चीनी उद्योगपति ने सरकार की आलोचना की, दो महीने से कोई अता-पता नहीं है!
सोशल मीडिया पर उनको लेकर कई थ्योरीज़ चल रही हैं.
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महीनों तक गायब रहने के बाद जैक मा एक वीडियो में नजर आए हैं.
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चीन का एक आदमी था. बच्चों को अंग्रेज़ी पढ़ाता था. फिर उसने टीचिंग छोड़ी, थोड़े पैसे कर्ज़ लिए और एक वेबसाइट बनाई. जैसे धड़कन फ़िल्म में सुनील शेट्टी देखते-ही-देखते 500 करोड़ के मालिक बन जाते हैं, ऐसे ही वो आदमी भी चीन का सबसे अमीर इंसान बन गया. ई-कॉमर्स से लेकर डिजिटल बैंकिंग, ऑनलाइन मैसेज़िंग और मूवी प्रॉडक्शन, वो हर फील्ड में मौजूद था. उसकी बनाई कंपनियां चाइनीज जनता के ख़र्च और बचत का पैटर्न तय करने लगीं. वो शख्स था तो चाइनीज़ कम्युनिस्ट पार्टी का मेंबर, मगर वो सरेआम चाइनीज़ सिस्टम से भिड़ने में भी नहीं चूकता था. खुलेआम वो सिस्टम की कमियां गिनाता, आलोचना करता. ये आदमी पिछले दो महीने से लापता है.अक्टूबर 2020 में आख़िरी दफ़ा उसे पब्लिक में देखा गया था. अपनी इस आख़िरी पब्लिक अपीयरेंस में उसने कहा था कि चीन के सरकारी बैंकों की आलोचना की थी. इस आलोचना को शायद चाइनीज़ गवर्नमेंट ने अपनी बेअदबी माना. उसकी कंपनी पर जांच बिठा दी गई. अब ख़बर है कि चीन उसकी कंपनी का नियंत्रण लेने की तैयारी कर रहा है. सरकार के सेट किए गए टोन के चलते जो पब्लिक कल तक उसे सुपरस्टार समझती थी, उसे प्यार से 'डैडी' कहकर बुलाती थी, वो अब उसे खून पीने वाला राक्षस कह रही है.
कहां है वो शख्स? उसके गायब होने का रहस्य क्या है? उसपर लग रहे आरोपों की सच्चाई क्या है?

चीन के दक्षिणी हिस्से में बसा है हांगचो.
चीन के दक्षिणी हिस्से में हांगचो नाम का एक शहर है. यहीं पर एक गरीब परिवार में पैदा हुआ एक लड़का, मा युन. पढ़ने में कच्चा, जैसे-तैसे कॉलेज़ ख़त्म किया. अपने ही शहर में नौकरियां खोजने लगा. तकरीबन 30 जगहों पर अप्लाई किया और हर जगह से खारिज़ किया गया. यहां तक कि KFC में काउंटर जॉब तक नहीं मिली उसको. थककर उसने पुलिस की नौकरी करनी चाही. मगर यहां भी निराशा मिली. फिर सोचा, क्यों न टीचर बन जाए. इसके लिए टीचर्स कॉलेज की एन्ट्रेन्स परीक्षा पास करने की ज़रूरत थी. इसमें भी बैक-टू-बैक दो बार फेल हुआ वो. तीसरे अटेम्प्ट में कामयाबी मिली और किसी तरह कोर्स पूरा करके टीचर बन गया. ये साल था 1988 और इस वक़्त मा युन की उम्र थी 24 साल.
मा युन टीचर तो बन गया, मगर उसकी ख़्वाहिश थी दुकानदारी. वो अपना कारोबार शुरू करना चाहता था. कभी ट्रांसलेशन एजेंसी बनाकर एक्स्ट्रा पैसे कमाता, कभी दवा कंपनियों का पार्ट-टाइम एजेंट बन जाता. वो छोटे-मोटे काम कॉन्ट्रैक्ट पर भी लेने लगा. 1995 के साल ऐसे ही एक कॉन्ट्रैक्ट ने उसकी ज़िंदगी बदल दी. हुआ ये कि एक चाइनीज़ फर्म थी. उसे एक अमेरिकी बिज़नसमैन से अपने बकाया पैसे लेने थे. फर्म ने इन पैसों की वसूली का जिम्मा सौंपा मा युन को. वो कैलिफ़ॉर्निया आया, उस बिज़नसमैन के घर पहुंचा.
