2019 के लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी के भीतर खींचतान शुरू
अमित शाह प्रदेश प्रभारियों की नियुक्ति के जरिए नितिन गडकरी के हमले का जवाब दिया है.
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गडकरी और अमित शाह के बीच शीत युद्ध चल रहा है.
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जुलाई 2010. सोहराबुद्दीन शेख फर्जी एनकाउंटर केस में आरोपी होने के चलते अमित शाह को जेल जाना पड़ा. तीन महीने जेल में रहने के बाद वो 29 अक्टूबर 2010 में जमानत पर जेल से रिहा हुए. 30 अक्टूबर 2010 को सुप्रीम कोर्ट ने अपनी खास सुनवाई में अमित शाह को 24 घंटे के भीतर गुजरात छोड़ने का आदेश दे दिया. यह अमित शाह के जीवन का सबे बुरा दौर था. कुछ ही महीने पहले वो गुजरात के गृहमंत्री थे. देश निकाला भुगत रहे अमित शाह गुजरात से दिल्ली चले आए.
दिल्ली में उस समय कांग्रेस का राज था. बीजेपी की बागडोर नितिन गड़करी के हाथ में हुआ करती थी. कहते हैं कि उस समय नितिन गडकरी एक मुलाकात के लिए अमित शाह को घंटो बैठाए रखते थे. वो अमित शाह का बुरा दौर था. समय का पहिया बदला. 2014 के लोकसभा चुनाव के वक़्त बीजेपी भले ही पार्टी के अध्यक्ष राजनाथ सिंह रहे हों लेकिन प्रचार अभियान की पूरी जिम्मेदारी अमित शाह के कंधों पर ही थीं. 2014 के लोकसभा चुनाव में मिली जीत ने सत्ता के समीकरण पूरी तरह से बदल दिए. अब नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी सत्ता के शीर्ष पर थी. नितिन गडकरी की हैसियत पार्टी में संघ के नुमाइंदगे तक सिमट कर रह गई. अमित शाह 2010-2012 के बीच नितिन गडकरी के बर्ताव को भूले नहीं थे. अपमान की खरोंचे अब भी दिमाग में मौजूद थीं.
2014 के लोकसभा चुनाव से पहले जून 2013 में बीजेपी का गोवा अधिवेशन हुआ. इस अधिवेशन में नरेंद्र मोदी को पार्टी का चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष घोषित किया गया. फिर सितंबर 2013 में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया गया. इस उठा-पटक को उस समय पार्टी के भीतर आडवानी खेमे के आत्मसमर्पण के तौर पर देखा गया. दरअसल यह आत्मसमर्पण की बजाए 'टेक्टिकल रीट्रीट' था. उस समय बीजेपी के भीतर एक खेमा यह मानकर बैठा था कि नरेंद्र मोदी अपने दम पर कभी भी पूर्ण बहुमत हासिल नहीं कर पाएंगे. खिचड़ी लोकसभा की स्थिति में उन्हें अपने लिए समर्थन जुटाने में दिक्कत पेश आएगी. ऐसी स्थिति में आडवाणी खेमे के दो नेता सुषमा स्वराज और राजनाथ सिंह के इर्द-गिर्द गठबंधन कायम किया जा सकेगा. इस तरह एक-दूसरे को खास पसंद ना करने के बावजूद नितिन गडकरी राजनाथ सिंह और सुषमा स्वराज ने पार्टी के नेतृत्व में बीजेपी के भीतर मोदी विरोधी खेमा खड़ा होना शुरू हुआ. इसे तब 'क्लब-160' के नाम से जाना जाने लगा. क्योंकि ये लोग 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को 160-70 सीट मिलने का अनुमान लगाए बैठे थे. 2014 के लोकसभा चुनाव ने इस क्लब की हवा निकाला दी. पिछले साढ़े चार साल में हर विधानसभा चुनाव में जीत के साथ ही यह क्लब और ज्यादा कमजोर होता चला गया.
2018 का दिसम्बर 'क्लब-160' के लिए पटलवार का मौका बनकर आया. हिंदी हार्टलैंड के तीन बड़े राज्यों में सत्ता गंवाने के बाद पार्टी के भीतर अमित शाह बैकफुट पर हैं. नतीजों के तुरंत बाद नितिन गडकरी ने शाह पर निशाना साधना शुरू कर दिया. पुणे में एक कार्यक्रम में उन्होंने इशारों ही इशारों में केन्द्रीय नेतृत्व को हार की जिम्मेदारी लेने की सलाह दे दी. बाद में उन्होंने अपने इस बयान पर सफाई भी दी. लेकिन तब तक डैमेज हो चुका था. इसके बाद उन्होंने नेहरु की तारीफ करके बीजेपी को संशय की स्थिति में डाल दिया. नितिन गडकरी एक तरफ अमित शाह के खिलाफ मोर्चा खोले हुए थे. शाह ने दूसरे मोर्चे पर अपनी स्थिति मजबूत करनी शुरू कर दी. 26 दिसंबर को अमित शाह ने एकसाथ 17 राज्यों के प्रभारी बदलने की घोषणा कर दी. प्रभारियों की इस लिस्ट में संघ के करीबी लोगों को दरकिनार किया गया. आइए इस लिस्ट पर एक नजर डालते हैं-
1. उत्तर प्रदेश
उत्तर प्रदेश बीजेपी के मिशन 2019 के लिए सबसे नाजुक मैदान है. पिछले लोकसभा चुनाव में बीजेपी को 80 में 71 सीटों पर सफलता हासिल हुई थी. उत्तर प्रदेश में बीजेपी का काफी-कुछ दांव पर लगा हुआ है. 2018 में हुए तीन लोकसभा उपचुनाव में बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा है. सपा-बसपा का गठबंधन बीजेपी के लिए नई चुनौती बनकर उभरा है. ऐसे में बीजेपी पूरी ताकत से आने वाले लोकसभा चुनाव की तैयारी में जुटी हुई है. अब तक यहां ओम प्रकाश माथुर प्रभारी हुआ करते थे. लोकसभा चुनाव से ठीक पहले यहां आलाकमान ने प्रभारी बदलने का निर्णय लिया है. कभी मोदी-शाह की जोड़ी के कड़े आलोचक रहे गोवर्धन झड़ापिया को यहां का प्रभारी बनाया है. उनका साथ देने के लिए दुष्यंत गौतम और नरोत्तम मिश्र को भी दिल्ली से उत्तर प्रदेश भेजा गया है. गोवर्धन झड़ापिया की नियुक्ति ने कई राजनीतिक विश्लेषकों को अचम्भे में डाल दिया.

गोवर्धन झड़ापिया.
गोवर्धन झड़ापिया 2002 में नरेंद्र मोदी के गृहमंत्री हुआ करते थे. उस समय नरेंद्र मोदी को दिल्ली से गुजरात भेजा गया था. वजह थी भुज के भूकंप के बाद केशुभाई पटेल ठीक तरीके से चीजें संभाल नहीं पा रहे थे. ऐसा मीडिया और लोगों को बताया गया. असल में नरेंद्र मोदी अपने दिल्ली प्रवास के दौरान केशुभाई के खिलाफ जमकर लॉबिंग कर रहे थे. आखिरकार संघ के इशारे पर केशुभाई की जगह उन्हें गुजरात का मुख्यमंत्री बनाया गया. उस समय समझौते के तहत केशुभाई के खेमे के गोवर्धन झड़पिया को गृह मंत्रालय दिया गया.
2002 के गुजरात दंगों के समय नरेंद्र मोदी की छवि लार्जर देन लाइफ नहीं बनी थी. सूबे के संगठन पर भी उनकी कमान ऐसी नहीं थे. उस समय विश्व हिंदू परिषद के नेता प्रवीण तोगड़िया की गुजरात सरकार में पर्याप्त दखल हुआ करती थी. मोदी के गुरात आने के साथ ही पार्टी के भीतर केशुभाई का खेमा उनके विरोध में खड़ा हो गया. गोवर्धन झड़ापिया, हरेन पंड्या, प्रवीण तोगड़िया और संघ का स्थानीय नेतृत्व नरेंद्र मोदी के खिलाफ खड़ा था. गोधरा दंगों के बाद गोवर्धन झड़ापिया और नरेंद्र मोदी के बीच गोधरा दंगों का चेहरा बनने की होड़ शुरू हो गई. 2002 में गुजरात विधानसभा चुनाव जीतने के बाद नरेंद्र मोदी ने झड़ापिया को किनारे लगाना शुरू किया. वो पिछली सरकार में गृहमंत्री हुआ करते थे. नई कैबिनेट में उन्हें जगह तक नहीं दी गई.
इसके बाद झड़ापिया और नरेंद्र मोदी के बीच रस्साकशी का दौर शुरू हुआ. 2007 में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले उन्होंने बीजेपी छोड़ दी. अपनी नई पार्टी बनाई महागुजरात जनता पार्टी. कांग्रेस के साथ गठबंधन किया. कुछ भी काम नहीं आया. पटेलों के बीच अच्छी पकड़ होने बावजूद उनका सियासी ग्राफ नीचे गिरता ही गया. इसके बाद केशुभाई पटेल का दामन थाम लिया. लेकिन यह कवायद भी काम नहीं आई. 2014 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले उन्होंने समझदारी भरा फैसला लिया. नरेंद्र मोदी के साथ मतभेद मिटाकर बीजेपी की सदस्यता ले ली. अब उन्हें उत्तर प्रदेश जैसा महत्वपूर्ण राज्य दिया गया है.
2. आंध्र प्रदेश
आंध्र प्रदेश में बीजेपी की उपस्थिति ना के बराबर है. 2014 के चुनाव में बीजेपी तेलगुदेशम पार्टी के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ी थी. इस चुनाव में उसे 25 में महज दो सीट हासिल हो सकी. फिलहाल यह गठबंधन टूट चुका है. बीजेपी के पास एक विकल्प यह भी है कि वो आने वाले चुनाव में जगन मोहन रेड्डी की पार्टी YRS कांग्रेस के साथ गठबंधन कर ले. अमित शाह ने इस राज्य में वी. मुरलीधरन को नया प्रभारी नियुक्त किया. इसके अलावा सुनील देवधर को सह प्रभारी की जिम्मेदारी दी गई है.
कौन हैं वी. मुरलीधरन?
वी. मुरलीधरन केरल के कन्नूर जिले कर रहने वाले हैं. यह जिला केरल में संघ और सीपीएम की खूनी जंग का मैदान बना हुआ है. मुरलीधरन स्कूल के जमाने से ही संघ की छात्र इकाई अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के सदस्य रहे हैं. आपातकाल के दौरन वो कन्नूर जिले की ABVP के सचिव थे. इस दौरन जेल भी गए. इनके राजनीतिक करियर में तीन ऐसे मौके हैं जिनकी बदौलत वो आज बीजेपी के केन्द्रीय नेतृत्व में अपनी जगह बनाने में कामयाब हुए. पहला मौक़ा 1980 का. उस समय इन्हें केरल की सीपीएम सरकार ने गिरफ्तार करवा लिया था. इस गिरफ्तारी के विरोध में दिल्ली में प्रदर्शन हुए. महज 25 साल की उम्र में मुरलीधरन केन्द्रीय नेतृत्व की नजर में आ गए.

