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अटल और मनमोहन के बाद मोदी प्रवासी भारतीयों को जोड़ने में कितने सफल हुए?

प्रवासी भारतीय सम्मेलन की शुरुआत पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने की थी.

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11 जनवरी 2023 (पब्लिश्ड: 09:25 PM IST)
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प्रवासी भारतीय सम्मेलन में शामिल पीएम मोदी (फोटो: एएनआइ)
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ये बात इतनी बार कही जा चुकी है, कि घिस गई है. कि भारत में अचीवमेंट यही है, कि आप भारत छोड़कर विदेश में बस जाएं. इस लाइन पर कई निबंध, स्टैंड अप जोक्स और चर्चा-विमर्श हमारे सामने आ चुके हैं. लेकिन इस समस्या पर सिर धुनना एक बात है. और आपदा में अवसर खोजना दूसरी बात. हम ये तो जानते हैं कि पढ़ाई, रोज़गार और नए तरह के मौकों के लिए भारतीय पूरी दुनिया के देशों में जाकर बसते हैं. इस बात का एक सिरा हमें ये सोचने पर मजबूर करता है कि भारत को वहां पहुंचने में कितना वक्त लगेगा, कि किसी को भारत से बाहर जाना न पड़े. लेकिन एक दूसरा सिरा भी है, जहां इस बात पर विचार किया जा सकता है कि जो लोग भारत से जाकर बसे हैं, उनकी मदद से भारत को एक ग्लोबल ब्रैंड कैसे बनाया जाए.

बात सिर्फ हमारे स्वार्थ की नहीं है. भारतवंशी जहां भी होते हैं, भारत से एक भावनात्मक जुड़ाव महसूस करते हैं. जब एक मुकाम हासिल कर लेते हैं, तो भारत में कुछ नया करने की ललक रखते हैं. कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो जीवन भर विदेश में मेहनत करने के बाद सुकून की तलाश में अपने वतन की ओर देखते हैं. इन सारी चीज़ों पर बात करने का एक मौका हमें मिला, प्रवासी भारतीय सम्मेलन के मौके पर. तीन दिवसीय सम्मेलन 10 जनवरी को खत्म हो गया. तो आज दी लल्लनटॉप शो में इस विषय पर बात होगी, कि प्रवासियों के मोर्चे पर भारत सरकार कैसा काम कर रही है और पूरी दुनिया से भारतवंशियों को इंदौर बुलाने का हासिल क्या रहा.  

प्रवासी भारतीय सम्मेलन की शुरुआत पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने की थी.  

सरकार के काम के मूल्यांकन के लिए सिर्फ इंदौर के कार्यक्रम पर गौर करने से काम नहीं चलेगा. हमें प्रवासियों को लेकर सरकारी नीति का ऐतिहासिक संदर्भ समझना होगा. प्रवासी भारतीय सम्मेलन की शुरुआत का क्रेडिट पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को जाता है. उनके बाद आए दोनों प्रधानमंत्रियों - डॉ मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी ने इसे जारी रखा और आगे बढ़ाया. लेकिन एक और नाम है, जो आपको मालूम होना चाहिए - डॉ लक्ष्मी मल सिंघवी. राजनीति के अच्छे विद्यार्थी इस नाम को जानते हैं. क्योंकि आप कांग्रेस सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी के पिता थे. लेकिन डॉ लक्ष्मी मल का परिचय काफी विस्तृत है. राजस्थान के जोधपुर से आने वाले डॉ लक्ष्मी मल भी एक नामी वकील थे. उन्होंने राजस्थान उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में वकालत की और अपने सूबे के एडवोकेट जनरल भी रहे. इन्हें राजनीति में भी दिलचस्पी थी और वो 1962 में जोधपुर से निर्दलीय सांसद रहे थे. लेकिन सार्वजनिक जीवन और वकालत से इतर उनकी एक और पहचान थी, जिसपर हम आप फोकस करेंगे - एक राजनयिक की पहचान. वो 1991 से 1997 तक ब्रिटेन में भारत के उच्चायुक्त रहे. ये ब्रिटेन में किसी भी भारतीय राजनयिक के सबसे लंबे कार्यकालों में से एक था.

