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होटलों की ये 5 सच्चाइयां जानिए कि वहां क्या-क्या होता है

एक रिसेप्शनिस्ट ने सब बता दिया है.

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26 नवंबर 2016 (अपडेटेड: 26 नवंबर 2016, 08:18 AM IST)
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ये सुबोध मिसरा हैं. कई तरह के काम करते हैं. जर्नलिज्म भी पढ़े हैं. इंगलिश लिटरेचर भी. शरिया भी पढ़ते हैं, संस्कृत भी. होटल में रिसेप्शनिस्ट हैं. मिजाज ऐसा कि हर चीज नोट करते हैं. हिंदी से विशेष लगाव है. अपने अनुभव लिख भेजे हैं हमें. पढ़िए:
      आदमी जब लाइटों से भकभकाते चौंध मारते खूबसूरत इंटीरियर वाले एक होटल में घुसता है तो अपने आप को 'हिज़ हाइनेस' फ़ील करने लगता है. एक अच्छे-ख़ासे होटल में ठीक-ठीक अरसे तक होटल रिसेप्शनिस्ट रहने का मेरा व्यक्तिगत अनुभव ये रहा कि हिंदुस्तानी आदमी हर जगह 'जित्ता हो सके लपेट लो' वाले माइंडसेट के साथ जाता है. और जो होटल में नहीं जाता, रोज़ाना आते-जाते केवल होटलों के बाहर से गुज़रता है उसने तो इधर-उधर से सुनकर होटल और होटल वालों के बारे में न जाने क्या-क्या ग़लतफ़हमी पाल रखी होती है. आज मैं आपको ऐसे ही पांच मिथ बताता हूं जो होटल-इंडस्ट्री के बारे में बहुत पॉपुलर हैं :

1. इतने टूरिस्ट आते तो नहीं हैं ? काम कैसे चलता है?

होटल को देख के सबसे पहला सवाल आदमी यही सोचता है, कि इतने टूरिस्ट आते तो नहीं. फिर ये होटल कैसे चलते हैं? तो भाईसाहब, दरअसल होटल केवल टूरिस्ट्स के भरोसे नहीं चलते. न चल ही सकते हैं. होटलों का असली काम चलता है कॉर्पोरेट लोगों से. मने ये जो टाटा-रिलायंस-बिरला जैसी कंपनियां हैं. जिनके मार्केटिंग, सेल्स, मेनेजर वगैरह लोग कंपनी के काम से अपने होम-टाउन से बाहर ही बाहर रहते हैं. अब चूंकि अलग-अलग जगहों पर एक-दो दिन का ही काम होता है इसलिए कम्पनी अपना गेस्ट-हाउस नहीं बनाती और लोगों को ठहराती है होटलों में. मज़े की बात ये कि होटल में रहने का खर्चा भी कंपनी ही देती है. इससे होटल कमाते हैं.

2. गन्दे काम होते हैं खूब!

होटलों के बारे में जो सबसे बड़ी ग़लतफ़हमी लोगों को होती है वो ये कि होटल में 'वैसे वाले' काम होते हैं . जी नहीं जनाब. ऐसा कोई काम अगर वहां होगा तो बाकी गेस्ट लोगों को भी कभी न कभी पता लग ही जाएगा. इससे कॉर्पोरेट के साथ किया गया कॉन्ट्रैक्ट टूटने का खतरा होता है. मेरे जानने में एक होटल से एयर-फ़ोर्स जैसी कमाऊ पार्टी का कॉन्ट्रैक्ट सिर्फ इस वजह से टूटा कि रहने आए अफसर को फर्श पर बाल पड़े दिख गए थे. तो ऐसा नुकसान कोई भी होटल खुद अपना नहीं करता.

3. जुगाड़दानी!

होटल में रहते मैं जिस चीज़ से सबसे ज़्यादा दुखी था वो थी आने वाले पुरुष-गेस्ट्स की ठरक! ये वैसे बड़ा सीधा मामला है. जब लोगों में ये भी मिथ है कि होटल में गन्दे काम होते हैं तो ये भी होना ही था कि हर होटल एम्प्लॉयी 'जुगाड़दानी' हो. मने कि, वो कॉल गर्ल बुला दे. दिल्ली के पहाड़गंज से चूंकि जी. बी. रोड का रेड लाइट एरिया पास है इसलिए वहां के बहुत से चालू किस्म के लॉज वाले ऐसे जुगाड़ रखते हैं. लेकिन मालिक इसका मतलब ये कतई नहीं कि हर होटल वाला दलाल है.

4. तुम तो यार पुलिसवाले हो जैसे!

सिक्योरिटी के लिए हर होटल में लाल रंग के गत्ते वाला एक खूब भारी-भरकम रजिस्टर होता है जो सरकारी होता है, और पुलिस उसे चेक कर सकती है. उसमें हमें हर गेस्ट की पूरी डिटेल उसी से भरवानी होती है, कुल 16 कॉलम होते हैं शायद. थोड़ा सा कलम चलाने में घिसता थोड़ी है कोई भाई साहब! और है भी तो गेस्ट की ही सुरक्षा के लिए न. लेकिन ना! लोग तुरंत ताने मारते हैं 'हम आतंकवादी दिख रहे हैं तुम्हें?' भई आपके साथ जो रह रहा है, कोई बात पर टुन्न-फुन्न होने पर वही आपको चमकाकर चला गया, तो पुलिस उसे कैसे खोजेगी? बस इसीलिए भरवाते हैं हम.

5. होटल मने ए.टी.एल. (ऑल टाइम लिकर)

तीसरे नंबर वालों के बाद कोई सबसे ज़्यादा तंग करता है तो वो हैं ये लोग. जो होटल को इमरजेंसी ठेका समझते हैं. इस केटेगरी में होटल में रहते गेस्ट भी आते हैं और रात-बिरात दारु तलाशने वाले फक्कड़ भी. दिल्ली में बाकायदा रात बारह बजे के बाद बीट-अफ़सर खुद आ कर होटलों के बार पे ताला चेक करते हैं. होटल में रहते हो, लेट हो, तो इतना कर लो यार कि फोन कर के बोल दो निकाल के रखने को. गेस्ट हो तो इतनी सेवा तो कर ही दी जाएगी. मगर भाई रात में तीन बजे रिसेप्शन पर आ के गदर मचा के क्यों दूसरे का भी दिमाग भन्नाते हो. तो जनता ! रहम खाओ, होटल में काम करने वाले भी तुम्हारी तरह ही नौकरी पर हैं. जीने खाने दो भाई.

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