इस आदमी की वजह से अमरनाथ यात्रा हमले में बची बहुत से लोगों की जान
ऐसा क्या किया इस आदमी ने, जानिए...

अमरनाथ यात्रा के दौरान हुए आतंकी हमले में जिस शख्स का जिक्र किया जाना सबसे जरूरी है, वो हैं सलीम. सलीम उसी बस के ड्राइवर हैं, जिस पर आतंकियों ने गोलियां बरसाईंं और सात लोगों को मार डाला. जैसे ही गोलियां चलनी शुरू हुईं, बस में मौजूद हर शख्स घबरा गया. सलीम भी. लेकिन उन्होंने होश नहीं खोया. उन्होंने बस बंद नहीं की. चलाते रहे. और तब तक चलाते रहे, जब तक वो लोगों को आतंकियों से दूर सुरक्षित स्थान तक नहीं ले गए. अगर वो ऐसा न करते, तो शायद उस बस में कोई जिंदा न बचता. सलीम की इस बहादुरी के लिए जम्मू-कश्मीर सरकार ने उन्हें छ: लाख रुपए का इनाम देने की घोषणा की है. राज्य सरकार ने मृतकों के घरवालों को भी 6-6 लाख रुपए मुआवजे की घोषणा की है. सलीम को हमारा सलाम.
आइए, अब आपको बताते हैं अमरनाथ यात्रा के दौरान हुए हमले की पूरी कहानी और कैसे अमरनाथ में शुरू हुई थी पूजा...
अमरनाथ यात्रा पूरी करके जम्मू लौट रहे श्रद्धालुओं की एक बस पर 10 जुलाई की शाम 8:20 पर आतंकवादियों ने हमला कर दिया. अनंतनाग के पास बटेंगू गांव में हुए इस हमले में सात श्रद्धालुओं की मौत हो गई, जबकि 19 से ज्यादा घायल हो गए. मरने वालों में पांच महिलाएं हैं. रिपोर्ट्स के मुताबिक बाइक से आए दो आतंकियों ने पुलिस और 54 यात्रियों से भरी इस बस पर फायरिंग की. मरने वाले श्रद्धालुओं में तीन गुजरात, दो महाराष्ट्र और दो दमन के रहने वाले थे. आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा ने हमले की जिम्मेदारी ली है. वहीं आतंकियों की तलाश के लिए सर्च ऑपरेशन जारी है.

जम्मू-कश्मीर पुलिस के प्रवक्ता की तरफ से जारी बयान में कहा गया, '8:10 बजे आतंकियों ने सबसे पहले बटेंगू के पुलिस बंकर पर हमला किया था. हमने जवाब में गोलियां चलाईं, लेकिन दोनों तरफ कोई नुकसान नहीं हुआ. इसके बाद आतंकियों ने खानबल के पुलिस नाका पर गोलियां चलानी शुरू कर दीं. जवाब में पुलिस ने भी गोलियां चलाईं. एक यात्री बस पर फायरिंग हुई, जिसमें सात लोगों की मौत हो गई और 18 घायल हो गए. इनका इलाज कराया जा रहा है.'

आतंकी हमले में मरने वाले श्रद्धालुओं की लिस्ट
जम्मू-कश्मीर जोन में CRPF के अडिशनल डायरेक्टर जनरल सच्चिदानंद श्रीवास्तव ने बताया, 'जब बस पर हमला हुआ, तब उसमें करीब 60 लोग थे. बस बालटाल से आ रही थी और बटेंगू की तरफ जा रही थी. सात यात्रियों की मौत हुई है, कई यात्री घायल हुए हैं और उनमें से कुछ की हालत बेहद गंभीर है.' बताया जा रहा है कि हमले से पहले करीब 4-5 आतंकियों ने इलाके की रेकी की थी.