वी. मुरलीधरन.
दूसरा मौक़ा है 1999 का. मुरलीधरन को मौका मिला चुनाव प्रचार में बैकरूम ऑपरेशन समझने का. उस समय मुरली वैंकया नायडू के असिस्टेंट हुआ करते थे. 1999 के लोकसभा चुनाव में ये दिल्ली में रहकर पार्टी के प्रचार अभियान शामिल रहे. तीसरा मौक़ा था 2014 का. लोकसभा चुनाव जीतने के बाद वी. मुरलीधरन को केरल में बीजेपी का अध्यक्ष बनाया गया. इनके कार्यकाल के दौरान बीजेपी की सदस्यता में बड़ा इजाफा देखा गया. पिछले चार साल में केरल में बीजेपी के सदस्यों की संख्या 5.75 से बढ़कर 20 लाख तक पहुंच गई. इन्हें जुलाई 2018 में ही आंध्र प्रदेश का प्रभारी बना दिया गया था.
सुनील देवधर
सुनील देवधर संघ की शाखा से बीजेपी में पहुंचने वाले नेता हैं. महाराष्ट्र से आने वाले देवधर 1994 में महज 20 साल की उम्र में संघ के प्रचारक हो गए थे. उस समय इन्हें शिलोंग भेजा गया था. देवधर की राजनीतिक पारी शुरू हुई 2009 में. नितिन गडकरी बीजेपी के अध्यक्ष थे. उस समय संघ कनेक्शन के चलते देवधर बीजेपी में आए. उन्हें नार्थ-ईस्ट कम्युनिकेशन सेल का मुखिया बनाया गया था. 2014 के लोकसभा चुनाव में वो वाराणसी सीट पर तैनात थे. नरेंद्र मोदी के चुनाव प्रचार की कमान संभाले हुए थे. यहां से वो अमित शाह की नजर में आए. महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के दौरान महाराष्ट्र के आदिवासी विस्तार वाले जिले पालघर की कमान इनके पास थी.

सुनील देवधर.
सुनील देवधर पहली बार राष्ट्रीय मीडिया की नज़रों में आए त्रिपुरा विधानसभा चुनाव के बाद. उन्हें 2015 में पार्टी की तरफ से त्रिपुरा की जिम्मेदारी सौंपी गई थी. त्रिपुरा के नतीजे में बीजेपी को प्रचंड बहुमत हसिल हुआ. यहां से लोगों ने देवधर की सियासी बाजीगरी को पहचाना. जिस पार्टी के पास पांच साल पहले सूबे में 2 फीसदी से कम वोट था. 50 में से 49 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हुई थी. वही पार्टी पांच साल में त्रिपुरा में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने में सफल रही थी.
आंध्र प्रदेश के दोनों प्रभारी संघ के कोटे से आते हैं. आंध्र प्रदेश कर्नाटक के बाद दूसरा एज़ा दक्षिणी राज्य है जहां बीजेपी अपने लिए संभावनाएं खोज रही है. देवधर और मुरलीधरन संगठन के काम में माहिर आदमी माने जाते हैं. बीजेपी को आंध्र प्रदेश में इसी चीज के सबसे ज्यादा दरकार है.
3. असम
बीजेपी ने महेंद्र कुमार सिंह को आने वाले लोकसभा चुनाव में प्रभारी बनाया गया है. महेंद्र कुमार सिंह का ताल्लुक उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले से है. राजनीति में आमद होने से पहले वो एक कॉलेज में बच्चों को पढाया करते थे. महेंद्र कुमार सिंह को 2013 में असम विधानसभा चुनाव से पहले वहां का प्रभारी बनाया गया था. 2016 के असम विधानसभा चुनाव में जीत के बाद उनका रसूक काफी तेजी से बढ़ा. 2017 में उत्तर प्रदेश में बीजेपी की जीत के बाद उन्हें विधान परिषद का सदस्य बनाया गया. वो फिलहाल उत्तर प्रदेश सरकार में ग्रामीण विकास मंत्री हैं. महेंद्र कुमार सिंह अमित शाह के करीबी लोगों में से माने जाते हैं. 2019 के लोकसभा चुनाव् में उन्हें असम का प्रभारी बनाया जाना स्वाभाविक चुनाव है.
4.बिहार
कभी ओपी माथुर के साथ उत्तर प्रदेश का प्रभार संभालने वाले भूपेंद्र यादव को आने वाले लोकसभा चुनाव में बिहार का प्रभारी बनाया गया है. हाल ही अमित शाह के आवास पर रामविलास पासवान, नितीश कुमार और अमित शाह की बैठक हुई थी. भूपेंद्र यादव इस मीटिंग में मौजूद थे. उस समय यह कयास लगने शुरू हो गए थे कि आने वाले चुनाव में बिहार की कमान भूपेंद्र यादव के हाथ में रहेगी. भूपेंद्र यादव बेहतरीन चुनाव मैनेजर माने जाते हैं. वो पिछले चार साल सूबे में बीजेपी के प्रभारी हैं.

भूपेंद्र यादव.
भूपेंद्र यादव राजस्थान के अजमेर के रहने वाले हैं. यहीं के सेंट पॉल स्कूल में उनकी शुरूआती पढ़ाई-लिखाई हुई है. इसके बाद राजनीति विज्ञान की पढ़ाई के लिए उन्होंने अजमेर के सरकारी कॉलेज में दाखिला ले लिया था. यहीं वो पहली मर्तबा संघ के संपर्क में आए. जन्मभूमि आंदोलन के दौर में वो अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के कारकून हुआ करते थे. पढ़ाई पूरी करने के बाद वो संघ के मजदूर संगठन अखिल भारतीय मजदूर संघ से जुड़ गए और गुड़गांव के औद्योगिक क्षेत्र में सक्रिय हो गए.
बीए की पढ़ाई के बाद वो संगठन में सक्रिय थे और साथ-साथ लॉ भी हो रही थी. इसी योग्यता के चलते उन्हें 2000 के साल में वकीलों के संगठन अखिल भारतीय अधिवक्ता महासंघ का महासचिव बना दिया गया. 2010 में यादव को बीजेपी का राष्ट्रीय सचिव बनाया गया. उस समय नितिन गडकरी बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हुआ करते थे. 2013 में राजनाथ सिंह के कार्यकाल के वक़्त भी वो इसी पद पर बने रहे. 2014 में अमित शाह के कमान संभालने के बाद उन्हें राष्ट्रीय महासचिव पद दिया गया. वो फिलहाल बिहार के प्रभारी हैं. बीजेपी के भीतर भूपेंद्र यादव की छवि इलेक्शन मैनेजर की है. गुजरात के हालिया विधानसभा चुनाव में भी उनकी सक्रिय भूमिका रही.
5.छत्तीसगढ़
हाल ही के विधानसभा चुनाव में यहां बीजेपी करारी हार का सामना करना पड़ा है. 15 साल सत्ता में रहने के बाद 2018 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी महज 15 सीट पर सिमट गई. इतनी बड़ी हार के बाद यह अनुमान लगाया जा रहा था कि सूबे में बीजेपी संगठन में बड़ा बदलाव हो सकता है. लेकिन अमित शाह ने अपने मात खाए हुए जनरैल को फिर से कमान सौंप दी है.

