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वो, जिसके एक इशारे पर दया तोड़ देता है दरवाज़ा!

शिवाजी साटम. कितनी ही फिल्मों में नज़र आने वाला चेहरा. हिंदी भी मराठी भी. लेकिन पहचाने जाते हैं एसीपी प्रद्युम्न के नाम से. आज बर्थडे है.

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केतन बुकरैत
21 अप्रैल 2016 (अपडेटेड: 21 अप्रैल 2016, 08:47 AM IST)
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बम्बई के एक गरीब गरीबी से कोने में बसी एक चॉल की छत पे रघु अपने दोस्तों के साथ सोया पड़ा है. उसके सिरहाने से थोड़ी ही दूर ईंटों से बने चूल्हे पर स्टील के कुछ बर्तन चढ़े हुए हैं. कुछ जूठे बर्तन इधर उधर भी पड़े हैं. पिछली रात कुछ पकाया गया है. मुर्गी. मुर्गी पकाई गयी थी पिछली रात. चोरी की मुर्गी. उसी चॉल में रहने वाले दगड़ू की. दगड़ू वो जिसे रघु और उसके दोस्त दिन भर परेशान करते थे. सुबह सुबह डेढ़ फुटिया दौड़ता हुआ छत पे चढ़ता है और सबको जगाता है. दगड़ू ने चॉल में हल्ला कर दिया है. उसे उसकी मुर्गियां गायब मिलीं और टेरेस पे मुर्गियों की हड्डियां मिलीं. उसने दो और दो चार जोड़ लिया और पहुंच गया रघु के बाप के पास. रामदेव! जैसा नाम वैसा इंसान. संत आदमी. सरकारी नौकर. मिल में काम करके कैसे भी परिवार चलाने वाला. बड़ा बेटा बीकॉम करके घर में बैठा है. नौकरी ढूंढ रहा है. छोटा मोहल्ले में नाक कटवाता है. रामदेव परेशान हैं. नीचे आते हैं. हर चॉल की तरह यहां भी भीड़ इकठ्ठा हो चलती है. रघु आता है. 22-23 साल का हो चलने के बावजूद बाप से पिटता है. एक थप्पड़ पड़ते ही बालकनी में जाकर सामने सुनार की दुकान वाले को देख चिल्लाने लगता है - "ए रमणीक लाल ए भड़वे! देख मेरा बाप मारता है अपुन को!" और रामदेव उसे पीटना बंद कर देते. उन्हें अपने नाम का डर है. उसपे वो कैसा भी बट्टा नहीं आने देना चाहते. ये बात रघु भी जानता है. बेटे को मिलते हैं चालीस हज़ार रुपये. रघु लगाता है पाव-भाजी का ठेला. डेढ़ फुटिया के साथ. जहां एक गलती और उससे एक मर्डर हो जाता है. रघु भाग जाता है. पुलिस से, अपने घर से, समाज से, अपनी मां से और रामदेव से छुपकर. रघु सालों बाद घर वापस आता है. गैंगस्टर बन कर. पचास तोले की चेन और दो पेटी के घोड़े को कमर में खोंसे. अपनी बीवी के साथ. बीवी, बीवी होने से पहले कोठे पे काम करती थी. साथ में कुछ महीनों का बच्चा भी है. बाप और मां दोनों मिल के सलाह देते हैं कि रघु को सरेंडर कर देना चाहिए. पुलिस रियायत कर देगी और कम सज़ा होगी. Vaastav रघु अपने बाप के घर के बगल से गुज़रती लोकल ट्रेन को देखता है और कहता है - "बचपन से मैं ये ट्रेन देख रहा हूं. कभी वीटी से दादर कभी वीटी से करजत. थाणे से वीटी. साली एकीच पटरी पकड़ के चलती है. क्या ये रोड पे चलेगी? क्या ये हवा में उड़ेगी? क्या ये पानी में चलेगी? नहीं बाबा! अपुन ने ऐसीच पटरी पकड़ी है बाबा." रामदेव पीछे खड़े रो रहे थे. कुछ कहते नहीं बनता है. रूंधे हुए गले से धीरे से कहते हैं - "ऐसे लगता है न के एक...एक कान के नीचे खेंच दूं." रघु मुस्कुराता है. आंसुओं से सने गालों के साथ. और चिल्लाता है - "ए रमणीक लाल ए भड़वे! देख मेरा बाप मारता है अपुन को!" दोनों आपस में लिपट जाते हैं. मानो इंसान नहीं बेल हों. आंसुओं से सिंचती बेल. कौन किसको सहारा दे रहा था, कहना मुश्किल है. रामदेव और रघुनाथ नामदेव शिवलकर. रामदेव बस एक ही सवाल पूछे जाते हैं - "ऐसा क्यूं हुआ रघु? ऐसा क्यूं हुआ?" ये फ़िल्म बचपन में देखी थी. वास्तव. पहली बार फ़िल्म देखते-देखते रोना आया था. इसी सीन पर. दो चेहरे हमेशा के लिए छप गए थे. एक संजय दत्त और एक वो जिसका नाम नहीं मालूम था.

