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लक्ष्मणपुर बाथे नरसंहार: जब गुंडों की एक सेना ने जाति के नाम पर 60 कत्ल किए

ये हत्याकांड आज ही के दिन हुआ था.

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1 दिसंबर 2020 (अपडेटेड: 1 दिसंबर 2020, 07:26 AM IST)
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1 दिसंबर. ठंड थी. तीन नावें पानी पर सरपट भागी जा रही थीं. मल्लाह बंडी-लुंगी में चप्पू चला रहे थे. उन्हें कुहरे और पानी से प्यार था. ठंड नहीं लगती थी. कुछ लोगों ने नाव किराये पर ली थी. शॉल लपेटे थे. सिर्फ आंखें दिखाई दे रही थीं. पानी के ऊपर सन्नाटे को उनकी खामोशी और बढ़ा दे रही थी. आपस में इशारों में बात कर लेते. मल्लाहों को इससे मतलब नहीं था. वो अपना काम कर रहे थे. पर कुछ अन्कम्फर्टेबल सा माहौल बन गया था. नाव किनारे पर लगी. लोग उतरे. मल्लाहों को कुछ अंदेशा हो गया था. उन्होंने पैसे नहीं मांगे. तुरंत नाव घुमाने लगे. पर घुमा नहीं पाये. क्योंकि उतरने वाले लोगों ने अपनी शॉल उतारी. ये कुल 100 लोग थे. इनके हाथ में गुप्ती, तलवार और बंदूकें लहरा रही थीं. मल्लाह रो पड़े. उन्होंने क्या किया था. मेहनत कर के थोड़ा कमाते हैं. फिर भी जो लेना है, ले लो. पर उस सन्नाटे में उनके गले से आवाज भी नहीं निकली. जब मौत निश्चित हो जाती है, तो रोने से तो होता नहीं. उनको काट दिया गया.
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नाव से उतरने वाले लोग सिर्फ मल्लाहों को मारने नहीं आए थे. वो तो यूं ही मार दिये गये थे. टारगेट था लक्ष्मणपुर-बाथे गांव. गांव कहा जाता था, पर सच ये है कि गांव भूमिहारों के होते थे. ये डेरे थे. कब उखड़ जाएं, नहीं पता. क्योंकि पक्के मकान नहीं थे. खेती नहीं थी. दूसरों के यहां काम कर के गुजारा होता था. ऐसा नहीं था कि योग्यता नहीं थी. काम नहीं था. योग्यता थी, क्योंकि इन लोगों ने भी वो करना शुरू कर दिया था जो भूमिहार करते थे. बंदूकें और गोलियां. इसमें ये भी उतने ही पारंगत थे. ये साबित करने के लिये था कि जो तुम कर सकते हो, हम भी कर सकते हैं. हमें बढ़ने दो. इन्होंने भाकपा-माले बना लिया था. और इन्हें अपने नीचे रखने के लिए रणवीर सेना बना ली गई थी. सितंबर 1994 में. पर इस गांव के लोगों के पास थोड़ी हथियार था. इन्हें तो बस ये लग रहा था कि हमारे समाज के कुछ लोग कुछ कर रहे हैं. यही इनकी गलती थी रणवीर सेना की नजरों में. शॉल वाले फिर गांव में पहुंचे. देखते ही भगदड़ मच गई. पर भाग के जाते कहां. 60 लोगों को गोली मार दी गई. 27 औरतें और 10 बच्चे मरे थे. उनमें तीन साल का भी एक बच्चा था. 10 औरतें गर्भवती थीं. तीन घंटे तक गोली चली. ये सोन नदी का किनारा था. उस दिन यहां कई परिवारों के सारे लोग मार दिये गये थे. कहीं एक बूढ़ा बचा था, कहीं एक बच्चा. कहीं एक औरत. शॉल ओढ़कर फिर वो लोग जाति की भीड़ में कहीं गुम हो गये. कहीं कोई पता नहीं, कि कौन था.
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दो दिन तक लोग लाशें रखकर न्याय की दुहाई देते रहे. मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने दौरा किया. 3 दिसंबर को अंतिम संस्कार हुआ. लाशें ट्रैक्टर में भरकर ले जाई गई थीं. लोग कहते थे कि लोग तो रो ही रहे थे, जानवर भी रो रहे थे. ये अतिशयोक्ति नहीं थी. जो गाय-भैंस पालते हैं, उन्हें अच्छे से पता होगा कि ये होता है. मारे गये लोगों में से किसी की शादी दस दिन पहले हुई थी. किसी का छह महीने का बच्चा था. कोई गांव आया था. कोई औरत ससुराल से भागी अपने मायके आई और फिर अपने पति के पास वापस नहीं गई. एक सेंकंड में फैसला लिया गया था. क्योंकि भतीजे-भतीजियों का कोई नहीं था. ना जाने कितने परिवार टूटे थे. जाति को लेकर किया गया ये कांड आजाद भारत के मुंह पर वो तमाचा था जो सदियों बाद गूंजेगा. देश की संस्थाएं अपने लोगों को ही शर्मिंदा करती रही हैं. लोगों को नौकरियों और मुआवजे का वादा हुआ. लोग एड़ियां रगड़ते रहे. पर सरकार ने वादा ही तो किया था. ये थोड़ी कहा था कि दे रहे हैं. लोग दौड़ते रहे. कुछ नहीं मिला.
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