डॉ. अनिल जैन.
डॉ. अनिल जैन फिरोजाबाद उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं. लखनऊ से एमबीबीएस और सर्जरी की पढ़ाई की. नौकरी की तलाश में दिल्ली चले आए. बतरा हॉस्पिटल में बतौर सर्जन काम किया. लेकिन मन लगा नहीं. संघ के प्रचारक हो गए. झारखंड उस समय बिहार से अलग नहीं हुआ था. संघ के रस्ते राजनीति में आए. अमित शाह के बेहद करीबी आदमी माने जाते हैं. 2018 में उत्तर प्रदेश से राज्यसभा में भेज दिए गए. छत्तीसगढ़ के अलावा हरियाणा का प्रभार भी इनके पास ही है.
6.गुजरात
गुजरात नरेंद्र मोदी और अमित शाह दोनों का गृह राज्य है. 2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी किसी तरह यहां अपनी इज्जत बचा पाई थी. बीजेपी केन्द्रीय नेतृत्व ने अब इसे सूबे की कमान अपने सबसे अनुभवी आदमी ओम प्रकाश माथुर को दी है. माथुर इससे पहले उत्तर प्रदेश के प्रभारी हुआ करते थे. पिछले कुछ दिनों से खबर आ रही थी कि उत्तर प्रदेश में संगठन महासचिव सुनील बंसल और ओम माथुर के बीच अनबन की खबर आ रही थी. पिछले कई दिन से ओम माथुर की उत्तर प्रदेश में उपस्थिति ना के बराबर थी. विवाद इतना बढ़ गया था कि आलाकमान को कई मौकों पर माथुर की जगह भूपेंद्र यादव को उत्तर प्रदेश भेजना पड़ा था. आने वाले लोकसभा चुनाव में माथुर से प्रभार लिए जाने के कयास लंबे समय से लग रहे थे.

ओम माथुर.
ओम माथुर राजनीति के पुराने खिलाड़ी हैं. 1972 में संघ के प्रचारक हो गए थे. 1997-98 में उन्हें राजस्थान बीजेपी में संगठन सचिव बनाया गया था. यहां माथुर ने अपने सख्त मिजाजी की पहली नुमाइश की. उस समय सूबे के मुख्यमंत्री भैरो सिंह शेखावत हुआ करते थे. शेखावत के साथ उनका विवाद उस समय राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया. कहते हैं कि माथुर ने संघ का दबाव डलवाकर शेखावत को रोज सचिवालय जाने से पहले पार्टी कार्यालय पर हाजरी लगाने का पाबंद करवा दिया था.
ओम माथुर कमाल के पॉलिटिकल मैनेजर हैं. लेकिन उनकी चर्चा अक्सर उनके विवादों लेकर ही हुई है. भैरोसिंह शेखावत से विवाद के बाद वो वसुंधरा राजे के साथ विवाद के चलते चर्चा में रहे. इस बीच उनके जीवन में एक सुखद घटना हुई. वो 2007 के विधानसभा चुनाव के दौरान गुजरात के प्रभारी बने. इस दौरान उनकी करीबी नरेंद्र मोदी के साथ हुई. 2013 में नरेंद्र मोदी के पक्ष में उन्होंने संघ के भीतर जमकर लॉबिंग की. इसके चलते बिना किसी खास जनाधार के वो सत्ता के शीर्ष पर बने रहे. ओम माथुर बीजेपी संगठन के उन लोगों में से हैं जिन्हें नरेंद्र मोदी का भरोसा हासिल है. उत्तर प्रदेश बीजेपी के मिशन 2019 के लिए सबसे नाजुक कड़ी है. ऐसे में आलाकमान नहीं चाहता था कि लोकसभा चुनाव से ठीक पहले संगठन की सिरफुटव्वल जारी रहे. ऐसे में ओम माथुर को गुजरात की तरफ भेज दिया गया है.
7. हिमाचल प्रदेश
हिमाचल प्रदेश में बीजेपी सत्ता में होने के बावजूद खेमों में बंटी हुई है. प्रेम कुमार धूमल और शांता कुमार के बीच चल रहे शीत युद्ध में पार्टी को काफी नुक्सान उठाना पड़ रहा है. अब तक मंगल पांडे के पास सूबे का प्रभार था. अब आलाकमान ने यहां तीरथ सिंह रावत को नियुक्त किया है. तीरथ सिंह रावत 2013 से 2015 के बीच उत्तराखंड में बीजेपी के अध्यक्ष थे. इसके बाद इन्हें पार्टी ने केन्द्रीय नेतृत्व में ले लिया. फिलहाल वो पार्टी के राष्ट्रीय सचिव हैं. तीरथ सिंह रावत अपनी राजनीति की शुरुआत युवा मोर्चे से की. वो 1997 में पहली दफा विधायक चुने गए. हिमाचल प्रदेश में कुल चार लोकसभा सीट हैं. पिछले चुनाव में ये चारों सीट बीजेपी के खाते में गई थी.

तीरथ सिंह रावत.
8.झारखंड
दिसंबर 2014 में झारखंड में हुए विधानसभा चुनाव में बीजेपी को पूर्ण बहुमत हासिल हुआ. 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को कुल 14 लोकसभा में से 12 पर जीत हासिल हुई थी. 2019 के चुनाव में बीजेपी इस राज्य में अपने प्रदर्शन को बरक़रार रखना चाहेगी. आने वाले लोकसभा चुनाव में बीजेपी आलाकमान ने यहां की कमान मंगल पाण्डेय को सौंपी है. बिहार के सीवान जिले से आने वाले मंगल पाण्डेय 1989 में बीजेपी में आए थे. सूबे में बीजेपी के ब्राह्मण चेहरा माने जाते हैं. 2013 में इन्हें बिहार बीजेपी का अध्यक्ष बनाया गया था. 2017 के विधानसभा चुनाव में उन्हें हिमाचल का इंचार्ज बनाया गया था.
9. मध्य प्रदेश
मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में हार के बाद यहां सांगठनिक बदलाव लाजमी था. अब तक विनय सहस्त्रबुद्धे मध्य प्रदेश के प्रभारी थे. सहस्त्रबुद्धे संघ के आदमी थे. उन्हें नितिन गड़करी का करीबी माना जाता है. अगस्त 2018 से ही सहस्त्रबुद्धे के खिलाफ मध्य प्रदेश संगठन में बगावत के स्वर उठने शुरू हो गए थे. चुनावी हार के बाद सहस्त्रबुद्धे की विदाई तय मानी जा रही थी. उनकी जगह स्वतंत्रदेव सिंह को आलाकमान ने मध्य प्रदेश भेजा है. सतीश उपाध्याय को सिंह की मदद के लिए भेजा गया है. उपाध्याय मध्य प्रदेश के सहप्रभारी होंगे.

स्वतंत्रदेव सिंह.
स्वतंत्र देव सिंह
स्वतंत्र देव सिंह उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर के रहने वाले हैं. 1984 में अपने भाई श्रीपत सिंह के साथ बुन्देलखण्ड के उरई में आ गए थे. यहीं से उन्होंने अपनी राजनीति की शुरुआत की. सबसे पहले अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के टिकट पर उरई के डीवीसी कॉलेज से चुनाव लड़े. हार का सामना करना पड़ा. विद्यार्थी परिषद से जुड़ाव बना रहा. स्वतंत्र देव सिंह को पहला राजनीतिक ब्रेक मिला मंदिर आंदोलन के समय. उरई में रहते हुए वो स्थानीय अखबार स्वतंत्र भारत में काम भी किया करते थे. इसी अखबार में उन्होंने फायरब्रांड हिंदुत्ववादी नेता विनय कटियार का एक इंटरव्यू छापा. इस तरह कटियार के साथ करीबी बढ़ गई. कटियार के कहने पर 1992 में झांसी चले गए. संगठन का काम देखने के लिए. अब तक इनका नाम कांग्रेस सिंह हुआ करता था. संघ के पदाधिकारियों के कहने पर नाम बदल कर स्वतंत्र देव सिंह रख लिया.
दूसरा बड़ा राजनीतिक ब्रेक मिला 2012 में. सूबे में बीजेपी के महामंत्री बने. जालौन की कालपी सीट से चुनाव भी लड़ा. जमानत तक नहीं बची. किस्मत चमकी 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान. अमित शाह उत्तर प्रदेश के प्रभारी हुआ करते थे. स्वतंत्र देव सिंह टीम अमित शाह में शामिल किए गए. संगठन के काम का अनुभव काम आया. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में तैनात कर दिए गए. नतीजा यह हुआ कि सहारनपुर जैसी मुश्किल सीट भी बीजेपी के खाते में गई. 2017 के विधानसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी की हर चुनावी रैली का मैनेजमेंट इनके हाथ में था. हर मोर्चे पर खुद को साबित किया. विधानसभा चुनाव के बाद इन्हें विधान परिषद भेज दिया गया. अमित शाह से करीबी की वजह से मुख्यमंत्री पद के दावेदार भी बताए गए. फिलहाल सूबे की सरकार में मंत्री हैं. उन्हें अब मध्य प्रदेश की कमान सौंपी गई है.
सतीश उपाध्याय
सतीश उपाध्याय छात्रसंघ के दफ्तर से राजनीति में आने वाले नेता हैं. 1982 में वो ABVP के टिकट पर दिल्ली यूनिवर्सिटी छात्रसंघ के उपाध्यक्ष चुने गए थे. 2012 तक इनकी राजनीति म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन तक ही सिमटी रही. 2014 में डॉ. हर्ष वर्धन के लोकसभा चले जाने के बाद उपाध्याय को दिल्ली बीजेपी की कमान सौंपी गई थी. 2015 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में बीजेपी को उनके नेतृत्व में हार का सामना पड़ा था. नवंबर 2016 में उन्हें यह पद छोड़ना पड़ा था.
10. मणिपुर और नागालैंड
किसी दौर में उत्त्तर-पूर्व के मोर्चे पर कांग्रेसी झंडा लहराता था. इस समय उत्त्तर-पूर्व के सभी सात राज्यों में बीजेपी या बीजेपी गठबंधन सत्ता में हैं. उत्त्तर-पूर्व के सात राज्य अपने 23 प्रतिनिधि लोकसभा में भेजते हैं. इस समय बीजेपी गठबंधन के पास 23 में से 11 सीट हैं. वहीं कांग्रेस की गिनती 6 पर सिमटी हुई है. पिछले चार साल में बीजेपी ने यहां अपनी पकड़ तेजी से मजबूत की है. उत्तर-पूर्व में बीजेपी अपने स्कोर को और दुरुस्त करना चाहती है. सुनील देवधर को उत्तर-पूर्व से आंध्र भेजने के बाद आलाकमान ने नालिक कोहली को उत्तर पूर्व के दो राज्यों की जिम्मेदारी सौंपी है.