शिवाजी साटम. ये नाम आज भी उतना जाना पहचाना नहीं है. 10 लोग ला खड़े कीजिये. बमुश्किल 3 लोग शिवाजी साटम नाम पहचानते होंगे. उन्हीं 10 के कान में कहिये एसीपी प्रद्युम्न तो चिल्ला पड़ेंगे - "अच्छा वो! अरे उनको कौन नहीं जानता होगा?"


ये हैं शिवाजी साटम. जो असल मायने में अपना किरदार जी रहे हैं. आज उसी शिवाजी का जन्मदिन है. 21 अप्रैल 1950 की पैदाइश. वो शिवाजी जो एसीपी बनने को ही पैदा हुआ था. केमिस्ट्री में ग्रेजुएशन और बिज़नेस एडमिनिस्ट्रेशन में मास्टर्स करने के बाद बैंक में कैशियर की नौकरी करने लगे. बैंक भी ऐसा वैसा नहीं. सेंट्रल बैंक ऑफ़ इंडिया. लेकिन मन एक्टिंग में ही धरा था. इंटर-बैंक कम्पटीशन में पार्टिसिपेट किया. वहां इनके अलावा बाकी लोगों को भी मालूम चला कि ये ऐक्टिंग करते हैं. इन्होंने एक एक मराठी थियेटर को पकड़ लिया. या ये कहिये कि उस मराठी थियेटर ने इन्हें पकड़ लिया. बाल धुरी नाम का थियेटर. नाटक का नाम था संगीत वारद. संगीत धुरी में शिवाजी का पहला नाटक. 1980 में पहली बार टीवी पे आये. रिश्ते नाते नाम के सीरियल में. और वहां से फिर रुके नहीं. हिंदी-मराठी फिल्मों, सीरियल्स में दिखते रहे. गुलाम-ए-मुस्तफ़ा का वो ईमानदार सरकारी बाबू. जो एक गुंडे के आगे झुकने, उसकी दी हुई रिश्वत की रकम पर थूकने से भी इनकार कर देता है. जब मुस्तफ़ा उसके घर एक पैसों से भरी थैली लेके आता है तो उसे उल्टे पांव लौटा देता है. पैसे छूना भी नहीं मंज़ूर. मुस्तफ़ा इस कदर खीजता है कि वो थैली उसके घर के सामने लगे पेड़ पे फेंक देता है. थैली वहीं, उसी पेड़ पे लटकी रहती है. shivaji-satamशिवाजी साटम को यशवंत, गुलाम-ए-मुस्तफ़ा, वास्तव, सूर्यवंशम, पुकार, कुरुक्षेत्र, हथियार जैसी फिल्मों में देखा गया. लेकिन बॉस! एक ऐसी चीज़ जो अपने कंधे पे लेके चल रहे हैं - सीआईडी. एसीपी प्रद्युम्न. देश की सबसे लम्बी चलने वाली टीवी सीरीज़. पायलट एपिसोड आया साल 1997 में. और 1998 से शुरू हुई शिवाजी की एसीपी की ड्यूटी. आज तक चल रही है. सीरियल ने कल्ट स्टेटस धारण किया और अब शिवाजी साटम उस कल्ट का चेहरा बन चुके हैं. सीआईडी में से शिवाजी को अगर निकाल दिया जाये तो वही बचेगा जो कपूर को खुले में छोड़ देने पर बचता है. 18 सालों से लगातार, हर हफ़्ते एसीपी प्रद्युम्न अपने साथियों के साथ देश के बड़े बड़े केसों को यूं चुटकियों में सॉल्व कर रहे हैं. और उनकी चुटकियों से याद आईं उनकी वो कड़ी, मोटी खूंखार उंगलियां जो चलती ही जाती थीं. जो केस की इंटेंसिटी के साथ साथ और कड़क होती जाती हैं. तानी हुई भौंहें, चेहरे पर सीरियस एक्सप्रेशन, माथे पर सिकुड़न, और वो घूमती उंगलियां. जैसेजैसे कैमरा लॉन्ग-शॉट से क्लोज़-अप में आता जाता है, केस का अपराधी अगर देख ले तो सरेंडर ही कर दे. और अंत में वो मास्टरस्ट्रोक. केस सॉल्व होने पर पड़ने वाली फटकार! "अब तो तुम्हें फांसी होगी. फांसी!" 66 साल के हो चुके शिवाजी साटम लगभग दो दशकों से प्रद्युम्न का कैरेक्टर प्ले कर रहे हैं. ऐसे में लाज़मी है कि उनके किरदार को उनपर हावी होने दिया जाता है. शिवाजी के हिसाब से उनका प्रद्युम्न के नाम से फ़ेमस होना एक कॉम्प्लीमेंट है. ये उनकी ऐक्टिंग और शो की बाकी चीज़ों की ही बदौलत हुआ है. और हां! शिवाजी सीआईडी में प्रमोशन नहीं चाहते. वो एसीपी रह कर ही रिटायर होना चाहते हैं.

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