SC ने लोगों की जान बचाने को रोड सेफ्टी के 5 निर्देश दिए, हाल देखिए- किसी भी राज्य ने बात नहीं सुनी
भारत की सड़कों पर हर साल 1.77 लाख लोग मरते हैं. सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को कड़े सुरक्षा उपाय लागू करने के निर्देश दिए थे, लेकिन किसी भी राज्य ने इन्हें लागू नहीं किया. जानिए पूरा मामला.

भारत की सड़कों पर हर साल तकरीबन 1.77 लाख लोग अपनी जान गंवा देते हैं. यह आंकड़ा परेशान करने वाला है. साथ ही सड़क सुरक्षा को लेकर कई सवाल भी खड़े करता है. पिछले महीने सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों को कुछ कड़े सुरक्षा उपाय लागू करने के निर्देश दिए थे. लेकिन 34 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने जो जानकारी कोर्ट को सौंपी, उससे पता चलता है कि इन उपायों को किसी भी राज्य ने लागू नहीं किया. अदालत ने इन उपायों को लोगों की जान बचाने के लिए जरूरी बताया था.
सुप्रीम कोर्ट ने पांच सुरक्षा उपाय बताए
इंडियन एक्सप्रेस से जुड़े धीरज मिश्रा की रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने 26 मई के अपने आदेश में सभी राज्यों से पांच सुरक्षा उपाय लागू करने के लिए कहा था.
1. एक ही इमरजेंसी फोन नंबर.
2. GPS वाली एम्बुलेंस
3. 'गुड समैरिटन' (मदद करने वाले भले इंसान) के लिए कानून
4. ट्रॉमा रजिस्ट्री
5. बचाव का तरीका (रेस्क्यू प्रोटोकॉल)
ये पांच उपाय ‘गोल्डन आवर’ की तैयारी के लिए जरूरी हैं. यानी हादसे के बाद के शुरुआती 60 मिनट, जो जान बचाने के लिए बहुत अहम माने जाते हैं. सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश दिल्ली की सड़क सुरक्षा संस्था 'सेवलाइफ फाउंडेशन' की एक याचिका पर आया था, जिसमें सभी राज्यों में एक जैसा ट्रॉमा केयर सिस्टम बनाने की सलाह दी गई थी, ताकि हादसे के बाद तुरंत इलाज की व्यवस्था की जा सके.
इन 8 राज्यों ने इमरजेंसी नंबरों को '112' में नहीं मिलाया
सुप्रीम कोर्ट में जमा किए गए 1,200 पन्नों के दस्तावेजों को पढ़ने पर पता चलता है कि देश में सड़क हादसों से होने वाली हर तीन मौतों में से दो मौतें इन आठ राज्यों में होती हैं- उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, राजस्थान, बिहार और आंध्र प्रदेश. इनमें से सात राज्यों ने अभी तक अपने सभी इमरजेंसी नंबरों को '112' में नहीं मिलाया है. कर्नाटक ने इस बारे में जानकारी नहीं दी.
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 2019 में '112' नंबर को ‘नेशनवाइड इमरजेंसी रिस्पॉन्स सिस्टम’ (NERS) के तौर पर शुरू किया था. इसका मकसद पुलिस, फायर ब्रिगेड, मेडिकल, एम्बुलेंस, हाईवे, महिलाओं की सुरक्षा आदि के लिए अलग-अलग इमरजेंसी नंबरों को एक ही नंबर में मिलाना था. अलग-अलग इमरजेंसी के लिए बहुत सारे नंबर होने की वजह से लोगों में कन्फ्यूजन रहता था कि किस नंबर पर कॉल करें. NERS को इसी कन्फ्यूजन को दूर करने के लिए बनाया गया था.
'गुड समैरिटन' के लिए कानून
एक और अहम बात जो लोगों को सड़क पर मदद करने से रोकती है, वह है पुलिस या अस्पताल द्वारा बहुत सारे सवाल-जवाब करके परेशान किए जाने का डर. 2024 में हुई 1.77 लाख मौतों में से दो-तिहाई मौतें जिन आठ राज्यों में हुईं, उनमें से सिर्फ दो राज्यों महाराष्ट्र और कर्नाटक में ही 'गुड समैरिटन' के लिए शिकायत निवारण सिस्टम है. चार राज्यों में ऐसा कोई सिस्टम नहीं है. दो राज्यों ने इसकी जानकारी नहीं दी.
सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) ने 2020 में 'गुड समैरिटन नियम' जारी किए थे, ताकि हादसे में घायलों की मदद करने वाले लोगों को सुरक्षा दी जा सके. इस योजना के तहत जो कोई भी घायल की ‘गोल्डन आवर’ के भीतर इलाज दिलाने में मदद करता है, वह 25,000 रुपये के इनाम का हकदार होता है.
देश के सड़क नेटवर्क पर होने वाली मौतों को रोकने के लिए जरूरी ट्रॉमा-रिस्पॉन्स इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने में राज्य सुस्ती दिखा रहे हैं. यह इसलिए अहम है क्योंकि नीति आयोग-AIIMS की 2021 की 'इमरजेंसी एंड इंजरी केयर रिपोर्ट' के मुताबिक, देश में ट्रॉमा से जुड़ी कम से कम 30% मौतें इमरजेंसी केयर में देरी की वजह से होती हैं.
ट्रॉमा रजिस्ट्री बनाने में भी पीछे
फाइलों से यह भी पता चलता है कि ज्यादा मौतों वाले राज्य ट्रॉमा रजिस्ट्री बनाने में भी पीछे हैं और कई राज्य अभी भी मैनुअल डेटाबेस के आधार पर काम कर रहे हैं. ट्रॉमा रजिस्ट्री एक क्लिनिकल डेटाबेस है जो चोट लगने की जगह से लेकर एम्बुलेंस, अस्पताल में इलाज और डिस्चार्ज तक मरीज के सफर को ट्रैक करता है. आठ राज्यों में से पांच के पास ट्रॉमा रजिस्ट्री नहीं है. तीन राज्यों तमिलनाडु, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश ने कहा कि उनके पास ट्रॉमा रजिस्ट्री सिस्टम है.
एंबुलेंस में GPS नहीं
सभी 34 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में से केवल आठ में 'गुड समैरिटन' के लिए शिकायत प्रणाली है. 17 में सड़क दुर्घटना पीड़ितों के लिए रेस्क्यू प्रोटोकॉल है. 22 राज्यों में ट्रॉमा रजिस्ट्री नहीं है और 13 राज्यों में या तो GPS नहीं है या कुछ एम्बुलेंस में ही GPS है और वह भी सिर्फ सरकारी एम्बुलेंस में.
राज्यों ने क्या कहा?उत्तर प्रदेश में 2024 में सड़क हादसों में सबसे ज्यादा 24,118 (13.61%) मौतें हुईं. राज्य ने ज्यादातर इमरजेंसी नंबरों को 112 NERS से जोड़ दिया है, केवल 102 एम्बुलेंस सेवा का इंटीग्रेशन बाकी है. 'गुड समैरिटन' के लिए अलग शिकायत व्यवस्था नहीं है, बल्कि अस्पतालों में सामान्य शिकायत प्रणाली है, जहां 24 घंटे के भीतर शिकायत निपटाने का दावा किया गया है.
तमिलनाडु (सड़क हादसों में पहला और मौतों में दूसरा) ने इमरजेंसी नंबरों का ज्यादातर इंटीग्रेशन किया है. महाराष्ट्र ने बताया कि केवल MEMS-108 एम्बुलेंस में GPS सुविधा उपलब्ध है. मध्य प्रदेश में 'गुड समैरिटन' शिकायत प्रणाली अभी प्रक्रिया में है. राज्य ने ट्रॉमा केयर के लिए नई नीति बनाई है, जिसमें पुलिस, स्वास्थ्य विभाग, रोड पेट्रोल और सड़क एजेंसियों की जिम्मेदारियां तय की गई हैं.
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कर्नाटक के पास ट्रॉमा केयर रजिस्ट्री नहीं है और वह इसे केंद्र की नीति के अनुसार विकसित करेगा. फिलहाल केवल 108 आरोग्य कवच एम्बुलेंस की डैशबोर्ड से निगरानी होती है. राजस्थान में ट्रॉमा केयर रजिस्ट्री के लिए SOP तैयार किया जा रहा है.
बिहार में 'गुड समैरिटन' के लिए अलग शिकायत व्यवस्था नहीं है. ट्रॉमा का अलग रजिस्ट्रेशन भी नहीं होता, हालांकि एक्सीडेंट और इमरजेंसी के डेटा में इसे शामिल किया जाता है. आंध्र प्रदेश ने कहा कि उसने 112 NERS से पहले ही साल 2005 में 108 इमरजेंसी रिस्पॉन्स सेवा शुरू कर दी थी.
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