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इस वक़्त इस मंदिर में भक्तों को मिलता है 'पीरियड के खून' से सना कपड़ा

जानिए अंबुबाची पर्व के बारे में.

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20 जून 2018 (अपडेटेड: 20 जून 2018, 06:10 AM IST)
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योनि, वेजाइना. एक ऐसा शब्द जिसे बोलने के पहले सौ बार सोचेंगे. उसके लिए दूसरे शब्द तलाशेंगे. और पीरियड्स की बात! वो तो भूल ही जाओ. आज भी देश के आधे पुरुष ये मानते हों कि पीरियड का मतलब पैड पर नीली स्याही गिरना है, तो अचंभा नहीं होगा.
मगर ऐसे ही समाज में एक मंदिर ऐसा है, जहां देवी की योनि की पूजा की जाती है. और साल में एक बार उन्हें होने वाले पीरियड पर बड़ा सा पर्व मनाते हैं.
असम में 22 जून से अंबुबाची पर्व शुरू होने वाला है. और ये अगले चार दिन यानी 25 जून तक चलने वाला है. देश भर से भक्त मंदिर में दर्शन के लिए जायेंगे. उस दौरान सिटी का ट्रैफिक थम जाएगा और सभी लोग इस फेस्टिवल को धार्मिक और पवित्र ज़ज्बे के साथ मनाएंगे. असम की सरकार ने श्रद्धालुओं को आकर्षित करने के लिए इसमें कुछ कल्चरल परफॉर्मेंसेस को भी जोड़ने का फैसला किया है.
अब सुनिए उस पर्व की कहानी, जहां मिलता है 'पीरियड के खून' से रंगा हुआ कपड़ा.
कामाख्या – ‘द मिथ’
कामाख्या को ‘सती’ (जो कि भगवान शिव की पत्नी थीं) का एक अवतार माना जाता है. सती की मृत्यु के बाद, शिव ने तांडव नृत्य शुरू कर दिया था. उन्हें रोकने के लिए विष्णु ने अपना चक्र छोड़ा था. जिसने सती के शरीर को 51 हिस्सों में काट दिया था. ये 51 हिस्से धरती पर जहां-जहां गिरे, उन्हें ‘शक्तिपीठ’ का नाम दिया गया. इन्हीं में से एक हिस्सा वहां गिरा, जहां पर इस वक्त कामाख्या मंदिर है.
क्यों पड़ा ये नाम?
सती का गर्भाशय जिस जगह पर गिरा था, उसका पता तब तक नहीं चल पाया था जब तक कामदेव ने उसे ढूंढा नहीं था. कामदेव ने शिव के शाप से मुक्त होने के लिए इसे ढूंढा. कामदेव का शरीर तहस-नहस हो चुका था. लेकिन उन्होंने सती की योनि ढूंढ कर उसकी पूजा की. और अपना शरीर वापस पा लिया. इसलिए इस मंदिर या देवी को कामाख्या के नाम से जाना जाता है. क्योंकि कामदेव इनकी पूजा करते थे.
कामाख्या मंदिर
ये मंदिर 1565 में नर-नारायण ने बनवाया था. अपने बनने के साथ ही ये मंदिर अंबुबाची मेले से जुड़ गया था. मंदिर के गर्भगृह (मेन हिस्सा) में देवी की कोई मूर्ति नहीं है. उनकी पूजा की जाती है एक पत्थर के रूप में. जो एक योनि के आकार का है और जिसमें से नैचुरली पानी निकलता है.
kamakhya
अंबुबाची मेला
अंबुबाची का पर्व ‘अहार’ (जिसे आषाढ़ कहते हैं) के महीने में आता है. आषाढ़ जून-जुलाई में आता है. जबसे कामाख्या मंदिर बना है, हर साल ये पर्व मनाया जाता है. महीने के आखिरी चार दिनों में ये मेला लगता है. ऐसा कहा जाता है कि ये वो चार दिन वो होते हैं, जब कामाख्या देवी को पीरियड आते हैं. मंदिर के दरवाज़े बंद रहते हैं. ऐसा कहा जाता है कि इस दौरान मंदिर के अंदर बने हुए एक छोटे से तालाब का पानी लाल रंग में बदल जाता है. प्रसाद के तौर पर देवी का निकलने वाला पानी या फिर अंगवस्त्र (लाल कपड़ा, जिससे देवी की योनि को ढका जाता है) मिलता है. लोग ऐसा मानते हैं कि इस प्रसाद में औरतों में होने वाली पीरियड से समस्याओं को ठीक करने और उन्हें 'बांझपन' से मुक्त करने की ताकत होती है.
कौन जाता है इस पर्व में?
नागा साधुओं से लेकर अघोरी तक. वो लोग भी, जो ये मानते हैं कि अधर्म ही ‘निर्वाण’ को पाने का सही रास्ता है; और सभी तरह के संन्यासी इस फेस्टिवल में जाते हैं. हालांकि ये पर्व सिर्फ साधुओं और संन्यासियों के लिए नहीं है. बल्कि असम राज्य के और हिस्सों से और भारत के हर कोने से लोग देवी के दर्शन करने और उनका आशीर्वाद लेने आते हैं.
इस साल असम के चीफ मिनिस्टर सर्बानंद सोनोवाल ने इस चार दिन के पर्व में एक कल्चरल परफॉर्मेंस भी जोड़ा है. इस इवेंट में कुछ स्थानीय कलाकारों की परफॉर्मेंसेस और लोक संगीत भी प्रस्तुत किया जाएगा. इसमें मंदिर का एक स्पेशल गाइडेड टूर भी होगा और साथ ही ब्रह्मपुत्र नदी में वॉटर स्पोर्ट्स भी.


दी लल्लनटॉप के लिए ये स्टोरी टीना दास ने लिखी है.  

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