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शकुंतला एक्सप्रेस मांगे आजादी

ये रेलवे इंडिया में है लेकिन इंडियन नहीं है. ब्रिटेन की कंपनी हमारी सरकार से करोड़ों रुपए किराया वसूल रही है.

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फोटो - thelallantop
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आशुतोष चचा
8 जून 2016 (Updated: 8 जून 2016, 07:44 AM IST)
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इंटरनेट जो है, वो आज की दुनिया का इंकलाब है. लोगों का पूरा लाइफस्टाइल बदलने वाला. ऐसे ही पहले जो क्रांतिकारी सर्विस चलीं उनमें सबसे खास थी डाक, यानी पोस्ट ऑफिस. और रेलवे. इन दोनों के बिना आदमी की जिंदगी कितनी मुश्किल होती कि शायद ही आज हम इतना आगे बढ़ पाते. लेकिन अपन बात करेंगे सिर्फ रेलवे की. उस रेलवे की जो इंडिया में होते हुए भी इंडियन नहीं है.
शकुंतला रेलवे, महाराष्ट्र के अमरावती में 190 किलोमीटर की एक रेलवे लाइन है. इस पर चलने वाली शकुंतला एक्सप्रेस पैसेंजर गाड़ी है. जो अमरावती अचलपुर होकर चलती है. और यवतमाल से मुर्तजापुर की दूरी करीब चार घंटे में तय करती है.
Shakuntala-Express-yavatmal

ये लाइन भी इंडिया में तब बनी जब बाकी रेलवे का जाल बिछ रहा था. यानी अंग्रेजों के जमाने में. साल 1910 था. ब्रिटिश कंपनी किलिक निक्सन ने इसे बनाया था. उसके बाद सन 1951 में जब पूरे देश की रेल सरकारी हो गई. माने केंद्र सरकार के अंडर में भारतीय रेल बन गई. तो पता नहीं किस वजह से ये 190 किलोमीटर का ट्रैक छूट गया. इसकी वजह का पता आज तक नहीं चला है.
जब ये लाइन बनी थी तो वो इलाका कॉटन का अड्डा था. वहां के खेतों से कपास इसी ट्रैक पर मालगाड़ियों में लदकर मुंबई पोर्ट पहुंचती थी. वहां से ब्रिटेन वाले लपक लेते थे. आजादी के बाद ये ट्रैक सवारी ढोने के काम आने लगा. आज ये आलम है कि वहां की गरीब मजदूर जनता के हाथ पै कट जाएं. अगर ये ट्रेन बंद हो जाए. बाई रोड जाना पड़े तो किराया 5-6 गुना ज्यादा देना पड़े.
Image: Angus McDonald
Image: Angus McDonald

लेकिन एक लोचा ये है कि वो नामुराद ब्रिटिश कंपनी न मरे न पीछा छोड़े. ससुरी एक करोड़ से ज्यादा रुपए वसूल करती है किराया. वो भी सरकार इतने साल से देती आ रही है. पिछले कुछ साल से सरकार ये कर रही है कि किराए का पैसा मेंटीनेंस में काट देती है.
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इस ट्रैक और ट्रेन का ये हाल ये है कि यहां पहुंचने पर धांय से सौ साल पीछे चले जाओगे. लगेगा कि कोई फिल्म देख रहे हो अंग्रेजों के जमाने की. काहे कि सरकार तो किराया देती है. वो कोई काम कराती नहीं ट्रैक पर. और उस कंपनी को क्या गरज पड़ी है जो कराए. जब अंडू बिक जाए तो बधिया कौन कराए. नतीजा सिग्नल से लेकर इंजन, पटरी, इन्फॉर्मेशन सिस्टम सब अंग्रेजों के जमाने का है.
उस ट्रेन का इंजन कोयला पानी वाला है. पटरियां नैरो गेज हैं. 'छोटी लाइन' पढ़ो तो जमेगा. सिग्नल सिस्टम बहुत पुराना है. उन सिग्नलों पर उकेरा हुआ है 'मेड इन लिवरपूल.'
Beyer.Garrett

कुल मिलाकर अभी तक हमारे देश में होते हुए भी गुलामी की जंजीरों में जकड़ी है शकुंतला एक्सप्रेस. सरकार को जल्दी से जल्दी इसे आजाद कराना चाहिए. अब इस ट्रेन का एक वीडियो देख लो. नए नए डिब्बे हैं इसमें. रिपेयरिंग के बाद वाले.
https://www.youtube.com/watch?v=BD1VXEgYEpE

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