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अबू धाबी में बना हिंदू मंदिर कैसा है? पीएम मोदी करेंगे उद्घाटन

243 साल पहल अयोध्या के पास के गांव में एक लड़के का जन्म हुआ.बच्चा बड़ा हुआ तो वेदों और परंपराओं का ज्ञाता बना. यही बालक आगे चलकर स्वामीनारायण कहलाया.

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abu dhabi himdu temple swaminarayan
स्वामीनारायण मंदिर
5 फ़रवरी 2024 (Updated: 14 फ़रवरी 2024, 15:42 IST)
Updated: 14 फ़रवरी 2024 15:42 IST
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तारीख 22 जनवरी. पीएम मोदी ने अयोध्या में भगवान राम की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा की. इसी अयोध्या से कुछ दूर है छपिया गांव. 243 साल पहले इस गांव में एक लड़के का जन्म हुआ. नाम रखा गया घनश्याम पांडे. बच्चा बड़ा हुआ तो वेदों और परंपराओं का ज्ञाता बना. और आज इसी बालक के स्थापित किए हुए संप्रदाय के मंदिर पूरी दुनिया को हिन्दू धर्म का संदेश दे रहे हैं. ये बालक आगे चलकर स्वामीनारायण कहलाया. 
 

तो जानते हैं
● स्वामीनारायण कौन थे? उनका घनश्याम पांडेय से गुरु स्वामीनारायण तक का सफर.
● स्वामीनारायण मंदिर दुनिया के किन देशों में है? इन मंदिरों की क्या विशेषताएं हैं ?
● और अबू धाबी में बना मंदिर कैसा है?

14 फरवरी 2024 को अबू-धाबी में पीएम मोदी एक भव्य हिन्दू मंदिर का उद्घाटन करने वाले हैं. यूएई में बना ये मंदिर वेस्ट एशिया का सबसे बड़ा हिन्दू मंदिर है. मंदिर का निर्माण बोचासनवासी अक्षर पुरुषोत्तम स्वामीनारायण संस्था यानी BAPS ने करवाया है.

 स्वामीनारायण कौन थे ? 
अयोध्या के पास एक गांव है छपिया. साल 1781 में रामनवमी का दिन था. गांव के हरिप्रसाद पांडे के घर एक बेटे का जन्म हुआ. नाम रखा घनश्याम पांडे. बचपन में ज्योतिषियों ने उन्हें देखकर कहा था कि ये बच्चा एक तेजस्वी बालक साबित होगा. दुनिया को राह दिखाएगा. खैर, मां -बाप के लिए बात आई-गई हो गई. 8 साल के हुए तो बालक घनश्याम का उपनयन संस्कार या जनेऊ संस्कार हुआ. इसके बाद उनकी शिक्षा शुरू हुई. 11 साल के हुए तो माता-पिता चल बसे. इसके बाद बालक घनश्याम ने घर छोड़ दिया. पूरे देश के भ्रमण पर निकले. भारत की परिक्रमा की और इसी दौरान उनकी मुलाकात हुई गोपाल योगी से. गोपाल योगी उस समय के बड़े योग साधक थे. उन्होंने बालक घनश्याम को अष्टांग योग सिखाया. और यहीं से बालक घनश्याम को नया नाम मिला, नीलकंठ वर्णी. कुछ समय बाद स्वामी रामानंद ने नीलकंठ वर्णी को पीपलाणा गांव में दीक्षा दी. उनके स्वभाव के अनुरूप स्वामी रामानंद ने उन्हें नया नाम भी दिया, सहजानंद. कुछ समय बाद जब स्वामी रामानंद का उत्तराधिकारी चुनने का समय आया, तो उन्होंने सहजानंद को अपने संप्रदाय के आचार्य पद पर आसीन किया. स्वामी रामानंद के बाद सहजानंद ने ही उनके धर्म के कार्यों को आगे बढ़ाया.  गांव-गांव जाकर नारायण-मंत्र का जप करने लगे.

भारत में घूमते हुए सहजानंद गुजरात पहुंचे. यहाँ उन्होंने एक नए संप्रदाय की स्थापना की. उनके सभी शिष्यों ने उन्हें नया नाम दिया, पुरुषोत्तम नारायण. जब भी देश में कहीं प्राकृतिक आपदा आई, उस समय पुरुषोत्तम नारायण और उनके शिष्यों ने लोगों की मदद करनी शुरू की. वो अपने अनुयायियों को हमेशा जरूरतमंदों की सेवा करने को कहते. जल्द ही उनके सेवा-कार्यों से जनता भी प्रभावित होने लगी. लोग उन्हें भगवान का अवतार मानने लगे. और यहीं लोगों ने उन्हें नया नाम दिया स्वामी नारायण.


स्वामीनारायण संप्रदाय के मंदिरों के बनने की शुरुआत 

फरवरी 1822 में पहली बार गुजरात के अहमदाबाद में एक मंदिर का निर्माण शुरू हुआ. स्वामीनारायण और उनके संप्रदाय का ऐसा प्रभाव था कि अंग्रेजों ने भी मंदिर के लिए जमीन दान में दी. ईंटों से बने इस मंदिर में लकड़ी के खंभे इसकी खासियत थी. चूंकि ये मंदिर 24 फरवरी 1822 को बनकर तैयार हुआ था, इसलिए 24 फरवरी का दिन स्वामीनारायण संप्रदाय के लिए काफ़ी अहम माना जाता है.

