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पंजाब के सेलेब्स सोशल मुद्दों पर इतने वोकल क्यों रहते हैं?

क्या उन्हें इसकी कीमत नहीं चुकानी पड़ती?

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किसानों के मुद्दे पर पंजाबी एक्टर-सिंगर दिलजीत दोसांझ के ट्वीट ने काफी बज़ क्रिएट कर दिया है. इसी के बाद तमाम और पंजाबी कलाकार भी खुलकर किसानों के समर्थन में आ रहे हैं. (फोटो- PTI/Social Media)
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अभिषेक त्रिपाठी
5 दिसंबर 2020 (अपडेटेड: 7 दिसंबर 2020, 07:35 AM IST)
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हमारे समाज में एक ‘आदर्श सितारा’ वो होता है, जो कल्चर को कैरी करता हो. जिसके घर से पूजा-पाठ की फोटोज़ सामने आए तो कोने में खड़ी एक खाट दिखे. जो कितना भी बड़ा क्यूं न हो जाए, स्टेज पर बहू-बेटे झुककर पैर छुएं. ये आदर्श सितारे के ‘प्रतिमान’ हैं. आदर्श सितारे की कुछ ज़िम्मेदारियां भी होती हैं. आदर्श सितारा, कि जिसे समाज से, जनता से जो कुछ मिला है, उसे वो लौटाए. अपनी कला से माध्यम से. जब कभी समाज में कुछ ग़लत होता दिखे, तो वो सही के पक्ष में झंडाबरदारी करे या अटलिस्ट करता दिखे.
हमारी हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री के सितारे ‘प्रतिमानों’ के स्तर पर तो खरे उतर जाते हैं. लेकिन जिम्मेदारियों के स्तर पर नहीं. उनमें पॉलिटकली करेक्ट होने की अद्भुत पिपासा है. लेकिन पैरलली एक और आर्ट इंडस्ट्री है, जो सामाजिक मुद्दों पर मुखर दिखती है. पंजाबी आर्ट इंडस्ट्री. पंजाबी कलाकार किसानों से लेकर आतंकवाद और अन्य तमाम मुद्दों पर खुलकर अपनी राय रखते हैं. इस पर बात करते हैं.

मुखर पंजाबी सेलेब्स

दिलजीत – हालिया ज़िक्र इन्हीं का है. दिल्ली में चल रहे किसान आंदोलन पर कंगना रनौत ने ट्वीट किया. किसान आंदोलन और शाहीन बाग़ की दादी को दिहाड़ी मज़दूर बताया. कहा कि सौ-सौ रुपए में ये आंदोलनों में शामिल होती रहती हैं. जवाब दिया दिलजीत दोसांझ ने. दोनों के बीच सीरीज़ ऑफ ट्वीट्स चले. इस सबके बीच दिलजीत की जिस बात ने सोशल मीडिया पर सबसे ज़्यादा असर छोड़ा, वो ये कि उन्होंने किसानों और उनके मुद्दों पर समझ जाहिर की. दूसरी बात कि हर ट्वीट पंजाबी में किया. लेकिन जहां तमाम और बड़े सितारे चुप हैं, वहां दिलजीत ने खुलकर बात रखी.
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गुरदास मान – गुरदास मान ने भी इस बीच ट्वीट्स करके, वीडियो पोस्ट करके किसानों के हित में सोचने के लिए सरकार से अपील की है. हालांकि वो दिलजीत जितने मुखर नहीं रहे, लेकिन बात रखते रहे.
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एमी विर्क - सिंगर एमी विर्क भी किसानों के मुद्दे पर लगातार ट्विटर पर एक्टिव बने हुए हैं. एक चीज, जिस पर आंदोलन कर रहे किसानों के साथ-साथ सपोर्टर्स का भी जोर है, वो है- पीसफुल प्रोटेस्ट. एमी विर्क भी अपने ट्वीट्स में किसानों का पक्ष लेते हुए पीसफुल प्रोटेस्ट पर जोर दे रहे हैं. हालांकि मीडिया से गुस्सा हैं. लगातार लिख रहे हैं कि मीडिया तो किसानों की बात दिखाएगा नहीं तो ट्विटर के माध्यम से ही आगे आना होगा. आठ दिसंबर को किसानों ने भारत बंद की अपील की है और इसके समर्थन में भी एमी विर्क ने ट्वीट किए हैं.
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गिप्पी ग्रेवाल - गिप्पी ग्रेवाल ने इंस्टाग्राम पर लिखा- "किसान बचाओ, देश बचाओ." ट्विटर पर भी लगातार किसानों की बात रख रहे हैं. हालांकि बॉलीवुड से गुस्सा भी हैं. लिखा- प्यारे बॉलीवुड, अक्सर आपकी फिल्में पंजाब में शूट होती हैं. हर बार हम दिल खोलकर आपका स्वागत करते हैं. लेकिन आज जब पंजाब को आपकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत है तो न तो आप दिखे, न कुछ कहा.
हालांकि इस पर तापसी पन्नू ने जवाब देते हुए लिखा था कि बॉलीवुड से भी उनके जैसे कई लोग किसानों की बात कर रहे हैं, इसलिए सबको एक तराजू में न तौला जाए.