जब वो वापिस लौटे, तब उन्होंने भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ली. और प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने उन्हें 1998 में राज्य सभा भेजा. 2007 में जब उनका देहांत हुआ, तब अटल बिहारी वाजपेयी ने डॉ लक्ष्मी मल से अपनी दोस्ती याद करते हुए उन्हें ''सरस्वती पुत्र'' कहा था. और ये भी कहा था कि विदेश में बसे भारतवंशियों से संबंध बढ़ाने के लिए ''प्रवासी भारतीय दिवस'' मनाने का विचार डॉ लक्ष्मी मल का ही था.

दरअसल सितंबर 2000 में वाजपेयी सरकार ने डॉ लक्ष्मी मल की अध्यक्षता में High Level Committee on the Indian Diaspora बनाई थी. इस कमेटी को दुनिया भर में भारतवंशियों पर एक विस्तृत अध्ययन करके सिफारिशें पेश करनी थी. कमेटी ने साल 2002 में अपनी रिपोर्ट पेश की. भारत के विदेश मंत्रालय की वेबसाइट पर इस रिपोर्ट की एग्ज़ीक्यूटिव समरी प्रकाशित की गई है. इसके मुताबिक रिपोर्ट में पहले एक ज्योग्राफिकल सर्वे पेश किया गया. कि भारतीय दुनिया में बसे कहां-कहां हैं - खाड़ी देश, अफ्रीका, यूरोप अमेरिका आदि. और यहां बसे भारतीय उन देशों में किस स्थिति में हैं और भारत से किस तरह के संबंध रखने के इच्छुक हैं. और इसपर वो भारत सरकार से कैसी नीतियों की अपेक्षा करते हैं.

इस सर्वे के आधार पर लक्ष्मी मल कमेटी ने कुछ सिफारिशें कीं -
1. 1999 में आई Persons of Indian Origin PIO कार्ड स्कीम को खूब पसंद किया गया था. क्योंकि ये ऐसे लोगों को भारत की नागरिकता के करीब लाता था, जिनके पूर्वज भारत से विदेश जाकर बसे थे. कमेटी ने PIO स्कीम में कई सुधार सुझाए. मसलन फीस कम करना, ऐसे बुज़ुर्गों की मदद करना जिनके पास PIO कार्ड है और वो अपना बाकी जीवन भारत आकर एक नागरिक के तौर पर जीना चाहते हैं, आदि.

2. दूसरी सिफारिश ज़्यादा अहम थी. इसमें कहा गया कि हर साल 9 जनवरी के रोज़ ''प्रवासी भारतीय दिवस'' मनाया जाये. पूरी दुनिया में भारतीय दूतावास कार्यक्रम करें. भारत में भी एक बड़ा कार्यक्रम हो, जिसमें प्रवासी भारतीयों को बुलाया जाए और उनमें से कुछ लोगों को उनकी उपलब्धियों के लिए ''प्रवासी भारतीय सम्मान'' दिया जाए. 9 जनवरी की तारीख इसीलिए रखी गई, क्योंकि इसी रोज़ 1915 के साल में, भारत ही नहीं, दुनिया के सबसे मशहूर NRI - महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका से स्वदेश लौटे थे. इनके आने के बाद जो हुआ, वो इतिहास में दर्ज है.

कुल जमा बात ये थी कि PIO को भावनात्मक रूप से भारत से जोड़ने की कोशिश हो, और इसके लिए कानूनी ढांचा आकर्षक बनाया जाए. एक बार ये काम हो गया, तब आर्थिक लाभ और भारत की ब्रैंडिंग आदि का काम अपने आप आगे बढ़ेगा. वाजयेपी को ये सुझाव बहुत पसंद आए और NDA सरकार ने अगले ही साल से प्रवासी भारतीय दिवस मनाना और सम्मान देना शुरू कर दिया.

