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3 महीने से ज्यादा उम्र के बच्चे को गोद लेने पर भी मिलेगी मैटरनिटी लीव, SC पैटरनिटी लीव पर क्या बोला?

सुप्रीम कोर्ट ने तीन महीने से बड़े बच्चों को गोद लेने वाली महिलाओं को भी मैटरनिटी लीव देने का आदेश दिया है. कोर्ट ने कहा कि बच्चे को जन्म देने वाली माता की तरह ही बच्चे को गोद लेने वाली मां को भी मैटरनिटी लीव मिलनी चाहिए. कोर्ट का मानना है कि बच्चे की देखभाल की जरूरत उम्र पर निर्भर नहीं करती.

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17 मार्च 2026 (अपडेटेड: 17 मार्च 2026, 06:48 PM IST)
 maternity leave supreme court adopted child
सुप्रीम कोर्ट ने मैटरनिटी लीव को लेकर बड़ा फैसला दिया है. (AI Image)
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सुप्रीम कोर्ट ने बच्चे को गोद लेने वाली महिलाओं के लिए बड़ा फैसला सुनाया है. कोर्ट ने कहा कि तीन महीने से ज्यादा उम्र के बच्चों को गोद लेने वाली महिलाओं को भी 12 हफ्ते की मैटरनिटी लीव देनी होगी. अभी तक तीन महीने से ज्यादा उम्र के बच्चों को गोद लेने पर महिलाओं को मैटरनिटी लीव नहीं मिलता थी.

इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गोद लेने वाली महिलाओं को भी जन्म देने वाली माताओं की तरह मैटरनिटी लीव लेने का अधिकार है. कोर्ट ने कहा कि तीन महीने से ज्यादा उम्र के बच्चों को मैटरनिटी लीव देने से मना नहीं किया  जा सकता. शीर्ष अदालत ने उस कानूनी प्रावधान को असंवैधानिक बता दिया है, जिसके तहत सिर्फ 3 महीने तक की उम्र के बच्चे को गोद लेने पर ही मैटरनिटी लीव मिलती थी. 

सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 की धारा 60 (4) में ये प्रावधान था कि गोद लेने वाली मां को 12 हफ्ते की मैटरनिटी लीव तभी मिलेगी, जब गोद लिया गया बच्चा 3 महीने से कम उम्र का हो. सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रावधान को अनुच्छेद 14 यानी समानता और अनुच्छेद 21 यानी जीने के अधिकार का उल्लंघन मानते हुए असंवैधानिक ठहरा दिया. 

जस्टिस पारदीवाला और जस्टिस महादेवन की बेंच ने साफ किया, 

“गोद लिए गए बच्चे की उम्र जितनी भी हो, बच्चे को गोद लेने वाली महिला को मैटरनिटी लीव का अधिकार मिलना ही चाहिए.”

कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि बच्चे को जन्म देने वाली माता की तरह ही बच्चे को गोद लेने वाली मां को भी मैटरनिटी लीव मिलनी चाहिए. कोर्ट का मानना है कि बच्चे की देखभाल की जरूरत उम्र पर निर्भर नहीं करती. 

कोर्ट ने 3 महीने की उम्र सीमा को हटाते हुए कहा,

“ये भेदभाव करने वाला नियम है. कोर्ट ने कहा कि बड़े बच्चे को गोद लेने वाली मां को भी बच्चे के साथ भावनात्मक रिश्ता बनाने और उसकी देखभाल के लिए समय की जरूरत होती है.”

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले के दौरान पिताओं की भूमिका पर भी बात की. उसने केंद्र सरकार को पितृत्व अवकाश (Paternal Leave) पर भी एक ठोस नीति बनाने की सलाह दी है. कहा कि बच्चे के पालन-पोषण में पिताओं की भी भागीदारी उतनी ही जरूरी है. इसलिए इसे 'सामाजिक सुरक्षा लाभ' के दायरे में लाना चाहिए.

कर्नाटक की वकील हमसानंदिनी नंदूरी की दायर की गई जनहित याचिका पर ये फैसला आया है. उन्होंने सामाजिक सुरक्षा संहिता की धारा 60 (4) को चुनौती दी थी, जिसके तहत तीन महीने से ज्यादा उम्र के बच्चे को गोद लेने पर मैटरनिटी लीव नहीं मिलती थी. उनका तर्क था कि उम्र से जुड़ा ये प्रतिबंध संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है.

वीडियो: सुप्रीम कोर्ट में 'इच्छा मृत्यु' पर फैसला सुनाते हुए जज क्यों भावुक हो गए?

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