The Lallantop
Advertisement
  • Home
  • Lallankhas
  • Amrendra Nath Tripathi explaining the reason and story behind use of sindoor

मांग में सिंदूर भरने की शुरुआत की एक कहानी, जिसे बेहद कम लोग जानते हैं

जिसे कोई मर्दों की गुलामी का प्रतीक बताता है, तो कोई शास्त्र का आदेश, उसकी एक सूरत ये भी है.

Advertisement
pic
28 सितंबर 2017 (अपडेटेड: 28 सितंबर 2017, 11:28 AM IST)
Img The Lallantop
सांकेतिक तस्वीर
Quick AI Highlights
Click here to view more
डॉ. अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी
डॉ. अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी

डॉ. अमरेंद्र नाथ त्रिपाठी. शिक्षक और अध्येता. लोक में खास दिलचस्पी, जो आपको यहां दिखेगी. अमरेंद्र हर हफ्ते हमसे रू-ब-रू होते हैं. ‘देहातनामा’ के जरिए. पेश है इसकी पंद्रहवीं किस्त:



सिंदूर और उससे मांग-भराई को लेकर बहुत सी बातें पढ़ने और सुनने में आती हैं. कुछ बातों पर थोड़ी सी चर्चा यहां मैं भी करूंगा, लेकिन बाद में. पहले वो देहाती मसला आपसे साझा कर लूं, जिसे मैंने सुना था. तो सुना जाए:-

'भगवान ने बड़ी लगन से दो सूरतों में प्राण फूंके थे. एक था भील, नाम था वीरा. वीर था. एक दूसरी थी, नाम था धीरा. इसमें वीरता और धीरता दोनों थी. जितनी सुंदर थी, उतनी ही बहादुर.

दोनों का विवाह हुआ. दोनों ने साथ-साथ जीना शुरू किया. दोनों भील थे, शिकार पर जाते थे. ज़िंदगी जंगलों में घूमते-छानते बीतती थी. वीरा के साथ हमेशा धीरा होती थी. पूरे जंगल में इस जोड़ी की खुशबू फैल गई थी. दोनों से दुनिया सुंदर लगने लगी थी. जैसे दो का प्यार दुनिया को सुंदर बनाता है.

dehatnama

दुनिया में कुछ होते हैं, जिन्हें हर सुंदरता से जलन होती है या हर सुंदरता पर कब्जा करना चाहते हैं. 'देखि न सकहिं पराई बिभूती!' सो उस इलाके का दुर्दान्त डाकू कालिया उनके सुखमय जीवन से हैरान रहने लगा. उसने सोचा कि वीरा को अगर वीरगति दे दे, तो धीरा उसी की.


एक दिन दोनों शिकार पर गए हुए थे. कोई शिकार नहीं मिला. दोनों ने बहुत कोशिश की, लेकिन नसीब में कुछ नहीं आया. मारे थकान के दोनों एक पहाड़ी के पास बैठ गए. कुछ देर में उन्हें नींद आ गई. जब नींद खुली, तो दोनों ने देखा कि रात होने वाली है. फैसला हुआ कि आज रात यहीं कंदमूल खाकर काटी जाए.

forest

वीरा और धीरा, दोनों वहीं बैठ गए. वीरा ने कहा कि प्यास बहुत लगी है, मैं पास के जलाशय से पानी ले आता हूं. धीरा वहीं रह गई. वीरा पानी लाने चला गया.

वीरा थोड़ी ही दूर के रास्ते पर जा रहा था. कालिया अपने शिकार पर नजर लगाए हुए था. उसे बढ़िया मौका मिला. उसने वीरा को टोका- कौन है तू? कहां जा रहा है? वीरा ने कहा कि पानी लेने जा रहा हूं. कालिया बद्तमीजी पर उतारू हो गया.

वीरा लड़ना नहीं चाहता था. कालिया तो इरादा करके आया था कि वो आज वीर-धीरा का शिकार करके ही रहेगा. वीरा के न चाहने पर भी कालिया ने वीरा पर हमला कर दिया. वीरा घायल अवस्था में असहाय होकर जमीन पर गिर पड़ा. कालिया शिकार कर लेने की खुशी में दहाड़-दहाड़कर हंसने लगा.


