'सिर्फ कुत्तों की चिंता क्यों, मुर्गों-बकरियों का जीवन नहीं?', SC ने डॉग लवर्स से टेढ़े सवाल पूछ लिए
पीड़ितों के वकीलों ने कोर्ट में कहा कि आवारा कुत्तों की वजह से लोग परेशान हैं. लिहाजा मानवाधिकारों की रक्षा की जानी चाहिए. उन्होंने दूसरे देशों में कुत्तों को लेकर बने नियमों का हवाला दिया.

सुप्रीम कोर्ट ने आवारा कुत्तों से जुड़ी एक सुनवाई के दौरान डॉग लवर्स से अन्य पशुओं को लेकर सवाल पूछ लिए. शीर्ष अदालत ने याचिकाकर्ता डॉग लवर्स से पूछा कि केवल कुत्तों की चिंता क्यों की जाती है, बाकी जानवरों का क्या होगा. क्या मुर्गों, बकरियों जैसे जानवरों का जीवन नहीं है?
दरअसल सुप्रीम कोर्ट में आवारा कुत्तों से जुड़ी कई याचिकाओं पर एकसाथ सुनवाई चल रही है. बुधवार की सुनवाई में हर पक्ष की तरफ से दलीलें दी गईं. इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, एक पीड़ित याचिकाकर्ता ने कोर्ट में खड़ा होकर एक 90 साल के बुजुर्ग की तस्वीर दिखाने की कोशिश की. इस बुजुर्ग पर आवारा कुत्तों ने कथित तौर पर हमला किया था जिससे उनकी मौत हो गई थी. कोर्ट ने उस शख्स को रोकते हुए कहा कि तस्वीर दिखाने की कोई जरूरत नहीं है.
पीड़ितों के वकीलों ने कोर्ट में कहा कि आवारा कुत्तों की वजह से लोग परेशान हैं. लिहाजा मानवाधिकारों की रक्षा की जानी चाहिए. उन्होंने दूसरे देशों में कुत्तों को लेकर बने नियमों का हवाला दिया. कहा कि जापान और अमेरिका जैसे देशों में 'ड्रैमबॉक्स किल शेल्टर' हैं. वहां आवारा कुत्तों को शेल्टर्स में भेजा जाता है. अगर उन्हें कोई अडॉप्ट नहीं करता तो उन्हें कम से कम निर्मम तरीके से मौत दे दी जाती है. वकील ने आगे कहा कि इसी वजह से जापान में आवारा कुत्तों की समस्या नहीं है. वहां 1950 के बाद से रेबीज से कोई मौत नहीं हुई है.
पिछले साल नोएडा में आवारा कुत्तों ने एक 8 साल की बच्ची पर हमला कर दिया था. बाद में उसकी मौत हो गई थी. सुनवाई में मृतक बच्ची के पिता भी कोर्ट में पेश हुए. उन्होंने नोएडा प्रशासन पर आरोप लगाया कि बार-बार शिकायतें मिलने के बावजूद भी नोएडा प्रशासन ने कोई कार्रवाई नहीं की. पीड़ित पिता की मांग है कि रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन यानी RWA को ये अनुमति मिलनी चाहिए कि वो रिहायशी सोसायटीज को ‘नो डॉग जोन’ घोषित करें, यानी सोसायटीज में कुत्तों को रखने की अनुमति नहीं होनी चाहिए.
वहीं डॉग लवर्स की तरफ से पेश हुए सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल ने कहा कि वे कुत्ता और पर्यावरण प्रेमी के रूप में आए हैं. रिपोर्ट के मुताबिक इसी के बाद कोर्ट ने पूछा, "अन्य जानवरों के जीवन का क्या? मुर्गियों और बकरियों का क्या? क्या उनका कोई जीवन नहीं है?"
जवाब में सिब्बल ने कहा, “मैंने अब चिकन खाना छोड़ दिया है. क्योंकि उन्हें इतने क्रूर तरीके से पिंजरे में बंद रखा जाता है.” उन्होंने आगे तर्क दिया, “अगर एक बाघ आदमखोर हो जाए, तो सभी बाघों को आदमखोर समझ कर मारना जरूरी नहीं है.”

सिब्बल ने कोर्ट को बताया कि पूरी दुनिया में कुत्तों को पकड़ने, नसबंदी करने, टीका लगाने और फिर छोड़ने के मॉडल का पालन किया जाता है. इससे वहां कुत्तों की आबादी लगभग जीरो हो गई है. लेकिन भारत जैसे देश में, जहां कूड़ा-कचरा और झुग्गी-झोपड़ियां बड़े पैमाने पर फैली हुई हैं, आवारा कुत्तों को हटाना इस समस्या को और बढ़ा देगा.
सिब्बल ने तर्क दिया कि आवारा कुत्तों को शेल्टरों में रखने से नगर निगमों पर भारी आर्थिक बोझ पड़ेगा. वहीं, नगर निगम Animal Birth Control (ABC) नियमों के मुताबिक काम करने के लिए एजेंसियों और गैर-सरकारी संगठनों को पंजीकृत करने में सफल नहीं हो पाए हैं.
पशु कल्याण संगठनों की ओर से सीनियर एडवोकेट कॉलिन गोंसाल्वेस ने पक्ष रखा. उन्होंने बताया कि कुत्ते के काटने के मामलों की संख्या असली आंकड़े से पांच से सात गुना ज्यादा बताई जाती है. क्योंकि, इंजेक्शन की हर खुराक को कुत्ते के काटने का एक अलग मामला मान लिया जाता है. उन्होंने डर के मारे आवारा कुत्तों को कैद करने के बाद के भयानक परिणामों की चेतावनी भी दी.
वहीं सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता का कहना है कि ये मुद्दा एनिमल लवर्स के बजाय डॉग लवर्स के इर्द-गिर्द घूम रहा है. उन्होंने कहा कि कॉलोनी में कुत्तों को घूमने की अनुमति दी जानी चाहिए या नहीं, इसका फैसला RWA को करना चाहिए, न कि लोगों को. तुषार मेहता के मुताबिक समस्या तब पैदा होती है जब 90 प्रतिशत लोग आवारा कुत्तों का विरोध करते हैं लेकिन मात्र 10 प्रतिशत लोग उन्हें पालने पर अड़े रहते हैं. उन्होंने पूछा, “क्या होगा अगर कल कोई कहे कि मैं अपने घर में भैंस या गाय रखना चाहता हूं?”
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