मैं कहानी सुनाने में, बांधना नहीं चाहता हूं. मैं दर्शक को भावनात्मक तौर परउत्तेजित करना या सलाह देना पसंद नहीं करता हूं. मैं उसे अपराध के भाव तले दबाना यातुच्छ करना नहीं चाहता हूं. ये ऐसी चीजें हैं जिन्हें मैं फिल्मों में पसंद नहींकरता हूं.- अब्बास कियारोस्तमी (1940-2016)द ब्रेड एंड एली अब्बास कियारोस्तमी की पहली फिल्म थी जो उन्होंने 1970 में बनाईथी. 10.21 मिनट की ये ब्लैक वाइट कहानी एक बच्चे के बारे में थी जो तेहरान कीगलियों से होता हुआ घर जा रहा है. उसका मन बचपन की पूरी तरंग में लीन है. रास्तेमें एक खाली डब्बे को लात से मारता जा रहा है. हाथ में बड़ी रोटी है जो संभवत: ईरानीब्रेड संगेक का प्रकार है. एक गली में उसकी तेजी से दौड़ती लय टूटती है जब एक कुत्तासामने आ जाता है. वह भौंकता है. बच्चा डरकर गली के पिछले मोड़ दौड़ जाता है. कुत्ताआगे रास्ते में बैठ जाता है. बच्चा घर नहीं जा पा रहा. ये एक ऐसी स्थिति है जिससेदुनिया के हर गांव-कस्बे के बच्चे दो-चार हुए हैं. मैं भी. लेकिन इसे किसी फिल्ममें कभी नहीं देखा. ये फिल्म किरायोस्तमी ने तेहरान स्थित बच्चों और वयस्क युवाओंके बौद्धिक विकास संस्थान 'कानून' के फिल्ममेकिंग विभाग के लिए बनाई थी. इस विभागके सह-संस्थापक वे ही थे और ये विभाग की पहली फिल्म थी. बाल शिक्षा के लिए बनी होनेके बावजूद फिल्म की प्रस्तुति और खासकर अंत ऐसा था जो एक अच्छे फिल्मकार द्वारा हीसोचा जा सकता है.The Bread and Alley (1970)उनकी आखिरी फिल्म थी लाइक समवन इन लव जो 2012 में प्रदर्शित हुई. ये एक बूढ़ेप्रोफेसर और एक युवती की कहानी है जो एक विश्वविद्यालय की छात्रा है औरवेश्यावृत्ति करती है. जापान में शूट हुई, जापान में ही स्थित इस फिल्म का मूलविचार इससे 20 साल पहले उन्हें आया था जब वे टोकयो के एक कारोबारी इलाके में खड़ेथे. वहां काले सूट-बूट में कई कारोबारी खड़े थे और उनके अंधेरों के बीच एक सफेदब्राइडल गाउन में एक लड़की खड़ी थी. कियारोस्तमी ने किसी से पूछा तो पाया कि वह एकवेश्या है. उसने ब्राइडल गाउन इसलिए पहना हुआ था क्योंकि ऐसे परिधान वो युवाछात्राएं पहनती हैं जो पार्ट टाइम वेश्यावृत्ति करती हैं. मूल फिल्म में हालांकिकाफी तब्दीलियां थीं.Like Someone in Love (2012)इन दो फिल्मों के बीच अब्बास कियारोस्तमी का पूरा जीवन बसा है. उन्होंने 40 सेज्यादा फिल्में, शॉर्ट और डॉक्यूमेंट्री बनाईं. ईरान में क्रांति आई. इस्लामिकमुल्क बन गया. सेंसरशिप बढ़ गई. लेकिन वे अपनी फिल्में बनाते रहे. तमाम दिक्कतों केबीच. दुनिया में ईरान के सिनेमा को उन्होंने सबसे व्यापक पहचान दी. एक और पश्चिमीदेश उनके मुल्क को