कपड़े, जिस्म, फर्श सब खूनम-खून, उस रात की कहानी जिसने 9 पुलिसवालों को दिलाई फांसी
Custodial death case: तमिलनाडु के 2020 कस्टोडियल किलिंग केस में 9 पुलिसकर्मियों को मौत की सजा सुनाई गई है. ये केस दक्षिण सतांकुलम में 58 साल के बिजनेसमैन पी. जयराज और उनके 31 साल के बेटे जे. बेनिक्स की पुलिस हिरासत में हुई मौत से जुड़ा है.

तमिलनाडु को झकझोर देने वाले 2020 कस्टोडियल किलिंग केस में 9 पुलिसकर्मियों को मौत की सजा सुनाई गई है. ये केस दक्षिण तमिलनाडु के शहर सतांकुलम में 58 साल के बिजनेसमैन पी. जयराज और उनके 31 साल के बेटे जे. बेनिक्स की पुलिस हिरासत में हुई मौत से जुड़ा है. पिता को हिरासत में लेने की वजह कोविड लॉकडाउन नियमों का कथित उल्लंघन बताया गया था. जबकि बेटे को तब उठाया गया जब वो अपने पिता से मिलने थाने पहुंचा. 7 अप्रैल को मदुरई की फर्स्ट ऐडिशनल डिस्ट्रिक्ट ऐंड सेशंस कोर्ट ने सभी 9 दोषी पुलिसकर्मियों को मौत की सजा सुना दी.
दोषी ठहराए गए 9 पुलिसकर्मियों के नाम ये हैं- तत्कालीन इंस्पेक्टर एस. श्रीधर, सब–इंस्पेक्टर के. बालकृष्णन, सब–इंस्पेक्टर पी. रघु गणेश, हेड कॉन्स्टेबल एस. मुरुगन, हेड कॉन्स्टेबल ए. समदुरई, कॉन्स्टेबल एम. मुतुराजा, कॉन्स्टेबल एस. चेल्लादुरई, कॉन्स्टेबल एक्स. थॉमस फ्रांसिस और कॉन्स्टेबल एस. वैलमुतु.
इस केस में एक 10वें आरोपी को भी गिरफ्तार किया गया था. नाम था पल्दुरई (तत्कालीन स्पेशल सब–इंस्पेक्टर). मगर अगस्त 2020 में कोविड-19 से उसकी मौत हो गई. बचे 9 पुलिसवालों को कोर्ट ने 23 मार्च 2026 को ही इस डबल मर्डर का दोषी ठहराया था. मगर तब सजा नहीं सुनाई गई थी. अब, घटना के करीब 6 साल बाद 7 अप्रैल को सजा भी सुना दी गई है. लेकिन केस को इस अंजाम तक पहुंचाने के लिए काफी स्टेप्स लेने पड़े.
शुरुआत तब हुई जब दोनों पिता–पुत्र की मौत के बाद तमिलनाडु में बड़े स्तर पर प्रोटेस्ट शुरू हो गए. लोगों ने विरोध में अपनी दुकानें बंद रखीं और उस बर्बरता के खिलाफ आवाज उठाई, जिसके साथ जयराज और बेनिक्स को पीटा गया था. उनकी कहानी आज भी सुनेंगे तो गुस्सा और दहशत दोनों महसूस होंगे.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, ये मामला एक तरह से ‘सबक सिखाने’ के लिए शुरू हुआ था. शुरुआत से ही ये केस सिर्फ एक लोकल क्राइम की कहानी नहीं रहा. बल्कि सीबीआई चार्जशीट के मुताबिक, जयराज ने असल में लॉकडाउन नियमों का उल्लंघन किया ही नहीं था, जिस आधार पर पुलिस ने उन्हें हिरासत में लिया.
इन्वेस्टिगेटर्स ने कहा कि 19 जून 2020 की शाम करीब 7:30 बजे, जयराज को उनकी दुकान से उठा कर थाने लाया गया. उन पर आपराधिक साजिश जैसे आरोप लगाए गए. जब उनका बेटा जे. बेनिक्स थाने पहुंचा और अपने पिता की पिटाई का विरोध किया, तो पुलिस ने उसे भी गैर–कानूनी तरीके से हिरासत में रख लिया. चार्जशीट बताती है कि इसके बाद पूरी रात दोनों की पुलिस ने बुरी तरह पिटाई की. मक़सद था उन्हें ये ‘सबक’ सिखाना कि पुलिस से कैसे पेश आना चाहिए.
