डॉ. अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठीडॉ. अमरेंद्र नाथ त्रिपाठी. शिक्षक और अध्येता. लोक में खास दिलचस्पी, जो आपको यहांदिखेगी. अमरेंद्र हर हफ्ते हमसे रू-ब-रू होते हैं. 'देहातनामा' के ज़रिए. पेश हैइसकी सोलहवीं किस्त:--------------------------------------------------------------------------------अपने समाज में ताकत का विरोध बे-ताकत (और बे-आवाज़) लोग अपने किस्से-कहानियों मेंकैसे करते हैं, इस पर एक बार चर्चा हो रही थी. भगवान राम के जन्म लेने के बाद हिरनीजोड़े के दु:ख वाली कहानी उसके केंद्र में थी. ये कहानी आप सबसे साझा कर चुका हूं.(यहां क्लिक करके पढ़ें) चर्चा में ही एक नई कहानी पता चली- बुगली-बुगला की कहानी. मजेदार और घने मतलबवाली. हरियाणा और राजस्थान के मिले-जुले इलाके में ये कहानी चर्चित रही है. इसेसुनें फिर:बुगली-बुगला का एक जोड़ा था. दूसरे पक्षियों के जोड़े की तरह. उनका अपना परिवार था.बच्चे थे. गृहस्थी थी. अपने और परिवार के भरण-पोषण की ज़रूरत थी. दोनों दाना चुगनेनिकलते थे. कुछ दाने घर के लिए भी ले आते थे. जिंदगी खरामा-खरामा चल रही थी.एक बार दोनों दाना चुगने निकले थे. दोनों की निगाह ज्वार के एक खेत पर पड़ी. चुगनेके लिए वहां ज्वार की कमी नहीं थी. बुगला का मन ललचाने लगा. बुगली समझदार थी. उसनेललचाते हुए बुगले से कहा कि तू इस ज्वार के खेत में दाना चुगने न जा. ये ज़मींदार काखेत है. वो तुझे पकड़कर मार डालेगा.बुगले का ललचाता मन बुगली की सलाह पर भारी पड़ा. वो ज्वार के खेत में घुस गया. बुगलीरोकती रह गई. फिर बुगली का अंदेशा सही साबित हुआ और बुगले की मनमानी उसकी कैद काकारण बनी. ज़मींदार वहीं था. उसने हिकमत लगाकर बुगले को पकड़ लिया.ज्वार का खेत (सांकेतिक तस्वीर)अब बुगला कैद में पड़ा फड़फड़ा रहा है. उसे खुद पर पछतावा ज़रूर हो रहा है, फिर भी वोधैर्य से काम लेना चाहता है. मरने से पहले ही खौफ खाकर मर जाना उसे पसंद नहीं. अपनीहिम्मत का सहारा उसे है. इधर बुगली बेसहारा होकर रो रही है. अपने दु:ख में वो कहेजा रही है-हे बुगला, तैने बरजै थी सुण, हे बुगला, तैने बरजावै थी तू ज़मींदार की जवार मत खाबुगला, नी मरजावागो तू बुगला, तू ज़मींदार की जवार मत खा... (हे बुगला, मैं तुझे बरजरही थी, बार-बार बरज रही थी कि तू ज़मींदार की ज्वार मत खा. नहीं तो तू माराजायेगा.)ज्वार का खेत (सांकेतिक तस्वीर)ये सब देखकर ज़मींदार हंस रहा है. उसे हंसता हुआ देखकर बुगला उसके पंजों में कसमसाताहै. उधर बुगली रूदन कर रही है. बुगला साहस करके बुगली से कहता है-हे बुगली, मैं जीऊं सूं सुण, हे बुगली, मैं जागूं सूं तू बच्चा धौरे चल बुगली मैं आजाऊंगा, तू बच्चा धौरे चल. (हे बुगली, मैं जिऊंगा. सुन बुगली, मैं जग रहा हूं(चेतना में हूं). तू बच्चों के पास जा. मैं आ जाऊंगा. तू बच्चों के पास जा.)