मगर उस कारोबारी ने पैसे लौटाने की जगह मा युन पर पिस्तौल तान दी. दो दिन तक एक कमरे में बंद रखा. अपनी जान छुड़ाने के लिए मा युन ने उस बिज़नसमैन के साथ एक करार किया. ये बिज़नसमैन अपनी एक इंटरनेट कंपनी खोलना चाहता था. उसे इस काम के लिए चीन में एक पार्टनर की ज़रूरत थी. मा युन को इंटरनेट के बारे में कुछ भी पता नहीं था. मगर जान छुड़ाने की गर्ज़ से उसने उस अमेरिकी बिज़नसमैन का चाइनीज़ पार्टनर बनने की हामी भर दी.

1995 के साल में सिआटल यात्रा के दौरान जैक मा को इंटरनेट का पता चला. यहां से उनकी दुनिया हमेशा के लिए बदल गई.
इस वायदे के बाद किसी तरह मा युन को रिहाई मिली और वो अमेरिका के ही सिआटल शहर में रह रहे अपने कुछ दोस्तों के पास भाग आया. यहां मा युन ने दोस्तों से इंटरनेट के बारे में पूछताछ की. पता चला कि इंटरनेट पर याहू नाम का एक सर्च इंजन है. वहां एक क्लिक पर दुनियाभर की जानकारी मिल जाती है. मा युन ने इस सर्च इंजन पर चाइना टाइप किया. मगर कोई जवाब नहीं मिला. इससे मा युन को आइडिया आया कि क्यों न वो चाइनीज़ कंपनियों के लिए वेबसाइट बनाए. ताकि वो भी इंटरनेट पर अपनी रीच बढ़ा सकें.
फिर शुरू हुई सक्सेस स्टोरी
इसी आइडिया के साथ मा युन ने चीन लौटकर अपनी टीचिंग जॉब छोड़ दी. करीब 60 हज़ार रुपये का कर्ज़ लिया और एक वेबसाइट कंपनी बनाई- चाइना पेज़ेस. ये चीन की सबसे शुरुआती इंटरनेट कंपनियों में से एक थी. इस कंपनी के सहारे मा युन अमेरिका में रह रहे अपने दोस्तों की मदद से चीनी कंपनियों के लिए वेबसाइट के होम पेज़ बनाते. मा युन का काम चल निकला. उनके नए जमाने वाले इंटरनेट पर आधारित इनोवेटिव आइडियाज़ की फॉलोइंग बनने लगी.
कंपनियों के लिए वेब पेज़ेस बनाने के बाद मा युन ने ई-कॉमर्स सेक्टर में घुसने का फैसला किया. ई-कॉमर्स माने, इंटरनेट पर चलने वाली दुकान. जहां आपको सशरीर किसी दुकान न जाना पड़े, आप इंटरनेट प्लेटफ़ॉर्म पर सामान ऑर्डर कर सकें. ये फरवरी 1999 की बात है. मा युन ने कुछ दोस्तों को पार्टी पर बुलाया और इसी पार्टी में नींव रखी गई 'अलीबाबा' की. अलीबाबा के नाम से आपको मा युन की पहचान मालूम चल गई होगी.

शुरुआती टीम मेंबर्स के साथ जैक मा.