हमले में घायल हुए लोगों की लिस्ट
अभी कुछ साफ नहीं, लेकिन हमले के ये दो प्लॉट नज़र आ रहे हैं
कश्मीर से अब तक आईं कुछ रिपोर्ट्स में बताया जा रहा है कि बाइक से आए आतंकी पुलिस जीप पर हमला करने आए थे. जीप में हथियारबंद पुलिसकर्मी थे और दोनों के बीच फायरिंग हो रही थी. बस इनके बीच में आ गई और श्रद्धालुओं की मौत हो गई. दूसरी थ्योरी ये बताई जा रही है कि आतंकी श्रद्धालुओं पर ही हमला करने आए थे और फायरिंग करके फरार हो गए. पुलिस से जुड़े सूत्रों को मुताबिक आतंकियों ने पहले बटेंगू के पुलिस बंकर पर ही हमला किया था.

संदिग्ध आतंकी इस्माइल
सलीम न होते, तो श्रीनगर-जम्मू नेशनल हाइवे पर और लाशें होतीं
आतंकी हमले के दौरान बस में मौजूद रहे योगेश प्रजापति बताते हैं, 'बस पर दाहिनी तरफ से हमला किया गया था. उस समय वहां बहुत अंधेरा था. जैसे ही हमें गोलियों की आवाज सुनाई दी, ड्राइवर सलीम ने बस की स्पीड तेज कर दी और काफी आगे जाकर एक चौकी पर बस रोकी. उसकी सूझबूझ की वजह से कई लोगों की जान बच गई.'

बस चलाने वाले सलीम
सलीम के भाई जावेद मिर्जा ने मीडिया से बात करते हुए बताया, 'मेरे भाई ने मुझे रात में साढ़े नौ बजे फोन करके बताया था कि उसकी बस पर फायरिंग की गई है. उसने मुझे बताया कि जब आतंकी बस पर गोली चला रहे थे, तब भी वो रुका नहीं. श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिए उसने बस को सुरक्षित जगह मिलने से पहले नहीं रोका.'

ड्राइवर सलीम का भाई जावेद
खुद को बस का रसोइया बताने वाले अमित भी इस हमले में घायल हुए. उन्होंने बताया, 'वहां 40 से 60 सेकेंड तक गोलीबारी हुई. हर तरफ से गोलियां आ रही थीं. हर कोई रो रहा था. ढेर सारे यात्री वहां फैले खून के बीच पड़े हुए थे. हम लोग बालटाल से जम्मू जा रहे थे.' अमित का अनंतनाग के जिला अस्पताल में इलाज चल रहा है.
काफिले से अलग हो चुकी थी बस
अमरनाथ जाने वाले यात्रियों की गाड़ियां सुरक्षा दस्ते के बीच चलती हैं, लेकिन अनंतनाग में जिस बस पर हमला हुआ, वो दूसरी गाड़ियों से अलग हो चुकी थी. सोमवार को बाकी सभी यात्रियों का काफिला शाम चार बजे से इस इलाके से लौट गया था. यात्री योगेश ने बताया कि बस पंचर हो गई थी, जिसे ठीक करने में दो घंटे लग गए और इसी वजह से बस बाकी काफिले से अलग हो गई. हालांकि, अभी इस बात की जांच की जा रही है कि बस के साथ कितनी सुरक्षा व्यवस्था थी.