ज्वार चुगने वाला पक्षी (सांकेतिक तस्वीर)बुगले की इन बातों को सुनकर बुगली को उस पर थोड़ा भरोसा होता है. घर में बच्चे अकेलेथे. वो घर चली आती है. बुगली देखती है कि काफी शाम होने को है, लेकिन बुगला इधरनहीं आ रहा. बच्चों को घर पर सुरक्षित करके वो ज़मींदार के घर की ओर आ जाती है. येदेखने कि बुगला किस दशा में है.वो देखती है कि बुगला अभी भी ज़मींदार की कैद में है. उसका आज ही काम तमाम हो जाएगा.उसे पकाने-खाने की व्यवस्था में ज़मींदार लगा हुआ है. बुगली इस दशा में पड़े अपनेबुगले के सामने वही रुदन-गीत फिर गाती है- हे बुगला, तैने बरजी थी. ये देखकरज़मींदार हंसता है और खुश होता है. उसे खुश होता देखकर बुगला फिर वही कहता है- हेबुगली, सुण मैं जीऊं सूं.बुगले की बात पर किसी तरह भरोसा करके बुगली फिर वापस घर आ जाती है. बुगले की राहअगोरती रहती है. अचानक उसे सीझते मांस की गंध महसूस होने लगती है. वो बेचैन हो उठतीहै. वो फिर ज़मींदार के घर जाती है. वो लाचारी में फिर कहती है- हे बुगला, तैने बरजीथी. ज़मींदार अट्टाहास करता है. इस अट्टाहास के जवाब में बर्तन में पक रहे बुगले कास्वर सुनाई पड़ता है- हे बुगली, सुण मैं जीऊं सूं.ज्वार चुगने वाला पक्षी (सांकेतिक तस्वीर)ज़मींदार बनाने वाले से कहता है, 'ला, बुगले को पकाकर इसे अभी खाकर खत्म करता हूं'.बनाने वाले जल्दी से उसे पकाकर ज़मींदार के सामने परोसते हैं. बुगली लाचार अवस्थामें सब देखती रहती है. आंसू से नहाती जाती है. उसी के सामने ज़मींदार बुगले कोचटखारे ले-लेकर खाता है. वो बेसहारा-बदनसीब-कातर निगाह से देखती रहती है.उसे वही सब बार-बार याद आता रहता है. देखती है कि बुगले के कटे पंख पड़े हैं. अबउनमें हरकत नहीं होती. दु:ख में वो फिर उचारती है- 'हे बुगला, तैने बरजी थी'. लेकिनये क्या चमत्कार हुआ इस बार! बुगले की आवाज ज़मींदार के पेट से निकल आई. बुगलाज़मींदार के पेट से बोल रहा है, 'हे बुगली, सुण मैं जीऊं सूं'. बुगली रोते-रोते घरलौट आती है. वो पूरी रात जगते-रोते काटती है.ये सब देख ज़मींदार के पैरों तले जमीन खिसक गई. वो तुच्छ जीव तो उसके पेट में भीबोले जा रहा है. अब वो अपनी ताकत कहां आजमाए. अपने पेट को तो काट नहीं सकता. बुगलेकी औकात उसे चुनौती दे रही है, ये बात उसे बर्दाश्त नहीं हो पा रही. बुगला सामनेहोता, तो वो पचीस बार उसका गला मरोड़ता, लेकिन अपने पेट को लेकर वो कहां जाए!सांकेतिक तस्वीरज़मींदार को फिर अपने मजदूर आदमियों का ध्यान हुआ. उसने दो मज़दूरों को बुलाया. उनसेकहा कि कल जब मैं पाखाना करने जाऊं, तो तुम दोनों तलवार-हथियार लेकर मेरे साथ रहो.जैसे ही मैं हगूं और बुगला निकले, उसे घायल करके कैद कर लो. पूरी चुस्ती बरतना.कहीं ढिलाहट न हो. बुगला बहुत तेज है. नहीं तो भाग जाएगा. बुगले को मैं जीवनभर कैदरखूंगा और यातनाएं दूंगा. ज़मींदार के हगने का इंतिजार किया जाता है.