अमेरिकी अधिकारी ऑपरेशन सिंदूर से जुड़ी अहम कमान के मुख्यालय पहुंचे, क्या बातें हुईं?
भारतीय सेना की कमान पर अमेरिकी अफसरों की मौजूदगी ने हलचल मचा दी है. अमेरिका के भारत में राजदूत सर्जियो गोर और अमेरिकी एडमिरल सैमुअल जे पपारो की लेफ्टिनेंट जनरल मनोज कुमार कटियार के साथ फोटो सामने आई जिसके बाद विपक्ष ने सरकार को घेरा है.
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US Envoy Visit At Indian Army Western Command: भारतीय सेना चंडीगढ़ में जहां से बैठकर पाकिस्तान से लगी सीमा की निगरानी करती है, वहां पर अमेरिकी अफसरों के दौरे से बवाल मच गया है. अमेरिका के राजदूत सर्जियो गोर और अमेरिकी एडमिरल सैमुअल जे पपारो 16 फरवरी को चंडीगढ़ स्थित सेना की पश्चिमी कमान (Western Command) के मुख्यालय पहुंचे. यहां उन्होंने भारतीय सैन्य अधिकारियों से मुलाकात की. लेफ्टिनेंट जनरल मनोज कुमार कटियार के साथ उनकी फोटो सामने आई तो विपक्ष ने सरकार को घेरना शुरू कर दिया.
शिवसेना (UBT) की राज्यसभा सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने इसकी तुलना पठानकोट एयरबेस पर हमले के बाद पाकिस्तानी खुफिया अधिकारियों को जांच के नाम पर भारत बुलाने वाली घटना से भी की.
चंडीगढ़ में भारतीय सेना की पश्चिमी कमान का मुख्यालय है. यह पाकिस्तान से सटे भारत के सीमावर्ती इलाकों की देखरेख करती है. जम्मू-कश्मीर के अखनूर से लेकर पंजाब के फाजिल्का तक तकरीबन 200 भारतीय सैन्य ठिकानों की निगरानी का केंद्र यही है. मई 2025 में जब पाकिस्तान के खिलाफ भारतीय सेना ने ऑपरेशन सिंदूर चलाया था, तब उसमें इस कमान की बड़ी भूमिका थी.
अमेरिकी अधिकारी वेस्टर्न कमांड पहुंचेविदेशी अफसरों की मौजूदगी के बाद एक बार फिर से पश्चिमी कमान चर्चा में है. सोमवार को चंडीगढ़ के चंडीमंदिर स्थित भारतीय सेना के पश्चिमी कमान मुख्यालय में अमेरिकी राजदूत और डॉनल्ड ट्रंप के करीबी सहयोगी सर्जियो गोर पहुंचे. उनके साथ अमेरिकी इंडो-पैसिफिक कमांडर एडमिरल सैमुअल जे पपारो भी थे. यहां पहुंचने से पहले गोर ने एक्स पर पोस्ट किया कि वह भारतीय सेना की पश्चिमी कमान का दौरा करने के लिए बहुत उत्सुक हैं. इसके कुछ ही देर बाद वह और एडमिरल लेफ्टिनेंट जनरल मजोज कटियार के साथ कमान के मुख्यालय में थे.
इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले साल भारत और पाकिस्तान के बीच तीन दिन तक चले सैन्य संघर्ष के बाद किसी विदेशी प्रतिनिधिमंडल की यहां यह पहली यात्रा थी. इस दौरे के ब्योरे का खुलासा भारतीय सेना ने नहीं किया. इतना बताया कि डॉनल्ड ट्रंप के करीबी सहयोगी गोर और एडमिरल पपारो को पश्चिमी मोर्चे यानी पाकिस्तानी सीमा की स्थिति और ऑपरेशन सिंदूर की कार्रवाई के बारे में जानकारी दी गई.
वेस्टर्न कमांड ने भी एक्स पर पोस्ट किया,
हालांकि विदेशी प्रतिनिधियों का वहां जाना शिवसेना सांसद प्रियंका चतुर्वेदी को पसंद नहीं आया. खासतौर पर इसलिए क्योंकि सर्जियो गोर दक्षिण और मध्य एशियाई देशों के लिए अमेरिका के विशेष दूत के रूप में भी काम करते हैं और इनमें पाकिस्तान भी शामिल है.
