प्रदीप अवस्थी लल्लनटॉप रीडर हैं. मुंबई रहते हैं. लिखते हैं. एक्टिंग भी करते हैं.उन्होंने हमें ये आर्टिकल लिख भेजा है. आप भी कोई किस्सा, कोई आर्टिकल, कोई फोटो याकोई वीडियो भेजना चाहें. हम तक पहुंचाने को एक मेल गिरा दीजिए.lallantopmail@gmail.com पर. हम छापेंगे. आपका प्यारा सा फोटो लगाएंगे. आप खुश होजाएंगे और हम भी.--------------------------------------------------------------------------------जी हां! हम शर्मिंदा हैं. अब इस शर्मिंदगी में जीते हुए, हाथ स्वयं गले तक पहुंचकरउसे घोटने ना लगें. इसलिए हम गीत लिखेंगे. कहानी लिखेंगे. कविता लिखेंगे. फ़िल्मबनाएंगे. और भी तरीके अपनाएंगे कि हमारे लोग जान सकें. समझ सकें कि वे कुछ विचारोंऔर उनकी तरह के जो नहीं हैं, को ही नहीं नकार रहे. बल्कि उनको मृत्यु के लिए बाध्यकर रहे हैं. वे अकेलापन चुनते नहीं, उन्हें तो साधारण तरीके से अपनी जिंदगी जीनीहोती है. जैसे प्रोफेसर श्रीनिवास रामचंद्र सिरास. लेकिन आपकी भीड़ और हिकारत भरीनज़रें कोई चारा नहीं छोड़ती. ऐसा व्यक्ति,जो कविताएं लिखता हो. अपने घर में शान्तिसे लता मंगेशकर के गाने सुनते हुए, इत्मिनान से शराब पीता हो, कैसे समाज के लिएअनैतिक हो जाता है. क्या सिर्फ़ इसलिए कि अपने घर में, कमरे में, वह एक पुरुष होतेहुए दूसरे पुरुष के साथ शारीरिक संबंध बना रहा है. यह जानकर, यह देखकर, ऐसा क्याहोता है आपके मस्तिष्क में कि आपसे सहन नहीं होता? क्यों आप अपने भीतर जगह नहीं बनापाते ज़रा सी भी अलग सोच और जीवन के लिए. आपके भीतर यह जगह बनेगी, तभी समाज मेंबनेगी ना ! एक घर दिखता है. एक खिड़की भी. कौन दिखाता है ? आंख. वहां कैमरा आंख कीतरह, स्थिर देख रहा है. उस कैमरे में एक कैमरा है, आंख के अंदर एक आंख है,जो हिंसकहै. अब जो है, यह कैमरा ही है जो हमें प्रोफेसर सिरास की दुनिया में ले जाता है.लेकिन उससे पहले एक कैमरा ही था,जिसने उनकी शांत और साधारण ज़िन्दगी में उथल-पुथलमचा दी. छोड़िए, कल्पना मत कीजिए. बस यह बताइए. कमरे के अंदर जो हो रहा है उसमेंआपकी दिलचस्पी क्यों है? क्या ऐसी कुंठा है कि सुकून मिलेगा. फिर एक कानून हैअंग्रेज़ों के ज़माने का. वे छोड़ चुके, हम ढो रहे हैं. अगली जो बात मैं कह रहाहूं. जबकहता हूं तो यही लगता है कि सब कुछ इतना बेतरतीब क्यों है? जैसा होना चाहिए उसकाबिल्कुल उल्टा. दो लोगों का एक बंद कमरे में प्यार करना एक जुर्म? अप्राकृतिक सेक्सजुर्म है.प्राकृतिक सेक्स वह है जिससे बच्चे पैदा हो सकें. फिर बचेगा कौन? कोई मुझेसमझाए कि क्या हो जाता है, आसमान फटने लगता है, भूकंप आता है, कहीं कोई ज्वालामुखीफटता है, प्रलय आ जाती है, आखिर हो क्या जाता है, जब दो लोग प्रेमरत होते हैं? जैसेमैं पुरुष हूं. जैसे कोई स्त्री है. वैसे ही कोई समलैंगिक है. यह भी ख़ुद को खोजनेकी एक यात्रा है. खोजने दीजिए. यही जीवन है. ख़ुद को खोजना, समझ पाना, अपनी पहचान सेजूझना और स्वीकार करना, यह एक निजी यात्रा और संघर्ष है,जिसमें यदि आप साथ नहीं देसकते तो मुश्किलें तो मत बढ़ाइए. पढ़िए अलीगढ़ फिल्म का रिव्यू: गंधाते रिक्शे वाले कोचूमता गे प्रोफेसर! इस सीन में खुशबू नहीं, प्यार है. कहानी जितनी समलैंगिता केबारे में है. उससे कहीं ज़्यादा उससे उपजते संघर्ष, परिस्थितियों और उसके प्रतिलोगों के नज़रिए के बारे में है. पूरी कहानी में कहीं कोई मांग नहीं है. कहीं नहींकहा गया कि हमारे लिए कुछ कहिए. कुछ करिए. कहा गया तो बस यह कि एक व्यक्ति को उसकीज़िन्दगी जैसे वह चाहता है वैसे जीने दीजिए. फ़िल्म कहीं आपसे सहानुभूति नहीं मांगती.बस शर्मिंदा कर जाती है. ऐसे ट्रीटमेंट के लिए ईशानी बेनर्जी और अपूर्व असरानी कोबधाई. हंसल मेहता अपना कैमरा टिकाए रखते हैं. मनोज वाजपेयी के चेहरे पर और हमेंदेखना है. एक चौंसठ साल का आदमी, अपने चेहरे पर पूरी उम्र लिए हुए,जिसके ज़ेहन मेंकई सवाल हैं, लेकिन चेहरे पर नहीं. कोई बांसुरी बजा रहा हो जैसे, और आस-पास कुछ लोगतल्लीनता से सुन रहे हैं,ऐसा ही किया मनोज वाजपेयी ने. वही प्रोफेसर सिरास हैं, तोहंसना मुस्कुराने में सिमटा हुआ है. सरदार खान हैं, तो हंसने में वहशियत है. उन्हेंघर छोड़ने को कहा जाता है, तो उनकी आंखों में सवाल है लेकिन वे पूछ नहीं रही हैं.उनके घर की बिजली काटी जाती है तो अचानक रोहित वेमुला याद आ जाता है. यूं ही तोहोता है सामाजिक बहिष्कार और इस बहिष्कार का अंत देखिए. अभिनय की बात करूं तो एकछोटा सा टुकड़ा है जहाँ राजकुमार राव जब प्रोफेसर श्रीधरन को ढूंढते हैं और मिलने परचलते-चलते सवाल करते हैं प्रोफेसर सिरास के बारे में,तो श्रीधरन (के.आर.परमेश्वर)जीभ बाहर निकालकर सिर हिलाते हैं. यह याद रह जाता है. राजकुमार राव सहजता से अपनेकिरदार की भाषा में उतर जाते हैं. सत्य नागपाल के कैमरे से लम्बे शॉट मनोज के चेहरेपर और उनका उसे संवारना. ऐसे व्यक्ति में मैं देखता हूं. अपने अकेलेपन के साथ उनकीलय. जिसमें उनके पैर थिरकते हैं. वे प्यार की बात कर रहे हैं. महज़ तीन शब्दों कीनहीं. बात कर रहे हैं प्राकृतिक ख़ूबसूरती की. उन्हें बार-बार घर से निकाला जा रहाहै. सामाजिक नैतिकता के नाम पर. तरह-तरह की नैतिकताओं के नाम पर इंसानों को मार देरहे हैं. वह रिक्शावाला, जो जिंदा है,छुपकर जीने के लिए मजबूर है. और उनका क्या जोनैतिकता बचाने के लिए कैमरा लेकर उनके घर में घुसे? जो असल में ग़लत है. फ़िल्म कोईउम्मीद नहीं छोड़ती. कहीं किसी क्रांति के लिए आवाज़ बुलंद नहीं करती. एक व्यक्ति केजीवन का एक हिस्सा भर आपके सामने रख देती है कि देखो यह हो रहा है. दरवाज़े कभी भीटूट सकते हैं. खिड़की हम सबके घरों में है. कैमरा कहीं भी दाखिल हो सकता है और कैमरेकी आंखों में यदि ख़ून हो तो ख़ुद के साथ क्या होता? सोचिए. बस और क्या!--------------------------------------------------------------------------------अलीगढ़ से याद आया. हमने होमोसेक्शुऐलिटी पर एक पूरी सीरीज की थी. उसे भी पढ़ें.LGBTQ 10: 'हां साले, लड़के के साथ सोना चाहता हूं. तुझे प्रॉब्लम?'