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'सफेद पहाड़ियों पर मरने से अच्छा, मैं मंटो के लाहौर में मरूं'

पढ़िए जर्नलिस्ट प्रियंका दुबे का ट्रैवलॉग.

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तस्वीर: स्वयं विकास
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विकास टिनटिन
27 मार्च 2016 (Updated: 27 मार्च 2016, 09:11 AM IST)
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प्रियंका दुबे से कभी मुलाकात नहीं हुई. एक बार दूर से देखा था. तब उन्हें जर्नलिज्म में बढ़िया रिपोर्टिंग के लिए ताजा-ताजा रामनाथ गोयनका अवॉर्ड मिला था. पत्रकारिता में फ्रेश एंट्री मारे हुए बालकों के लिए ऐसे लोगों को देखना, 'ओह देख बेटे' फीलिंग पैदा करता हैं. फेसबुक पर फॉलो करने लगा. सारा लिखा नहीं पढ़ पाता हूं. पर जितना पढ़ता हूं अच्छा लगता है. स्माइली गोलू कमेंट करने का मन करता है. :)
तस्वीर: प्रियंका दुबे के फेसबुक से
तस्वीर: प्रियंका दुबे के फेसबुक से

प्रियंका कहीं भी जाती हैं तस्वीरें खूब खेंचती हैं. फोटोग्राफी का शौक है. लिखने का भी. बिना सजे धजे खूब फोटो लेती हैं. मेरी निर्मला वर्मा से पहली मुलाकात भी प्रियंका के थ्रू हुई. प्रियंका रिपोर्टिंग के लिए कहीं भी निकल जाती हैं. पर पत्रकार होने के साथ खुद में एक बच्ची को बचाए रखती हैं. बच्ची जो कश्मीर में झील देखकर चहकने लगती है. भोपाल का नाम सुनते ही घर को याद करने लगती है. कोई फेसबुक पर कुछ ज्यादा बकर-बकर करता है तो वहां उसे भिड़ती नहीं हैं. पर हां, कभी कभार एक आधी पोस्ट डालकर कहती हैं कि डूड यू आर रॉन्ग.
खैर, ये तो बात हुई सिर्फ प्रियंका की. अब कुछ बात उनकी घुमक्कड़ी की. प्रियंका कुछ रोज से लंदन में थीं. अब इंडिया लौट आई हैं. लेकिन रास्ते में उनका प्लेन खराब मौसम में फंस गया था. घंटों उनका प्लेन फ्लक्चुएशंस के साथ उड़ता रहा. प्रियंका ने उस पर ट्रैवल नोट लिखा है अपने फेसबुक पर. बड़ा प्यारा सा है. हमें अच्छा लगा तो सोचा दी लल्लनटॉप रीडर्स भी पढ़ लें. तो बस हम अपना ज्ञान खत्म करते हैं और प्रियंका का ट्रैवल नोट शुरू करते हैं. - विकास.


