अमर सिंह दलाल है. इस दलाल ने बाप-बेटे के बीच फर्क डालने की कोशिश की है. जो इसदलाल के साथ रहेगा, वो पार्टी से बाहर जाएगा. मैं नेताजी का उत्तराधिकारी हूं. वोनेता ही नहीं, मेरे पिता भी हैं. मैं हमेशा उनके साथ रहूंगा. पार्टी तोड़ने की मेरीकोई इच्छा नहीं है. 5 नवंबर को होने वाली पार्टी मीटिंग में मैं जाऊंगा. - अखिलेशयादवअपने मुख्यमंत्री आवास पर ये कहते हुए अखिलेश यादव ने चाचा शिवपाल समेत कईमंत्रियों को बर्खास्त कर दिया. लगे हाथ जयाप्रदा को भी फिल्म विकास परिषद से हटादिया गया. यादव परिवार की ये कांटा-कुश्ती पब्लिक में पहली बार आई थी जून में, जबदागी मुख्तार अंसारी की पार्टी के एसपी में विलय को लेकर अखिलेश और शिवपाल में ठनीथी. फिर दोनों तरफ से गोले दागे गए, पर मुलायम सिंह यादव ने एक कुशल पैट्रियार्क कीतरह मामले को निपटा दिया था.लेकिन ऐसा सिर्फ जनता की नजर में हुआ था. अंदर आग तो बहुत पहले से जल रही थी.समय-समय पर धुंआ निकल रहा था. पर मुलायम ने अपनी राजनीति ही कोहरे में की है. हरबार सलटा ले जाते. पर इस बार बेटा हीरा बनकर निकला है. खुद पर भरोसा रखकर उसने सबकोधता बता दिया है. पर ये कहानी बेहद जटिल है. मुलायम सिंह यादव ने अपनी राजनीतिलोहिया के साथ और इंदिरा के खिलाफ शुरू की थी. फिर बाद में राजीव की कांग्रेसके सपोर्ट से मुख्यमंत्री बने.अपनी नई पार्टी बनाई. गठबंधन की केंद्रीय सरकार में रक्षामंत्री रहे. फिर मायावतीके साथ मिलकर उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री बने थे. जब माया ने सपोर्ट खींचा तोकुख्यात गेस्टहाउस कांड भी हुआ, जिसने माया और मुलायम के बीच वो लकीर खींच दी, जोकभी पाटी नहीं जा सकती. सत्ता के प्रति मुलायम का मोह इस कदर था कि कभी किसी चीज कीपरवाह नहीं की. एक दौर था कि मुलायम के प्रधानमंत्री बनने का मौका आया था. तबवरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैय्यर ने हरकिशन सिंह सुरजीत से कहा कि आप ऐसे आदमी कोप्रधानमंत्री बनाना चाहते हैं जो अपने फायदे के लिये किसी को मरवा देता है?मुलायम की इच्छा दबी रह गई. फिर से वो उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बन गये. पर 2007में माया ने इनको पटखनी दी. 2007 में ही एक नामालूम शख्स विश्वनाथ चतुर्वेदी नेमुलायम को आय से अधिक संपत्ति में कोर्ट में घसीटा कि 1979 में 79000 रुपए कीसंपत्ति वाला समाजवादी करोड़ों का मालिक कैसे बन गया? इसी केस में कोर्ट में दियेहलफनामे ने मुलायम का एक और राज खोला, जिस पर दशकों से पर्दा पड़ा था कि मुलायम कीदूसरी बीवी भी है और एक बेटा भी है. साधना गुप्ता और प्रतीक यादव.प्रतीक और अपर्णा यादवसाधना कभी सपा की एक छोटी कार्यकर्ता हुआ करती थीं. मुलायम राजनीति में औरतों कोप्रश्रय देने वाले नहीं थे, पर निजी जीवन में नहीं रोक पाये.सारा खेल मुलायम का खुद का रचा हुआ है. सत्ता के गलियारों में घूमते मुलायम ने बेटेअखिलेश पर ध्यान नहीं दिया था. 1973 में पैदा हुआ था अखिलेश. उसको चाचा शिवपाल नेही पाला था. मां मालती देवी तो थीं ही, पर मालती एक सीधी-सादी औरत थीं. राजनीति मेंदखल नहीं था.उनको अहसास भी नहीं हुआ होगा कि अस्सी के दशक में ही मुलायम ने एक और रिश्ता बनालिया था. शायद समझा भी दिया हो कि लड़कों से गलती हो जाती है. 1988 में साधना सेपैदा हुआ बेटा प्रतीक यादव. लीड्स यूनिवर्सिटी से पढ़ा था, जिसकी बीवी अपर्णा सिंहलखनऊ के टाइम्स ऑफ इंडिया के बड़े पत्रकार की बेटी है. अपर्णा बेहद महत्त्वाकांक्षीहै. ठीक अपनी सास की तरह. साधना के बारे में लोगों को पता नहीं था कि राजनीति मेंउनका दखल है. प्रतीक बॉडी-बिल्डिंग का शौकीन है. रियल एस्टेट में बिजनेस जमानाचाहता है. राजनीति में कतई दिलचस्पी नहीं. पर मां का मन है कि बेटा गद्दी पर आये.