हरभजन मान - सिंगर हरभजन मान ने ट्वीट किया -
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रंजीत बावा भी लगातार ट्वीट कर रहे हैं, किसानों के समर्थन में लिख रहे हैं. दिलजीत के ट्वीट्स को भी रीट्वीट कर रहे हैं. उन्होंने ट्वीट किया-
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मीका सिंह और हनी सिंह जैसे न्यू एज स्टार्स ने भी सोशल मीडिया के जरिए किसानों की झंडाबरदारी की है. सिख वॉलंटियर्स का लोगों को खाना खिलाते हुए का वीडियो शेयर करते हुए मीका सिंह लिख रहे हैं- "जो आवे, रजि जावे." मीका ने ये भी लिखा कि जब बात किसानों की आती है तो कोई भी हिंदू या मुस्लिम नहीं होता, सारे किसान होते हैं. मीका के भाई औऱ मशहूर सिंगर दलेर मेहंदी भी टीवी चैनलों पर किसानों के पक्ष में बात कर रहे हैं, ट्विटर पर भी एक्टिव हैं.
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यो यो हनी सिंह भी लगातार तो एक्टिव नहीं हैं, लेकिन बीच-बीच में किसानों के लिए ट्वीट्स भी आ रहे हैं. लिखा- किसानों के साथ मेरी प्रार्थनाएं. वाहेगुरु, मेहर करां. लेकिन इससे पहले कि आप सोचें कि पंजाबी स्टार्स की सामाजिक जागरुकता इसी बार दिख रही है, थोड़ा अतीत में दाखिल होते हैं.

..तो हमें खतरा है

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अपनी बात को खुलकर रखने वाले, समाज-सिस्टम की धज्जियां उड़ाने वाले लोग चंद लोगों की नज़रों में हमेशा अखरते रहे हैं. ऐसा ही एक लिखने वाला जन्मा था 9 सितंबर 1950 को. अवतार सिंह संधू उर्फ ‘पाश’. इंकलाबी पंजाबी कवि, जिसके मुक्त विचारों से तिलमिलाए खालिस्तानी उग्रवादियों ने उसे गोली मार दी थी. लेकिन उनके लिखे को मिटा नहीं सके. ऊपर लिखी पंक्तियां पाश की ही हैं.
Pash
पाश की कविता.

जब हम इतना पीछे जाते हैं तो पंजाबी कवि शिव कुमार बटालवी का नाम भी याद आता है. वही बटालवी, जिन्होंने ओरिजिनल 'इक कुड़ी, जिदा नाम मुहब्बत' लिखा था. हम-आप में से से कइयों ने ये गीत तब जाना, जब 'उड़ता पंजाब' में इस्तेमाल हुआ. बटालवी ने यूं तो प्रेम पर ही अधिकतर लिखा. लेकिन समाज पर सवाल उन्होंने भी उठाए. BBC को दिए एक इंटरव्यू में बटालवी ने कहा था –
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क्या इसकी कीमत नहीं चुकानी पड़ती?