हॉस्पिटल में इलाज के दौरान घायल महिला
कुछ सूत्रों का ये भी कहना है कि इस बस के यात्री श्रीनगर घूमने चले गए थे, जिसकी वजह से वो बाकी काफिले से अलग हो गए. CRPF का कहना है कि बस ने सुरक्षा नियमों का उल्लंघन किया है.
CRPF डीजी राजीव भटनागर बताते हैं, 'ये बस ऑफीशियल काफिले का हिस्सा नहीं थी, क्योंकि इसका अमरनाथ बोर्ड के पास रजिस्ट्रेशन नहीं कराया गया था. जितने भी नॉन-ऑफीशियल वाहन श्राइन की तरफ जाते हैं, उनका रजिस्ट्रेशन जरूरी होता है. जिस जगह हमला हुआ है, ऑफीशियल काफिला वहां से शाम सात बजे निकल चुका था. तब उसके साथ जम्मू-कश्मीर पुलिस और CRPF का सुरक्षा दस्ता था. ऑफीशियल दस्ता निकल जाने की वजह से ही आधे घंटे बाद वहां पेट्रोलिंग पार्टी को हटा लिया गया था. श्राइन बोर्ड की अडवाइजरी में यात्रियों को साफ ताकीद की गई है कि वो अपना रजिस्ट्रेशन कराएं. इससे उनकी पहचान करने और उनकी सुरक्षा का इंतजाम करने में आसानी होती है. अडवाइजरी के मुताबिक यात्रियों को जल्दी निकलना चाहिए ताकि वो सूरज डूबने से पहले ही बेसकैंप पहुंच जाएं. अडवाइजरी के मुताबिक यात्रियों को सूरज डूबने के बाद हाइवे पर रहने की सख्त मनाही है.'ॉ

वो बस, जिस पर हमला किया गया
भटनागर ने ये भी बताया कि हमले वाली जगह से साढ़े तीन किमी दूर CRPF का एक कैंप था, जिस पर भी हमला किया गया. हालांकि, वहां किसी जवान के घायल होने की खबर नहीं है. एक अन्य वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बताया कि जब बस पर हमला हुआ, तब तक ऑफीशियल काफिला जवाहर टनल पार कर चुका था.
रजिस्टर्ड नहीं थे यात्री, दो दिन से घूम रहे थे
जम्मू-कश्मीर पुलिस के IG मुनीर खान ने भी बस के श्राइन बोर्ड में रजिस्टर्ड न होने की बात कही. साथ ही, उन्होंने कहा, 'बस में जो यात्री थे, उनका भी रजिस्ट्रेशन नहीं हुआ था. वो सारे अपने इंतजाम पर यात्रा पर गए थे.' एक और महत्वपूर्ण बात ये कि जिस इलाके में बस पर हमला हुआ, वहां हमले से 50 मिनट पहले ही सुरक्षा व्यवस्था हटाई गई थी. हमला शाम 8:20 पर हुआ, जबकि गश्त पार्टी को 7:30 बजे पेट्रोलिंग से हटा लिया गया था. सुरक्षा एजेंसियों से मिली जानकारी के मुताबिक इस बस के यात्री दो दिन पहले ही अमरनाथ यात्रा पूरी कर चुके थे और पिछले 24 घंटे से श्रीनगर और इसके आसपास के इलाकों में घूम रहे थे.

हमले के बाद बढ़ाई गई सुरक्षा
जिस बस पर हमला हुआ, उसकी डीटेल्स
हमले की शिकार हुई बस ओम ट्रैवेल्स की है, जिसका नंबर GJ 09 Z 9976 है. सबरकंठ के SP पीएल माल ने बताया, 'जिस बस पर हमला हुआ, वो इदार के ओम साई ट्रैवेल्स के नाम पर रजिस्टर्ड थी, जिसे बाद में वलसाड के ओम ट्रैवेल्स को बेचा गया था. बस के मालिक जवाहर देसाई का बेटा हर्ष 2 जुलाई को अमरनाथ यात्रियों के साथ रवाना हुआ था.' अस्पताल में भर्ती जिन घायल यात्रियों की पहले की कुछ तस्वीर सामने आई हैं, उनमें से एक फोटो हर्ष देसाई की है, जो बस मालिक के बेटे हैं.

