बंगाल SIR: ड्राफ्ट लिस्ट में हिंदी भाषी लोगों के ज्यादा नाम कटे? मुस्लिमों का क्या हुआ?
West Bengal SIR: BJP के लिए अहम माने जाने वाले मतुआ समुदाय बहुल इलाकों में भी काफी नाम कटे हैं. हिंदी भाषी इलाकों में बड़ी संख्या में वोटरों के नाम हटाए गए हैं. मुस्लिम बहुल विधानसभा क्षेत्रों में नाम कटने की संख्या काफी कम है.

पश्चिम बंगाल में वोटर लिस्ट का स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) का एन्युमरेशन पीरियड पूरा हुआ. भारतीय चुनाव आयोग (ECI) ने मंगलवार, 16 दिसंबर को ड्राफ्ट वोटर लिस्ट जारी कर दी. लेकिन इसके आंकड़ों ने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है. बंगाल में कुल मतदाताओं की संख्या 7.66 करोड़ से घटकर 7.08 करोड़ रह गई है. करीब 58 लाख नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए हैं. ECI के अनुसार, नाम हटाने के कारणों में मृत्यु, स्थायी पलायन, डुप्लीकेशन (दो जगह नाम होना) और गणना फॉर्म जमा ना करना शामिल है.
हालांकि यह सूची अभी प्रोविजनल है और अगले चरण में दावे और आपत्तियों के बाद इसमें बदलाव हो सकता है. मगर शुरुआती आंकड़ों के एनालिसिस से कई अहम राजनीतिक संकेत मिल रहे हैं. ड्राफ्ट लिस्ट को देखें तो पता चलता है कि जिन विधानसभा क्षेत्रों में हिंदी भाषी आबादी ज्यादा है, वहां वोटरों के नाम सबसे ज्यादा कटे हैं.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, टॉप 10 विधानसभा सीटों में से हटाए गए नामों में बड़ी संख्या में हिंदी भाषी लोग हैं. इनमें 15% से लेकर 36% तक वोटरों के नाम हटाए गए हैं. इसके उलट, मुस्लिम बहुल सीटों में नाम कटने की संख्या काफी कम है.
BJP के स्ट्रॉन्ग होल्ड का कैसा हाल?
बंगाल में जहां BJP मजबूत मानी जाती है, वहां भी हिंदी भाषी वोटरों के नाम कटने की दर ज्यादा है. हावड़ा उत्तर में 26.89%, पश्चिम बर्धमान जिले की आसनसोल दक्षिण में 13.68% और आसनसोल उत्तर में 14.71% नाम हटाए गए. उत्तर 24 परगना जिले की बैरकपुर सीट से भी 19.01% नाम हट गए. इन सीटों पर BJP की अच्छी पकड़ मानी जाती है. हालांकि फिलहाल सिर्फ आसनसोल दक्षिण में ही BJP का विधायक है. बाकी सीटों पर BJP ने TMC से कड़ी टक्कर ली है और उसका संगठन भी मजबूत है.
BJP के लिए अहम माने जाने वाले मतुआ समुदाय बहुल इलाकों में भी काफी नाम कटे हैं. दक्षिण 24 परगना की कसबा सीट से 17.95% और सोनारपुर दक्षिण सीट से 11.29% नाम हट गए. उत्तर 24 परगना के बनगांव उत्तर में 9.71% वोटरों का नाम हट गया है.
कोलकाता और उसके आसपास के इलाकों में भी बड़े पैमाने पर नाम हटाए गए हैं. कोलकाता नॉर्थ जिले में 25.92% और कोलकाता साउथ जिले में 23.82% वोटरों के नाम ड्राफ्ट लिस्ट से हटाए गए हैं. जिन 10 विधानसभा सीटों में सबसे ज्यादा नाम कटे हैं, उनमें कोलकाता की कई अहम सीटें शामिल हैं.