लक्ष्मी मल कमेटी ने योजना आयोग की तर्ज पर विदेश में बसे भारतवंशियों के लिए एक संस्था बनाने की भी बात कही थी. लेकिन मई 2004 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने Ministry of Non-Resident Indians’ Affairs नाम से एक पूरा मंत्रालय ही बना दिया. आगे चलकर इसका नाम Ministry of Overseas Indian Affairs हो गया. मनमोहन सिंह सरकार ने प्रवासी भारतीय दिवस और सम्मेलनों का सिलसिला जारी रखा और 2014 में आई मोदी सरकार.

2015 में महात्मा गांधी के भारत लौटने के 100 साल पूरे हो गये. मोदी सरकार ने इस मौके को ज़ोरशोर से मनाया. और प्रवासी भारतीय सम्मेलनों का फॉर्मेट कुछ बदला. अबसे प्रवासी भारतीय दिवस तो हर साल मनाया जाने लगा. लेकिन भारत में होने वाला सम्मेलन हर दो साल में होने लगा.
2015 में ही मोदी सरकार ने विदेश में बसे भारतीयों का वर्गीकरण बदला.
अब तक 3 कैटेगरी थीं -
>NRI - नॉन रेज़िडेंट इंडियन. ये वो भारतवंशी हैं, जो विदेश में रहते हैं. लेकिन नागरिक भारत के हैं. माने ये भारतीय पासपोर्ट रखते हैं.
>PIO - पर्सन ऑफ इंडियन ओरिजिन. ये वो भारतवंशी हैं, जो विदेशी नागरिक हैं. 1999 में PIO स्कीम में उन लोगों को भी PIO कार्ड देने की शुरुआत हुई थी, जिनके पूर्वज चार पीढ़ी पहले भारतीय नागरिक थे.
>OCI - ओवरसीज़ सिटिज़न ऑफ इंडिया. 2006 में OCI कार्ड देने की शुरुआत हुई. ये उन्हें मिलता था, 26 जनवरी 1950 या उसके बाद भारत के नागरिक होने के पात्र थे. इनके नाबालिग़ बच्चे (जो विदेशी नागरिक हों) भी OCI कार्ड के पात्र थे.

मोदी सरकार ने 2015 में PIO कार्ड देना बंद कर दिया. और इस कैटेगरी को OCI में मिला दिया. जिनके पास PIO कार्ड हैं, वो 31 दिसंबर 2023 तक प्रभावी रहेंगे. इससे पहले इच्छुक लोग अपने PIO कार्ड्स के आधार पर OCI कार्ड बनवा सकते हैं.

आप पूछ सकते हैं कि इन कार्डस से फायदा क्या है. तो बात ये है कि भारत  में दोहरी नागरिकता नहीं दी जाती. ऐसे में भारतवंशी जब भारत आने या फिर यहां कोई निवेश या व्यापार आदि शुरू करने की कोशिश करते हैं, तो उन्हें कानून एक विदेशी नागरिक की तरह ही देखता है. लेकिन PIO या OCI कार्ड होने पर भारतवंशी विदेशी नागरिक रहते हुए भी भारतीय नागरिकों को मिलने वाले कुछ फायदे ले सकते हैं. जैसे इन्हें भारत आने के लिए वीज़ा लगवाने की लंबी प्रक्रिया से नहीं गुज़रना पड़ता. तो ये कार्ड ऐसे लोगों के लिए बड़े काम के हैं, जो अपनी विदेशी नागरिकता को छोड़ना नहीं चाहते, लेकिन भारत में भी अपना भविष्य देखते हैं. PIO और OCI के एक हो जाने से ये सारा काम कुछ सुलभ हो गया.