प्रियंका चतुर्वेदी ने तंज कसते हुए कहा कि अब तो भारत के राष्ट्रीय रणनीतिक हित (National Strategic Interests) इस बात से जुड़े हैं कि अमेरिका भारत से क्या करवाना चाहता है. ऐसे में अमेरिकी अफसरों का ये दौरा भी उसी मकसद के हिसाब का लगता है. उन्होंने सवाल उठाया कि अमेरिकी राजदूत तो अपने देश के लिए अपना काम कर रहे हैं, लेकिन हमारे लिए कौन कर रहा है?
प्रियंका चतुर्वेदी ने ये भी याद दिलाया कि मई 2025 में भारत-पाकिस्तान के बीच सीजफायर का क्रेडिट डॉनल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पर खुद ले लिया था, जबकि भारत ने कहा था कि सीजफायर सीधी बातचीत से हुआ था. ट्रंप ने ही सबसे पहले युद्धविराम की घोषणा अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर की थी. इसके बाद चंडीगढ़ में संवेदनशील सैन्य इलाकों में अमेरिकी अधिकारियों की पहुंच पर सवाल उठाते हुए सांसद ने कहा,
पठानकोट पहुंचे थे पाकिस्तानी खुफिया अधिकारी
प्रियंका चतुर्वेदी साल 2016 में पठानकोट एयरफोर्स स्टेशन पर आतंकी हमले के बाद सबूतों की जांच के लिए पाकिस्तान से आई अधिकारियों की टीम की बात कर रही थीं. 2 जनवरी 2016 को जैश-ए-मोहम्मद के आतंकवादियों ने पठानकोट एयरबेस पर हमला किया था. भारत ने पाकिस्तान को इसका दोषी ठहराया और आतंकियों के खिलाफ जांच में सहयोग की मांग की.
इसके बाद पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने ISI के अफसरों, मिलिट्री इंटेलिजेंस, पुलिस और अन्य अधिकारियों की एक 5 सदस्यीय टीम भेजी, जो 29 मार्च 2016 को पठानकोट पहुंची थी. इस टीम ने एनआईए के साथ मीटिंग की और क्राइम सीन का भी दौरा किया.
प्रियंका चतुर्वेदी ने अमेरिकी अफसरों के दौरे को पठानकोट वाली घटना से जोड़ा है. लेकिन सवाल है कि क्या दोनों बातें एक हैं? क्या पहले भी भारतीय सैन्य दफ्तरों में विदेशी प्रतिनिधियों की आमद नहीं हुई है? क्या ऐसा पहली बार हुआ है?
जवाब है नहीं. राजनीति से अलग इस तरह के दौरे इतिहास में कम ही हुए हैं, लेकिन यह कोई अजीब बात नही हैं. अमेरिकी अधिकारियों का यह दौरा भारत और अमेरिका के बीच एक सुनियोजित सैन्य आदान-प्रदान का हिस्सा है. इससे पहले भी विदेशी देशों के राजनयिक कमांड मुख्यालयों का दौरा कर चुके हैं. इसी तरह भारतीय दूत भी अमेरिकी पेंटागन कार्यालय और लैंगली स्थित सीआईए मुख्यालय जा चुके हैं.
क्या है संदेश?
बताया जा रहा है कि अमेरिकी अफसरों के इस दौरे के पीछे एक व्यापक संदेश है, जो भारत और अमेरिका के बीच रक्षा साझेदारी को और गहरा करने के प्रयास से जुड़ा है. अमेरिका की सरकारों ने एशिया और हिंद-प्रशांत इलाके में चीन के बढ़ते प्रभाव को डाइल्यूट करने के लिए भारत के साथ संबंध मजबूत रखे हैं. हालांकि, डॉनल्ड ट्रंप इस मामले में कई बार लड़खड़ाए. उन्होंने भारत पर टैरिफ लगाया. पाकिस्तान से नजदीकी बढ़ाई. क्या अब उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ है? भारत के साथ नजदीकी बढ़ाने के अमेरिकी प्रयास हाल के दिनों में तेज हुए हैं.
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