जी, ये अलीबाबा के फाउंडर जैक मा का ही चाइनीज़ नाम है. दोस्तों से मिली शुरुआती फाइनैंसिंग से मा युन उर्फ़ जैक मा ने अलीबाबा बनाया. एक साल के भीतर अलीबाबा को अमेरिकी इन्वेस्टमेंट बैंकिंग कंपनी 'गोल्डमैन सैक्स' और जापानी कंपनी सॉफ़्टबैंक जैसे बड़े निवेशकों की बैकिंग भी मिल गई. शुरुआत में कंपनियों को ऑनलाइन सामान बेचने के लिए फ्री सर्विस देने वाला अलीबाबा चाइनीज़ जनता के खरीदने की आदतें तय करने लगा. 2005 में याहू ने अलीबाबा के साथ एक 400 बिलियन डॉलर्स की डील की और अब अलीबाबा को चीन में याहू के तमाम ऑपरेशन्स का इंजार्च मिल गया. अलीबाबा देखते-ही-देखते चीन का सबसे बड़ा ई-कॉमर्स प्लेटफ़ॉर्म बन गया. चाइनीज़ जनता इंटरनेट से क्या खरीदती है, ये तय करने लगा अलीबाबा.
अब भी इस मशीनरी का एक ज़रूरी फील्ड एक्सप्लोर किया जाना बाकी था. खरीदारी के लिए सबसे ज़रूरी चीज है, पैसा. चीन में बैकिंग सिस्टम पर सरकार का कब्ज़ा है. उसका बर्ताव बहुत एहतियात बरतने वाला है. इस वजह से चाइनीज़ सिस्टम में क्रेडिट का शॉर्टेज़ था. जैक मा ने इस शॉर्टेज़ का फ़ायदा उठाया और वित्तीय सेवाओं में घुस गए. शुरुआत की, अलीपे नाम के एक प्लेटफ़ॉर्म से.
अपने शुरुआती रूप में ये अलीपे अलीबाबा को होने वाले पेमेंट्स को प्रॉसेस करता था. फिर धीरे-धीरे ये डिजिटल भुगतान में भी डील करने लगा. अलीपे बन गया चीन का सबसे बड़ा डिज़िटल पेमेंट प्लेटफ़ॉर्म. 100 करोड़ से भी ज़्यादा लोग डिजिटल पेमेंट के लिए अलीपे इस्तेमाल करते हैं. डिजिटल पेमेंट्स के अलावा जैक मा इंश्योरेंस, मनी-मैनेज़मेंट और कंज्यूमर लोन्स की फील्ड में भी आ गए.
एक आलोचना और पता गुल
2014 में उन्होंने एक और कंपनी बनाई- ऐंट ग्रुप. ये एक फिनटेक कंपनी है. फिनटेक माने, फाइनैंस और टेक्नॉलज़ी का कॉम्बो पैक. ऐसी कंपनी, जो टेक्नॉलजी के सहारे वित्तीय सेवाओं और गतिविधियों में डील करती हो. नवंबर 2020 में यही ऐंट कंपनी दुनिया का सबसे बड़ा IPO लेकर आने वाली थी. उम्मीद थी कि इस कंपनी की शुरुआती पब्लिक लिस्टिंग से करीब 23 लाख करोड़ रुपये की रकम आएगी.
मगर इससे पहले कि ये हो पाता, जैक मा का वक़्त पलट गया. वो चाइनीज़ कम्युनिस्ट पार्टी की बैड बुक्स में आ गए. इसकी वजह बनी, जैक मा की दी एक स्पीच. 24 अक्टूबर, 2020 को दी गई इस स्पीच में जैक मा ने चाइनीज़ बैकिंग सिस्टम की आलोचना की थी. कहा था कि सरकारी बैकिंग सिस्टम इनोवेशन को कुंद करता है. इसके नियम-क़ायदे, इसके काम करने का तरीका बुजुर्गों के किसी क्लब जैसा है. अगर देश को तरक्की करनी है, तो उसे अपने वित्तीय ढांचे में सुधार करना ही होगा.

चीनी सरकार की आलोचना के बाद उनकी कंपनी का IPO रोक दिया गया था.
