अमीश त्रिपाठी. बैंकर थे. अब किताबें लिखते हैं. भगवान जी को इंसान जी की तरह ट्रीटकरते हैं. मजा आता है पढ़ने में. मैं फैन हूं उनका. शिवा ट्रिलिजी की पहली किताबसे. अब वो राम जी पर लिख रहे हैं. एक किताब आ चुकी है. सायन ऑफ इक्ष्वाकु. यानीइक्ष्वाकु के वंशज. राम. हमारे यहां ओरछा में हों तो राजा राम. राम को राजा के रूपमें दो ही जगह पूजते हैं. अयोध्या और ओरछा. ये कहानी फिर कभी.आज अमीश की एक नई बात. पिछले हफ्ते कुंमायूं लिटरेचर फेस्टिवल (केएलएफ) में उन्हेंसुना. जंगल के बीच जंगलों और प्रकृति की बात. जंगल में ये मंगल रचाया सुमंत बत्राने. पेशे से वकील हैं सुमंत. पहाड़ों से, अपने पहाड़ों से प्यार है. फेस्टिवल कादूसरा सीजन था, जिम कार्बेट के जंगलों के बीच एक रिसॉर्ट में. यहां वो ऐसी तल्लीनतासे इधर-उधर भागदौड़ कर रहे थे, गोया बिटिया का बियाह हो. बड़े आयोजनों में ऐसा हीहोता है. सुमंत को बधाई.कुंमायूं लिटरेचर फेस्टिवल में शाज़ी जमा (दाएं) के साथ सुमंत बत्रा. शाज़ी कीकिताब 'अकबर' लॉन्च होने वाली हैअब लौटते हैं अमीश पर. अमीश प्रकृति पर बोले. पुराने वक्त के समय और समाज पर उसकेप्रति क्या सोच थी, इस पर बोले. जो बोले. उन्हीं की जुबानी पेश है.--------------------------------------------------------------------------------प्रकृति को लेकर हमारा नजरिया वेस्ट के हिसाब से हो गया है. और साफ लहजे में कहूंतो अब्राहमिक थॉट हो गया है. ये क्या होता है. ये विचार ऐसा है कि दुनिया में भगवानने जो सबसे अच्छी चीज रची, वो है इंसान. और फिर उसकी सहूलियत के लिए पत्थर, हवा,पानी वगैरह बनाए.जबकि हमारे यहां का पुराना असल विचार क्या है. और ये सिर्फ हमारे यहां ही क्यों,ग्रीक और जितनी भी पुरानी सभ्यताएं हैं, वहां सब जगह है कि प्रकृति जो है, वो हमारीमां है. ग्रीक में इसके लिए गेया शब्द यूज किया गया है. तो ये जो हमारी मां है,जिसने हमें पैदा किया. उसे हम कैसे बचा सकते हैं.आपको बात अजीब लग सकती है. फिर भी मैं कहना चाहता हूं. प्रकृति को मत बचाइए.प्रकृति ने इंसान से भी बड़ी आपदाएं देखी और झेली हैं. और बची रही है. बचाना ही हैतो अपने आप को बचाइए.अगर आप प्लास्टिक का इस्तेमाल नहीं रोकेंगे तो क्या होगा. प्लास्टिक नष्ट नहींहोगी. लाखों साल तक. मगर आप हो जाएंगे. प्रकृति तब भी बची रहेगी. इसलिए अपने आप कोबचाइए. और उसके लिए जो भी जतन बन पड़े, करिए. नदियों को साफ रखिए. केमिकल केइस्तेमाल में सावधानी बरतिए. अपनी खातिर.एल्कएक उदाहरण देता हूं आपको. अमेरिका में एक नेशनल पार्क है. बहुत मशहूर. येलो स्टोन.वहां की बात है. रूजवेल्ट का शासन था. अस्सी एक साल पहले. तो नेता जी पहुंचे नेशनलपार्क घूमने. पार्क खूब घना. तमाम वनस्पतियों और जीव जंतुओं से भरा. सरकारी ठठ करमसे यथासंभव बचा हुआ. मगर हुक्मरानों का दौरा हुआ तो बाबुओं को दखल देना ही था.