जनवरी 2016 में मोदी सरकार ने Ministry of Overseas Indian Affairs को विदेश मंत्रालय में मिला दिया. इसके बाद प्रवासी भारतीय सम्मेलनों का पूरा काम विदेश मंत्रालय देखने लगा. इसी मंत्रालय की देखरेख में 9 जनवरी 2023 को 17 वां प्रवासी भारतीय दिवस मनाया. मुख्य कार्यक्रम रखा गया मध्यप्रदेश के इंदौर में. थीम थी - Diaspora: Reliable partners for India’s progress in Amrit Kaal.

माने अमृत काल में भारत की प्रगति में भरोसेमंद साथी - भारतवंशी. इसके लिए तकरीबन 70 देशों में बसे साढ़े तीन हज़ार से ज़्यादा भारतवंशियों ने पंजीकरण करवाया था. मुख्य अतिथि थे गुयाना के राष्ट्रपति मुहम्मद इरफान अली. स्पेशल गेस्ट ऑफ ऑनर थे सुरीनाम के राष्ट्रपति चंद्रिकाप्रसाद संतोखी. ये दोनों भारतीय मूल के परिवारों से आते हैं. और इनके देशों में बहुत बड़ी संख्या में भारतवंशी बसते हैं, जिनके पूर्वज 19 वीं सदी में मज़दूरी के लिये भारत से वहां ले जाए गये थे. गुयाना में तो उप राष्ट्रपति का पद भी भारतवंशी के ही पास है - नाम है भरत जगदेव.  

जैसी कि लक्ष्मी मल कमेटी ने सिफारिश की थी, इस साल के कार्यक्रम में भारत सरकार के सारे high profile पदों पर बैठे लोगों ने शिरकत की. राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, प्रधानमंत्री मोदी, विदेश मंत्री डॉ एस जयशंकर और मोदी कैबिनेट के तमाम बड़े चहरे इंदौर पहुंचे. सूबे के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी अपनी पूरी कैबिनेट के साथ मौजूद थे. आप पूछ सकते हैं कि इतने लंबे चौड़े कार्यक्रम पर भारत सरकार ने तो पैसा बहा दिया. लेकिन इसका फायदा भी होता है? जो शख्स विदेशी नागरिक बन गया, उससे संबंध रखने का हमें क्या फायदा. तो हम आपको नागरिक उड्डयन मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया की ये बयान सुनाते हैं. जिसमें उन्होंने बताया कि यूक्रेन पर रूसी आक्रमण के दौरान ऑपरेशन गंगा में रोमानिया जैसे देशों में बसे भारतवंशियों ने दिन रात मदद की.

बात सिर्फ आपदा में मदद की नहीं है. प्रवासी सतत रूप से भारत की मदद करते रहते हैं. पैसों से इतर, भारत को हर क्षेत्र में जिस नई तकनीक और विज्ञान की आवश्यकता है, उसमें भी हमें प्रवासियों से बड़ी मदद मिलती है. मदद की खूब बात हो गई. अब आते हैं सॉफ्ट पावर पर. भारत दुनिया में सबसे बड़ा लोकतंत्र और बाज़ार होने के नाते बहुत प्रभाव रखता है. इस प्रभाव को बढ़ाने में प्रवासी बहुत अहम भूमिका निभाते हैं.

इन्हीं सारे कारणों के चलते प्रवासी भारतीय सम्मेलन का महत्व है. अलग-अलग जगहों पर सम्मेलन का फायदा उन राज्यों और शहरों को भी होता है, जहां ये आयोजन होते हैं. जैसे इस बार इंदौर और मध्यप्रदेश को चर्चा मिली. इस दौरान कुछ प्रवासियों ने अव्यवस्था की शिकायत भी की, लेकिन कार्यक्रम कमोबेश सफल रहा. प्रवासी भारतीय सम्मेलन के साथ ही मध्य प्रदेश ने अपने यहां ग्लोबल इंवेस्टर समिट भी करवा लिया. जिसमें उद्योगपतियों और निवेशकों के साथ-साथ प्रधानमंत्री मोदी भी पहुंचे.

