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अमानतुल्लाह ख़ान जी, रमज़ान में मुसलमान क्या और काम नहीं करते, जो वोट नहीं देंगे?

रमज़ान में चुनाव पर अमानतुल्लाह ख़ान से ज़्यादा सेंसिबल बात असदुद्दीन ओवैसी ने कही है.

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12 मार्च 2019 (अपडेटेड: 11 मार्च 2019, 04:37 AM IST)
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इस बार चुनाव के तीन चरण रमज़ान के महीने में पड़ेंगे.
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10 मार्च को लोकसभा चुनावों की एग्जाम शीट आई. उसके बाद आम आदमी पार्टी के विधायक अमानतुल्लाह ख़ान का बयान आ गया. बयान भी ऐसा कि उसमें तुक खोजने की दूर-दूर तक संभावना नहीं है. पहली नज़र में तो वो मुस्लिम समुदाय के हक में कही हुई बात लगती है लेकिन गौर किया जाए तो है ऐन उलट. ज़्यादा तीखा होकर कहा जाए तो ये एक तरह से मुस्लिम समुदाय का अपमान ही है.
पहले बयान जान लीजिए. लोकसभा चुनाव 11 अप्रैल से लेकर 19 मई तक होने हैं. रमज़ान का महीना 5 या 6 मई से शुरू होगा. यानी वोटिंग के कम से कम तीन चरण रमज़ान के महीने में पड़ेंगे. रमज़ान का महीना यानी रोज़े रखने का महीना. अमानतुल्लाह ख़ान ने ट्विटर पर लिखा कि रमज़ान में मुसलमान कम वोट करेगा और इसका फायदा भाजपा को होगा.
देखिए वो ट्वीट:
अमानतुल्लाह खान पहले भी विवादों में रहे हैं.
अमानतुल्लाह खान पहले भी विवादों में रहे हैं.

इस ट्वीट को पढ़ने के बाद मुझे बचपन का एक वाकया याद आ गया. पड़ोस के एक अंकल थे. पूरे महीने भर के रोज़े रखते थे. हर साल. बिना नागा. मोहल्ले में इस बात की बड़ी धाक थी. बस हमारी अम्मी इम्प्रेस नहीं होती थी. कहती थी, "रोज़ा रखकर काम की छुट्टी कर लेता है. सारा दिन लेटा रहता है. ऐसे क्या खाक रोज़ा कबूल होगा?" अम्मी की वो बात दिमाग में घुस गई थी. उनकी उस फटकार से जो एक काम की सीख मिली वो ये कि रोज़े का मतलब दिन के कामकाज को तिलांजलि देना नहीं है. रोज़ा रोज़ाना के रुटीन के साथ-साथ ही चलता है. लोगबाग पूरी अकीदत से रोज़ा रखते हैं और अपने तमाम रोज़मर्रा के काम भी निपटाते हैं.
न जाने क्यों विधायक जी को लगता है कि मुस्लिम समाज के लोग रोज़ा रखते हुए वोट नहीं कर पाएंगे. न सिर्फ अमानतुल्लाह ख़ान को बल्कि तृणमूल कांग्रेस के नेता फिरहाद हकीम को भी ऐसा ही लगता है. हकीम कोलकाता के मेयर भी हैं. उन्हें भी लगता है कि रमज़ान में वोटिंग अल्पसंख्यक समाज के लिए असुविधा पैदा करेगी.
फिरहाद हकीम पश्चिम बंगाल में शहरी विकास मंत्री भी हैं.
फिरहाद हकीम पश्चिम बंगाल में शहरी विकास मंत्री भी हैं.

मुस्लिम समाज की नुमाइंदगी करते ये लीडरान रोज़े के बेसिक स्ट्रक्चर को ही नज़र-अंदाज़ कर रहे हैं. यूं तो गर्मियों का रोज़ा अपने आप में ही कड़ी आज़माइश होती है. रोज़ेदार 14 से 15 घंटे भूखे-प्यासे रहते हैं. बावजूद इसके तमाम काम करते हैं. ऐसे में उनके बारे में ये मान लेना कि वोटिंग उनके लिए असुविधा पैदा करेगी थोड़ी सी नाइंसाफी तो है. अमानतुल्लाह ख़ान ने तो इसका सरलीकरण भी कर दिया. उन्होंने घोषणा कर दी कि मुसलमान कम वोट करेगा और फायदा बीजेपी को होगा. ये एक तरह से मुस्लिम समाज का अपमान ही है.
उस पर तुर्रा ये कि इलेक्शन कमीशन ने भी इस पर सफाई दे डाली. बोला कि रमज़ान के सारे दिनों में इलेक्शन न रखना मुमकिन नहीं था लेकिन जुमे का ध्यान रखा गया है. कमाल ही है भई! ज़रूरत ही क्या है ऐसी सफाई की? अव्वल तो यही बात कि एक सेक्युलर लोकतंत्र किसी मज़हब के व्यक्तिगत कार्यकलापों से क्यों ही प्रभावित हो? ऊपर से रमज़ान में वोटिंग कोई इतनी बड़ी बात भी नहीं है. ठीक ही कहा असदुद्दीन ओवैसी ने कि जो लोग चुनावों की तारीखों को लेकर कंट्रोवर्सी कर रहे हैं वो इस्लाम को नहीं जानते. उन्होंने रमज़ान में चुनाव कराने का स्वागत किया.
उधर जावेद अख्तर ने भी ऐसे लोगों को ट्विटर पर लताड़ लगाई है. वो बोलें,
"मुझे तो ये रमज़ान और इलेक्शंस वाली पूरी चर्चा ही घिनौनी लगती है. सेकुलरिज्म का ये विकृत रूप है जो बर्दाश्त के बाहर है. इलेक्शन कमीशन को इसे एक सेकंड के लिए भी नहीं कंसीडर करना चाहिए."
देखिए उनका ट्वीट:
जावेद अख्तर अपनी बेबाक बातों के लिए मशहूर - या बदनाम, जो चाहे कह लीजिए - हैं.
जावेद अख्तर अपनी बेबाक बातों के लिए मशहूर - या बदनाम, जो चाहे कह लीजिए - हैं.

कुल मिलाकर बात यही कि रमज़ान ऑर नो रमज़ान, वोटिंग करना हर नागरिक का कर्तव्य है. उसके लिए बेतुके एक्सक्यूज़ न दिए जाएं. चाहे रोज़ा हो चाहे निर्जला एकादशी, जो देश का ज़िम्मेदार नागरिक होगा वो ईवीएम का बटन दबाने ज़रूर जाएगा.


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