बस, जिस पर हमला हुआ
मौके पर पहुंचीं CM महबूबा, PM मोदी के पास दर्द बयां करने के लिए शब्द नहीं
जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती घटना के कुछ समय बाद ही अनंतनाग पहुंच गईं. श्रद्धालुओं की मौत पर शोक जताते हुए उन्होंने कहा, 'वो यात्री कश्मीर के मेहमान थे. जिन लोगों ने ये अपराध किया है, उन्होंने सिर्फ लोगों पर ही नहीं, बल्कि कश्मीर की संस्कृति पर भी हमला किया है. ये एक भयानक हमला है. न सिर्फ मेहमानों पर, बल्कि कश्मीर और कश्मीरियत पर भी. हम सबको इस हिंसा के खिलाफ खड़ा होना पड़ेगा और ये जितना जल्दी हो, बेहतर होगा.'

हॉस्पिटल में घायलों से मिलतीं महबूबा मुफ्ती
वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट किए:
Pained beyond words on the dastardly attack on peaceful Amarnath Yatris in J&K. The attack deserves strongest condemnation from everyone.
— Narendra Modi (@narendramodi) July 10, 2017
दक्षिणी कश्मीर में हुआ हमला, यहां नहीं हो पा रहा आतंक का इलाज
दक्षिणी कश्मीर में आतंकी संगठन हिजबुल मुजाहिदीन पहले से मौजूद है और अब लश्कर-ए-तैयबा भी स्थापित होने की कोशिश में है. पिछले साल जब इसी इलाके में हिजबुल कमांडर बुरहान वानी को मारा गया था, तो हालात बहुत खराब हो गए थे. इस साल मई में 22 साल के लेफ्टिनेंट उमर फयाज़ की हत्या भी दक्षिणी कश्मीर के शोपियां में हुई थी. यहां के हालात ऐसे हैं कि पुलिस और सेना के जवानों के लिए अडवाइजरी जारी करनी पड़ती है कि वो कहां जाएं, कहां न जाएं और कितनी सुरक्षा के साथ जाएं. दक्षिणी कश्मीर में पुलवामा, शोपियां, अनंतनाग और कुलगाम जैसे जिले हैं, जहां आतंकी गतिविधियां नियंत्रण से बाहर हो चुके हैं.

22 साल के लेफ्टिनेंट उमर फयाज, जिन्हें मार दिया गया
इस साल मारे जा चुके हैं 92 आतंकी
इस साल 1 जनवरी से 2 जुलाई के बीच सुरक्षाबल 92 आतंकियों को मार गिरा चुके हैं. पिछले महीने ही जून में हुए एन्काउंटर्स में सेना ने 27 आतंकियों को मार गिराया था, जिनमें से 10 स्थानीय और चार बाहरी आतंकी थे. अमरनाथ यात्रियों पर हुआ हमला इसी की बौखलाहट के नतीजे के तौर पर देखा जा रहा है. एक शीर्ष खुफिया अधिकारी के मुताबिक, 'घाटी में हुई पिछली कुछ घटनाओं का मुंहतोड़ जवाब दिया गया है. आतंकी दबाव में हैं और वो खुद को ताकतवर साबित करने के लिए बौखलाए हुए हैं. अमरनाथ यात्रियों के रूप में उन्हें आसान टारगेट मिल गया.'

अमरनाथ यात्रा के बीच लोग
लेकिन सुरक्षा व्यवस्था पर बड़ा सवाल
हमले का शिकार हुई बस भले सुरक्षा दस्ते के बीच नहीं थी, लेकिन पिछले साल के मुकाबले इस साल घाटी में दोगुना सुरक्षाबल तैनात किया गया है. दोगुनी सुरक्षा के बीच भी बाइक से आए सिर्फ दो आतंकी इतना नुकसान पहुंचाकर भाग निकले.
29 जून को अमरनाथ यात्रा शुरू होने से पहले भी हमले का खुफिया अलर्ट जारी किया गया था. हालांकि, दावा किया जा रहा है कि उस इनपुट में किसी खास समय या जगह का जिक्र नहीं था.
संख्या बल के लिहाज से देखें, तो केंद्र ने राज्य सरकार को पैरामिलिट्री फोर्स की 250 एक्स्ट्रा कंपनी दी हैं. BSF ने यात्रियों की सुरक्षा के लिए दो हजार जवान तैनात किए हैं. सेना ने अपनी पांच बटालियन और 54 एक्स्ट्रा कंपनी सिक्यॉरिटी फोर्स दी हैं. इनके अलावा CRPF और राज्य पुलिस को भी सुरक्षा में तैनात किया गया है. अमरनाथ यात्रा करीब 300 किमी लंबी है, जिसके लिए करीब 40 हजार सुरक्षाबल तैनात किए गए हैं.

घाटी में जांच करते पुलिसकर्मी
29 जून से शुरू हुई थी यात्रा, सरकार कह रही हमले के बावजूद जारी रहेगी
इस साल 40 दिनों तक चलने वाली अमरनाथ यात्रा 29 जून को शुरू हुई थी और 7 अगस्त तक चलेगी. पिछले साल ये यात्रा 48 दिनों तक चली थी. इस बार अमरनाथ जाने के लिए 2.12 लाख यात्रियों ने रजिस्ट्रेशन कराया है. केंद्र सरकार ने साफ किया है कि इस हमले के बावजूद यात्रा जारी रहेगी और ये किसी हाल में रोकी नहीं जाएगी. हमले के बाद सुरक्षा भी बढ़ा दी गई है.
आतंकियों को खोजने के लिए सर्च ऑपरेशन चलाया जा रहा है. घाटी में इंटरनेट सर्विस बंद कर दी गई है. जम्मू-श्रीनगर हाइवे भी बंद कर दिया गया है. श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिए CCTV कैमरे, ड्रोन, बुलेटप्रूफ मोबाइल बंकर, जैमर्स और डॉग स्क्वॉड सहित कई इंतजाम किए गए हैं. सैटेलाइट ट्रैकिंग के जरिए आसमान से भी नजर रखी जा रही है.

घायल श्रद्धालुओं और मृतक श्रद्धालुओं के शव वायुसेना के विमान से सूरत पहुंचाए गए
वैष्णो देवी रूट भी अलर्ट पर
अनंतनाग में हमले की खबर आते ही जम्मू-कठुआ नेशनल हाइवे बंद कर दिया गया. पुलिस ने सभी हाइवे पर नाका लगा रखा है. साथ ही, वैष्णो देवी श्राइन के रूट की सुरक्षा भी बढ़ा दी गई है. वैष्णो देवी यात्रा पहले जैसी ही जारी है, लेकिन हाई अलर्ट जारी किया गया है.
हमले की वजह से भगवती नगर के अमरनाथ यात्री निवास में भी यात्रियों के आने-जाने को लेकर कन्फ्यूजन रहा. श्रद्धालुओं के लिए पहले बेस कैंप का काम करने वाले इस यात्री निवास के एक अधिकारी ने बताया, 'हम अब भी जानकारी का इंतजार कर रहे हैं. अभी तक की योजना यही है कि श्रद्धालुओं को आम दिनों की तरह सुरक्षा के बीच सुबह तीन बजे घाटी के लिए रवाना किया जाएगा. आज के आतंकी हमले के बाद अगर यात्रा रोके जाने का कोई आदेश आता है, तो हम उसके मुताबिक काम करेंगे.'

घायलों के बीच महबूबा
रोजाना करीब तीन हजार श्रद्धालु इस यात्री निवास से कड़ी सुरक्षा के बीच निकलते हैं. उन्हें दोपहर तीन बजे तक जवाहर टनल पार कर लेना होता है, ताकि वो सूरज डूबने से पहले ही बालटाल या पहलगाम पहुंच जाएं.
डिफेंसिव राजनीति को मजबूर कर रहा ये हमला
सोमवार का हमला कश्मीर में लक्ष्मण रेखा पार करने जैसा है, इसलिए घाटी के अलगाववादी नेता भी एक सुर में डिफेंसिव हो गए हैं. कश्मीर के मुद्दे पर हमेशा आक्रामक रहने वाले और हिंसा का समर्थन करने वाले अलगाववादी नेता दबे सुर में बात कर रहे हैं. सैयद अली गिलानी, मीरवाइज उमर फारूक और मोहम्मद यासीन मलिक ने साझा बयान जारी करते हुए कहा, 'ये घटना कश्मीर के स्वभाव के उलट है. इस घटना से हर कोई सन्न रह गया है. कश्मीर की अवाम और हुकूमत इस हमले की मुलामत करती है. हमारे लिए श्रद्धालु हमेशा से मेहमान रहे हैं और हमेशा रहेंगे.'