axis of evil यानी शैतान की धुरी कहने में बिजी रहे, कियारोस्तमीअपनी फिल्मों से ऐसे एंबेसेडर बने हुए थे कि जब अमेरिका में 11 सितंबर 2001 केहमलों के बाद न्यू यॉर्क फिल्म फेस्टिवल में उन्हें आने के लिए वीजा मना कर दियागया तो फेस्टिवल के निदेशक ने इसे बहुत बुरा संकेत बताया. अन्य फिल्मकारों ने भीफेस्टिवल को बॉयकॉट किया. विश्व में सिनेमा विधा के जो पहली पंक्ति के legend हैं,अब्बास कियारोस्तमी उस पंक्ति में खड़े होते हैं. इन्हीं का सोमवार को फ्रांस मेंनिधन हो गया. वे कैंसर का इलाज करवा रहे थे. पिछले महीने पैरिस में उनका ऑपरेशन भीहुआ था. एक अच्छी फिल्म क्या होती है आज उसे लेकर जो भी कमर्शियल परिभाषाएं मौजूदहैं वे सब भ्रम पैदा करने वाली हैं. कियारोस्तमी एक अच्छी फिल्म को इन अर्थों मेंदेखते थे: मुझे लगता है एक अच्छी फिल्म वो होती है जिसमें लंबे समय तक बने रहने कीताकत होती है. आप थियेटर छोड़ने के बाद उसे फिर से गढ़ने लगते हैं. ऐसी बहुत सीफिल्में हैं जो बोरिंग लगती हैं लेकिन वे अच्छी फिल्में हैं. वहीं दूसरी ओर ऐसीफिल्में हैं जो आपको सीट पर जकड़ देती हैं और इतना अभिभूत कर देती हैं कि आप सब कुछभूल जाते हो, लेकिन बाद में आप छला हुआ महसूस करते हो. यही वो फिल्में होती हैं जोआपको बंधक बना लेती हैं. मैं बिलकुल भी पसंद नहीं करता हूं ऐसी फिल्में जिनमेंफिल्मकार दर्शकों को बंधक बना लेते हैं और उन्हें भड़काते हैं. बल्कि मैं उन फिल्मोंको वरीयता देता हूं जो थियेटर में अपने दर्शकों को सुला देती हैं. मुझे लगता है वोफिल्में इतनी दयालु होती हैं कि आपको एक प्यारी झपकी लेने देती हैं और आपको विचलितनहीं छोड़ती जब आप थियेटर से जा रहे होते हैं. कुछ फिल्में रही हैं जिन्हें देखकरमैं थियेटर में सोया हूं लेकिन उन्हीं फिल्मों ने मुझे रात रात भर जगाया है. जिनकेबारे में सोचता-सोचता सुबह को मैं जागा हूं. जिनके बारे में हफ्तों तक सोचता रहाहूं. इस तरह की फिल्में हैं जिन्हें मैं पसंद करता हूं. विश्व के सिनेमा में जापानके अकीरा कुरोसावा, भारत के सत्यजीत रे, ऑस्ट्रिया के माइकल हेनेके, फ्रांस के जॉनलूक गोदार, जर्मन मूल के वर्नर हरजॉग जैसे लोग नहीं हुए हैं. इन्होंने व अन्य नेकहा है कि कियारोस्तमी होने के मायने क्या हैं और इनकी टिप्पणियां पत्थर की लकीरहैं.फिल्म इतिहास में मील का पत्थर सेवन सामुराई (1954) और राशोमोन (1950) बनाने वालेअकीरा कुरोसावा ने कहा था, "जब सत्यजीत रे का देहांत हुआ तो मैं बहुत उदास हो गयाथा. लेकिन कियारोस्तमी की फिल्में देखने के बाद मैंने भगवान का शुक्रिया किया किउन्होंने रे की जगह लेने के लिए हमें एकदम सही आदमी दे दिया है."