नलिन कोहली.
नालिल कोहली पेशे से वकील हैं. सुप्रीम कोर्ट में अपने मुवक्किलों के पक्ष में जिरह करते हैं और टीवी पर बीजेपी के पक्ष में. बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं. आइडियोलोग किस्म के आदमी हैं. अब उत्तर-पूर्व के दो राज्य दिए गए हैं. यहां से लोकसभा की महज 3 सीट आती हैं. पिछले चुनाव में यह गठबंधन के पार्टनर के पास थी.
11. ओडिशा
ओडिशा में बीजेपी अपने लिए जमीन तैयार करने के लिए हाथ-पांव मार रही है. 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के दौरान 21 में 20 सीटें बीजू जनता दल के खाते में चली गई थीं. एक सीट बीजेपी के खाते में आई थी. बीजू पटनायक के बेटे नवीन पटनायक पिछले 18 साल से सूबे के मुख्यमंत्री हैं. यहां विधानसभा चुनाव लोकसभा के साथ ही होते हैं. 2014 में हुए विधानसभा चुनाव में कुल 147 सीट में से 117 बीजू जनता दल के खाते में गई थीं. कांग्रेस के खाते में 16 और बीजेपी के खाते में 10 सीते आई थीं. वोट शेयर के लिहाज से BJD के पास 43, कांग्रेस के पास 25 और बीजेपी के पास 18 फीसदी सीट हैं. कुल मिलाकर ओडिशा बीजेपी के लिए मुश्किल मैदान है.

अरुण सिंह.
अरुण सिंह उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर के रहने वाले हैं. बीजेपी युवा मोर्चा से सियासत की शुरुआत की. 2013 में ओडिशा चुनाव से पहले ओडिशा के सहप्रभारी बनाए गए थे. 2014 के चुनाव के बाद प्रभार इन्हें सौंप दिया गया. 2017 के पंचायत चुनाव में बीजेपी का प्रदर्शन चौंकाने वाला था. 2012 के पंचायत चुनाव में 854 में से महज 36 सीट बीजेपी के खाते में आई थीं. यह आंकड़ा 2017 में बढ़कर 297 पर पहुंच गई. इसे उस समय अरुण सिंह की बड़ी कामयाबी के तौर पर देखा गया था. आने वाले लोकसभा और विधानसभा चुनाव की कमान उनके हाथ में रहेगी.
12.पंजाब
पंजाब में अब तक बीजेपी अकाली दल के जूनियर पार्टनर के तौर पर लड़ती आई है. पिछले लोकसभा चुनाव में बीजेपी को यहां 13 में महज दो सीटें हासिल हुई थीं. कांग्रेस के खाते में 3, आप के खाते में 4 और अकाली दल के खाते में 4 सीटें थीं. पंजाब में बीजेपी के साथ बड़ी दिक्कत यह है कि सिख बहुसंख्यक राज्य में 'हिन्दुत्ववादी पार्टी' होने के वजह से उसकी अपील बहुत सीमित है. इस वजह से यहां अकाली दल पर उसकी निर्भरता अब भी बनी हुई है. हालांकि 1984 के सिख विरोधी दंगों पर आए कोर्ट के फैसले को बीजेपी अपने पक्ष में भुनाने का प्रयास जरुर करेगी. नवजोत सिंह सिद्धू इस सूबे में बीजेपी का जाना-पहचाना चेहरा हुआ करते थे. अब वो कांग्रेस में जा चुके हैं.

कैप्टन अभिमन्यु.
आने वाले लोकसभा चुनाव में बीजेपी आलाकमान ने कैप्टन अभिमन्यु को यहां का प्रभारी बनाया है. अभिमन्यु बगल के राज्य हरियाणा से आते हैं. वो 2012 के पंजाब विधानसभा चुनाव के वक़्त पंजाब के सह-प्रभारी हुआ करते थे. उस समय बीजेपी-अकाली गठबंधन ने लगातार दूसरी बार सत्ता हासिल करके इतिहास बदल दिया था. इसके बाद उनकी सांगठनिक क्षमता को देखते हुए उन्हें 2013 में उत्तर प्रदेश का सहप्रभारी बनाया गया था. पंजाब में बीजेपी को कैप्टन अमरिंदर सिंह की वजह से कड़ी चुनौती मिल रही है. पस्तहाल संगठन के साथ बीजेपी को खड़ा करना अभिमन्यु के लिए बड़ी चुनौती होगा.
13. राजस्थान
राजस्थान में बीजेपी क्षेत्रीय क्षत्रपों की वजह से परेशानी का सामना कर रही है. अमित शाह और वसुंधरा राजे की अदावत जगजाहिर है. बीजेपी के भीतर राजे विरोधी गुट का दावा है कि अगर विधानसभा चुनाव से पहले मुख्यमंत्री का चेहरा बदल दिया जाता तो शायद नतीजा बीजेपी के पक्ष में जा सकता था. सूबे में बीजेपी धड़ेबाजी का शिकार है. कयास यह लागे जा रहे थे कि विधानसभा चुनाव में हार के बाद वसुंधरा राजे को किनारे लगा दिया जाएगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

प्रकाश जावडेकर.
2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को रास्थान की सभी 25 सीटों पर जीत हासिल हुई थी. विधानसभा चुनाव में हार के बाद बीजेपी बैकफुट पर है. विधानसभा चुनाव से पहले केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर को राजस्थान का प्रभारी बनाया गया था. आलाकमान लोकसभा चुनाव से पहले राजस्थान में किसी भी किस्म का खून-खराबा नहीं चाहता है.जावड़ेकर किसी समय वसुंधरा के साथ बीजेपी के आडवाणी खेमे में हुआ करते थे. वो एक साथ संघ और वसुंधरा दोनों को साध सकते हैं.
14. तेलंगाना
तेलंगाना में हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव में केसी चंद्रशेखर राव की पार्टी तेलंगाना राष्ट्र समिति ने विपक्ष का सूपड़ा साफ़ कर दिया. 119 सीटों वाली विधानसभा में टीआरएस को 88 सीट हासिल हुई. कांग्रेस 19 सीटों के साथ दूसरे स्थान पर रही. बीजेपी को इस चुनाव में 4 सीटों का नुक्सान झेलना पड़ा और उसकी गिनती महज 1 सीट पर आ गई. 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को तेलंगाना की 17 लोकसभा सीटों में से महज एक सीट मिली थी.

