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धरती को गोल बताने वाले को ब्लैकलिस्ट कर दिया होता तो?

सिने संन्यासी की चौथी किस्त. बात फिल्म Trumbo और Straight Outta Compton की.

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लल्लनटॉप
5 मार्च 2016 (Updated: 7 मार्च 2016, 06:56 AM IST)
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सिने संन्यासी. 'दी लल्लनटॉप' की सीरीज. जिसमें एक जवान साधुनुमा आदमी बात कर रहा है. आपसे. फिलहाल हॉलीवुड सिनेमा पर. वह साधु है क्योंकि उसे अपनी नाम पहचान या ऑस्कर के शोर से कोई मतलब नहीं. उसकी बस एक ही हवस है. भक्ति की तरह. फिल्में. पहली किस्त में उसने बताया कि अवॉर्ड तो बस एक फरेब भर हैं. जिसके चलते हम कई को जानते हैं, तो कई हारकर पीछे छूट जाते हैं. भले ही वह और भी हकदार हों. इसी किस्त में फिल्म ‘दी बीस्ट्स ऑफ नो नेशन’ की बात हुई. दूसरी किस्त में बात हुई ‘द डैनिश गर्ल और एक्सपेरिमेंटर’ पर. जिसके बारे में कुछ सलीके के लोग कहते हैं कि अगर एक्टिंग भर ही पैमाना होती. कोई कवित्तपूर्ण न्याय करने का दबाव न होता तो बेस्ट एक्टर का अवॉर्ड 'द डैनिश गर्ल' के लिए एडी रेडमेइन को ही मिलता. तीसरी किस्त में सिने संन्यासी ने इस बार की बेस्ट फिल्म का ऑस्कर अवॉर्ड जीतने वाली 'स्पॉटलाइट' की बात की. लगे हाथ फिल्म ‘द बिग शॉर्ट’ के बारे में बताया. और अब पेश है चौथी किस्त, जिसमें बात होगी फिल्म 'ट्रम्बो' की. कहानी डॉल्टन ट्रम्बो की है. हॉलीवुड के टॉप स्क्रीन राइटर हुआ करते थे. 1947 में पॉलिटिकल रुझान की वजह से उनको जेल में डाल दिया गया था. दूसरी फिल्म जिस पर बात होगी वो है 'स्ट्रेट आउटा कॉम्पटन' की. तो बिना देरी किए मिलिए अपने सिने संन्यासी से… Trumbotrumboब्लैकलिस्ट वाला वक्त शैतानी वक्त था. और उससे बचकर निकलने वाला कोई भी व्यक्ति उससे अनछुआ नहीं रह पाया. हम सब सामान्य व्यक्तियों की तरह उस परिस्थिति में कैद थे. हर इंसान ने वैसी ही प्रतिक्रिया दी जैसी उसकी प्रवृति थी, उसकी जरूरतें थी, उसकी धारणाएं थीं. इन विशेष हालातों ने उससे ये सब करवाया. वो भय का दौर था. कोई अछूता नहीं था. अनेक-अनेक लोगों ने अपने घर-बार खो दिए. उनके परिवार टूट गए. और कुछ ने अपनी जान तक गंवा दी. लेकिन जब आप उस अंधेरे वक्त की ओर देखते हैं, जो आपको देखते रहना चाहिए. उसमें आपको हीरो और विलेन की खोज करके कुछ नहीं मिलेगा. कोई थे ही नहीं. वहां सिर्फ शिकार थे. शिकार जो ऐसी बातें कहने या करने को बाध्य थे जो अन्यथा वे नहीं करते. घाव देने या लेने को बाध्य थे जो अन्यथा हम कभी नहीं लेते-देते. मैं वहां बैठे अपने परिवार की ओर देखता हूं और पाता हूं कि मैंने उन्हें किन हालातों से गुजारा है. ये अन्याय था. मेरी पत्नी, जिन्होंने जैसे-तैसे सब कुछ जोड़े रखा..मुझे आश्चर्य होता है. डॉल्टन ट्रम्बो, 1970 में एक पुरस्कार लेते हुए बोलते हैं. 