फिट्जकराल्डो (1982) के रचयिता वर्नर हरजॉग ने अपनी नजर की टॉप-5 फिल्में बताईं तोउनमें चौथे नंबर पर कियारोस्तमी की वेयर इज़ द फ्रेंड्स होम? (1987) थी.Where Is the Friend's Home? (1987)2013 में बेस्ट फॉरेन फिल्म का ऑस्कर जीती एमूर और खासतौर पर द सेवंथ कॉन्टीनेंट(1989) के निर्देशक माइकल हेनेके से जब 2009 में पूछा गया कि वे समकालीनफिल्ममेकिंग परिदृश्य में किसके काम को बहुत ज्यादा पसंद करते हैं तो उन्होंने कहाथा, "मुझे कहना होगा, कियारोस्तमी. अभी भी उनसे आगे कोई नहीं निकल पाया है. जैसेब्रेख़्त (Bertolt Brecht) ने कहा है, "जिसे हासिल कर पाना सबसे कठिन है वो हैसादगी." हर कोई सपना देखता है कि चीजों को सामान्य रूप से करेगा लेकिन फिर भी उसेदुनिया की भरेपन से भर देता है. सिर्फ बेस्ट लोग ही इसे हासिल कर सकते हैं.कियारोस्तमी ने किया है, ब्रेसों (रॉबर्ट, फ्रेंच फिल्मकार) ने किया है." टैक्सीड्राइवर (1978), रेजिंग बुल (1980) और गुडफेलाज़ (1990) जैसी अनेक फिल्मों के दिग्गजअमेरिकी निर्देशक मार्टिन स्कॉरसेज़ी ने कहा था कि कियारोस्तमी सिनेमा में सबसे ऊंचेस्तर की कला का प्रतिनिधित्व करते हैं. कियारोस्तमी के निधन के बाद उन्होंने दहॉलीवुड रिपोर्टर को जारी अपने वकतव्य में गहरा दुख जताया, "जब मैंने अब्बासकियारोस्तमी की मृत्यु की खबर पढ़ी तो मुझे गहरा धक्का लगा और मैं बहुत दुखी हुआहूं. वे उन कुछेक दुर्लभ आर्टिस्टों में से थे जिन्हें दुनिया का खास ज्ञान होताहै. महान जॉन रेनुआ ने कहा था "सच्चाई हमेशा जादुई होती है" और ये बात कियारोस्तमीके अद्वितीय काम का निचोड़ है." असगर फरहादी कियारोस्तमी से मिलने पैरिस जाने वालेथे लेकिन उससे पहले ही वे चल बसे. फरहादी ईरान की उस पीढ़ी के निर्देशक हैंजिन्होंने बड़े होते हुए रोमांचित होकर कियारोस्तमी की फिल्में देखीं. वे उनकी पीढ़ीके लिए बेस्ट आइकन थे. इन्हीं फरहादी ने आगे जाकर अ सेपरेशन जैसी अद्भुत फिल्म बनाईजिसे 2012 में बेस्ट फॉरेन फिल्म का ऑस्कर मिला. और ऐसा करने वाली ईरान की ये पहलीफिल्म थी. फरहादी ने कहा कि कियारोस्तमी ने ईरान और ईरान के बाहर बहुत फिल्मकारोंकी पीढ़ियों को अपने काम से प्रेरित किया है.मोहसेन मख़मलबाफ ईरान के प्रमुख फिल्मकारों में आते हैं. इनसे जुड़ी असली घटना परकियारोस्तमी ने फिल्म क्लोज़ अप बनाई थी. मख़मलबाफ ने कहा कि ईरान के सिनेमा को जोवैश्विक पहचान आज मिली हुई है वो उसके कारण है. लेकिन उनके अपने ही मुल्क में उनकेकाम को पर्याप्त जगह नहीं मिली. उन्होंने दुनिया के सिनेमा को बदल कर रख दिया था.