अब आपको बताते हैं उन लोगों के बारे में, जिन्हें इस बार प्रवासी भारतीय सम्मान दिया गया. कुल 27 भारतवंशियों को राष्ट्रपति मुर्मू ने सम्मानित किया. यूं सभी का काम अपने-अपने क्षेत्र में अव्वल है। मगर एक लल्लनटॉप शो में सभी 27 की चर्चा करना संभव नहीं है. इसलिए हम 5 महत्वपूर्ण लोगों के बारे में बताएंगे जिन्हें ये सम्मान मिला.

1. पहले हैं इरफान अली जिनका जिक्र हमने पहले भी किया. ग्लोब पर जब अमेरिका के नीचे साउथ अमेरिकन देशों पर नजर डालेंगे, वेनेजुएला के ठीक दायीं तरफ एक मुल्क है गुयाना. इसी देश के राष्ट्रपति हैं इरफान अली. मोहम्मद इरफान अली साल 2020 में गुयाना के राष्ट्रपति बने थे, वो Indo-Guyanese Muslim फैमली से ताल्लुक रखते हैं. सम्मान मिलने के बाद मीडिया से बातचीत के दौरान राष्ट्रपति अली बताते हैं कि साल 1964 में आई हिंदी फिल्म 'दोस्ती' गुयाना के हर घर में आज भी लोकप्रिय है. भारत ने कोरोना वायरस महामारी के दौर में कोविड वैक्सीन देकर हमारी जो मदद की, उससे फिल्म 'दोस्ती' को चरितार्थ कर दिया.

उन्होंने कार्यक्रम में पीएम मोदी की तारीफ करते हुए कहा- 'पीएम मोदी का गुयाना से खास कनेक्शन रहा है. वो सीएम बनने से पहले ही हमारे देश में आ गए थे. कोरोना महामारी में भारत ने केवल गुयाना का ही नहीं, बल्कि पूरे कैरिबियन का समर्थन किया. भारत ने हमें 5 लाख टीके दिए. भारत ने हमें समर्थन देकर जो दिया है, उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता. राष्ट्रपति अली को दिया गया सम्मान विदेशों में भारत की मुस्लिम विरोधी छवि को भी तोड़ने की कोशिश के तौर पर देखा गया.  

2. दूसरे व्यक्ति हैं, चंद्रिका प्रसाद संतोखी. गुयाना का ही छोटा सा पड़ोसी देश है सुरीनाम. करीब 6 लाख आबादी वाले इस देश में 27.4 फीसदी लोग भारतीय मूल के हैं. वहां के राष्ट्रपति भी भारतीय मूल के चंद्रिका प्रसाद संतोखी ही हैं. पीएम मोदी ने मन की बात में भी इनका जिक्र ऐसे भारतवंशी के तौर पर किया था जो विदेश में रहकर भारत का नाम रोशन कर रहे हैं. सूरीनाम के लेलीडॉर्प में जन्मे चंद्रिका प्रसाद संतोखी की पिछली पीढ़ियां बिहार से ताल्लुक रखती हैं. उनके पिता बिहार से मजदूर के रूप में यहां आए और बंदरगाह पर काम करना शुरू किया. मां एक दुकान पर काम करती थीं. 2022 के जुलाई में वो सूरीनाम के राष्ट्रपति बने. प्रवासी भारतीय सम्मेलन में राष्ट्रपति संतोखी ने पीएम मोदी को सुझाव देते हुए कहा - 'कैरेबियाई देशों में हिन्दी सिखाने वाले संस्थान खोलने में मदद करें, इससे भारतवंशी अपनी संस्कृति और परंपरा को जान सकेंगे.