फिर 19वीं  सदी में ही स्वामीनारायण ने उत्तर प्रदेश से अपने दो भतीजों को बुलाया. एक को वडताल और दूसरे को कालूपुर मंदिर की गद्दी पर बिठा दिया. पर उनका अपने ही भतीजों को गद्दी पर बिठाना संप्रदाय ही कुछ लोगों को रास नहीं आया. विरोध शुरू हुआ. इसका नतीजा ये हुआ कि स्वामीनारायण संप्रदाय दो खेमों में बंट गया. घनश्याम पांडे के खेमे ने वंश परंपरा को स्वीकार किया और दूसरे खेमे ने साधु परंपरा को अपनाया. 1907 में साधु परंपरा के शास्त्री महाराज ने एक नई गद्दी की परंपरा शुरू की. इस गद्दी को नाम दिया गया बोचासनवासी अक्षय पुरुषोत्तम संप्रदाय. इसे ही भाषा में BAPS नाम से जाना जाता है.

कहां-कहां हैं स्वामीनारायण के मंदिर ?
बात करें भारत की, तो भारत में स्वामीनारायण संप्रदाय के मंदिर हर बड़े शहर में हैं. दिल्ली का अक्षरधाम मंदिर, अशोक विहार स्थित स्वामीनारायण मंदिर, हैदराबाद ,कोलकाता जैसी जगहों पर मंदिर हैं. इसके अलावा गुजरात , मध्य प्रदेश में और कर्नाटक में भी स्वामीनारायण संप्रदाय के भव्य और विशाल मंदिर हैं. इन सभी मंदिरों में स्वामी नारायण की पूजा की जाती है. इसके अलावा विदेशों में भी स्वामीनारायण संप्रदाय के मंदिर हैं. अकेले अमेरिका में 20 से ज्यादा स्वामीनारायण संप्रदाय के मंदिर हैं. अमेरिका के अलावा ऑस्ट्रेलिया के सिडनी, मेलबर्न, पर्थ, ब्रिस्बेन और एडिलेड में भी स्वामीनारायण संप्रदाय के मंदिर हैं. इसके अलावा कनाडा और फ़िजी में भी इस संप्रदाय के मंदिर हैं. स्वामीनारायण संप्रदाय के मंदिरों की सबसे बड़ी खासियत है, इनकी शानदार बनावट और वास्तुकला. इसके मंदिरों में भगवान कृष्ण की शैली को प्राथमिकता दी जाती है. स्वामीनारायण के जीवन काल में जितने भी मंदिर बने, उनमें भगवान कृष्ण की झलक दिखाई देती है. कुल मिलाकर पूरी दुनिया में अभी 1 हजार से अधिक मंदिर स्वामीनारायण संप्रदाय के हैं.

 यूएई में कौन सा मंदिर बन रहा है?

इस मंदिर की कहानी शुरू होती है साल 2015 से. पीएम नरेंद्र मोदी को देश की बागडोर संभाले एक साल हो चुका था. इसी साल उन्होंने यूएई का दौरा किया. ये दौरा कई मायनों में अहम था क्योंकि इंदिरा गांधी के बाद पहली बार कोई भारतीय प्रधानमंत्री यूएई के दौरे पर गया था. यहां भारत-यूएई के संबंधों के अलावा एक और बात पर चर्चा हुई. वो थी यूएई में एक हिन्दू मंदिर को लेकर. फिर 2017 गणतंत्र दिवस समारोह में यूएई के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन ज़ायद अल नाहयान बतौर चीफ गेस्ट आए. कहते हैं कि इसी समय इस मंदिर के शिलान्यास का कार्यक्रम तय हुआ था. फिर फरवरी 2018 में पीएम मोदी ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए मंदिर का शिलान्यास किया. अब 14 फरवरी को पीएम मोदी इस मंदिर का उद्घाटन करेंगे.  

मंदिर की विशेषताएं 

इस मंदिर का निर्माण 55 हजार स्क्वायर मीटर के विशाल क्षेत्र में हुआ है. निर्माण के लिए जमीन यूएई के राष्ट्रपति मोहम्मद बिन ज़ायद अल नाहयान ने दी है. ये वेस्ट वेस्ट एशिया का सबसे बड़ा हिन्दू मंदिर है. इस मंदिर का नाम बीएपीएस मंदिर है. इसकी ऊंचाई 32.92 मीटर , लंबाई 79.86 मीटर और चौड़ाई 54.86 मीटर है. मंदिर के बाहरी हिस्से में 96 घंटियां लगाई गई हैं. मंदिर में सात शिखर हैं, जो UAE के सात एमिरेट्स को दर्शाते हैं. साथ ही इसकी दीवारों पर रामायण, शिव पुराण और भगवान जगन्नाथ की यात्रा को भी दर्शाया गया है. इसके साथ ही मंदिर के पास ही एक गंगा घाट भी बनाया गया है जिसमें गंगा जल की व्यवस्था की जाएगी. आने-जाने के रास्ते पर हमेशा ठंडी रहने वाली नैनो टाइल्स लगाई गई हैं. इस मंदिर में गंगा-यमुना और सरस्वती नदी का संगम भी दर्शाया है.इस पूरे मंदिर को बनाने की कुल लागत 700 करोड़ रुपये आई है. खास बात ये है कि इसके निर्माण में लोहे या स्टील नहीं, बल्कि पत्थरों का इस्तेमाल किया गया है. इन पत्थरों और मंदिर में स्थापित होने वाली मूर्तियों को खास तौर पर भारत से भेजा गया है.

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