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इन 5 वजहों से असम में बन सकती है BJP की सरकार!

तो क्या जिंदा कौमें 15 साल से असम में कर रही हैं इंतजार?

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10 अप्रैल 2016 (अपडेटेड: 10 अप्रैल 2016, 07:35 AM IST)
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असम में विधानसभा चुनाव चल रहे हैं. 11 अप्रैल को अगले फेज़ की वोटिंग होगी. बीजेपी कांग्रेस मैदान में डटी हुई हैं. कांग्रेस राज्य में 15 साल से सत्ता पर काबिज है.
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वहीं बीजेपी भी अबकी बारी उम्मीद भरी निगाह से असम को देख रही है. ऐसा माना जा रहा है कि असम में बीजेपी के जीतने के चांसेस पहले के मुकाबले इस बार ज्यादा हैं. इसके पीछे कुछ वजह भी हैं. ऐसी 5 वजहों को बता रहे हैं स्वदेश सिंह. दिल्ली यूनिवर्सिटी के एक कॉलेज में प्रोफेसर स्वेदश सिंह भाजयुमो के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भी हैं. जानिए वो 5 वजहें, जिनके चलते इस बार असम में बीजेपी की सरकार बन सकती है.

 
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असम में बीजेपी और कांग्रेस आमने-सामने हैं. चुनाव प्रचार खत्म हो चुका है और दोनों ही पक्ष अपनी जीत का दावा कर रहे हैं. अगर बीजेपी जीतती है तो पहली बार असम में सरकार बनाएगी और उसके लिए उत्तर-पूर्व के दूसरे राज्यों के लिए दरवाजा खुल जाएगा. वहीं अगर कांग्रेस जीतती है तो चौथी बार सत्ता में आएगी और केंद्र में मोदी सरकार बनने के बाद ये कांग्रेस की पूर्ण बहुमत वाली पहली सरकार होगी. दोनों दलों के दावों के बीच देखना ये होगा कि जनता के क्या मन बनाया है. अगर सभी पहलुओं पर विचार करें तो बीजेपी का पलड़ा ज्यादा भारी दिखता है. इसके पीछे कई वजह गिनाई जा सकती हैं. जानिए ऐसी ही 5 वजहें: 1. बदलाव: समाजवादी नेता राम मनोहर लोहिया कहा करते थे कि जिंदा कौमें 5 साल इंतजार नहीं करतीं. कांग्रेस को असम में राज करते हुए 15 साल हो गए. लोग कांग्रेस राज से थके हुए नजर आ रहे हैं. कांग्रेस भी इन चुनावों में जनता को कुछ ऐसा नहीं परोस पाई जिससे जनता कांग्रेस को स्वीकार कर ले. 15 साल में धीरे-धीरे कांग्रेस के खिलाफ वातावरण निर्माण हुआ जिसे खत्म करने के लिए कोई कदम पार्टी द्वारा नहीं उठाए गए. इसलिए अब जनता बदलाव चाहती है. अगर कांग्रेस ने नेतृत्व परिवर्तन द्वारा या किसी अन्य तरीके से अपना एक रिवाइज्ड वर्जन दिखाने की कोशिश होती तो जीत उनकी हो सकती थी. 2. बांग्लादेशी घुसपैठ: पिछले दो-तीन दशकों में पूरे भारत में और खासतौर पर असम में जमकर बांग्लादेशी घुसपैठ हुई. पहले इन अवैध रूप से रह रहे बांग्लादेशियों ने छोटे-छोटे रोजगार किए. लेकिन बाद में स्थानीय असमिया लोगों की जमीनें या तो खरीद लीं या कब्जा करने लग गए. आज जमीन का काफी बड़ा क्षेत्रफल इन बांग्लादेशियों के कब्जे में है. इसमें सत्रों (मंदिर) और जंगल की जमीनें शामिल हैं. 85 फीसदी ग्रामीण जनसंख्या वाले असम प्रदेश में जमीन का इस तरह दूसरों के कब्जे में चले जाने से स्थानीय लोगों को रोजगार और पहचान की बड़ी समस्या हो गई है. धीरे-धीरे स्थानीय असमिया जनसंख्या अल्पसंख्यक होती जा रही है. बढ़ती अवैध बांग्लादेशी जनसंख्या के खिलाफ स्थानीय लोगों में काफी रोष है. पहले जो असम अहोम, बोडो, राभा, मिशिंग जैसे विभिन्न समूहों के रूप में अपनी पहचान रखता था, आज वो सारी की सारी जनसंख्या बढ़ती बांग्लादेशी मुसलमानों के सामने ‘हिंदू’पहचान के रूप में सामने आ रही है. स्थानीय असमिया जनसंख्या चाहती है कि बांग्लादेशी मुसलमानों के अवैध रूप से भारत आने पर रोक लगे. उन्हें लगता है कि कांग्रेस राज ने अवैध बांग्लादेशियों को भारत आने में मदद की इसलिए वो कांग्रेस को सत्ता में देखना नहीं चाहते. असम में बीजेपी गठबंधन के नेता ये बोलते सुने जा सकते हैं कि असम अपनी अस्मिता और पहचान की अंतिम लड़ाई लड़ रहा है. लगता है कि ये बात असम के स्थानीय लोगों को दिल तक छू गई है और अब वो बीजेपी के साथ खड़े नजर आ रहे हैं. 