The Lallantop
Advertisement
  • Home
  • India
  • supreme court urges center rape survivors abortion law should change india

रेप पीड़िताओं के अबॉर्शन पर सुप्रीम कोर्ट का आदेश, केंद्र से कहा- 'उनका दर्द समझिए, कानून बदलिए'

Supreme Court Abortion Law: सुप्रीम कोर्ट ने एक 15 साल की नाबालिग रेप पीड़िता को 30 सप्ताह के गर्भावस्था के बावजूद अबॉर्शन की अनुमति दी है. AIIMS वाले ऐसा नहीं चाहते थे, इसलिए उन्होंने याचिका दाखिल की थी. इसपर आदेश देते हुए कोर्ट ने केंद्र सरकार को रेप पीड़िताओं के गर्भपात कानूनों में बदलाव पर विचार करने का भी निर्देश दिया.

Advertisement
pic
30 अप्रैल 2026 (पब्लिश्ड: 02:08 PM IST)
Supreme Court Abortion Law
रेप पीड़िताओं के अबॉर्शन पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा, 'कानून में बदलाव होना चाहिए.' (Photo: AAJ TAK)
Quick AI Highlights
Click here to view more

सुप्रीम कोर्ट ने रेप पीड़ित नाबालिग की याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार को अबॉर्शन की अनुमति देने का आदेश दिया. इस याचिका की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह भी कहा कि सरकार को गर्भपात कानूनों (अबॉर्शन) में सुधार पर विचार करना चाहिए. मौजूदा कानूनों के तहत 20 सप्ताह तक अनचाहे गर्भ (Unwanted Pregnancy) को गिराने की अनुमति है. कोर्ट ने कहा कि रेप पीड़िता और विशेष मामलों में इस कानून में छूट के प्रावधानों पर सहानुभूति के साथ विचार करना चाहिए.

कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि केंद्र सरकार कानून में संशोधन करने पर विचार करे, जिससे बलात्कार जैसे जघन्य अपराध की पीड़िताओं (Rape Survivors) को 20 सप्ताह से भी ज्यादा समय बाद भी अनचाही गर्भावस्था को समाप्त करने की अनुमति मिल सके. यह मामला 15 साल की नाबालिग के 30 हफ्ते से ज्यादा के गर्भ को गिराने संबंधी याचिका से जुड़ा है. एम्स (AIIMS) की ओर से यह याचिका दाखिल की गई थी. याचिका नाबालिग रेप पीड़िता की 30 सप्ताह की प्रेग्नेंसी को मेडिकल तरीके से टर्मिनेट करने की अनुमति के आदेश को रद्द करने के लिए दी गई थी.

Supreme Court ने रेप पीड़िताओं के लिए दिया निर्देश

चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस ज्योतिमाला बागची की पीठ ने बलात्कार पीड़िताओं के लिए अहम टिप्पणी की. पीठ ने कहा, ‘गर्भावस्था का कारण अगर रेप हो, तो इसमें अबॉर्शन के लिए कोई समय-सीमा नहीं होनी चाहिए. कानून को गतिशील (organic) और समय के साथ बदलावों को शामिल करने के मुताबिक होना चाहिए. यह एक बच्ची के साथ बलात्कार का मामला है और अगर अबॉर्शन की अनुमति नहीं दी गई, तो पीड़िता के लिए जिंदगी भर का दुख, अपमान और प्रताड़ना की वजह बन सकता है.’

AIIMS ने अपनी याचिका में क्या दलील दी?

अदालत ने इस फैसले के दौरान यह भी कहा कि अगर मां को कोई स्थायी बीमारी या दिव्यांगता नहीं है, तो गर्भपात की अनुमति दी जानी चाहिए. कोर्ट ने AIIMS को यह भी निर्देश दिया कि पीड़िता के माता-पिता को अबॉर्शन और बाद की परिस्थितियों के लिए काउंसलिंग भी देनी चाहिए. सीजेआई की अध्यक्षता वाली दो जजों की बेंच ने कहा कि अंतिम फैसला पीड़िता (व्यक्ति संबंधित) का ही होना चाहिए. कोर्ट ने इस याचिका पर सुनवाई के दौरान ही गोद लेने के बारे में भी टिप्पणी की. कोर्ट ने कहा, 'इस देश में गोद लेने के लिए बहुत से बच्चे इंतजार कर रहे हैं. इस देश की सहानुभूति भी उनसे है... सड़कों पर छोड़े गए बच्चे, परिवार ने जिन बच्चों का त्याग कर दिया हो... हमें इन सब स्थितियों पर भी विचार करना होगा. इन सबके बीच यह नहीं भूलना चाहिए कि यह एक 15 साल की बच्ची की अनचाही गर्भावस्था है.'

यह भी पढ़ें: लिव-इन रिलेशनशिप पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी, ‘एक बच्चा भी है और रेप का आरोप भी लगा रही हैं?’

'अनचाही गर्भावस्था एक किशोरी के लिए त्रासदी जैसी'

सर्वोच्च अदालत ने इस क्यूरेटिव पिटिशन पर सुनवाई करते हुए कहा, ‘अनचाही गर्भावस्था किसी व्यक्ति पर जबरन नहीं थोपी जा सकती. यह भी सोचिए कि वह एक बच्ची है. अभी उसे पढ़ना चाहिए. हम उसे मां बनाना चाहते हैं. इस बच्ची को जो पीड़ा और अपमान सहना पड़ा है, उसके बारे में भी सोचना होगा.’

एम्स की तरफ से इस याचिका पर एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने पैरवी की. उन्होंने क्यूरेटिव पिटिशन का जिक्र करते हुए कहा कि गर्भपात (Pregnancy Termination) संभव नहीं है. उन्होंने कहा, 'जन्म लेने वाला बच्चा गंभीर बीमारियों के साथ पैदा होगा. ऐसे में नाबालिग मां को आजीवन स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं रहेंगी और हो सकता है कि दोबारा मां भी नहीं बन पाएगी.' भाटी ने अपनी दलील में यह भी कहा कि यह बच्चा किसी संस्था को गोद लेने के लिए दिया जा सकता है. अब 30 सप्ताह हो चुके हैं और बच्चे में जीवन पूरी तरह से आ चुका है.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गर्भपात करने का फैसला पीड़िता और उसके माता-पिता का होना चाहिए. इसमें AIIMS पीड़िता और उसके परिवार की मदद कर सकता है, ताकि वे सारी परिस्थिति और भविष्य की चुनौतियों को समझते हुए एक सही फैसला ले सकें. बता दें कि जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुयान की पीठ ने पीड़िता को अपनी 30 सप्ताह की गर्भावस्था को मेडिकल तरीके से खत्म कराने की अनुमति दी थी. हालांकि, इस फैसले के विरोध में एम्स ने याचिका दाखिल की थी, जिस पर सीजेआई की अध्यक्षता वाले दो जजों की पीठ ने फैसले को बरकरार रखने की अनुमति दी.  

वीडियो: IPS अजय पाल शर्मा के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका, महुआ मोइत्रा पर क्या आरोप लगे?

Advertisement

Advertisement

()