उसे ताजा किया था. उसका मानवीयकरण किया था. जो हॉलीवुड के खराश भरे संस्करण का उलटाथा.Close-Up (1990)अब्बास कियारोस्तमी 1940 में जन्मे थे. तेहरान में. तेहरान विश्वविद्यालय के कॉलेजऑफ फाइन आर्ट्स से उन्होंने पेंटिंग में मेजर किया. पढ़ाई के साथ-साथ उन्होंनेट्रैफिक पुलिसकर्मी के तौर पर भी काम किया. 60 के दशक में ग्राफिक डिजाइनर के तौरपर काम किया. फिर विज्ञापन पोस्टर और फिल्में बनानी शुरू की.जीवन को लेकर कियारोस्तमी के आधारभूत विचार बेहद अनूठे थे. उन्होंने एक कलाकार केतौर पर वो कहानियां चुनीं जो वक्त के दरिया को पार करके भी जिंदा रहेंगी क्योंकिउन्हें बनाने को लेकर दिमाग में किसी किस्म की मिलावट नहीं रखी गई. किसी क्षणिकप्राप्ति का लालच नहीं है. उनकी फिल्मों में ईरान का ग्रामीण परिवेश, संस्कृति,लोगों का स्वभाव, उनका भोलापन, सादगी, बच्चों के विशिष्ट किरदार, व्यवहार, जीवनदर्शन, मृत्यु का दर्शन, हसरतें, सपने, फैंटेसी, गली-मुहल्ले, मध्यमवर्गीय औरनिम्नमध्यमवर्गीय जीवन, सही-गलत, नया-पुराना, समुदाय, सुंदर लैंडस्केप नजर आए हैं.द ब्रेड एंड एली के चार साल बाद 1974 में उनकी फिल्म द ट्रैवलर आई थी जो एक लड़केकासम की कहानी थी. वह ईरान के छोटे शहर में रहता है और उसे दूर एक फुटबॉल मैच देखनेजाना है. पैसे जुटाने के लिए वो अपने दोस्तों और पड़ोसियों को ठगता है. इस फिल्म मेंमानव स्वभाव और सही-गलत का बेहद अनूठा विश्लेषण है. ऐसा observation हमारी फिल्मोंमें नहीं मिलता.The Traveler (1974)फिर 1977 में आई रिपोर्ट एक टैक्स अधिकारी की कहानी थी जिस पर रिश्वत लेने का आरोपलगता है. वो आत्महत्या का विचार करता है. वेयर इज द फ्रेंड्स होम? (1987), जिसनेउन्हें व्यापक वैश्विक पहचान दिलाई, एक 8 साल के बच्चे की कहानी है जो अपने दोस्तकी कॉपी लौटाने के लिए पड़ोस के गांव को निकला है. अगर वो ऐसा नहीं कर पाया तो उसकेदोस्त को स्कूल से निकाल दिया जाएगा. लेकिन वो दोस्त के घर का रास्ता नहीं जानता.इस फिल्म के बाद उन्होंने जो दो फिल्में बनाईं - लाइफ एंड नथिंग मोर (1992) और थ्रूद ऑलिव ट्रीज (1994) - इन्हें कोकर ट्रिलजी कहा जाता है. क्योंकि ये उत्तरी ईरान केकोकर गांव के इर्द-गिर्द बनी हैं. 1990 में ईरान में भूकंप आया था जिसमें 40,000लोग मारे गए थे. इस हादसे का संदर्भ भी इनमें हैं.Through the Olive Trees (1994)क्लोज़-अप (1990) सच्ची घटना पर आधारित फिल्म थी जिसमें एक आदमी ईरानी फिल्मनिर्देशक मोहसेन मख़मलबाफ बनने का नाटक करता है. एक परिवार के लोगों कहता है कि वोउसकी अगली फिल्म में काम करने वाले हैं. बाद में वो खुलासा होता है तो संबंधितपरिवार कहता है कि चोरी करने के लिए उसने ये नाटक किया लेकिन ऐसा करने वाला होसेनकहता है कि बात इससे कहीं ज्यादा जटिल है.