अरविंद लिम्बावली.
बीजेपी आलाकमान ने तेलंगाना की कमान अरविंद लिम्बावली के हाथ में दी है. अरविन्द कर्नाटक के रहने वाले हैं. संघ की शाखा से बीजेपी में आने वाले नेता हैं. छात्र राजनीति में सक्रिय रहे हैं. ABVP के राष्ट्रीय महासचिव हुआ करते थे. उस दौरान क्लासिक कंप्यूटर घोटाला हुआ था कर्नाटक में. अरविन्द के नेतृत्व में छात्रों का 'सेव कैंपस' आन्दोलन चला था.मुख्यमंत्री एस.बंगारप्पा को इस्तीफ़ा देना पड़ा था. 'कश्मीर चलो' आंदोलन के दौरान भी सक्रिय रहे. संघ के आदमी माने जाते हैं. फिलहाल तेलंगाना की जिम्मेदारी मिली है.
15. उत्तराखंड
2014 के लोकसभा चुनाव में उत्तराखंड की सभी पांचों सीट बीजेपी के खाते में गई थी. इस बार बीजेपी अपने स्कोर को बरकरार रखने की उम्मीद कर रही है. खास तौर पर जब सूबे में वो सत्ता में है. सूबे की कुल 70 विधानसभा सीटो में से 57 बीजेपी के पास है. 2016 में विधानसभा चुनाव से पहले जेपी नड्डा और धर्मेंद्र प्रधान को उत्तराखंड का प्रभारी बनाया गया था. 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले यह जिम्मेदारी थांवरचाँद गहलोत को सौंपी गई है. थांवरचंद मध्यप्रदेश से आते हैं. 1996 से 2009 तक वो मध्य प्रदेश की शाजापुर सीट से सांसद हुआ करते थे. 2012 में उन्हें मध्य प्रदेश से राज्यसभा में भेज दिया गया था. 26 दिसंबर से पहले वो हिमाचल के प्रभारी हुआ करते थे. अब उन्हें उत्तराखंड भेजा गया है. गहलोत मोदी-अमित शाह के करीबी माने जाते हैं. 2014 में सामाजिक न्याय मंत्रालय दिया गया था. बाद में मंत्रिमंडल में फेरबदल के चलते उन्हें मंत्रालय छोड़ना पड़ा था.
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दिल्ली में उस समय कांग्रेस का राज था. बीजेपी की बागडोर नितिन गड़करी के हाथ में हुआ करती थी. कहते हैं कि उस समय नितिन गडकरी एक मुलाकात के लिए अमित शाह को घंटो बैठाए रखते थे. वो अमित शाह का बुरा दौर था. समय का पहिया बदला. 2014 के लोकसभा चुनाव के वक़्त बीजेपी भले ही पार्टी के अध्यक्ष राजनाथ सिंह रहे हों लेकिन प्रचार अभियान की पूरी जिम्मेदारी अमित शाह के कंधों पर ही थीं. 2014 के लोकसभा चुनाव में मिली जीत ने सत्ता के समीकरण पूरी तरह से बदल दिए. अब नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी सत्ता के शीर्ष पर थी. नितिन गडकरी की हैसियत पार्टी में संघ के नुमाइंदगे तक सिमट कर रह गई. अमित शाह 2010-2012 के बीच नितिन गडकरी के बर्ताव को भूले नहीं थे. अपमान की खरोंचे अब भी दिमाग में मौजूद थीं.
2014 के लोकसभा चुनाव से पहले जून 2013 में बीजेपी का गोवा अधिवेशन हुआ. इस अधिवेशन में नरेंद्र मोदी को पार्टी का चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष घोषित किया गया. फिर सितंबर 2013 में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया गया. इस उठा-पटक को उस समय पार्टी के भीतर आडवानी खेमे के आत्मसमर्पण के तौर पर देखा गया. दरअसल यह आत्मसमर्पण की बजाए 'टेक्टिकल रीट्रीट' था. उस समय बीजेपी के भीतर एक खेमा यह मानकर बैठा था कि नरेंद्र मोदी अपने दम पर कभी भी पूर्ण बहुमत हासिल नहीं कर पाएंगे. खिचड़ी लोकसभा की स्थिति में उन्हें अपने लिए समर्थन जुटाने में दिक्कत पेश आएगी. ऐसी स्थिति में आडवाणी खेमे के दो नेता सुषमा स्वराज और राजनाथ सिंह के इर्द-गिर्द गठबंधन कायम किया जा सकेगा. इस तरह एक-दूसरे को खास पसंद ना करने के बावजूद नितिन गडकरी राजनाथ सिंह और सुषमा स्वराज ने पार्टी के नेतृत्व में बीजेपी के भीतर मोदी विरोधी खेमा खड़ा होना शुरू हुआ. इसे तब 'क्लब-160' के नाम से जाना जाने लगा. क्योंकि ये लोग 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को 160-70 सीट मिलने का अनुमान लगाए बैठे थे. 2014 के लोकसभा चुनाव ने इस क्लब की हवा निकाला दी. पिछले साढ़े चार साल में हर विधानसभा चुनाव में जीत के साथ ही यह क्लब और ज्यादा कमजोर होता चला गया.
2018 का दिसम्बर 'क्लब-160' के लिए पटलवार का मौका बनकर आया. हिंदी हार्टलैंड के तीन बड़े राज्यों में सत्ता गंवाने के बाद पार्टी के भीतर अमित शाह बैकफुट पर हैं. नतीजों के तुरंत बाद नितिन गडकरी ने शाह पर निशाना साधना शुरू कर दिया. पुणे में एक कार्यक्रम में उन्होंने इशारों ही इशारों में केन्द्रीय नेतृत्व को हार की जिम्मेदारी लेने की सलाह दे दी. बाद में उन्होंने अपने इस बयान पर सफाई भी दी. लेकिन तब तक डैमेज हो चुका था. इसके बाद उन्होंने नेहरु की तारीफ करके बीजेपी को संशय की स्थिति में डाल दिया. नितिन गडकरी एक तरफ अमित शाह के खिलाफ मोर्चा खोले हुए थे. शाह ने दूसरे मोर्चे पर अपनी स्थिति मजबूत करनी शुरू कर दी. 26 दिसंबर को अमित शाह ने एकसाथ 17 राज्यों के प्रभारी बदलने की घोषणा कर दी. प्रभारियों की इस लिस्ट में संघ के करीबी लोगों को दरकिनार किया गया. आइए इस लिस्ट पर एक नजर डालते हैं-
1. उत्तर प्रदेश
उत्तर प्रदेश बीजेपी के मिशन 2019 के लिए सबसे नाजुक मैदान है. पिछले लोकसभा चुनाव में बीजेपी को 80 में 71 सीटों पर सफलता हासिल हुई थी. उत्तर प्रदेश में बीजेपी का काफी-कुछ दांव पर लगा हुआ है. 2018 में हुए तीन लोकसभा उपचुनाव में बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा है. सपा-बसपा का गठबंधन बीजेपी के लिए नई चुनौती बनकर उभरा है. ऐसे में बीजेपी पूरी ताकत से आने वाले लोकसभा चुनाव की तैयारी में जुटी हुई है. अब तक यहां ओम प्रकाश माथुर प्रभारी हुआ करते थे. लोकसभा चुनाव से ठीक पहले यहां आलाकमान ने प्रभारी बदलने का निर्णय लिया है. कभी मोदी-शाह की जोड़ी के कड़े आलोचक रहे गोवर्धन झड़ापिया को यहां का प्रभारी बनाया है. उनका साथ देने के लिए दुष्यंत गौतम और नरोत्तम मिश्र को भी दिल्ली से उत्तर प्रदेश भेजा गया है. गोवर्धन झड़ापिया की नियुक्ति ने कई राजनीतिक विश्लेषकों को अचम्भे में डाल दिया.

गोवर्धन झड़ापिया.
गोवर्धन झड़ापिया 2002 में नरेंद्र मोदी के गृहमंत्री हुआ करते थे. उस समय नरेंद्र मोदी को दिल्ली से गुजरात भेजा गया था. वजह थी भुज के भूकंप के बाद केशुभाई पटेल ठीक तरीके से चीजें संभाल नहीं पा रहे थे. ऐसा मीडिया और लोगों को बताया गया. असल में नरेंद्र मोदी अपने दिल्ली प्रवास के दौरान केशुभाई के खिलाफ जमकर लॉबिंग कर रहे थे. आखिरकार संघ के इशारे पर केशुभाई की जगह उन्हें गुजरात का मुख्यमंत्री बनाया गया. उस समय समझौते के तहत केशुभाई के खेमे के गोवर्धन झड़पिया को गृह मंत्रालय दिया गया.
2002 के गुजरात दंगों के समय नरेंद्र मोदी की छवि लार्जर देन लाइफ नहीं बनी थी. सूबे के संगठन पर भी उनकी कमान ऐसी नहीं थे. उस समय विश्व हिंदू परिषद के नेता प्रवीण तोगड़िया की गुजरात सरकार में पर्याप्त दखल हुआ करती थी. मोदी के गुरात आने के साथ ही पार्टी के भीतर केशुभाई का खेमा उनके विरोध में खड़ा हो गया. गोवर्धन झड़ापिया, हरेन पंड्या, प्रवीण तोगड़िया और संघ का स्थानीय नेतृत्व नरेंद्र मोदी के खिलाफ खड़ा था. गोधरा दंगों के बाद गोवर्धन झड़ापिया और नरेंद्र मोदी के बीच गोधरा दंगों का चेहरा बनने की होड़ शुरू हो गई. 2002 में गुजरात विधानसभा चुनाव जीतने के बाद नरेंद्र मोदी ने झड़ापिया को किनारे लगाना शुरू किया. वो पिछली सरकार में गृहमंत्री हुआ करते थे. नई कैबिनेट में उन्हें जगह तक नहीं दी गई.
इसके बाद झड़ापिया और नरेंद्र मोदी के बीच रस्साकशी का दौर शुरू हुआ. 2007 में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले उन्होंने बीजेपी छोड़ दी. अपनी नई पार्टी बनाई महागुजरात जनता पार्टी. कांग्रेस के साथ गठबंधन किया. कुछ भी काम नहीं आया. पटेलों के बीच अच्छी पकड़ होने बावजूद उनका सियासी ग्राफ नीचे गिरता ही गया. इसके बाद केशुभाई पटेल का दामन थाम लिया. लेकिन यह कवायद भी काम नहीं आई. 2014 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले उन्होंने समझदारी भरा फैसला लिया. नरेंद्र मोदी के साथ मतभेद मिटाकर बीजेपी की सदस्यता ले ली. अब उन्हें उत्तर प्रदेश जैसा महत्वपूर्ण राज्य दिया गया है.
2. आंध्र प्रदेश
आंध्र प्रदेश में बीजेपी की उपस्थिति ना के बराबर है. 2014 के चुनाव में बीजेपी तेलगुदेशम पार्टी के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ी थी. इस चुनाव में उसे 25 में महज दो सीट हासिल हो सकी. फिलहाल यह गठबंधन टूट चुका है. बीजेपी के पास एक विकल्प यह भी है कि वो आने वाले चुनाव में जगन मोहन रेड्डी की पार्टी YRS कांग्रेस के साथ गठबंधन कर ले. अमित शाह ने इस राज्य में वी. मुरलीधरन को नया प्रभारी नियुक्त किया. इसके अलावा सुनील देवधर को सह प्रभारी की जिम्मेदारी दी गई है.
कौन हैं वी. मुरलीधरन?
वी. मुरलीधरन केरल के कन्नूर जिले कर रहने वाले हैं. यह जिला केरल में संघ और सीपीएम की खूनी जंग का मैदान बना हुआ है. मुरलीधरन स्कूल के जमाने से ही संघ की छात्र इकाई अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के सदस्य रहे हैं. आपातकाल के दौरन वो कन्नूर जिले की ABVP के सचिव थे. इस दौरन जेल भी गए. इनके राजनीतिक करियर में तीन ऐसे मौके हैं जिनकी बदौलत वो आज बीजेपी के केन्द्रीय नेतृत्व में अपनी जगह बनाने में कामयाब हुए. पहला मौक़ा 1980 का. उस समय इन्हें केरल की सीपीएम सरकार ने गिरफ्तार करवा लिया था. इस गिरफ्तारी के विरोध में दिल्ली में प्रदर्शन हुए. महज 25 साल की उम्र में मुरलीधरन केन्द्रीय नेतृत्व की नजर में आ गए.