3. तीसरे सम्मानित व्यक्ति हैं दर्शन सिंह धारीवाल. अमेरिका में रहने वाले NRI दर्शन सिंह धालीवाल साल 2021 में किसान आंदोलन के दौरान भी चर्चा में आए थे. जब उन्हें भारत से वापस भेज दिया गया था. किसान आंदोलन में धारीवाल लंगर चला रहे थे. वो 23 अक्टूबर 2021 को भारत आए थे. उनका आरोप है कि बड़े अधिकारियों ने उन्हें दो विकल्प दिए. या तो वो लंगर बंद कर दें या फिर वापस चले जाएं. जिसके उन्हें लौटना पड़ा था. सम्मान मिलने के बाद इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए धारीवाल ने कहा- पीएम मोदी ने उनसे 150 लोगों के सामने सार्वजनिक तौर पर माफी मांगी थी. और पीएम ने कहा-
"हमसे बड़ी गलती हो गई, आपको भेज दिया, पर आपका बहुत बड़ा बड़प्पन है जो हमारे कहने पर फिर भी आ गए."

बिजनेसमैन धारीवाल ने दावा किया कि ये बात उनसे पीएम मोदी ने 29 अप्रैल 2022 को कही थी, जब वो सिख समुदाय के लोगों के बीच एक बड़े सम्मेलन में शामिल हुए थे. दर्शन सिंह धारीवाल साल 1972 में अमेरिका जब बसे थे, खेती-किसानी से जुड़ा बड़ा बिसनेस सेट किया. साल में 3-4 बार भारत आते रहते हैं.

4. चौथे व्यक्ति हैं वैकुंठम अय्यर लक्ष्मणन. 1974 के साल कनाडा जा बसे थे. वहां के मशहूर वैज्ञानिक और इनोवेटर हैं. इन्होंने इंडो-कनाडा चैंबर ऑफ कॉमर्स और कनाडा-इंडिया बिजनेस काउंसिल जैसे सहायक संगठनों के माध्यम से सामुदायिक सेवा को प्रसारित किया. उन्होंने ग्रामीण भारत में स्वच्छ पेयजल प्रणाली और एक मोबाइल अस्पताल को प्रस्तावित किया है. इन्हें 2019 में इंडो-कैनेडियन चैंबर ऑफ कॉमर्स से लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड भी मिला था.

5. पांचवे सम्मानित व्यक्ति हैं भारतीय मूल के पोलिश बिजनेस मैन अमित कैलाश लाठ. इन्होंने रूस के साथ युद्ध शुरू होने पर यूक्रेन से पोलैंड में भारतीय छात्रों को निकालने में मदद की थी. आपको याद हो तो भारत ने यूक्रेन से छात्र-छात्राओं को निकालने के लिए ऑपरेशन गंगा शुरू किया था. जिसमें अमित कैलाश ने अहम भूमिका निभाई. मूल रूप से गोवा से अमित कैलाश यूरोप-इंडिया चैंबर ऑफ कॉमर्स के डायरेक्टर भी हैं.

इन सभी को बधाई के साथ हम आज का दी लल्लनटॉप शो यहीं पर समाप्त करते हैं. हम उम्मीद करते हैं कि भविष्य में सरकार प्रवासियों पर और ध्यान देगी और खाड़ी देशों में काम कर रहे भारतीय मज़दूरों पर भी ध्यान देगी, जो कफाला पद्दति के चलते शोषण के शिकार हो रहे हैं. इसकी चर्चा कतर में फीफा वर्ल्ड कप के समय भी हुई थी. कतर ने कहा था कि उसके यहां कफाला खत्म हो गया, लेकिन सभी जानते हैं कि ये पद्दति कतर और बाकी खाड़ी मुल्कों में जारी है. बस नाम का फर्क आ गया है. इस पद्दति में मज़दूर एक कॉन्ट्रैक्टर के लिए बंधुआ की तरह हो जाते हैं. उन्हें किसी दूसरी कंपनी में जाने के लिए भी अपने मालिक की मंज़ूरी चाहिये होती है. जो कि आसानी से नहीं मिलती. प्रायः पासपोर्ट भी रख लिये जाते हैं. इस शोषण के चक्र को तोड़ने के लिए भी भारत को अपने प्रभाव का इस्तेमाल करना चाहिए.

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