उनकी सबसे आइकॉनिक फिल्म टेस्ट ऑफ चेरी (1997) मानी जा सकती है. ये एक ऐसे आदमी कीकहानी है जो आत्महत्या करना चाह रहा है. वो अपनी गाड़ी में एक के बाद एक लोगों सेमिल रहा है और चाह रहा है कि जब वो मर जाए तो कोई उसे ठीक से दफना दे. ये एक मस्टवॉच है. वैसे बाकी सब भी.Taste of Cherry (1997)उनकी फिल्मों की सबसे बड़ी खासियत उनकी काव्यात्मकता है. उसके अलावा यात्राएं. खासकरकारों में होने वाली पात्रों की यात्राएं और बातें. इन्होंने इस फॉर्मेट को बहुतअच्छे से बरता था. जैसे द विंड विल कैरी अस देख लीजिए. या फिर टेन देख लीजिए.बाद में अब्बास खुद 10 ऑन टेन नाम की डॉक्यूमेंट्री में भी इसी अंदाज में नजर आएजहां वे कार में उन जगहों पर जाते हैं और बातें करते हैं जहां पिछली फिल्में शूटकीं.ईरान के जाने-माने फिल्मकार जफर पनाही की 2015 में प्रदर्शित फिल्म टैक्सी इसीप्रारूप पर बनी थी. इसमें पूरी फिल्म टैक्सी, इसे चला रहे जफर और अंदर बैठ रहेपात्रों की बातचीत पर आधारित होती है.https://www.youtube.com/watch?v=eM2tblIkL4gउनके इस प्रारूप को चुनने की खास वजह रही. दरअसल जफऱ कियारोस्तमी के शिष्य हैं.फिल्म थ्रू द ऑलिव ट्रीज़ में वे उनके असिस्टेंट थे. कियारोस्तमी ने ही जफर की 1995में आई पहली फिल्म द वाइट बैलून लिखी और प्रोड्यूस की थी. ये जफर वही हैं जिनकीफिल्मों की विषय वस्तु को लेकर मार्च 2010 में उन्हें उनकी पत्नी, बेटी और दोस्तोंके साथ गिरफ्तार कर लिया गया था. इसके बाद दुनिया भर के कलाकारों, बुद्धिजीवियों,कार्यकर्ताओं ने उनकी रिलीज की कोशिशें कीं. लेकिन 2010 में उन्हें छह साल जेल कीसजा सुनाई गई. 20 साल फिल्में बनाने पर प्रतिबंध लगा दिया गया. बाद में उन्हेंनजरबंद कर दिया गया. उनके देश छोड़ने पर पाबंदी लगा दी. बावजूद इसके जफर ने दो-तीनफिल्में बनाईं जो विदेशों में प्रदर्शित हुई और जीती. 1979 भी कियारोस्तमी के जीवनमें एक बहुत विकट समय था. इस समय ईरान में क्रांति हो गई थी. अमेरिका समर्थितमोहम्मद रज़ा शाह पहलवी को देश छोड़कर जाना पड़ा और धर्मगुरु अयातोल्लाह खोमेनी देश केसर्वोच्च बन गए. उन्होंने ईरान को इस्लामी गणराज्य बना दिया. इस क्रांति के दौर मेंकई फिल्मकार, बुद्धिजीवी और कलाकार देश से बाहर चले गए क्योंकि गहरी सेंसरशिप लगनीलाज़िम थी. लेकिन कियारोस्तमी देश छोड़कर नहीं गए. उन्होंने नई सत्ता के तले सेंसर केनए नियमों की मांगों के बीच अस्तित्व बचाए रखा. बाद में जब उनसे पूछा गया तो वेबोले थे, "एक पेड़ जो जमीन में उगा है, उसे अगर आप एक जगह से दूसरी जगह ले जाते हैंतो वो पेड़ फल देना बंद कर देगा. अगर मैंने अपना