वी. मुरलीधरन.
दूसरा मौक़ा है 1999 का. मुरलीधरन को मौका मिला चुनाव प्रचार में बैकरूम ऑपरेशन समझने का. उस समय मुरली वैंकया नायडू के असिस्टेंट हुआ करते थे. 1999 के लोकसभा चुनाव में ये दिल्ली में रहकर पार्टी के प्रचार अभियान शामिल रहे. तीसरा मौक़ा था 2014 का. लोकसभा चुनाव जीतने के बाद वी. मुरलीधरन को केरल में बीजेपी का अध्यक्ष बनाया गया. इनके कार्यकाल के दौरान बीजेपी की सदस्यता में बड़ा इजाफा देखा गया. पिछले चार साल में केरल में बीजेपी के सदस्यों की संख्या 5.75 से बढ़कर 20 लाख तक पहुंच गई. इन्हें जुलाई 2018 में ही आंध्र प्रदेश का प्रभारी बना दिया गया था.
सुनील देवधर
सुनील देवधर संघ की शाखा से बीजेपी में पहुंचने वाले नेता हैं. महाराष्ट्र से आने वाले देवधर 1994 में महज 20 साल की उम्र में संघ के प्रचारक हो गए थे. उस समय इन्हें शिलोंग भेजा गया था. देवधर की राजनीतिक पारी शुरू हुई 2009 में. नितिन गडकरी बीजेपी के अध्यक्ष थे. उस समय संघ कनेक्शन के चलते देवधर बीजेपी में आए. उन्हें नार्थ-ईस्ट कम्युनिकेशन सेल का मुखिया बनाया गया था. 2014 के लोकसभा चुनाव में वो वाराणसी सीट पर तैनात थे. नरेंद्र मोदी के चुनाव प्रचार की कमान संभाले हुए थे. यहां से वो अमित शाह की नजर में आए. महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के दौरान महाराष्ट्र के आदिवासी विस्तार वाले जिले पालघर की कमान इनके पास थी.

सुनील देवधर.
सुनील देवधर पहली बार राष्ट्रीय मीडिया की नज़रों में आए त्रिपुरा विधानसभा चुनाव के बाद. उन्हें 2015 में पार्टी की तरफ से त्रिपुरा की जिम्मेदारी सौंपी गई थी. त्रिपुरा के नतीजे में बीजेपी को प्रचंड बहुमत हसिल हुआ. यहां से लोगों ने देवधर की सियासी बाजीगरी को पहचाना. जिस पार्टी के पास पांच साल पहले सूबे में 2 फीसदी से कम वोट था. 50 में से 49 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हुई थी. वही पार्टी पांच साल में त्रिपुरा में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने में सफल रही थी.
आंध्र प्रदेश के दोनों प्रभारी संघ के कोटे से आते हैं. आंध्र प्रदेश कर्नाटक के बाद दूसरा एज़ा दक्षिणी राज्य है जहां बीजेपी अपने लिए संभावनाएं खोज रही है. देवधर और मुरलीधरन संगठन के काम में माहिर आदमी माने जाते हैं. बीजेपी को आंध्र प्रदेश में इसी चीज के सबसे ज्यादा दरकार है.
3. असम
बीजेपी ने महेंद्र कुमार सिंह को आने वाले लोकसभा चुनाव में प्रभारी बनाया गया है. महेंद्र कुमार सिंह का ताल्लुक उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले से है. राजनीति में आमद होने से पहले वो एक कॉलेज में बच्चों को पढाया करते थे. महेंद्र कुमार सिंह को 2013 में असम विधानसभा चुनाव से पहले वहां का प्रभारी बनाया गया था. 2016 के असम विधानसभा चुनाव में जीत के बाद उनका रसूक काफी तेजी से बढ़ा. 2017 में उत्तर प्रदेश में बीजेपी की जीत के बाद उन्हें विधान परिषद का सदस्य बनाया गया. वो फिलहाल उत्तर प्रदेश सरकार में ग्रामीण विकास मंत्री हैं. महेंद्र कुमार सिंह अमित शाह के करीबी लोगों में से माने जाते हैं. 2019 के लोकसभा चुनाव् में उन्हें असम का प्रभारी बनाया जाना स्वाभाविक चुनाव है.
4.बिहार
कभी ओपी माथुर के साथ उत्तर प्रदेश का प्रभार संभालने वाले भूपेंद्र यादव को आने वाले लोकसभा चुनाव में बिहार का प्रभारी बनाया गया है. हाल ही अमित शाह के आवास पर रामविलास पासवान, नितीश कुमार और अमित शाह की बैठक हुई थी. भूपेंद्र यादव इस मीटिंग में मौजूद थे. उस समय यह कयास लगने शुरू हो गए थे कि आने वाले चुनाव में बिहार की कमान भूपेंद्र यादव के हाथ में रहेगी. भूपेंद्र यादव बेहतरीन चुनाव मैनेजर माने जाते हैं. वो पिछले चार साल सूबे में बीजेपी के प्रभारी हैं.

भूपेंद्र यादव.
भूपेंद्र यादव राजस्थान के अजमेर के रहने वाले हैं. यहीं के सेंट पॉल स्कूल में उनकी शुरूआती पढ़ाई-लिखाई हुई है. इसके बाद राजनीति विज्ञान की पढ़ाई के लिए उन्होंने अजमेर के सरकारी कॉलेज में दाखिला ले लिया था. यहीं वो पहली मर्तबा संघ के संपर्क में आए. जन्मभूमि आंदोलन के दौर में वो अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के कारकून हुआ करते थे. पढ़ाई पूरी करने के बाद वो संघ के मजदूर संगठन अखिल भारतीय मजदूर संघ से जुड़ गए और गुड़गांव के औद्योगिक क्षेत्र में सक्रिय हो गए.
बीए की पढ़ाई के बाद वो संगठन में सक्रिय थे और साथ-साथ लॉ भी हो रही थी. इसी योग्यता के चलते उन्हें 2000 के साल में वकीलों के संगठन अखिल भारतीय अधिवक्ता महासंघ का महासचिव बना दिया गया. 2010 में यादव को बीजेपी का राष्ट्रीय सचिव बनाया गया. उस समय नितिन गडकरी बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हुआ करते थे. 2013 में राजनाथ सिंह के कार्यकाल के वक़्त भी वो इसी पद पर बने रहे. 2014 में अमित शाह के कमान संभालने के बाद उन्हें राष्ट्रीय महासचिव पद दिया गया. वो फिलहाल बिहार के प्रभारी हैं. बीजेपी के भीतर भूपेंद्र यादव की छवि इलेक्शन मैनेजर की है. गुजरात के हालिया विधानसभा चुनाव में भी उनकी सक्रिय भूमिका रही.
5.छत्तीसगढ़
हाल ही के विधानसभा चुनाव में यहां बीजेपी करारी हार का सामना करना पड़ा है. 15 साल सत्ता में रहने के बाद 2018 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी महज 15 सीट पर सिमट गई. इतनी बड़ी हार के बाद यह अनुमान लगाया जा रहा था कि सूबे में बीजेपी संगठन में बड़ा बदलाव हो सकता है. लेकिन अमित शाह ने अपने मात खाए हुए जनरैल को फिर से कमान सौंप दी है.