ये भाषण जैक मा सक्सेस स्टोरी के ताबूत में ठुका आख़िरी कील साबित हुई. 2 नवंबर को उन्हें पूछताछ के लिए बुलाया गया. 3 नवंबर को जैक की ऐंट कंपनी का IPO प्रोग्राम भी रद्द कर दिया गया. फिर ख़बर आई कि अलीबाबा पर मोनोपॉली क़ानूनों के उल्लंघन की जांच बिठाई गई है. उनके ऐंट ग्रुप को भी रीस्ट्रक्चरिंग का आदेश दिया गया. इसके अलावा जैक मा भी लापता हैं. 24 अक्टूबर वाली उस स्पीच के बाद से वो पब्लिक में नज़र नहीं आए. जैक मा कहां हैं, इसे लेकर कई तरह की कन्सपिरेसी थिअरीज़ गर्म हैं. चीनी सोशल मैसेज़िंग प्लेटफ़ॉर्म वीचैट से लेकर ट्विटर तक पर कई आशंकाएं टटोली जा रही हैं.

कई लोग तो ये दावा भी कर रहे हैं कि जैक मा को डिटेंशन कैंप में भेज दिया गया है.
कोई कह रहा है, जैक मा कहीं चीन छोड़कर तो नहीं भाग गए. कोई कह रहा है, उन्हें गायब कर दिया गया. ऐसी भी आशंका है कि कहीं सरकार ने उन्हें अंडरग्राउंड होने का निर्देश तो नहीं दिया. उन्हें यातना शिविर भेजे जाने का भी अंदेशा जताया जा रहा है.

सोशल मीडिया पर अलग-अलग कयास लगाए जा रहे हैं.
चीन में बिज़नस टाइकून्स और बड़ी नामचीन हस्तियों का गायब होना असामान्य नहीं है. इसी साल मार्च में रेन झिकियांग नाम के एक बड़े कारोबारी एकाएक लापता हो गए थे. गायब होने से कुछ ही दिन पहले उन्होंने एक लेख में कोरोना के लिए चाइनीज़ सरकार को जिम्मेदार ठहराते हुए राष्ट्रपती शी चिनफ़िंग को ऐसा मसख़रा बताया था, जिसके शरीर पर कपड़े नहीं हैं, मगर वो सम्राट बनना चाहता है. करीब छह महीने लापता रहने के बाद सितंबर में रेन की ख़बर आई. पता चला कि उन्हें भ्रष्टाचार और रिश्वतख़ोरी के इल्ज़ाम में 18 साल क़ैद की सज़ा सुनाई गई है. क्या जैक मा का भी यही अंज़ाम होगा? फिलहाल इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं.
चीन का अनाधिकारिक ऐम्बैसडर
ऐसा नहीं कि जैक मा और चाइनीज़ सरकार के बीच हमेशा से खुन्नस रही हो. जैक को चीन में सफलता का पर्याय समझा जाता था. शून्य से शुरू करके इतना बड़ा साम्राज्य खड़ा कर लेना, इस कहानी पर चीन को गर्व था. उन्हें चाइनीज़ सिस्टम की श्रेष्ठता के प्रतीक के तौर पर पेश किया जाता था. समझिए कि जैक मा चीन के अनाधिकारिक ऐम्बैसडर थे. वो वर्ल्ड प्लेटफ़ॉर्म्स पर कम्युनिस्ट पार्टी के ऑफ़िशल विजन्स दोहराते. दुनिया उन्हें जानती, सुनती थी. चीन को अपनी सकारात्मक छवि पेश करने का इससे बेहतर क्या मंच मिलता? सोचिए, चीन के लिए बेपनाह ज़हर उगलने वाले डॉनल्ड ट्रंप ने राष्ट्रपति बनने के फौरन बाद जैक मा से मीटिंग की थी.
जैक की पर्सनैलिटी भी किसी सुपर स्टार जैसी थी. वो कभी रॉक कॉन्सर्ट्स में गाते. कभी कुंग फु जैसी चर्चित फ़िल्म में नज़र आते. वो काफी लोकप्रिय हो गए थे. उन्हें एक समानांतर अथॉरिटी माना जाने लगा था. लोग समझते थे, जैक इतने बड़े हो गए हैं कि कोई उन्हें छू नहीं सकता. अपनी इसी छवि के साथ जैक मा समय-समय पर चाइनीज़ सिस्टम की आलोचना भी करते रहते.

2013 में भी उन्होंने सरकार की आलोचना की थी.
