सब का सब पास्ट है, जो टेंस रहा. प्रेजेंट मजेदार है. आपको पूरे यूरोप में देसी मिल जाएंगे. हमें भी मिल गए. हमारे देसी. नाम विवेक आसरी. जर्मनी में रहते हैं. और उन्होंने वादा किया है कि यूरोप के किस्से-कहानियां, सियासत और समाज के खूब नजारे दिखाएंगे. हमें. आपको.

वादे के मुताबिक वो लाए हैं 'डाक यूरोप' की एक नई किस्त. इस बार आपको पता चलेगा 'पोस्ट ट्रूथ' के बारे में. आसान भाषा में समझें तो एक ऐसी स्थिति, जब आप किसी पर यकीन ही न कर पाएं कि वो सच बोल रहा है या नहीं. पढ़िए.



व्यवहार पर किताबें लिखी जाती हैं. किताबें शब्द बन जाती हैं. शब्द भाषा में शामिल हो जाते हैं. भाषा व्यवहार प्रवाह का आईना हो जाती है. और फिर उसी आईने में व्यवहार नजर आता है. ये चक्र 'पोस्ट-ट्रूथ' की पूरी कहानी है. यूरोप आजकल पोस्ट-ट्रूथ की बात कर रहा है. इसलिए कि इसे ऑक्सफर्ड का 2016 का वर्ड ऑफ द ईयर चुना गया है.

ऑक्सफर्ड के मुताबिक ये शब्द सबसे पहले 1992 में सर्बियाई मूल के अमेरिकी नाटककार स्टीव तेसिश ने एक लेख में इस्तेमाल किया था, लेकिन ये मशहूर हुआ 2004 में आई एक किताब से. 2004 में राल्फ कीज़ की एक किताब आई थी, जिसका नाम था 'पोस्ट-ट्रूथ ईरा'. यहीं से ये शब्द निकला और अब ऑक्सफर्ड में पहुंच गया है.

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अपनी किताब में कीज एक जगह दिलचस्प बात लिखते हैं. लिखते हैं, 'शौच जाने या संभोग से ज्यादा व्यंजनाएं बेईमानी देती हैं. इससे हम बेईमानी के परिणामों को लेकर बेफिक्र हो जाते हैं. पोस्ट-ट्रूथ ईरा में बस सच और झूठ ही नहीं बचे हैं, एक तीसरी श्रेणी भी आ गई है. ऐसे बयान, जो सच नहीं हैं, लेकिन झूठ से थोड़े से कम हैं. इसे आप सत्य का थोड़ा सा बढ़ा हुआ रूप कह सकते हैं. नव-सत्य. शिथिल-सत्य. जाली-सत्य. हल्का-सत्य.'


हम सब उत्तर-सत्य में जी रहे हैं. कीज कहते हैं कि पहले सत्य और असत्य के बीच स्पष्ट विभाजक रेखा होती थी. अब ये धुंधली हो चुकी है. हर विभाजक रेखा धुंधली हो चुकी है. सत्य और कल्पना के बीच. ईमानदारी और बेईमानी के बीच. धोखा देना अब बुरी बात नहीं रही, क्योंकि ये खेल बन चुका है, जो बाद में चुनौती बन जाता है और फिर आदत. धोखा देना कला है. हर कोई दूसरों को धोखा दे रहा है. नेता जनता को. जनता समाज को. समाज इतिहास को. इतिहास भविष्य को. भविष्य वर्तमान को. अब लोग 'आई लव यू' और 'आई लव सूशी' एक ही शिद्दत से कहते हैं.

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खोजी पत्रकार राल्फ कीज़ अपनी किताब में इस बात का विश्लेषण करते हैं कि समाज में जो बिना बात की बेईमानी है, मतलब जिससे कुछ हासिल नहीं हो रहा है, उसके परिणाम क्या होंगे. वो लिखते हैं कि अनौपचारिक या इत्तेफाकन बेईमानी की वजह क्या होती है? क्यों लोग बेमकसद ही बेईमान हो जाते होंगे और इस कदर हो जाते हैं कि बेईमानी महामारी बन गई है. ऐसे लोग भी बेईमानी करते हैं, जिन्हें बेईमानी करने की जरूरत नहीं है.


जब जब किसी बड़े आदमी की बेईमानी पकड़ी जाती है, ये सवाल उठता है. नेता, व्यापारी, पत्रकार, जज, सैनिक, पुलिसवाले, ब्यूटी क्वीन्स, खिलाड़ी. हर जगत में बेईमान हैं. और इसकी वजह हम तभी समझ सकते हैं, जब हम जानें कि वे किस सागर में तैर रहे हैं. कीज कहते हैं कि सत्य के प्रति घृणा बढ़ती जा रही है. ऐसे लोगों का प्रभाव बढ़ता जा रहा है, जिनका सत्य फ्लेक्सिबल होता है.

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थेरेपिस्ट, एंटरटेनर्स, वकील से लेकर बड़े बड़े नेता तक, हर प्रभावशाली व्यक्ति की आचार संहिता फ्लेक्सिबल है. नैतिकता सापेक्ष हो गई है. समुदाय टूट गये हैं. सामुदायिक बंधन ढीले पड़ गए हैं. और इंटरनेट राजा हो गया है. नतीजा? भरोसा भुरभुरा गया है. वो भरोसा, जो किसी भी स्वस्थ सभ्यता की नींव होता है. जब फंतासियां व्यापक हो जाती हैं, तो समाज का सत्यता से रिश्ता टूट जाता है. कीज पूछते हैं कि सोचिए, हमें भरोसा ही ना रहे कि सामने वाला सच बोल रहा है, तो समाज का क्या होगा?

और यूरोप में बैठकर ये सब पढ़ते हुए मैं भारत में दिए जा रहे बयानों के बारे में, दावों के बारे में, वादों के बारे में सोच रहा हूं. भारत कितनी जल्दी पोस्ट ट्रूथ ईरा में पहुंच गया है. या शायद पोस्ट-ट्रूथ ईरा भारत से अमेरिका गया है. पोस्ट ट्रूथ का हिंदी शब्द अभी नहीं है. क्या हो सकता है सोचिए. उत्तर-सत्य चलेगा क्या? खोज लिया जाना चाहिए, क्योंकि इसमें हम भारतीयों को अपनत्व महसूस होगा.




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