अपर्णा यादवमां बेटे को लोकसभा से लड़ाना चाहती थी पर सौतेले भाई अखिलेश ने रोक दिया था. ये आगजलती रही. अपर्णा ने इस चीज को हल्के में नहीं लिया था. स्वच्छता अभियान पर वो मोदीके सपोर्ट में बोलने लगी. निर्भया डॉक्युमेंट्री विवाद में खुलकर बोला. कयास लगनेलगे कि वो भाजपा के साथ जा सकती है. मुलायम को धक्का लगने वाला था, पर अपर्णा कोमना लिया गया कि 2017 के विधानसभा चुनाव में तुमको लड़ना है. अपर्णा पैट्रियार्कीको नहीं मानती. खुलकर बोलना उसकी फितरत है. वहीं अखिलेश की बीवी डिंपल भी अपर्णा कीही तरह ठाकुर है. पढ़ी-लिखी है, पर डिंपल ने मुलायम की सत्ता को चुनौती नहींदी. डिंपल हर जगह एक पारंपरिक औरत के तौर पर ही नजर आती हैं.मुलायम ने अपनी राजनीति बाल-बुतरों के भरोसे नहीं खड़ी की है. उनके सबसे छोटे भाईशिवपाल यादव शुरू से उनके साथ रहे हैं. इतना कि उत्तर प्रदेश के हर जिले में शिवपालकी पकड़ है. वहीं चचेरे भाई रामगोपाल राज्यसभा में हैं और दिल्ली देखते हैं. शिवपालका बेटा आदित्य भी राजनीति में है, पर पिता के कहने पर ही चलता है. रामगोपाल काबेटा भी इसी तरीके का है. पर रामगोपाल और शिवपाल में अंदरूनी खींच-तान है.राम गोपाल, मुलायम और अखिलेशशिवपाल को निराशा हुई थी अखिलेश के मुख्यमंत्री बनने के बाद, क्योंकि उन्हें लगा थाकि वही मुलायम के उत्तराधिकारी होंगे. पर ऐसा हो नहीं पाया. वहीं रामगोपाल का उत्तरप्रदेश में ज्यादा दखल नहीं है, तो वो अखिलेश के साथ अपना भविष्य देखते हैं. इनकेअलावा मुलायम के दो और भाई हैं. एक का पोता और एक का बेटा राजनीति में है. पोते कीही शादी लालू की बेटी से हुई थी. ये दोनों अभी तक न्यूट्रल रहे हैं, पर माना जाताहै कि निर्णय की स्थिति में दोनों अखिलेश के साथ ही जायेंगे.शिवपाल की इच्छा पूरी नहीं हुई, तो उनको इस गम में एक साथी मिला. साधना गुप्ता केरूप में. साधना का शिवपाल की बीवी सरला से बड़ा दोस्ताना है. इनको अखिलेश का राजखटकता है. कहा जाता है कि जब अखिलेश मुख्यमंत्री बने, तो उनको अंदाजा था कि सबसेज्यादा डर अपनों से ही है. साधना के बारे में कहानी है कि उनको व्यापारियों कासपोर्ट है. वो अपनी वैश्य जाति के लोगों को अफसरशाही में भी प्रमोट करती हैं. चीफसेक्रेटरी के पद पर दीपक सिंघल की नियुक्ति को इसी नजर से देखा गया था.शिवपाल और अमर सिंहतो परिवार में इतने सारे लोगों के होने के बावजूद मुलायम अपने मन की बात किसी से कहनहीं पाते थे. इस काम में आगे आये अमर सिंह, जिन पर बच्चन और अंबानी परिवार में कलहकराने का आरोप लगता रहा है. कहा जाने लगा कि अमर परिवार तोड़ने के मास्टर माइंडहैं. अमर ने सपा को ग्रामीण पार्टी से ग्लैमर पार्टी में बदल दिया था. बॉलीवुड औरबिजनेस को अमर सपा में लेकर आए. फिर वो दौर भी आया, जब अमर को पार्टी से निकाल दियागया. पर कहा जाता है कि साधना और शिवपाल ने मिलकर अमर की फिर वापसी कराई. अमर कोप्रतीक का स्नेही माना जाता है.इस माने जाने के क्रम में अखिलेश के साथ बस उनकी बीवी डिंपल और यार-दोस्त ही हैं,जिनको पार्टी से ही शिवपाल ने निकाल दिया था. 2017 का चुनाव आने तक धीरे-धीरे ये तयहोने लगा था कि अखिलेश जनता की पसंद बनते जा रहे हैं. इसमें कोई शक नहीं था किअखिलेश ने सपा की गुंडों वाली पार्टी की इमेज बदल दी थी, तो दोबारा अखिलेश केमुख्यमंत्री बनने को लेकर पंगा स्वाभाविक था. पर राजनीति की कलह में अखिलेश नेमास्टर स्ट्रोक खेला है. अगर वो अपनी अलग पार्टी बनाते हैं तो जनता की सहानुभूतिजरूर साथ रहेगी. पर कितनी, ये कोई नहीं जानता.