 
जॉर्जिया के ऊपर से गुज़रते वक़्त अचानक जहाज़ तेज़ तूफ़ान में फंस गया. किसी सी-सॉ स्विंग की तरह तेज़ी से अस्थिर हो रहे जहाज़ के को-ऑर्डिनेट्स नक़्शे में पढ़ते हुए जैसे सांस रुकने सी लगी. सामने कैस्पियन सी आने वाला था! इस अंधेरी ठंडी रात में कैस्पियन सी में गिरकर मर जाने से ज़्यादा दुर्भाग्यपूर्ण और क्या हो सकता है ? पायलट तुरंत जहाज़ को चार हज़ार मीटर से बत्तीस सौ मीटर पर उतारकर नीचे लाए और स्थिति पहले से कुछ बेहतर हुई. पर फिर भी अगले कई घंटों तक जहाज़ लगातार जारी फ्लक्चुएशंस के साथ उड़ता रहा.
तब मैप पर नज़र गड़ाए सोचती रही! '...अभी तो घर पर सुबह के चार बज रहे होंगे. सब सो रहे होंगे. किसी को पता भी नहीं चलेगा कि प्लेन के साथ क्या हुआ. और रात के अंधेरे में मरने से बुरा क्या हो सकता है. बस किसी तरह ये कैस्पियन सी पार हो जाए एक बार. आई डोंट वांट टू डाई इन सी'. धीरे धीरे समंदर पार हुआ और रात भी डूब गई. किसी सूरियल सपने जैसी रात थी. तुर्कमेनिस्तान, अफगानिस्तान, बुखारा, मुल्तान. अब यही नाम मैप पर चमक रहे थे. हम वापस चार हज़ार मीटर की उंचाई पर थे. मौसम खराब था और जहाज़ उसी सी-सॉ स्विंग वाले अन्स्टेब्ल ढर्रे पर उड़ रहा था.
एक नज़र नीचे देखा तो फिर से दिल में हद्दस बैठ गयी. सुबह की धूप मीलों तक पसरे बर्फ के पहाड़ों पर चमक रही थी. न जाने क्यों मुझे स्विस ऐल्प्स में क्रैश करवाए गए जर्मन प्लेन की याद आ गई. नहीं नहीं, इन सफ़ेद पहाड़ियों में भी नहीं मरना चाहती! यहां गिरे तो किसी को हमारे निशान भी नहीं मिलेंगे कभी! मां कितनी परेशान होगी. फिर थोड़ी देर बाद मैप पर लाहौर दिखाई दिया तो मुझे लगा. यहां ठीक है. यहां लोग भी अपने जैसे हैं. मंटो का घर भी तो था यहां. यहां के बाद आगे कहीं भी गिरे प्लेन, तो उतना दुःख नहीं होगा मुझे. यहां गिरने पर हमें देखने हमारे ही जैसे लोग आएंगे.
गेहूं के खेतों और पूड़ी-छोले की दुकानों से निकलकर. और हमारी ही ज़बान में चिल्लाकर दुनिया को बताएंगे कि उन्होंने हमारे जहाज़ को कैसे गिरते देखा था! कम से कम यूक्रेन में शूट किए गए प्लेन की तरह दूसरे अंजान देश में धुआं उगल रहे रसोईघरों और उनके आगे फैले सूरजमुखी के खेतों में तो नहीं मरेंगे न!
ऐसे किसी देश में मरूं तो मेरे मां-पापा मुझे लेने भी नहीं आ पाते. उनके पास पासपोर्ट्स नहीं हैं और फिर कभी इस दुःख से उबर नहीं पाते. फिर मैंने सोचा की मरने से डर तो नहीं लगता मुझे पर प्रेफरेंस ज़रूर है. जैसे अपनी पढ़ाई के कमरे में अपनी डेस्क से जाना. अपने शहर भोपाल से जाना. मां साथ हो तब जाना. पर अब रोहतक आ चुका था और यह अति स्ट्रेस्फुल फ़्लाइट आखिरकार आखिर में आते आते स्टेबल हो ही गयी थी.
रास्ते भर मैं बहुत कुछ याद करने की कोशिश करती रही पर याद बहुत कम आया. और जो कुछ याद आया वह बहुत अनएक्सपेक्टेड था. जैसे वो दोस्त सारे, जो डेंगू होने पर अस्पताल ले जाते थे और हर दूसरे चौराहे पर गाड़ी रोककर फोर्सफुलि जूस पिलाया करते थे. मां याद आई बहुत. कुछ स्ट्रिंगर दोस्त भी याद आये. जो सुबह चार बजे वाली ट्रिप्स में भी थर्मस में चाय भरके ले आते थे और प्यार से सबसे ज़्यादा चाय मुझे दिया करते थे. पार्क में खेलते बच्चे और सुबह दूध लेने जाते लोग. द शीर हम्बल ऑर्डिनरीनेस ऑफ़ एवेरी डे लाइफ़ ! जीवित रह पाना और इस 'सिर्फ जी पाने' से जुड़ी असीम मानवीय करूणा, यही याद रहा बस!- प्रियंका दुबे

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