अगले दिन जब ज़मींदार हगने जाता है, तो दो आदमी उसके साथ मुस्तैद रहते हैं. हथियारके साथ. इंतिजार कि ज़मींदार अब हगे-तब हगे. इसी बीच धड़ाम की आवाज हुई. ज़मींदार नेहुलुम्मा हगा. हथियार चले. लेकिन ज़मींदार बुरा फंस गया. बुगला तो आवाज होने के साथही उड़ भागा. अपने ही आदमियों के हथियार से ज़मींदार घायल हो गया. वो अपना चोटग्रस्तपिछवाड़ा लिए औंधा पड़ा कराह रहा है. बुगला अपनी बुगली के साथ मगन है. दोनों अपने घरकी ओर उड़ चले.लोक में ऐसी कहानियों की कमी नहीं है, जो ताकत (सत्ता) के दंभ के खिलाफ आम आदमी यामजबूर आदमी का पक्ष रख रही हों. ये कहानी इसी स्वभाव की है. जो लोग मजबूर हैं,बे-आवाज हैं, वे भी अपने ढंग से मज़ा चखा देते हैं. ये मज़ा चखाना उनके यथार्थ कासच न हो, तो भी उनकी कल्पना का सच ज़रूर होता है. और ये कल्पना का सच ही उन्हेंयथार्थ में एक ताकत देता है. उनमें निडरता आती है. इस तरह एक दूसरे यथार्थ का सचबनता है. ये बे-ताकत और बे-आवाज की निडरता की कहानी है.गोरख पांडेयये निडरता ताकत या सत्ता को बर्दाश्त नहीं होती. शोषण का दर्शन भय पर काम करता है.भय से आजादी शोषण से आजादी का शुरुआती चरण भी है. ये बात ज़मींदार की तरह शोषक शक्तिको परेशान करती है. या कहिए कि इस बात से शोषक शक्ति भय खाने लगती है. इस कहानी याऐसी दूसरी कहानियों में शोषकों के भय के दर्शन की 'एंटी थीसिस' लोक की तरफ से पेशकी गई है. ये कहानियां इस दृष्टि से प्रतिरोध का वृत्त भी बनाती हैं. इस लोक-कहानीके साथ लोककवि गोरख पांडे की 'उनका डर' कविता भी ज़रूर पढ़ें:वे डरते हैं किस चीज से डरते हैं वे तमाम धन-दौलत गोला-बारूद, पुलिस-फौज के बावजूद?वे डरते हैं कि एक दिन निहत्थे और गरीब लोग उनसे डरना बंद कर देंगे.नोट 1: ये लोक-कहानी मुझे कथाकार डॉ. रजनी दिसोदिया के सौजन्य से मिली. उन्होंनेचर्चा के दौरान जब इस कहानी का ज़िक्र किया, तो मुझे इसमें 'प्रति-भय' की प्रतिरोधीआवाज दिखी. उनकी बताई कहानी को मैंने अपने शब्दों में यहां पेश किया है. ये सोचकरकि लोक-कहानियां एकतारता लिए भी खुलापाठ होती हैं. मैं रजनी मैम का शुक्रगुजार हूं.नोट 2: 'बुगला' हरियाणा-राजस्थान में किसी भी सफेद या सफेद-जैसे पक्षी को कहते हैं.मोटे रूप में बुगला माने 'पक्षी' हुआ. यहां तक कि जो प्रवासी पक्षी आते हैं, उन्हेंभी बुगला कहते हैं. यहां लिखे 'बुगला' का अर्थ 'बगुला' नहीं है.--------------------------------------------------------------------------------पढ़िए देहातनामा की पिछली किस्तें:मांग में सिंदूर भरने की शुरुआत की एक कहानी, जिसे बेहद कम लोग जानते हैंजब ‘मॉब लिंचिंग’ का शिकार होते-होते बचे हबीब तनवीर!कहानी उस हिरण की, जिसका राम के जन्म पर भोज हुआ थाइस तरह लड़कियों को अपने जाल में फंसाते हैं पाखंडी बाबा-------------------------------------------------------------------------------- शहीदों के बदन पर तिरंगे की जगह बोरी और गत्ता था, लेकिन उसकी एक वजह थी-