सीबीआई के मुताबिक, पिटाई के बाद दोनों पिता–पुत्र को अपने ही जख्मों से बह रहे खून को साफ करने पर मजबूर किया गया. मगर इसका असली मकसद सफ़ाई नहीं, बल्कि उत्पीड़न था, क्योंकि सबूत मिटाने के लिए तो अगली सुबह अलग से सफाई कर्मचारी बुलाया गया, जिसने पुलिस स्टेशन के फर्श से सारा खून साफ किया. ताकि निशान मिटाए जा सकें.
इन घटनाओं की बारीकियां सिर्फ उनकी क्रूरता से नहीं, बल्कि इस बात से भी डराती हैं कि इन्हें कितना ‘ऑर्डिनरी’ दिखाने की कोशिश हुई. जब ये सब हो रहा था, उस पूरी रात जयराज का परिवार थाने के बाहर इंतजार करता रहा. अगली सुबह उन्होंने दोनों को बेहद खराब हालत में देखा. जयराज की वेष्टी और बेनिक्स की पैंट पूरी तरह खून से भीगी हुई थीं. पुलिसवालों ने निर्लज्जता की हद तब पार कर दी, जब उन्होंने रिश्तेदारों से ही कहा कि वे गहरे रंग की लुंगी लेकर आएं. ताकि खून उतना साफ न दिखे. मगर दोनों के शरीर से इतना खून बह रहा था कि वो अपने कपड़े तक संभाल नहीं पा रहे थे.
फिर आया इस केस का सबसे डरावना बिंदु. जयराज के साले एस. जोसेफ के मुताबिक, दोनों को मजिस्ट्रेट के सामने ठीक से पेश ही नहीं किया गया. न ही रिमांड से पहले उनकी चोटों की जांच हुई. जोसेफ का कहना है कि मजिस्ट्रेट ऊपर की मंजिल से ही दिखाई दिए और सिर्फ एक इशारे से उन्हें रिमांड पर भेज दिया.
जांच अधिकारियों के अनुसार, बेहद गंभीर चोटों के बावजूद दोनों के लिए ‘फिट फॉर रिमांड सर्टिफिकेट’ ले लिया गया. यानी कागज पर ये दर्ज करा दिया गया कि वे रिमांड के लिए बिल्कुल स्वस्थ हैं. दोनों के खून से सने कपड़े अस्पताल के डस्टबिन में फेंक दिए गए. इसके बाद जयराज और बेनिक्स को कोविलपट्टी सब–जेल में रखा गया. जब उनकी हालत और बिगड़ गई तो उन्हें सरकारी अस्पताल ले जाया गया, जहां 22 जून 2020 को भारी खून बहने और हेमरेज से बेनिक्स की मौत हो गई. अगले दिन उनके पिता जयराज की भी मौत हो गई.
दोनों की मौत की खबर लगते ही पूरे तमिलनाडु और उसके बाहर भी प्रोटेस्ट भड़क उठे. मामले की गंभीरता देखते हुए 24 जून 2020 को मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै बेंच ने स्वतः संज्ञान लिया. कोर्ट ने न्यायिक जांच के आदेश दिए और लोकल पुलिस पर भरोसा न करते हुए सीबी–सीआईडी को जांच सौंपी, जब तक कि सीबीआई आधिकारिक तौर पर केस अपने हाथ में न ले ले.
एक वक्त ऐसा भी आया जब जजों को महिला हेड कॉन्स्टेबल एस. रेवती की सुरक्षा के लिए विशेष कदम उठाने पड़े. क्योंकि उनका बयान इस केस में बेहद अहम था और उन्होंने ही अंदर की कई बातें बाहर लाने में मदद की.
अब, केस के लगभग 6 साल बाद फैसला डिलिवर कर दिया गया है. कस्टोडियल डेथ में डबल मर्डर के दोषी पाए गए 9 पुलिसवालों को मौत की सजा सुना दी गई है. लेकिन अभी भी इन दोषियों के पास ऊपरी अदालतों में अपील दाखिल करने का विकल्प है.
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