1947 में हॉलीवुड के जिन दस (और बाद में सैकड़ों अन्य को) निर्देशकों-लेखकों को अमेरिका में ब्लैकलिस्ट कर दिया गया उनमें वे भी थे. दूसरे विश्वयुद्ध के बाद सोवियत संघ के साथ शीत युद्ध के दौर में अमेरिका में व्याप्त राष्ट्रवादी तत्वों और बेग़ैरत राजनेताओं ने कम्युनिस्ट कहते हुए अपने ही नागरिकों का शिकार करना शुरू किया. उनसे रोजगार छीन लिए. डॉल्टन उन्हीं में से एक थे. उन्हें जेल जाना पड़ा. छूटकर आए तो परिवार का पेट पालने के लिए छद्म नामों से फिल्में लिखने लगे. उनकी दो फिल्मों ने ऑस्कर पुरस्कार जीते. 1975 में एकेडमी ने आधिकारिक रूप से ट्रम्बो को फिल्म "द ब्रेव वन’ के लिए ऑस्कर प्रदान किया जिसे उन्होंने ब्लैकलिस्ट वाले दौर में रॉबर्ट राइच के छद्म नाम से लिखा था. अपने भाषण ने उन्होंने बेहद मानवीय सोच के साथ उन सब साथियों को माफ कर दिया जिन्होंने दबाव में उनके खिलाफ गवाहियां दी या उन्हें काम देने से मना कर दिया. 'ट्रम्बो' तब तक रहेगी जब तक सृष्टि है और फिल्म चलाने वाले यंत्र हैं. इसे देखते हुए 2016 का भारत, उसमें व्याप्त माहौल और घटनाओं के संदर्भों की बाढ़ जेहन में आ जाती है. कि कैसे कुछ दिशाहीन, अज्ञानी, मूर्ख लोगों और घातक सूचनाकर्मियों ने हमें इतनी तेजी से बांट दिया है जितना ज्यादा वक्त जुड़ने में लगा था. हम न ठीक से सोच पा रहे हैं, न इतिहास पर नजर डाल रहे हैं, न अच्छे-बुरे का फर्क समझ पा रहे हैं. एफटीआईआई से लेकर जेएनयू में जो हो रहा है, राष्ट्रद्रोह के नाम पर जैसे लोगों को जेल में डाला जा रहा है, अपने से अलग मत रखने वाले दोस्तों से बात करने में डर लग रहा है क्योंकि वे वॉट्सएप्प और टीवियों द्वारा सुझा दिए गए भ्रामक तथ्यों के बल पर तुरंत आपको पागल या देश की अखंडता के लिए खतरनाक करार दे देंगे. समानता और स्वतंत्रता जैसे दो बुनियादी मूल्यों का पैमाना मिटाया जा रहा है. यही 1947 में अमेरिका में हुआ था. जब कम्युनिस्ट विचारधारा वाले फिल्म लेखकों, उपन्यासकारों और निर्देशकों को जेल में डाल दिया गया. उन्हें ब्लैकलिस्ट कर दिया गया. जिन्हें संदर्भ मालूम नहीं.. 1930 में भीषण आर्थिक मंदी और फासीवाद के उभार के बाद हजारों अमेरिकी लोगों ने अमेरिका की कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता ली. जब अमेरिका ने सोवियत संघ के साथ मिलकर विश्व युद्ध-2 लड़ा तो और लोग कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े. युद्ध खत्म होने के बाद शीत युद्ध शुरू हो गया और इस विचारधारा के तमाम लोगों को सोवियत रूस का जासूस और न जाने क्या क्या कहा जाने लगा. पूरे देश में जैसा नकारात्मक दाब बनाया गया उसने सारी मानवता ताक पर रख दी. लेकिन कुछ दशक बाद वे पीड़ा देने वाले लोग उनसे आंख मिलाने लायक नहीं रहे जिन्हें उन्होंने बिना बात बर्बाद कर दिया. इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा है. आप आखिर अपने विचारों को लेकर इतना आश्वस्त कैसे हो सकते हैं? सत्य क्या है इसकी यात्रा अगर यूं रुक जाए और आप सबके लिए एक ही सच को कस्टमाइज करने लगें तो कितनी खतरनाक स्थिति होगी. जिसने पहली बार कहा कि धरती गोल है उसे सरेआम मार डाला गया. क्या फिर धरती गोल नहीं निकली? सदियों से ईसा मसीह गोरे माने जाते रहे हैं लेकिन हालिया अध्ययन में दावा किया गया है कि वे अश्वेत थे. https://www.youtube.com/watch?v=n0dZ_2ICpJE एक फिल्म के तौर पर ट्रम्बो चुस्त, मजेदार, बुद्धिमान, आह्लादकारी, संतुलित और भारी-प्रासंगिकता वाली प्रस्तुति है. 