डॉ. अनिल जैन.
डॉ. अनिल जैन फिरोजाबाद उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं. लखनऊ से एमबीबीएस और सर्जरी की पढ़ाई की. नौकरी की तलाश में दिल्ली चले आए. बतरा हॉस्पिटल में बतौर सर्जन काम किया. लेकिन मन लगा नहीं. संघ के प्रचारक हो गए. झारखंड उस समय बिहार से अलग नहीं हुआ था. संघ के रस्ते राजनीति में आए. अमित शाह के बेहद करीबी आदमी माने जाते हैं. 2018 में उत्तर प्रदेश से राज्यसभा में भेज दिए गए. छत्तीसगढ़ के अलावा हरियाणा का प्रभार भी इनके पास ही है.
6.गुजरात
गुजरात नरेंद्र मोदी और अमित शाह दोनों का गृह राज्य है. 2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी किसी तरह यहां अपनी इज्जत बचा पाई थी. बीजेपी केन्द्रीय नेतृत्व ने अब इसे सूबे की कमान अपने सबसे अनुभवी आदमी ओम प्रकाश माथुर को दी है. माथुर इससे पहले उत्तर प्रदेश के प्रभारी हुआ करते थे. पिछले कुछ दिनों से खबर आ रही थी कि उत्तर प्रदेश में संगठन महासचिव सुनील बंसल और ओम माथुर के बीच अनबन की खबर आ रही थी. पिछले कई दिन से ओम माथुर की उत्तर प्रदेश में उपस्थिति ना के बराबर थी. विवाद इतना बढ़ गया था कि आलाकमान को कई मौकों पर माथुर की जगह भूपेंद्र यादव को उत्तर प्रदेश भेजना पड़ा था. आने वाले लोकसभा चुनाव में माथुर से प्रभार लिए जाने के कयास लंबे समय से लग रहे थे.

ओम माथुर.
ओम माथुर राजनीति के पुराने खिलाड़ी हैं. 1972 में संघ के प्रचारक हो गए थे. 1997-98 में उन्हें राजस्थान बीजेपी में संगठन सचिव बनाया गया था. यहां माथुर ने अपने सख्त मिजाजी की पहली नुमाइश की. उस समय सूबे के मुख्यमंत्री भैरो सिंह शेखावत हुआ करते थे. शेखावत के साथ उनका विवाद उस समय राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया. कहते हैं कि माथुर ने संघ का दबाव डलवाकर शेखावत को रोज सचिवालय जाने से पहले पार्टी कार्यालय पर हाजरी लगाने का पाबंद करवा दिया था.
ओम माथुर कमाल के पॉलिटिकल मैनेजर हैं. लेकिन उनकी चर्चा अक्सर उनके विवादों लेकर ही हुई है. भैरोसिंह शेखावत से विवाद के बाद वो वसुंधरा राजे के साथ विवाद के चलते चर्चा में रहे. इस बीच उनके जीवन में एक सुखद घटना हुई. वो 2007 के विधानसभा चुनाव के दौरान गुजरात के प्रभारी बने. इस दौरान उनकी करीबी नरेंद्र मोदी के साथ हुई. 2013 में नरेंद्र मोदी के पक्ष में उन्होंने संघ के भीतर जमकर लॉबिंग की. इसके चलते बिना किसी खास जनाधार के वो सत्ता के शीर्ष पर बने रहे. ओम माथुर बीजेपी संगठन के उन लोगों में से हैं जिन्हें नरेंद्र मोदी का भरोसा हासिल है. उत्तर प्रदेश बीजेपी के मिशन 2019 के लिए सबसे नाजुक कड़ी है. ऐसे में आलाकमान नहीं चाहता था कि लोकसभा चुनाव से ठीक पहले संगठन की सिरफुटव्वल जारी रहे. ऐसे में ओम माथुर को गुजरात की तरफ भेज दिया गया है.
7. हिमाचल प्रदेश
हिमाचल प्रदेश में बीजेपी सत्ता में होने के बावजूद खेमों में बंटी हुई है. प्रेम कुमार धूमल और शांता कुमार के बीच चल रहे शीत युद्ध में पार्टी को काफी नुक्सान उठाना पड़ रहा है. अब तक मंगल पांडे के पास सूबे का प्रभार था. अब आलाकमान ने यहां तीरथ सिंह रावत को नियुक्त किया है. तीरथ सिंह रावत 2013 से 2015 के बीच उत्तराखंड में बीजेपी के अध्यक्ष थे. इसके बाद इन्हें पार्टी ने केन्द्रीय नेतृत्व में ले लिया. फिलहाल वो पार्टी के राष्ट्रीय सचिव हैं. तीरथ सिंह रावत अपनी राजनीति की शुरुआत युवा मोर्चे से की. वो 1997 में पहली दफा विधायक चुने गए. हिमाचल प्रदेश में कुल चार लोकसभा सीट हैं. पिछले चुनाव में ये चारों सीट बीजेपी के खाते में गई थी.

तीरथ सिंह रावत.
8.झारखंड
दिसंबर 2014 में झारखंड में हुए विधानसभा चुनाव में बीजेपी को पूर्ण बहुमत हासिल हुआ. 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को कुल 14 लोकसभा में से 12 पर जीत हासिल हुई थी. 2019 के चुनाव में बीजेपी इस राज्य में अपने प्रदर्शन को बरक़रार रखना चाहेगी. आने वाले लोकसभा चुनाव में बीजेपी आलाकमान ने यहां की कमान मंगल पाण्डेय को सौंपी है. बिहार के सीवान जिले से आने वाले मंगल पाण्डेय 1989 में बीजेपी में आए थे. सूबे में बीजेपी के ब्राह्मण चेहरा माने जाते हैं. 2013 में इन्हें बिहार बीजेपी का अध्यक्ष बनाया गया था. 2017 के विधानसभा चुनाव में उन्हें हिमाचल का इंचार्ज बनाया गया था.
9. मध्य प्रदेश
मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में हार के बाद यहां सांगठनिक बदलाव लाजमी था. अब तक विनय सहस्त्रबुद्धे मध्य प्रदेश के प्रभारी थे. सहस्त्रबुद्धे संघ के आदमी थे. उन्हें नितिन गड़करी का करीबी माना जाता है. अगस्त 2018 से ही सहस्त्रबुद्धे के खिलाफ मध्य प्रदेश संगठन में बगावत के स्वर उठने शुरू हो गए थे. चुनावी हार के बाद सहस्त्रबुद्धे की विदाई तय मानी जा रही थी. उनकी जगह स्वतंत्रदेव सिंह को आलाकमान ने मध्य प्रदेश भेजा है. सतीश उपाध्याय को सिंह की मदद के लिए भेजा गया है. उपाध्याय मध्य प्रदेश के सहप्रभारी होंगे.

स्वतंत्रदेव सिंह.
स्वतंत्र देव सिंह
स्वतंत्र देव सिंह उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर के रहने वाले हैं. 1984 में अपने भाई श्रीपत सिंह के साथ बुन्देलखण्ड के उरई में आ गए थे. यहीं से उन्होंने अपनी राजनीति की शुरुआत की. सबसे पहले अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के टिकट पर उरई के डीवीसी कॉलेज से चुनाव लड़े. हार का सामना करना पड़ा. विद्यार्थी परिषद से जुड़ाव बना रहा. स्वतंत्र देव सिंह को पहला राजनीतिक ब्रेक मिला मंदिर आंदोलन के समय. उरई में रहते हुए वो स्थानीय अखबार स्वतंत्र भारत में काम भी किया करते थे. इसी अखबार में उन्होंने फायरब्रांड हिंदुत्ववादी नेता विनय कटियार का एक इंटरव्यू छापा. इस तरह कटियार के साथ करीबी बढ़ गई. कटियार के कहने पर 1992 में झांसी चले गए. संगठन का काम देखने के लिए. अब तक इनका नाम कांग्रेस सिंह हुआ करता था. संघ के पदाधिकारियों के कहने पर नाम बदल कर स्वतंत्र देव सिंह रख लिया.
दूसरा बड़ा राजनीतिक ब्रेक मिला 2012 में. सूबे में बीजेपी के महामंत्री बने. जालौन की कालपी सीट से चुनाव भी लड़ा. जमानत तक नहीं बची. किस्मत चमकी 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान. अमित शाह उत्तर प्रदेश के प्रभारी हुआ करते थे. स्वतंत्र देव सिंह टीम अमित शाह में शामिल किए गए. संगठन के काम का अनुभव काम आया. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में तैनात कर दिए गए. नतीजा यह हुआ कि सहारनपुर जैसी मुश्किल सीट भी बीजेपी के खाते में गई. 2017 के विधानसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी की हर चुनावी रैली का मैनेजमेंट इनके हाथ में था. हर मोर्चे पर खुद को साबित किया. विधानसभा चुनाव के बाद इन्हें विधान परिषद भेज दिया गया. अमित शाह से करीबी की वजह से मुख्यमंत्री पद के दावेदार भी बताए गए. फिलहाल सूबे की सरकार में मंत्री हैं. उन्हें अब मध्य प्रदेश की कमान सौंपी गई है.
सतीश उपाध्याय
सतीश उपाध्याय छात्रसंघ के दफ्तर से राजनीति में आने वाले नेता हैं. 1982 में वो ABVP के टिकट पर दिल्ली यूनिवर्सिटी छात्रसंघ के उपाध्यक्ष चुने गए थे. 2012 तक इनकी राजनीति म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन तक ही सिमटी रही. 2014 में डॉ. हर्ष वर्धन के लोकसभा चले जाने के बाद उपाध्याय को दिल्ली बीजेपी की कमान सौंपी गई थी. 2015 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में बीजेपी को उनके नेतृत्व में हार का सामना पड़ा था. नवंबर 2016 में उन्हें यह पद छोड़ना पड़ा था.
10. मणिपुर और नागालैंड
किसी दौर में उत्त्तर-पूर्व के मोर्चे पर कांग्रेसी झंडा लहराता था. इस समय उत्त्तर-पूर्व के सभी सात राज्यों में बीजेपी या बीजेपी गठबंधन सत्ता में हैं. उत्त्तर-पूर्व के सात राज्य अपने 23 प्रतिनिधि लोकसभा में भेजते हैं. इस समय बीजेपी गठबंधन के पास 23 में से 11 सीट हैं. वहीं कांग्रेस की गिनती 6 पर सिमटी हुई है. पिछले चार साल में बीजेपी ने यहां अपनी पकड़ तेजी से मजबूत की है. उत्तर-पूर्व में बीजेपी अपने स्कोर को और दुरुस्त करना चाहती है. सुनील देवधर को उत्तर-पूर्व से आंध्र भेजने के बाद आलाकमान ने नालिक कोहली को उत्तर पूर्व के दो राज्यों की जिम्मेदारी सौंपी है.