सैयद अली शाह गिलानी
उधर जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला ने कहा, 'सही सोच रखने वाले हर कश्मीरी को आज अमरनाथ यात्रियों की हत्या की आलोचना करनी चाहिए.' वहीं पीडीपी-बीजेपी सरकार के एक शिया मंत्री इमरान अंसारी ने कहा, 'श्रद्धालुओं पर ऐसा हमला इस्लाम के खिलाफ है और ऐसी हिंसा को कोई भी सही साबित नहीं कर सकता.'
मंगलवार को बंद रहेगा जम्मू
अमरनाथ यात्रियों पर हमले के बाद घाटी के व्यापारिक संगठनों, विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल, नेशनल कॉन्फ्रेंस, जम्मू चेंबर ऑफ कॉमर्स ऐंड इंडस्ट्री और जम्मू-कश्मीर नेशनल पैंथर्स पार्टी ने मंगलवार को जम्मू में बंद का ऐलान किया है. जम्मू चेंबर ऑफ कॉमर्स ऐंड इंडस्ट्री के प्रेसिडेंट राकेश गुप्ता ने मरने वाले श्रद्धालुओं के शोक में लोगों से एक दिन सब बंद रखने की अपील की है. गुप्ता ने श्रद्धालुओं से ज्यादा से ज्यादा तादाद में अमरनाथ जाने की अपील की, ताकि आतंकवाद को कड़ा जवाब मिल सके और ये संदेश जा सके कि कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है. उन्होंने लोगों से बंद के दौरान शांति बनाए रखने की भी अपील की.

हमले के बाद यात्रा पर जाने को तैयार अगला जत्था
कब और कैसे शुरू हुई थी अमरनाथ यात्रा
हिंदू मान्यताओं के अनुसार भगवान शिव जब अपनी पत्नी पार्वती को अमरता का रहस्य बताने जा रहे थे, तो वो ऐसी जगह खोज रहे थे, जहां उन्हें कोई और न सुन सके. तब उन्होंने अमरनाथ गुफा को चुना. ये गुफा समुद्र तल से 3888 मीटर पर बनी है. यहीं उन्होंने पार्वती को अमरता का रहस्य बताया. आज ये जगह हिंदुओं का तीर्थस्थल है. यहां पहलगाम और बालटाल के रास्ते जाया जाता है.

अमरनाथ की एक पुरानी तस्वीर
लोगों को कैसे मिली थी ये गुफा
जनश्रुतियों के अनुसार साल 1850 में एक संत ने एक मुस्लिम चरवाहे बूटा मलिक को कोयले से भरा एक झोला दिया था. वो चरवाहा उस समय दक्षिणी कश्मीर के पर्वतों में बकरियों के झुंड के साथ घूम रहा था. मलिक ने घर पहुंचकर जब वो झोला खोला, तो वो सोने से भरा हुआ था. खुशी से पागल बूटा उस संत का शुक्रिया अदा करने के लिए उसे ढूंढ़ने के लिए भागा, लेकिन वो संत कहीं नहीं मिले. संत के बजाय बूटा को वो गुफा मिल गई, जिसमें बर्फ से बना शिवलिंग था. उसने गुफा के बारे में साथी गांववालों को बताया और फिर ये तीर्थस्थान बन गया.
पुरोहित सभा मट्टन के अध्यक्ष बताते हैं कि पहले ये यात्रा 15 दिन या एक महीने की होती थी. साल 2000 में जब श्री अमरनाथ जी श्राइन बोर्ड ने नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया, उससे पहले ये सभा ही यात्रा करवाती थी. 2005 में श्राइन बोर्ड ने यात्रा को दो महीने तक बढ़ाने का फैसला किया. हालांकि, इस बात का कोई आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं है कि पहली बार यात्रा कब शुरू हुई थी. ये सालाना यात्रा तब खत्म होती है, जब पवित्र गदा के कस्टोडियन महंत दीपेंद्र गिरि इसे गुफा लेकर जाते हैं.