उन्होंने अब प्रकृति में अपनी नाक घुसेड़ी. कहा गया कि यहां जो हिरण हैं एल्क नामके, वो कम हो रहे हैं, क्योंकि उन्हें भेड़िए खा रहे हैं. ये खाना नेचरल ऑर्डर काहिस्सा था. मगर सरकारी तंत्र को लगा कि वे इसमें दखल देकर चीजें सुधार सकते हैं. तोशिकारियों को हुक्म दिया गया कि पार्क में भेड़ियों को मार दिया जाए. चली गोलीधांय-धांय. वो मरे तो हिरण बेतहाशा बढ़े. घास की कमी होने लगी. पूरी फूड साइकल हिलगई. बीबर नाम के जानवर मरने लगे. पानी का जंगल में जो तंत्र था, खराब हो गया.सरकार फिर घुसी. अब बोली. हिरणों को कम करने के लिए भेड़िए लाओ. वो इन्हें खालेंगे. तो भेड़िए लाए गए. दूसरे जंगलों से. वो आए. साथ में नई बीमारियां लाए. जंगलनया था. वो इस तंत्र के लिए नहीं बने-ढले थे. अब चिड़ियां मरने लगीं. और अब वोपार्क जानवरों से ज्यादा इंसानों की हरकतों की गवाही देता है.इस वाकये के क्या सबक निकालें. एक तो यही कि इंसान को बहुत ज्यादा गुरूर है कि वोसब समझता है. सब ठीक कर सकता है. ये जो एटीट्यूड ऑफ एरोगेंस है, यही सबसे ज्यादानुकसान कर रहा है. प्रकृति का नहीं. उसके बीच पल रहे इंसानों का.अमीश त्रिपाठीइस मामले में हमें पुरानी पद्धति पर विचार करना चाहिए. हमारे देश में बस्तियां थीं.फिर जंगल थे. जंगल भी तीन तरह के थे. बस्ती के बाहर जो जंगल थे. शुरुआती सीमा पर.उन्हें तपोवन कहा जाता था. यहां ऋषियों को आश्रम हुआ करते थे. गुरुकुल हुआ करते थे.फिर दूसरे लेवल पर महावन थे. यहां इंसानों का दखल मना था. सबसे अंदर के एरिया मेंश्रीवन हुआ करते थे. श्री का अर्थ क्या होता है. लक्ष्मी. सिर्फ देवी नहीं. लक्ष्मीयानी प्रचुरता में. श्रीवन वो हिस्सा था, जहां सभ्यता के लिए खनिज और दूसरी संपदाएंप्रचुरता में मिलती थीं. इंसान एक तय रास्ते से जाता. बिना जंगल की पारिस्थितिकी कोबिगाड़े और श्रीवन से जरूरत भर की सामग्री ले आता. सभ्यता का विकास होता रहता.जीव-जंतु भी पनपते रहते.मगर बाद में ये व्यवस्था टूट गई. जंगल नुमाइश की चीज भर रह गए.आजकल क्या हो रहा है. प्रकृति बचाने के नाम पर पैरिस में समिट हो रहे हैं. वहां परप्रोग्रेस के पायदान पर सबसे आगे खड़े मुल्क अपनी शर्तें हम पर थोप रहे हैं. थर्डवर्ल्ड कंट्रीज पर. इस हालत पर साउथ अफ्रीका के जैकब जुमा की टिप्पणी मजेदार है. वोकहते हैं कि ये ऐसा है कि कोई सेवन कोर्स मील खा रहा हो. आपको सबसे आखिर में कॉफीपीने के लिए मेज पर बैठा ले. मगर जब पूरे भोज का बिल आए तो कहे, बराबर का हिस्सादेना होगा.जरूरत संतुलन समझने और साधने की है. जीवन में. प्रकृति में.--------------------------------------------------------------------------------ये भी पढ़ें: बागी लोगों के भगवान तो शिव ही हैं: अमीश त्रिपाठी