अभिलाष कौशिक.अभिलाष कौशिक हमारे रेगुलर पाठक हैं. हम पर मुहब्बत लुटाते रहते हैं. आचेन, जर्मनीमें रहते हैं. दुनियाभर में घूमने के शौक़ीन हैं. जहां कुछ भी अच्छा नज़र आता है हमसेशेयर करते हैं. तस्वीरें भेजते हैं. हाल ही में सर्बिया गए थे. वहां से उन्होंनेहमें एक रोचक किस्सा भेजा है. सोचा, क्यों न पाठकों के साथ साझा किया जाए! पढ़िए,उन्हीं की ज़ुबानी...--------------------------------------------------------------------------------जब हम सर्बिया की राजधानी बेलग्रेड में उतरे, तो हमें किसी ऐसी चीज़ की तलाश थी,जिसका रिश्ता हम भारत से जोड़ सकें. हम बहुत से मुल्क घूमे हैं. उन सबमें सर्बिया हीइकलौता ऐसा मुल्क था, जहां मैंने एक भी इंडियन नहीं देखा था.हमने गूगल बाबा की मदद से अपनी तलाश शुरू की, जो हमारे होटल के मैनेजर पर जाकर ख़त्महुई. आख़िरकार हमें एक ऐसी सड़क का पता चला, जिसे महात्मा गांधी का नाम दिया गया था.जब 1970 में नया बेलग्रेड बस रहा था, तब भारत के लिए आभार प्रदर्शित करने के इरादेसे सर्बियन सरकार ने दो सड़कों को भारतीय लीडर्स के नाम देने का फैसला किया. एकजवाहरलाल नेहरू के नाम पर और एक महात्मा गांधी के नाम पर. हमने थोड़ी ज़्यादा छानबीनकी और कुछ आर्टिकल्स खंगाले. पता चला कि 2 अक्टूबर 2007 को जब यूएन ने नॉन-वायलेंसडे (अहिंसा दिवस) घोषित किया, तो उसी दिन सर्बिया की सरकार ने गांधी जी की एकमूर्ति स्थापित की थी. जब हमने इंटरनेट पर मूर्ति का अता-पता ढूंढने की कोशिश की,तो कोई सुराग नहीं मिल पाया. हमने डिसाइड किया कि सड़क पर जाकर खोजते हैं. हम निकलपड़े. सड़क काफी लंबी थी. खोजते-खोजते हम सड़क के उस सिरे तक जा पहुंचे, जो नदी किनारेथा. साथ-साथ हम स्थानीय लोगों से भी पूछ रहे थे, लेकिन किसी को कोई आईडिया नहीं था.हमारे लोकल दोस्त और गाइड की एक आइसक्रीम बेचने वाली बूढ़ी महिला से मुलाक़ात हुई.उसने उनसे सर्बियन भाषा में मूर्ति के बारे में पूछा. वो हमें उस जगह ले गईं, जहांमूर्ति लगी हुई थी.गांधीजी के के नाम पर बेलग्रेड, सर्बिया की सड़क.जब हम वहां पहुंचे तो उस जगह की हालत देखकर दंग रह गए. उस बूढ़ी औरत ने हमें बतायाकि इस जगह पर काफी लंबे अरसे से कोई नहीं आया है. गांधीजी की मूर्ति साफ़-सुथरी थी.औरत ने बताया कि वो रोज़ अपने घर से पानी लाकर उस मूर्ति को धोती है. उसे साफ़ रखतीहै. हम बहुत हैरान हुए. हमने उनसे तुरंत पूछा कि वो ऐसा क्यों करती है? उनका जवाबशानदार था. उन्होंने कहा, “मैं नहीं चाहती कि सर्बिया की ऐसी इमेज बने कि वो दुनियाके सबसे बड़े अहिंसक नेता का आदर नहीं करता.” हमने उनसे कहा कि वो अपनी एक तस्वीरखींचने दे. ताकि हम स्टोरी के साथ उसे पब्लिश कर सके. उन्होंने साफ़ मना कर दिया.कहा कि वो ये सब नाम के लिए नहीं करती हैं. उन्होंने हमसे ये आग्रह भी किया कि हमइस जगह पर गांधीजी के नाम की तख्ती लगाने का जुगाड़ करें. ताकि लोगों को पता चल सकेकि ये किस महान हस्ती का पुतला है.गांधीजी का पुतला.आज भारत के अंदर ही गांधी को गालियां देना फैशनेबल माना जाता है. वहीं दूर देश कीकिसी अंजान सड़क पर कोई अंजान महिला उनके सम्मान के लिए चिंतित है. ये कहानी खुश तोकरती ही है, विश्वनायक के तौर पर महात्मा गांधी की स्वीकार्यता को पुरज़ोर ढंग सेरेखांकित करती है.--------------------------------------------------------------------------------ये भी पढ़ें:जिस तरह इधरवाले गोडसे को पूजते हैं, उधरवाले इस लड़के को हीरो मानते हैं‘क़त्ल करने वाली भीड़ का हिस्सा बनने को हम तैयार नहीं हैं’आप राक्षस हैं, आम मुसलमान से चिढ़ते हैं, उससे डरते हैं आप