अमरनाथ यात्रा
कैसे बनता है इस गुफा में शिवलिंग
बर्फ का ये शिवलिंग गुफा की छत से लगातार टपकने वाली पानी की छोटी-छोटी बूंदों से बनता है. धीरे-धीरे लगातार पानी गिरने ये शिवलिंग की शक्ल ले लेता है. मई में ये अपने पूरे आकार में आ जाता है और फिर धीरे-धीरे पिघलना शुरू करता है. अगस्त तक इसका काफी हिस्सा पिघल चुका होता है.

गुफा के अंदर बर्फ का शिवलिंग
इससे पहले भी हो चुके हैं अमरनाथ यात्रा पर आतंकी हमले
1990 में घाटी में मिलिटेंसी लगने के बाद अमरनाथ यात्रा कुछ मौकों पर निशाने पर आ चुकी है, लेकिन ये 1990 के बाद से अब तक का दूसरा सबसे बड़ा हमला है. अमरनाथ यात्रा अभी तक गहरे विवादों से इसलिए मुक्त रही है, क्योंकि इसे कश्मीर की संस्कृति का हिस्सा माना जाता रहा है. खासकर 1990 के बाद कश्मीरी पंडितों के पलायन के बाद.
इस तीर्थस्थल को सबसे पहले 1993 में निशाने पर लिया गया था, जब पाकिस्तान के हरकल-उल-अनसर ने इस सालाना यात्रा पर बैन की घोषणा की थी. इस आतंकी संगठन ने दावा किया कि बाबरी मस्जिद गिराए जाने के विरोध में वो हमला करेगा. हरकल ने सरकार से ये मांग भी की थी कि वो श्रीनगर के हजरतबल श्राइन पर बनाए गए सिक्यॉरिटी बंकर हटवा ले. हालांकि, वो यात्रा शांतिपूर्ण ढंग से समाप्त हो गई थी और हरकल कुछ नहीं कर पाया था.

कश्मीर के हर वर्ग ने हरकत की इस धमकी की खूब आलोचना की थी. स्थानीय आतंकी संगठन भी हरकत से नहीं जुड़े. हरकत का आतंकी संगठन USSR के खिलाफ लड़ने वाले अफगानी पूर्व सैनिकों द्वारा बनाया गया था. हरकत के फरमान के खिलाफ लोगों की नाराजगी को इस नजरिए से देखा गया कि मिलिटेंसी के चरम वाले समय में भी यात्रा जारी रखी जा सकती है.
17 साल पहले हुआ था सबसे बड़ा हमला
अमरनाथ यात्रा पिछले कई सालों से शांतिपूर्ण ढंग से होती आ रही है. यहां तक कि पिछले साल जब हिजबुल मुजहिदीन के कमांडर बुरहान वानी को सुरक्षाबलों ने मार गिराया था, तब भी खतरे के बीच अमरनाथ यात्रा कराई गई थी. साल 2000 में आतंकियों ने अमरनाथ यात्रा पर बड़ा हमला किया था, जिसमें 27 लोगों की मौत हो गई थी. इससे पहले 1991 से 1995 के बीच सुरक्षा कारणों की वजह से अमरनाथ यात्रा नहीं हुई थी, क्योंकि आतंकियों ने हमले की धमकी दी थी.