नलिन कोहली.
नालिल कोहली पेशे से वकील हैं. सुप्रीम कोर्ट में अपने मुवक्किलों के पक्ष में जिरह करते हैं और टीवी पर बीजेपी के पक्ष में. बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं. आइडियोलोग किस्म के आदमी हैं. अब उत्तर-पूर्व के दो राज्य दिए गए हैं. यहां से लोकसभा की महज 3 सीट आती हैं. पिछले चुनाव में यह गठबंधन के पार्टनर के पास थी.
11. ओडिशा
ओडिशा में बीजेपी अपने लिए जमीन तैयार करने के लिए हाथ-पांव मार रही है. 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के दौरान 21 में 20 सीटें बीजू जनता दल के खाते में चली गई थीं. एक सीट बीजेपी के खाते में आई थी. बीजू पटनायक के बेटे नवीन पटनायक पिछले 18 साल से सूबे के मुख्यमंत्री हैं. यहां विधानसभा चुनाव लोकसभा के साथ ही होते हैं. 2014 में हुए विधानसभा चुनाव में कुल 147 सीट में से 117 बीजू जनता दल के खाते में गई थीं. कांग्रेस के खाते में 16 और बीजेपी के खाते में 10 सीते आई थीं. वोट शेयर के लिहाज से BJD के पास 43, कांग्रेस के पास 25 और बीजेपी के पास 18 फीसदी सीट हैं. कुल मिलाकर ओडिशा बीजेपी के लिए मुश्किल मैदान है.

अरुण सिंह.
अरुण सिंह उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर के रहने वाले हैं. बीजेपी युवा मोर्चा से सियासत की शुरुआत की. 2013 में ओडिशा चुनाव से पहले ओडिशा के सहप्रभारी बनाए गए थे. 2014 के चुनाव के बाद प्रभार इन्हें सौंप दिया गया. 2017 के पंचायत चुनाव में बीजेपी का प्रदर्शन चौंकाने वाला था. 2012 के पंचायत चुनाव में 854 में से महज 36 सीट बीजेपी के खाते में आई थीं. यह आंकड़ा 2017 में बढ़कर 297 पर पहुंच गई. इसे उस समय अरुण सिंह की बड़ी कामयाबी के तौर पर देखा गया था. आने वाले लोकसभा और विधानसभा चुनाव की कमान उनके हाथ में रहेगी.
12.पंजाब
पंजाब में अब तक बीजेपी अकाली दल के जूनियर पार्टनर के तौर पर लड़ती आई है. पिछले लोकसभा चुनाव में बीजेपी को यहां 13 में महज दो सीटें हासिल हुई थीं. कांग्रेस के खाते में 3, आप के खाते में 4 और अकाली दल के खाते में 4 सीटें थीं. पंजाब में बीजेपी के साथ बड़ी दिक्कत यह है कि सिख बहुसंख्यक राज्य में 'हिन्दुत्ववादी पार्टी' होने के वजह से उसकी अपील बहुत सीमित है. इस वजह से यहां अकाली दल पर उसकी निर्भरता अब भी बनी हुई है. हालांकि 1984 के सिख विरोधी दंगों पर आए कोर्ट के फैसले को बीजेपी अपने पक्ष में भुनाने का प्रयास जरुर करेगी. नवजोत सिंह सिद्धू इस सूबे में बीजेपी का जाना-पहचाना चेहरा हुआ करते थे. अब वो कांग्रेस में जा चुके हैं.

कैप्टन अभिमन्यु.
आने वाले लोकसभा चुनाव में बीजेपी आलाकमान ने कैप्टन अभिमन्यु को यहां का प्रभारी बनाया है. अभिमन्यु बगल के राज्य हरियाणा से आते हैं. वो 2012 के पंजाब विधानसभा चुनाव के वक़्त पंजाब के सह-प्रभारी हुआ करते थे. उस समय बीजेपी-अकाली गठबंधन ने लगातार दूसरी बार सत्ता हासिल करके इतिहास बदल दिया था. इसके बाद उनकी सांगठनिक क्षमता को देखते हुए उन्हें 2013 में उत्तर प्रदेश का सहप्रभारी बनाया गया था. पंजाब में बीजेपी को कैप्टन अमरिंदर सिंह की वजह से कड़ी चुनौती मिल रही है. पस्तहाल संगठन के साथ बीजेपी को खड़ा करना अभिमन्यु के लिए बड़ी चुनौती होगा.
13. राजस्थान
राजस्थान में बीजेपी क्षेत्रीय क्षत्रपों की वजह से परेशानी का सामना कर रही है. अमित शाह और वसुंधरा राजे की अदावत जगजाहिर है. बीजेपी के भीतर राजे विरोधी गुट का दावा है कि अगर विधानसभा चुनाव से पहले मुख्यमंत्री का चेहरा बदल दिया जाता तो शायद नतीजा बीजेपी के पक्ष में जा सकता था. सूबे में बीजेपी धड़ेबाजी का शिकार है. कयास यह लागे जा रहे थे कि विधानसभा चुनाव में हार के बाद वसुंधरा राजे को किनारे लगा दिया जाएगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

प्रकाश जावडेकर.
2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को रास्थान की सभी 25 सीटों पर जीत हासिल हुई थी. विधानसभा चुनाव में हार के बाद बीजेपी बैकफुट पर है. विधानसभा चुनाव से पहले केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर को राजस्थान का प्रभारी बनाया गया था. आलाकमान लोकसभा चुनाव से पहले राजस्थान में किसी भी किस्म का खून-खराबा नहीं चाहता है.जावड़ेकर किसी समय वसुंधरा के साथ बीजेपी के आडवाणी खेमे में हुआ करते थे. वो एक साथ संघ और वसुंधरा दोनों को साध सकते हैं.
14. तेलंगाना
तेलंगाना में हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव में केसी चंद्रशेखर राव की पार्टी तेलंगाना राष्ट्र समिति ने विपक्ष का सूपड़ा साफ़ कर दिया. 119 सीटों वाली विधानसभा में टीआरएस को 88 सीट हासिल हुई. कांग्रेस 19 सीटों के साथ दूसरे स्थान पर रही. बीजेपी को इस चुनाव में 4 सीटों का नुक्सान झेलना पड़ा और उसकी गिनती महज 1 सीट पर आ गई. 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को तेलंगाना की 17 लोकसभा सीटों में से महज एक सीट मिली थी.

अरविंद लिम्बावली.
बीजेपी आलाकमान ने तेलंगाना की कमान अरविंद लिम्बावली के हाथ में दी है. अरविन्द कर्नाटक के रहने वाले हैं. संघ की शाखा से बीजेपी में आने वाले नेता हैं. छात्र राजनीति में सक्रिय रहे हैं. ABVP के राष्ट्रीय महासचिव हुआ करते थे. उस दौरान क्लासिक कंप्यूटर घोटाला हुआ था कर्नाटक में. अरविन्द के नेतृत्व में छात्रों का 'सेव कैंपस' आन्दोलन चला था.मुख्यमंत्री एस.बंगारप्पा को इस्तीफ़ा देना पड़ा था. 'कश्मीर चलो' आंदोलन के दौरान भी सक्रिय रहे. संघ के आदमी माने जाते हैं. फिलहाल तेलंगाना की जिम्मेदारी मिली है.
15. उत्तराखंड
2014 के लोकसभा चुनाव में उत्तराखंड की सभी पांचों सीट बीजेपी के खाते में गई थी. इस बार बीजेपी अपने स्कोर को बरकरार रखने की उम्मीद कर रही है. खास तौर पर जब सूबे में वो सत्ता में है. सूबे की कुल 70 विधानसभा सीटो में से 57 बीजेपी के पास है. 2016 में विधानसभा चुनाव से पहले जेपी नड्डा और धर्मेंद्र प्रधान को उत्तराखंड का प्रभारी बनाया गया था. 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले यह जिम्मेदारी थांवरचाँद गहलोत को सौंपी गई है. थांवरचंद मध्यप्रदेश से आते हैं. 1996 से 2009 तक वो मध्य प्रदेश की शाजापुर सीट से सांसद हुआ करते थे. 2012 में उन्हें मध्य प्रदेश से राज्यसभा में भेज दिया गया था. 26 दिसंबर से पहले वो हिमाचल के प्रभारी हुआ करते थे. अब उन्हें उत्तराखंड भेजा गया है. गहलोत मोदी-अमित शाह के करीबी माने जाते हैं. 2014 में सामाजिक न्याय मंत्रालय दिया गया था. बाद में मंत्रिमंडल में फेरबदल के चलते उन्हें मंत्रालय छोड़ना पड़ा था.
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