मुल्क छोड़ दिया होता तो मैं उस पेड़जैसा हो जाता." इसके बाद लंबे समय पर कियारोस्तमी धैर्य के साथ सेंसर का सामना करतेहुए फिल्में बनाते रहे. और अच्छी फिल्में बनाते रहे. लेकिन महमूद अहमदीनेजाद केसत्ता में आने के बाद उनके लिए फिल्में बनाना बहुत मुश्किल हो गया. तो अपनी आखिरीदो फिल्में उन्होंने ईरान से बाहर शूट की. सर्टिफाइड कॉपी इटली में और आखिरी फिल्मलाइक समवन इन लव जापान में. पिछले हफ्ते ही ऑस्कर पुरस्कारों की एकेडमी ने जिन 683फिल्मी लोगों को आमंत्रित किया उनमें कियारोस्तमी भी थे.ईरान जैसे मुल्क में सेंसरशिप में भला उन्होंने कैसे काम किया होगा? ये सवाल जरूरमन में कौंधता है. इसका जवाब भी कियारोस्तमी ही देते हैं. और संभवत: दुनिया में जिसभी कोने में आर्टिस्ट खुद को बंधा हुआ पाते हैं. जिन्हें लगता है कि सेंसरशिप है.उनके लिए कियारोस्तमी गज़ब प्रेरणा हैं. उन्होंने कहा था:सपना लेने की क्षमता, सबसे महत्वपूर्ण मानवीय चारीत्रिक विशेषताओं में से है जो हरकिसी में आनुपातिक रूप से समान नहीं है लेकिन सबके लिए पर्याप्त है. कल्पना कर पानाऐसा सबसे विशिष्ट और अद्वितीय उपहार है जो मानवों को प्रदान किया गया है. हम देखने,चखने और सुनने जैसी अन्य इंद्रियों को महसूस कर सकते हैं और उनके लिए कृतज्ञ हैं.लेकिन हम नहीं जान रहे कि कल्पनाशीलता के जरिए सामने अपार संभावनाएं खुली हैं. अगरहमारे जीवन में सपनों की कोई क्रिया नहीं होती तो इनके होने का भी कोई कारण नहींहोता. हम सपने कब लेते हैं? जब हम अपनी परिस्थितियों के कारण नाखुश होते हैं. और येकितनी अद्वितीय बात है कि दुनिया की कोई तानाशाही इन्हें (सपनों, कल्पनाशीलता को)काबू में नहीं कर सकती? न्याय की कोई व्यवस्था हमारी फैंटेसियों को नियंत्रित नहींकर सकती. वो आपको जेल में फेंक सकते हैं लेकिन आपके पास फिर भी वो क्षमता होगी किआप अपनी जेल अवधि जेल से बाहर काट सकते हैं और कोई आपको अंदर रख नहीं पाएगा.कल्पनाशीलता के जरिए आप दुनिया की सबसे दुर्गम दीवारों को लांघ सकते हैं और आपकाकोई निशान भी पीछे नहीं छूटा होगा.- अलविदा मास्टर!Also Read: सत्यजीत राय के 32 किस्से : इनकी फ़िल्में नहीं देखी मतलब चांद और सूरजनहीं देखेवो गंदा, बदबूदार, शराबी डायरेक्टर जिसके ये 16 विचार जानने को लाइन लगाएंगे लोगHuman Rights पर एक लघु निबंधअभिनय जगत में आज शोक है, एक एक्टर ने एक्टिंग छोड़ दी हैपावेल कुचिंस्की के 52 बहुत ही ताकतवर व्यंग्य चित्रबिमल रॉय: जमींदार के बेटे ने किसानी पर बनाई महान फिल्म 'दो बीघा ज़मीन'कोई नहीं कह सकता कि वो ऋषिकेश मुखर्जी से महान फ़िल्म निर्देशक है(STORY FIRST PUBLISHED ON JULY 6, 2016.)