चौकन्नी धीरा दहाड़ सुनकर वीरा को खोजती हुई उधर आई. उसने दूर से देखा कि वीरा निढाल पड़ा हुआ है. डाकू कालिया खुशी में खिखियाए जा रहा है. धीरा की धमनियों में गरम खून बहने लगा. बड़े धैर्य के साथ उसने अपना हंसुआ संभाला. चीते की फुर्ती से वो कालिया पर टूट पड़ी.

कालिया इस हमले के लिए एकदम तैयार न था. वो कुछ समझ पाता, उससे पहले ही हंसुआ उसके गले पर आघात कर चुका था. थोड़ी देर पहले वो खुशी में दहाड़ छोड़ रहा था, लेकिन अब वो पीड़ा से कराह रहा था. उसने उठने की दो-तीन कोशिश की, लेकिन कामयाब न हो सका. वो आखिरी सांसें गिनने लगा.

इसी बीच वीरा को होश आ गया. उसने चेतना में आते ही देखा कि उसके सामने धीरा खड़ी हुई है और डाकू जमीन पर लुढ़का हुआ है. उसे अपनी आंखों पर एकाएक विश्वास नहीं हुआ. आश्चर्य की भी एक अवधि होती है, उसके बाद जानने को सच बचता है. फिर-फिर देखकर वीरा ने ये जान लिया कि जो कुछ उसने देखा है, वो सच है.


वीरा खड़ा हुआ. अपनी पत्नी धीरा के पास गया. उसकी आंखों में आंसू थे. शरीर पुलकित हो रहा था. अपने शरीर से निकलता खून लेकर उसने धीरा की मांग में भर दिया. धीरा देखती रही. मारे नेह के उसने वीरा को लिपटा लिया. इस महामिलन को निकलते हुए सूरज ने सलाम लिया. प्यार की नई सुबह!

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर

इस वीरगाथा के साथ ये लोकमान्यता है कि इसी समय से, इसी घटना से, मांग भरने की प्रथा शुरू हुई जो आज तक जारी है. दूसरे इलाकों में भी ये लोककथा थोड़े-बहुत अंतर के साथ प्रचलित है. सिन्दूर लगाने की शुरुआत वाली कथा के रूप में.

*********

सिंदूर लगाने के बहुत से संदर्भ शास्त्रों में मिलेंगे और ज़ाहिर है कि कोई प्रथा आज इस रूप में प्रचलित है, तो उसके संदर्भ एक, और अंतिम एक, की तरह से नहीं होंगे. अलग-अलग समुदायों ने, अलग-अलग जगहों में उसे लेकर अपने-अपने ढंग के संदर्भ बनाए होंगे. शास्त्र की बात ही ठीक है, ये भी एक दुराग्रह है. शास्त्रों में जो बात दिखेगी, वो ज्यादा मर्यादा से नियंत्रित होगी. इसी से कई लोग सिंदूर लगाने को स्त्रियों द्वारा पुरुषों की गुलामी से जोड़कर देखते हैं.

सिंदूर शादीशुदा होने के प्रतीक के रूप में देखा जाता है. फेमिनिस्ट सोच कहती है कि पुरुष ऐसे किसी प्रतीक को धारण नहीं करता, तो स्त्री क्यों करे? ये तर्क हवा में नहीं उड़ाया जा सकता.


सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर

शास्त्र संदर्भ देखते हुए लोक संदर्भ नहीं छोड़े जाने चाहिए. इस कहानी के हवाले से बात करें, तो सिंदूर गुलामी नहीं, बल्कि स्त्री के शौर्य-धैर्य का प्रतीक साबित होता है. इस तरह स्त्री को वीरता की प्रेरणा देने वाला. ये घर में सिंदूर लगाकर दब्बू बने रहने से अलग होने की बात है. यहां घर की चारदीवारी को तोड़कर धरती के विस्तार से जुड़ने की कथाभूमि है. मांगभराई से जुड़े इस आदिवासी और देहाती संदर्भ पर क्या कोई सिंदूर-सेवी सोचता भी है?




पढ़िए देहातनामा की पिछली किस्तें:
जब 'मॉब लिंचिंग' का शिकार होते-होते बचे हबीब तनवीर!

कहानी उस हिरण की, जिसका राम के जन्म पर भोज हुआ था

इस तरह लड़कियों को अपने जाल में फंसाते हैं पाखंडी बाबा

50 में 1 बच्चा कहानी सुनाने की हिम्मत करता है और सरकार की बखिया उधेड़ देता है

लोना चमारिन, जिसने आपके बाप-दादा का भला चाहा, कौन हैं?

Advertisement

Advertisement

()