इस समय अधिकतर फिल्म स्टार ये सोचकर सामाजिक मुद्दों पर नहीं बोलते कि इसका मतलब राजनीतिक या सामाजिक बाहुबलियों से भिड़ने के तौर पर लगा लिया जाता है. क्या ये बात पंजाबी कलाकारों के जेहन में नहीं आती? क्या वहां ऐसा कोई ख़तरा नहीं?
पंजाब के एक लोकगायक हुए थे अमर सिंह ‘चमकीला’. उनके गानों में ड्रग अब्यूज और पितृसत्तात्मक मानसिकता की झलक देखने को मिलती थी. कई बार चमकीता के गाने समाज को जस का तस सामने रखते थे. वे कम समय में ही काफी लोकप्रिय हो गए थे. 80 के दशक में कहा जाता था कि चमकीला के गाने नशे की तरह होते हैं. कहा जाता है कि उस दौर में पंजाब के तमाम ट्रक ड्राइवर चमकीला के गाने ही सुना करते थे. गानों में कुछ ऐसा होता था जो उन्हें ट्रक चलाने के दौरान सोने नहीं देता था. बस कैसेट चालू की और ट्रक लेकर निकल पड़े. चमकीला के साथ उनकी पत्नी अमरजोत भी गाती थीं.
The Wire
वेबसाइट पर चमकीला पर एक विस्तृत रिपोर्ट है. इसमें लिखा है –
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चमकीला के गानों को पंजाब में उस दौर में 'पेंडू' यानी डबल मीनिंग गाने कहा जाता था. अपने गानों की वजह से चमकीला को कई बार धमकियां मिलती रहीं. जालंधर ज़िले के मेहसमपुर में आठ मार्च 1988 को 27 साल के चमकीला और उनकी पत्नी अमरजोत की गोली मारकर हत्या कर दी गई. चमकीला और उनकी मंडली एक कार्यक्रम में गाने जा रही थी. स्टेज की ओर जाते हुए गोली मार दी गई. हैरानी वाली बात ये है कि इस हत्याकांड की कोई रिपोर्ट तक दर्ज नहीं हुई. हत्यारों का पकड़ा जाना तो दूर की बात. यानी मुखर होने, बेफ़िक्र होने की कीमत पंजाबी कलाकारों ने भी चुकाई है.
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क्यों खुलकर बोलते हैं पंजाबी कलाकार?

इसे काफी आसानी से समझिए. गुरदास मान से लेकर मीका, दिलजीत के गाने देखिए. पंजाबी फिल्में उठाइए. या फिर बॉलीवुड में पंजाब का डिस्क्रिप्शन देखिए. पंजाब का ज़िक्र आते ही खेत, पिंड, किसानी को काफी गौरव के साथ दिखाया जाता है. ये एक कल्चर है पंजाब का, जहां खेत से, पिंड से बढ़कर कुछ नहीं. मैं जब इस बारे में पढ़ रहा था तो मुझे पंजाबी फिल्म अरदास का एक अच्छा रेफरेंस मिला. फिल्म में एक पंजाबी आदमी अपने ट्रैक्टर का लोन नहीं चुका पाता है. तो बैंक वाले ट्रैक्टर ज़ब्त करने के लिए वसूली वालों को भेजते हैं. वो आदमी उनके सामने कहता है कि मुझे कुछ दिन का समय दीजिए, लोन चुका दूंगा. और इस मोहलत के पीछे दुहाई देता है ‘पिंड की इज़्जत’ की. माने मेरे दो बच्चे हैं, एक बूढ़ी मां है टाइप दुहाई नहीं. पिंड की दुहाई.
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ये कल्चर पंजाबी आर्ट इंडस्ट्री भी कैरी करती है, या यूं कहें कि कैश भी कराती है. पंजाबी ऑडियंस को ‘पंजाबी फील’ चाहिए. मार्केट भी इस फील को साथ लेकर चलना चाहता है और कलाकार भी. रील लाइफ में भी और रियल लाइफ में भी. इसके अलावा एक वजह ये भी है अधिकतर पंजाबी कलाकार खेती-किसानी के बैकग्राउंड से ही आते हैं. माने घर-परिवार में खेती-बाड़ी होती है, लड़के-बच्चे वहां से निकले और आर्ट इंडस्ट्री में नाम कमाया. इस वजह से वे इन मुद्दों से जुड़ाव भी महसूस करते हैं. इन्हीं सब वजहों से पंजाबी कलाकार मुद्दों पर अपनी राय खुलकर रखते हैं.
रही बात मुद्दों पर बात करने की, स्टैंड लेने की तो गुरु गोबिंद सिंह जी की वाणी का संग्रह है- दसम ग्रंथ. सिखों का पवित्र धर्मग्रंथ. उसकी एक शबद है -
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माने– "जब अंत समय आता लगे, जब लगे की अब कोई और विकल्प बचा नहीं है, तो मैं रण में युद्ध करता हुआ, जूझता हुआ मरूं." और यहा तो मरना भी नहीं है. सिर्फ साथ देना है. वरना पाश के शब्दों में – “..मन बदकार पलों के सामने दण्डवत झुका रहे तो हमें देश की सुरक्षा से ख़तरा है.”

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