3. ‘रेनबो’ गठबंधन: बीजेपी ने इस विधानसभा चुनाव में एक ‘रेनबो’ गठबंधन का गठन किया है. इसमें बीजेपी, असम गण परिषद, बोडो पीपल फ्रंट के साथ-साथ कई स्थानीय जनजातीय समूहों के दल शामिल हैं. बीजेपी लोकसभा चुनावों में सात सींटों पर दर्ज कर राज्य में एक बड़े दल के रूप में उभरी है तो छात्र आंदोलन से निकली असम गण परिषद के कार्यकर्ता गांव-गांव में फैले हैं. असमिया अस्मिता की बात करने वाले असम गण परिषद के साथ ‘अहोम’ समूह बड़ी संख्या में जुड़ा हुआ है. बोडो पीपल फ्रंट (बीपीएफ) बोडो जनजाति का प्रमुख दल है.
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4. नेतृत्व: असम में कांग्रेस का नेतृत्व तरुण गोगोई के हाथ में है जो 80 साल के हैं और 15 साल से राज्य के मुख्यमंत्री हैं. वहीं बीजेपी के पास प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम के साथ-साथ दो अपेक्षाकृत युवा नेता हैं. पहले नेता है सर्वानंद सोनोवाल जो पहले असम गणपरिषद और ऑल असम स्टूडेंट यूनियन (आसू) में रह चुके हैं. आसू के अध्यक्ष रहे सोनोवाल को आईएमडीटी कानून रद्द कराने का श्रेय जाता है. लोकसभा सांसद सोनोवाल अभी केंद्र सरकार में खेल एवं युवा मामलों के मंत्री भी हैं. वहीं असम में कांग्रेस के बागी नेता हिमंत विस्वशर्मा ने अगस्त में नौ विधायकों के साथ बीजेपी का दामन थामा था. युवाओं और छात्रों में बेहद लोकप्रिय हिमंतविस्व शर्मा को तरुण गोगोई की पिछली जीत का श्रेय दिया जाता है. स्टार प्रचारक के रूप में सर्वानंद सोनोवाल और हिमंतविस्वशर्मा ने पूरे राज्य में सैकड़ों जनसभाएं की. बीजेपी के पास सबसे बड़े स्टार प्रचारक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं जिन्होंने तीन बार राज्य का दौरा किया. उन्होंने केंद्र सरकार द्वारा पिछले दो साल में उत्तर-पूर्व और विशेष रूप से असम के लिए किए गए काम-काज का ब्यौरा स्थानीय लोगों के बीच रखा और वादा किया कि आने वाले समय में असम के छात्रों की पढ़ाई, युवाओं की कमाई और बुजुर्गों की दवाई की पूरी चिंता करेंगे. 5. युवा छात्रों का रुझान: अगर पिछले तीन दशकों का असम का राजनीतिक इतिहास देखें तो हम पाएंगे कि असम में सरकार उसी की बनी है जिसके साथ छात्र और युवा खड़ा हुआ है. आजादी के बाद ऐसा किसी राज्य में पहली बार हुआ कि एक छात्र संगठन ऑल असम स्टूडेंट यूनियन (आसू) ने चुनाव से दो महीने पहले असम गण परिषद (अगप) के नाम से राजनीतिक दल का गठन किया और 33 साल की उम्र में उसके नेता प्रफल्ल मोहन्ता असम के मुख्यमंत्री बने. उस चुनाव में असम के छात्रों और युवाओं ने एक साथ आकर अगप का समर्थन किया और कांग्रेस को सत्ता से हटाया. बाद में आसू का आंदोलन कमजोर पड़ गया. पिछले चुनावों में राज्य के युवाओं और छात्रों ने हिमंत विस्वशर्मा का साथ दिया और कांग्रेस की सरकार गठित की. इस बार छात्रों और युवाओं में लोकप्रिय राज्य के दोनों बड़े नेता सर्वानंद सोनोवाल और हिमंत विस्वशर्मा एक साथ खड़े हैं और बीजेपी को नेतृत्व प्रदान कर रहे हैं. बीजेपी ने सर्वावनंद सोनोवाल को अपना मुख्यमंत्री पद का प्रत्याशी भी घोषित कर रखा है.
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