2013 में एक दफ़ा चीन के सरकारी अख़बार 'पीपल्स डेली' को दिए इंटरव्यू में जैक ने चाइनीज़ सिस्टम के असंख्य नियम-क़ानूनों की आलोचना कर दी थी. कहा था कि चीन का वित्तीय ढांचा केवल 20 फीसदी लोगों के ही हित देखता है. 2015 में जैक मा की कंपनी हॉन्ग कॉन्ग में युवा उद्यमियों को प्रोत्साहित करने के लिए एक फंड बना रही थी. इस समय हॉन्ग कॉन्ग में बड़े स्तर पर लोकतंत्र समर्थक प्रोटेस्ट हो रहे थे.
सत्ता-प्रतिष्ठान को चुनौती
जैक मा पर दबाव था कि वो प्रदर्शनकारियों को इस फंडिंग के फ़ायदों से दूर रखें. मगर जैक मा ने ये बात नहीं मानी. उन्होंने कहा कि उनकी कंपनी प्रोटेस्ट के आधार पर लाभार्थियों में फ़र्क नहीं करेगी. एक दफ़ा एक सरकारी रेगुलेटर ने अलीबाबा पर फ़ेक प्रॉडक्ट्स बेचने का इल्ज़ाम लगाया. जैक मा ने इन आरोपों को चुनौती दे दी. इतना कैंपेन किया कि रेगुलेटिंग एजेंसी को अपने इल्ज़ाम वापस लेने पड़े.
जैक मा मौका आने पर कन्फ्रंट भी करने से नहीं हिचकते थे. एक दफ़ा उनके थर्ड-पार्टी पेमेंट वाले बिज़नस पर जब सवाल उठा, तो उन्होंने बड़ी बेपरवाही से कहा था. कि अगर इस बिज़नस के बदले किसी को जेल जाना पड़े, तो वो ख़ुद क़ैद भुगतने को तैयार हैं. जैक मा ने बहुत कॉन्फ़िडेंट होकर ये बात कही थी. उन्हें लगता था कि उनकी छवि इतनी बड़ी हो गई है कि सरकार भी उन्हें नहीं छेड़ेगी. शायद जैक मा की यही मुखरता, उनकी यही लार्ज़र दैन लाइफ़ छवि के चलते शी चिनफ़िंग को उनसे ख़तरा महसूस होने लगा था.

शी चिनफिंग चीन में एकछत्र राज चलाते हैं. उन्हें जैक मा की लोकप्रियता से खतरा महसूस होने लगा था.
जैक मा को लंबे समय से टोन डाउन करने का सिग्नल दिया जा रहा था. इसी चलते सितंबर 2019 में अपने 55वें जन्मदिन पर उन्होंने अलीबाबा के चेयरमैन का पद छोड़ दिया. उन्होंने कई मौकों पर कहा था कि अगर सरकार उनकी कंपनी पाना चाहती है, तो वो इसे सरकार को सौंपने के लिए तैयार हैं. लोग सोचते थे, जैक मज़ाक कर रहे हैं. मगर अब जाकर स्पष्ट हो गया है कि सरकार सच में ही उन्हें किनारे हटाकर उनकी कंपनियों पर कंट्रोल करना चाहती है.
अलबीबा पर मोनोपोली का आरोप
चीन ने अलीबाबा पर मोनोपोली बनाने का आरोप लगाया है. ऐंट कंपनी पर क़ानून के प्रति उदासीनता बरतने, ज़रूरी नियमों की अवहेलना करने का आरोप है. सबसे मुख्य आरोप है, ऐंट के क्रेडिट बिज़नस पर. ये उसकी कमाई का सबसे बड़ा ज़रिया है. ऐंट बिना कैपिटल मेंटेन किए शॉर्ट टर्म लोन बांटता था. इसके लिए वो कर्ज़ चाहने वालों को सीधे लोन न देकर बैंकों के साथ कनेक्ट करता. लोन दिलाने के बदले लोगों से फीस लेता और बैंक भी ब्याज़ कमाते.