सोमवार रात हुए हमले में घायल श्रद्धालु
लेकिन फिर बयानबाजी के बाद भी विवाद नहीं हुआ
1999 में कारगिल वार के कुछ समय बाद ही प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो ने एक बयान जारी किया था, 'अमरनाथ यात्रा पर जाने वाले श्रद्धालु मोक्ष के लिए अमरनाथ जाते हैं और मोक्ष के लिए ही वो इतना मुश्किल रास्ता चुनते हैं. ये उसी तरह है जैसे सैनिक देश की रक्षा के लिए अपनी जान पर खेल जाते हैं.' इस बयान के बाद भी अमरनाथ यात्रा अलगाववादियों या आतंकियों के निशाने से बची रही और राजनीतिक विवादों से भी दूर रही.
हालांकि, 1 अगस्त 2000 को पहलगाम में यात्रा पर हुए आतंकी हमले में 25 श्रद्धालुओं के काफिले के 17 लोग मारे गए थे. अमरनाथ के दो बेस कैंप हैं, जिनमें से एक पहलगाम है. ग्रेनेड जैसे हथियारों से हुए इस हमले में दो पुलिसकर्मी और छ: गांववाले भी मारे गए थे. सरकार ने इसके लिए लश्कर-ए-तैयबा को जिम्मेदार ठहराया.
उस समय राज्य सरकार ने दावा किया था कि हमला सुरक्षाबलों को निशाना बनाते हुए किया गया था और श्रद्धालु इसका मुख्य निशाना नहीं थे. लेकिन श्रद्धालुओं की हत्या ने लोगों में गुस्सा भर दिया था. शायद यही वजह रही कि 2008, 2009, 2010 और 2016 में माहौल गर्म होने के बाद भी अमरनाथ यात्रा को कभी निशाना नहीं बनाया गया.

2000 के हमले के बाद क्या बदलाव आया
साल 2000 में हुए हमले के बाद अमरनाथ यात्रा में ये बदलाव आया कि राज्य सरकार ने श्रद्धालुओं के लिए सुविधाएं बेहतर की हैं. उस समय सत्ता में रही नेशनल कॉन्फ्रेंस ने श्राइन बोर्ड बनाने का प्रस्ताव रखा, जिसका अध्यक्ष राज्य के गवर्नर को बनाया गया. अमरनाथजी श्राइन बोर्ड बनते ही सरकार ने मलिक परिवार और उन हिंदू संगठनों को इस तीर्थ स्थल से अलग कर दिया, जो अभी तक इसकी देखरेख से जुड़े हुए थे.
अमरनाथ राजनीतिक मुद्दा सिर्फ एक बार बना है, जब 2008 में जंगल की जमीन श्राइन बोर्ड को ट्रांसफर की गई थी. इसमें हुए विवाद में राज्य में सांप्रदायिक हिंसा फैली थी. बाद में ये आदेश रद्द कर दिया गया.
वैसे ये संयोग ही है कि श्रद्धालुओं के साथ अब तक की सबसे बड़ी ट्रेजेडी मौसम की वजह से हुई है. सितंबर 1996 में हजारों लोग बर्फबारी और तीन दिन से लगातार हो रही बारिश की वजह से फंस गए थे. उस साल खराब मौसम की वजह से करीब 200 श्रद्धालुओं की मौत हो गई थी.

दिल्ली में चल रही हैं बैठकें
अनंतनाग हमले के बाद गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने साउथ ब्लॉक में NSA, CRPF, IB और RAW की बैठक बुलाई, जिसमें दूसरी सुरक्षा एजेंसियों के प्रमुख शामिल हुए. इसमें अमरनाथ यात्रा की सुरक्षा की समीक्षा की गई. राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को घाटी के हालात की जानकारी दे रहे हैं. डोवाल दूसरे सुरक्षा अधिकारियों और राजनाथ सिंह के साथ भी जुड़े हुए हैं. उधर श्रद्धालु हमले के बावजूद और जोश के साथ गुफा की तरफ रवाना हो रहे हैं.

