अब नेत्रहीनों को जज बनने से कोई नहीं रोक पाएगा, सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया बड़ा फैसला
यह फैसला छह याचिकाओं पर सुनाया गया. इनमें से एक मामले में कोर्ट ने ही स्वतः संज्ञान लिया था. ये याचिकाएं कुछ राज्यों में न्यायिक सेवाओं में नेत्रहीन उम्मीदवारों को आरक्षण न दिए जाने के मुद्दे पर दायर की गई थीं. फैसला सुनाते हुए न्यायमूर्ति महादेवन ने कहा कि विकलांग व्यक्तियों के साथ किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं होना चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट ने न्यायपालिका में नेत्रहीन उम्मीदवारों की भूमिका को लेकर अहम फैसला सुनाया है. शीर्ष अदालत ने कहा है कि नेत्रहीन उम्मीदवारों को न्यायिक सेवा में नौकरी देने से रोका नहीं जा सकता. इसके अलावा कोर्ट ने मध्य प्रदेश के उस नियम को असंवैधानिक करार दिया, जो नेत्रहीन और दृष्टिहीन उम्मीदवारों को न्यायिक सेवाओं में नियुक्ति से रोकता था.
द हिंदू में छपी खबर के मुताबिक, यह फैसला छह याचिकाओं पर सुनाया गया. इनमें से एक मामले में कोर्ट ने ही स्वतः संज्ञान लिया था. ये याचिकाएं कुछ राज्यों में न्यायिक सेवाओं में नेत्रहीन उम्मीदवारों को आरक्षण न दिए जाने के मुद्दे पर दायर की गई थीं. फैसला सुनाते हुए न्यायमूर्ति महादेवन ने कहा कि विकलांग व्यक्तियों के साथ किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं होना चाहिए. उन्होंने कहा,
मध्य प्रदेश का नियम रद्द"अगर कटऑफ या प्रक्रिया में ऐसी कोई बाधा है जो विकलांग लोगों को बाहर कर देती है, तो उसे हटाया जाना चाहिए. यह जरूरी है ताकि सभी को बराबर का मौका मिल सके."
सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश सेवा परीक्षा नियम, 1994 के कुछ प्रावधानों को असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया. इन प्रावधानों के तहत नेत्रहीन और कमजोर दृष्टि वाले (low vision) उम्मीदवारों को न्यायिक सेवा में प्रवेश से वंचित किया गया था. ये दलीलें मध्य प्रदेश भर्ती नियमों के नियम 6ए और 7 की वैधता से संबंधित थीं.
लाइव लॉ में छपी खबर के मुताबिक कोर्ट ने राजस्थान न्यायिक सेवा परीक्षा से जुड़े विकलांग उम्मीदवारों की याचिका पर भी सुनवाई की. उनका तर्क था कि राजस्थान की न्यायिक सेवा की प्रारंभिक परीक्षा में उनके लिए अलग कट-ऑफ तय नहीं किया गया, जिसके कारण वे मुख्य परीक्षा में नहीं पहुंच सके.
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जो विकलांग (PWD) उम्मीदवार न्यायिक सेवा की परीक्षा में शामिल हुए हैं, उन्हें नए फैसले के मुताबिक फिर से चुने जाने का मौका मिलेगा. अगर वे सभी जरूरी योग्यताएं रखते हैं तो उन्हें खाली पदों पर नियुक्त किया जा सकता है.
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि विकलांग उम्मीदवारों के साथ ऐसा करना भेदभावपूर्ण होगा और सरकार को समावेशी नीति अपनानी होगी. इससे पहले सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने 7 नवंबर, 2024 को निर्देश जारी किए थे. इनमें कहा गया था कि देश भर में न्यायिक सेवाओं में 'बेंचमार्क विकलांगता' (40 प्रतिशत से अधिक विकलांग) वाले व्यक्तियों को समान अवसर देने होंगे.
कैसे शुरु हुआ ये मामला?लाइव लॉ में छपी खबर के मुताबिक, इस मामले की शुरुआत तब हुई जब एक नेत्रहीन उम्मीदवार की मां ने पूर्व CJI डीवाई चंद्रचूड़ को पत्र लिखा था. इसे संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत याचिका के रूप में स्वीकार किया गया. इसके बाद मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल, मध्य प्रदेश सरकार और केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया गया.
कोर्ट ने पाया कि परीक्षा में नेत्रहीन उम्मीदवारों के लिए आरक्षण नहीं दिया गया है. ये विकलांगता अधिकार अधिनियम 2016 के खिलाफ था. जिसके बाद कोर्ट ने अंतरिम आदेश जारी कर मिनिमम मार्क्स पाने वाले उम्मीदवारों को इंटरव्यू में शामिल करने की अनुमति दी थी.
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