'ब्रेकिंग बैड’ सीरीज से बेहद प्रसिद्ध हुए ब्रायन क्रैनस्टन ने प्रभावोत्पादक अभिनय किया है. अतुलनीय कॉमेडियन और लेखक लुइस सी.के. को भी इस कहानी में देखना बहुत राहत भरा है. अगर नहीं देखा तो उनका काम जरूर देखें. माइकल स्टलबर्ग को इस फिल्म में ट्रम्बो के दोस्त और फिर मजबूरी में खिलाफ हो गए एक्टर रॉबिनसन के रोल में देखें और फिर 'स्टीव जॉब्स’ देखें. आप पहचान नहीं पाएंगे. जॉन गुडमैन फ्रैंक किंग के रोल में हैं. किंग ब्रदर्स ने ब्लैकलिस्ट काल में बहुतों को छद्म नामों से रोजगार दिया. वो दृश्य जब एक प्रतिनिधि उन्हें धमकाने आता है और अंत में अविश्वसनीय ढंग से फ्रेंक बेसबॉल बैट निकालता है और सामने वाले को डराकर पागल कर देता है. बैट कांच, अलमारी, दरवाजे पर दे मारते हुए वो चीखता है.. "मुझे फर्क नहीं पड़ता.. मैं फिल्में नहीं कचरा बनाता हूं.. तुम मेरे बारे में अखबार में लिखोगे..? लिख दो... क्योंकि मेरी फिल्में देखने वाले पढ़ना नहीं जानते.’ आते हैं निर्देशन पर. "द बिग शॉर्ट’ के एडम मकै वाली बात ही इसके निर्देशक जे रोच की है. उन्होंने इतना गंभीर विषय चुना और उसे सुग्राह्य बना दिया तो अपनी फिल्मी पृष्ठभूमि की वजह से. उन्होंने "ऑस्टिन पावर्स’ से लेकर "मीट द पैरेंट्स’ और "द कैंपेन’ जैसी कॉमेडीज़ रची है. वे सामान्य से आदमी और फिल्मकार हैं और आप इतने ही हो जाएं तो बहुत है. Straight Outta Comptonstraightहमारा आर्ट हमारे आसपास की सच्चाई का प्रतिबिंब है. खुद को देखो, आप सब क्या कर रहे हो? आप ए. के. (गन्स) रशिया से लेते हो, कोलंबिया से कोकेन आती है.. आइस क्यूब, गैंगस्टर रैप को प्रचलित करने वाले अमेरिकी हिप हॉप ग्रुप N.W.A के सदस्य. 1989 में एक प्रेस वार्ता में एक संवाददाता उनसे पूछता है "..आप लोगों के गानों का क्या जो गैंग्स, गन्स और ड्रग्स वाली जीवनशैली को ग्लैमराइज करते हैं? भारतीय फिल्मों में जब पंजाबी रैपर अपने नुमाइशी गानों के साथ अपनी जगह कमर्शियल योग्यताओं के कारण पक्की कर रहे हैं, बहुत जरूरी है कि आप N.W.A की ये कहानी देखें. गैंग्स्टर रैप को पॉपुलराइज करने में कुछ अफ्रीकी-अमेरिकी लड़कों के इस समूह का बड़ा हाथ था. इनकी लोकप्रियता रातों रात हुई. आइस क्यूब, डॉ. ड्रे, इज़ी-ई, और अरेबियन प्रिंस कैलिफोर्निया के कॉम्पटन के रहने वाले थे. रंगभेद के कारण पुलिस की बर्बरता देखी. इन्हें लोकप्रिय भी होना था. क्योंकि अमेरिका में इज्जत पाने के लिए पैसे वाला होना बड़ी योग्यता है. और अगर आप अश्वेत हैं और गरीब हैं तो आपका कोई चांस नहीं बनता. आप गंदगी के ढेर से ज्यादा कुछ नहीं. पढ़े-लिखे डॉ. ड्रे (कोरी हॉकिन्स) म्यूजिक प्रोड्यूस करते थे और आइस क्यूब (ओशीया जैक्सन, जूनियर) के लबों में तेज़ाब था. "फक द पोलिस..’ उनका लिखा बड़ा विध्वंसात्मक रैप था. तब भीतर से असंतोष पाले अफ्रीकी-अमेरिकी युवाओं ने इस शोर भरे हिप हॉप में शरण ली. अगर आपने फेसबुक के संस्थापक मार्क ज़करबर्ग की कहानी "द सोशल नेटवर्क’ में देखी है तो ये भी देखें. क्योंकि दुनिया के सब देशों में इस ग्रुप ने फैन जुटाए हैं. स्नूप डॉग तक इनके बाद में आए. कैसे ये लड़के म्यूजिक मैनेजर जेरी (पॉल जियामेटी) की मदद से नए लेबल तले रिकॉर्ड निकालने शुरू करते हैं. फिर ये प्रसिद्ध होते हैं. लेकिन फिर पैसे के कारण इनका ग्रुप टूट जाता है. और इनकी जिदंगियों में अलग-अलग मोड़ आते हैं. इस फिल्म के निर्माता हैं आइस क्यूब जो N.W.A के अहम सदस्य थे. फिर मैनेजर जेरी से मतभेद के चलते अलग हो गए और अपने सभी साथियों से ज्यादा सफल हुए. उन्होंने फिल्मों में प्रवेश किया. "ट्रिपल एक्स: स्टेट ऑफ द यूनियन’, "थ्री किंग्स’ और "एनाकॉन्डा’ जैसी कई फिल्मों में उन्होंने काम किया है. उन्होंने 1995 में "फ्राइडे’ नाम की फिल्म की स्क्रिप्ट लिखी और उसमें काम किया. इसी फिल्म से बतौर निर्देशक डेब्यू करने वाले एफ. गैरी ग्रे ने "स्ट्रेट आउटा कॉम्पटन’ डायरेक्ट की है. इस फिल्म में पॉल जियामेटी को छोड़कर एक भी जाना-पहचाना चेहरा नहीं है. लेकिन एक बार कहानी शुरू हो जाती है तो आप दूर नहीं हो पाते. फिल्म खत्म होती तो भी आपको आभास नहीं होता कि ये 2 घंटे 46 मिनट से ज्यादा लंबी है. इसकी वजह है कहानी के मानवीय पहलू. सभी कलाकारों का सटीक अभिनय. स्मार्ट निर्देशन. फिल्म में इज़ी-ई (जेसन मिचेल) के पहले गाने की रिकॉर्डिंग वाला सीन लें या बस में एक के पोर्न देखने और सबकी हंसोड़ प्रतिक्रिया वाला दृश्य.. सब गुदगुदाते हैं. आइस क्यूब की भूमिका उन्हीं के बेटे ओशीया ने की है. वे अपने पिता, उनकी मन:स्थिति और गुस्से को जिंदा करते हैं. कोरी भी डॉ. ड्रे लग पाते हैं. "स्ट्रेट आउटा..’ में 1989 के नेशनल टूर से पहले FBI की ओर से N.W.A को कहा जाता है कि वे "फक द पोलीस’ गाने को सार्वजनिक आयोजनों में न परफॉर्म करे. क्योंकि ये कानून-व्यवस्था के पालकों के प्रति हिंसा के लिए उकसाता है. लेकिन डिट्रॉयट के कॉन्सर्ट में वे नहीं मानते और ये गाने गाते ही हैं. हिरासत में लिए जाते हैं. फिर प्रेस कॉन्फ्रेंस में जब पूछा जाता है तो वे लोग कहते हैं कि उनके गाने उनकी सच्चाई के प्रतिबिंब हैं. कोई भी आर्ट फॉर्म ऐसी ही होती है और जहां न हो वहां ऐसी ही होनी चाहिए. अगर एक समाज बर्बरता भरे कानून तंत्र और अलोकतांत्रिक प्रशासन तले है तो आप गालियों भरे और अभद्र रैप या कुछ और पाएंगे ही. उस लिहाज से होने वाला सुधार युवाओं में असंतोष रोक सकता है. लेकिन सत्ता वजह पर ध्यान नहीं देती. वो अपराधी पैदा करती है, फिर उन्हें गोली मारकर कहती है कि देखिए, अब तो सब ठीक है न. https://www.youtube.com/watch?v=l5r5cZk0EfY

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