इस आसान लोन व्यवस्था में करीब 100 चाइनीज़ बैंक ऐंट ग्रुप के साझेदार थे. चाइनीज़ सरकार का कहना है कि ऐसा करके ऐंट ग्रुप ने बैंकिंग सिस्टम को वलनरेबल बनाया. उसके माथे बहुत बड़ा वित्तीय जोख़िम लाद दिया. मगर जानकारों का कहना है कि ऐंट ने तो केवल चाइनीज़ वित्तीय व्यवस्था की ख़ामियों को एक्सप्लॉइट किया. इन लूपहोल्स का ठीकरा जैक मा के माथे नहीं फोड़ा जा सकता है.

सरकार ने अलीबाबा के ख़िलाफ़ ऐंटी-मोनोपॉली इन्वेस्टिगेशन की शुरुआत कर दी है.
जहां तक बात है मोनोपॉली की, तो ये भी चाइनीज़ सिस्टम की ही देन है. राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर वहां सरकार ने हमेशा से ही इंटरनेट सेक्टर को प्रॉटेक्ट किया हुआ है. उसे विदेशी कॉम्पीटिशन से बचाकर रखा है. माइक्रोसॉफ़्ट, गूगल, ऐमज़ॉन और फेसबुक जैसी टेक कंपनियों को वहां ऑपरेट करने का हक़ नहीं. सरकार ख़ुद ही ओपन मार्केट का नियम नहीं मान रही. ऐसे में मोनोपॉली के बहाने जैक मा की गरदन नापना कितना जायज़ है?
देखते-देखते विलेन हो गए जैक मा
इतने समय तक जैक मा सरकार के ही सपोर्ट से ऑपरेट कर रहे थे. उनका चीन की टॉप लीडरशिप के साथ उठना-बैठना था. सारी बिज़नस प्रैक्टिस सरकार के सामने थी. क्या ये मुमकिन है कि बिज़नस से जुड़े उनके कथित ग़लत तौर-तरीके अब जाकर सरकार की नज़र में आए हों? ऐसा भी नहीं कि चीन की टेक कंपनियां सबसे बड़ी मोनोपॉली हों. बैंकिंग, फाइनैंस, टेलिकम्यूनिकेशन्स, बिजली इन सारे सेक्टर्स पर ख़ुद सरकारी कंपनियों की मोनोपॉली है.
जानकारों का कहना है कि ये सारा खेल, सारे आरोप दिखावटी हैं. असल बात इतनी ही है कि जैक मा काफी ताकतवर हो गए थे. सरकार सार्वजनिक तौर पर उन्हें जलील करना चाहती थी. उनके कान उमेठकर किनारे करना चाहती थी. ख़बरों के मुताबिक, ऐंट का IPO इवेंट रद्द करने, अलीबाबा पर जांच बिठाने और ऐंट कंपनी की रीस्ट्रक्चरिंग का आदेश ख़ुद राष्ट्रपति शिनफ़िंग ने जारी किया है. ये आदेश पॉलिसी सुधारने से ज़्यादा बदला लेने पर केंद्रित हैं.

जैक मा चीन की छवि को सुधारने के काम आते रहे हैं.
जैक मा देखते-ही-देखते विलन बना दिए गए हैं. उनकी कंपनी का भविष्य अधर में है. उनकी ग़ुमशुदगी के कारण उनका अपना भविष्य धुंधला दिख रहा है. दो दशकों की उनकी मेहनत पर पानी फिर गया है. जैक मा के बहाने चाइनीज़ सत्ता ने अपने सभी कारोबारियों को संदेश दे दिया है. कह दिया है कि वो जिस सीढ़ी से ऊपर चढ़ाते हैं, उसी सीढ़ी से नीचे भी गिरा देते हैं. सरकार की ये तानाशाही केवल चीन के प्राइवेट सेक्टर के लिए ख़तरे की घंटी नहीं है. चीनी कंपनियों में निवेश करने वाले फॉरेन इन्वेस्टर्स को भी इससे सचेत हो जाना चाहिए. क्योंकि बिज़नस की ये अनिश्चितता, बदला निकालने की इस प्रवृत्ति से उनके भी हित प्रभावित होंगे.

