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गांधीजी का आंदोलन देखा, हावड़ा ब्रिज का निर्माण भी, अब 104 साल के एसके इब्राहिम का वोटर लिस्ट में नाम नहीं

एसके इब्राहिम बताते हैं कि उन्होंने हावड़ा पुल को बनते हुए देखा है. इसका निर्माण साल 1936 से 1942 तक चला था. इससे पहले वहां एक पोंटून पुल हुआ करता था. इब्राहिम आजादी, विभाजन और उसके बाद हुए वीभत्स दंगे और युद्ध सहित कई ऐतिहासिक घटनाओं के गवाह रहे हैं.

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Voter since independence bengal 104 yrs voter sk ibrahim
बंगाल में 104 साल के बुजुर्ग का वोट फाइनल वोटर लिस्ट में खतरे में है. (इंडिया टुडे)
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आनंद कुमार
5 मार्च 2026 (अपडेटेड: 5 मार्च 2026, 12:11 AM IST)
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'क्या 100 साल से ज्यादा जीना अपराध है?' भारत छोड़ो आंदोलन से लेकर हावड़ा ब्रिज के बनने के साक्षी और आजादी के बाद से हर चुनाव में वोट डालने वाले 104 साल के बुजुर्ग एसके इब्राहिम ने ये सवाल उठाया है. क्योंकि 28 फरवरी को पश्चिम बंगाल में प्रकाशित फाइनल वोटर लिस्ट में उनका नाम ‘विचाराधीन’ कैटेगरी में डाल दिया गया है. यानी पूर्वी बर्दबान के पास जमालपुर ब्लॉक के मझ पारा में रहने वाले एसके इब्राहिम के वोट देने के अधिकार पर अब खतरा मंडरा रहा है.

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, एसके इब्राहिम परिवार के सदस्यों ने बताया कि उनके नाम में गड़बड़ी के चलते उनको नोटिस जारी किया गया था. साल 2002 की वोटर लिस्ट में उनका नाम एसके इब्राहिम था, जबकि साल 2025 की वोटर लिस्ट में उनका नाम इब्राहिम एसके हो गया है. उन्हें सुनवाई के लिए उपस्थित होने के लिए कहा गया था. लेकिन उम्र और चलने फिरने में असमर्थ होने के चलते वे दस्तावेजों के साथ जांच केंद्र पर नहीं पहुंच सके.

एक जॉइंट इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर सुनवाई के लिए उनके घर गए. लेकिन इससे नाम की गड़बड़ी को दूर करने में कोई मदद नहीं मिली. वोटर के तौर पर इब्राहिम का मुकद्दर अब न्यायिक अधिकारी द्वारा उनके दस्तावेजों की जांच के परिणाम पर निर्भर करता है. अपने बेटे अमजद के एक मंजिला घर में TOI से बात करते हुए इब्राहिम ने बताया, 

“चुनाव आयोग के अधिकारियों ने मुझसे मुलाकात की और मेरे परिवार के सदस्यों से बात की. उन्होंने सारे डॉक्यूमेंटस वेरिफाई किए. लेकिन मेरा नाम अब भी विचाराधीन है. अब तक के सारे चुनावों में वोट डालने के बाद अब यह बेहद निराशाजनक है.”

जमालपुर के BDO पार्थ सारथी डे ने बताया कि प्रशासन उनके मामले की समीक्षा कर रहा है. इब्राहिम के छह बेटे हैं. वह बारी-बारी से सभी बच्चों के साथ रहते हैं. साल 1942 के भारत छोड़ों आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी के 'करो या मरो' के नारे के बारे में बात करते हुए उनकी आंखों में चमक आ जाती है. इब्राहिम के पास भारत के इतिहास के कुछ सबसे महत्वपूर्ण क्षणों की जीवंत यादें हैं. 104 साल की उम्र में भी उनकी स्मृति तेज है और वे अपने जीवन की कई घटनाओं की सटीक तिथि बता सकते हैं. 

उन्होंने बताया कि बंगाली साल 1342 (1935-36) में कोलकाता में जोरासांको ठाकुरबाड़ी के पास एक बिस्तर की दुकान में काम करते वक्त स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी कई घटनाओं के साक्षी रहे. एसके इब्राहिम बताते हैं कि उन्होंने हावड़ा पुल को बनते हुए देखा है. इसका निर्माण साल 1936 से 1942 तक चला था. इससे पहले वहां एक पोंटून पुल हुआ करता था. इब्राहिम आजादी, विभाजन और उसके बाद हुए वीभत्स दंगे और युद्ध सहित कई ऐतिहासिक घटनाओं के गवाह रहे हैं.

वीडियो: राजधानी: पश्चिम बंगाल चुनावों से पहले दौड़ी 'ममता फॉर PM' की लहर, क्या है मतलब?

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