जोरासांको में 36.66%, चौरंगी में 35.45%, कोलकाता पोर्ट में 26.09% और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सीट भवानीपुर में 21.55% मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं. कोलकाता पोर्ट तृणमूल कांग्रेस (TMC) नेता और कोलकाता के मेयर फिरहाद हकीम का विधानसभा क्षेत्र है.
इन सभी इलाकों में हिंदी भाषी आबादी अच्छी खासी संख्या में है. हालांकि 2021 के विधानसभा चुनाव में TMC ने इन सीटों पर जीत हासिल की थी. TMC ने 2024 के लोकसभा चुनाव में भी बढ़त बनाई थी, लेकिन BJP यहां अपना आधार मजबूत करने की कोशिश कर रही है.
मुस्लिम बहुल सीटों में कम कटौती
इसके उलट, मुस्लिम बहुल विधानसभा क्षेत्रों में नाम कटने की संख्या काफी कम है. 2011 की जनगणना के अनुसार, मुर्शिदाबाद में 66.3% और मालदा में 51.6% मुस्लिम आबादी है. मुर्शिदाबाद में केवल 4.84% और मालदा में मात्र 6.31% मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं. किसी भी विधानसभा सीट में यह आंकड़ा 10% से ऊपर नहीं गया.
मुर्शिदाबाद के डोमकल (3.4%), रेजिनगर (5.04%) और शमशेरगंज (6.86%) में कम कटौती हुई है. मालदा की मुस्लिम बहुल मानिकचक सीट में भी सिर्फ 6.08% नाम कटे हैं. यहां वोटर इतने सजग थे कि SIR शुरू होने से पहले ही कागज बनवाने के लिए सरकारी दफ्तरों के सामने लाइनों में लगे थे. करीब 49.92% मुस्लिम आबादी वाले उत्तर दिनाजपुर के चोपड़ा, गोलपोखर, इस्लामपुर और चाकुलिया जैसी सीटों में नाम कटने की दर 10% से कम रही.
TMC-BJP आमने-सामने
SIR के शुरुआती नतीजे आए, तो राजनीतिक पार्टियों ने भी सियासी बयानबाजी शुरू कर दी. TMC के प्रवक्ता अरूप चक्रवर्ती ने कहा,
वहीं BJP के वरिष्ठ नेता और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष राहुल सिन्हा ने आरोप लगाया कि बूथ लेवल ऑफिसर्स (BLO) पर TMC सरकार का दबाव है, जिससे वे निष्पक्ष काम नहीं कर पा रहे हैं. उन्होंने बताया,
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) (CPI-M) के पूर्व सांसद सुजान चक्रवर्ती ने कहा कि हिंदी भाषी इलाकों में ज्यादा नाम कटने की वजह उत्तर प्रदेश और बिहार के प्रवासी मजदूर हो सकते हैं. उन्होंने अनुमान जताया कि इन लोगों ने अपना नाम अपने गृह राज्य की वोटर लिस्ट में रखने का फैसला किया होगा. उन्होंने आगे कहा,
शोधकर्ताओं की राय
ये तो हुई सियासी बयानबाजी. अब SIR पर बंगाल के शोधकर्ताओं का भी रुख जान लेते हैं. कोलकाता के रिसर्चर और प्रतीची ट्रस्ट से जुड़े सबीर अहमद का कहना है कि शुरुआती आंकड़ों ने 'घुसपैठ' के राजनीतिक नैरेटिव की हवा निकाल दी है. उन्होंने आगे कहा,
एक अन्य रिसर्चर अशिन चक्रवर्ती ने बताया,
उन्होंने आगे कहा कि अगर SIR से किसी को सबसे ज्यादा नुकसान होगा तो वह मतुआ समुदाय और गैर-बंगाली प्रवासी मजदूर होंगे. उन्होंने इसकी वजह उनका बड़ी संख्या में अनमैप्ड वोटरों में शामिल होना बताया.
वीडियो: दी लल्लनटॉप शो: पश्चिम बंगाल SIR में 58 लाख नाम कटे, TMC-BJP आपस में क्यों भिड़े?

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